Wednesday, July 22, 2020

नागपंचमी पर गुडिया पीटने पर समाज रोक लगाये महिला विरोधी प्रथायें,अब बर्दाश्त नहीं.डॉ वीना गुप्ता

            सामाजिक न्याय और समानता में यकीन  करने वाला हर स्त्री पुरुष आवाज़ उठाये                                                                .



                                                     महिला पुरुष असमानता को बढ़ने वाली समाज में बहुत सी मान्यताएं, प्रथाएं, और रूढ़ियाँ हैं. उन सब के विस्तार में ना जाकर आज में इस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक प्रचलित कुरीति के बारे में बताने जा रही हूं,जो ना सिर्फ स्त्री विरोधी बल्कि स्त्री हिंसा को सही ठहराने की मानसिकता विकसित करती है। परंपरा के नाम पर यह पाखंड लड़कों के मन में यह मानसिकता डालता है कि लड़कियों को पीटना बहुत सामान्य सी चीज है और लड़कियों के मन में भी यह डर अगर वह गलती करें तो उनकी पिटाई होना सामान्य सी घटना है। शायद कुछ लोग शोध करें तो बताएं कि इस प्रथा के क्या क्या सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हैं, पर यह है बहुत भयावह और बर्बर रिवाज़ .

रिवाज़ इस प्रकार है कि  नाग पंचमी के दिन छोटी लड़कियां अपनी थाली में सजाकर अपनी गुड़िया को लेकर और साथ में मिठाई वगैरह लेकर गांव में तालाब की तरफ जाती हैंवहां पर लड़के मिठाई खा लेते हैं और लड़कियां गुड़िया को पानी में फेंक देती हैंं और लड़के गुड़िया कोे खुशी से पीटते हैं.

जब कुछ लोगों से इस बारे में बात की तो उन्होंने इस रिवाज़ के पीछे चार प्रचलित कहानियां बतायीं, कहानियां तो कई हैं, पर उनके निष्कर्ष निम्न लिखित हैं -

  • दो कहानियों का निष्कर्ष है कि औरतों के पेट में बात नहीं रुकती इसलिए उन्हें श्राप मिला है कि वह साल में दिन पीटी जाएंगी
  •  दूसरी कहानी का निष्कर्ष है की ओर से सोच कर कुछ काम नहीं करती इसलिए उन्हें श्राप मिला है कि वह साल में दिन पीटी जाएंगे.
  • तीसरी कहानी का निष्कर्ष है की स्त्री ने अगर प्रेम किया,  तो फिर पूरा समाज  मिलकर पीटेगा। महिला के परिवार को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को यह हक है कि यदि महिला अपनी इच्छा से किसी से प्रेम करें तो समाज द्वारा पीटा जाना न्याय संगत है।

जो स्त्री घर में मान बहन बेटी बनकर हमारे रिश्तों में बंधी है, उसी के स्त्री के प्रतीक के रूप में गुड़िया को बेरहमी के साथ छड़ी से पीट-पीटकर उसे तहस-नहस कर देते हैं। लड़कों के लिए यह उत्सव है लेकिन लड़कियों के मन में यह डराने वाला अनुभव है। किसी भी लड़की को अपनी प्रिय गुड़िया को पीटा जाना, पीट-पीटकर खत्म कर दिया जाना उसे अंदर तक दुखी कर जाता है। और जब इस परंपरा के लिए तैयारी होती है और इसको किया जाता है तो निश्चित ही घर में परिवार में समाज में इसकी चर्चा भी होती होगी कि इस पर्व और रिवाज़ को क्यों मनाया जाता है. ये भी बताया जाता होगा कि औरत के पेट में बात नहीं पच सकती या उसे अकल नहीं होती, बिना सोचे समझे काम कर गुजराती है, या फिर किसी से प्रेम कर लिया तो ये तो सब से बड़ा अपराध कर दिया. यह सारी बातें एक ऐसी मानसिकता का निर्माण करती है जो स्त्री को कमतर समझने, उसे कम अक्ल समझने, और स्त्री हिंसा को जायज ठहराने की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं।

समाज में गैर बराबरी और भेदभाव को सही ठहराने के लिए बहुत सी सांस्कृतिक परंपराएं और प्रथाएं समाज में चली आ रही हैं । आज उच्च शिक्षित होकर और आधुनिक जीवन की सारी सुविधाओं को पाकर भी समाज सामाजिक न्याय और की बराबरी के मूल्यों को आत्मसात नहीं कर पा रहा है. इन मूल्यों को अपनाना तो दूर कि बात, बल्कि उसके अंदर की हिंसा और नफरत लगातार बढ़ती जा रही है. हमारे भारतीय समाज में और खासकर उत्तर प्रदेश में स्वयं की श्रेष्ठता और दूसरों को कमतर समझने की भावना इतनी गहराई से व्याप्त है की अपने परिवार में भी ये असमानता और नफ़रत बनी राखी है.

जी हां यह नफरत, यह अपने से कमतर समझने का भाव, स्वयं को सर्व श्रेष्ठ समझने का भाव, बनाये रखने के लिए दूसरों को लगातार नीचा दिखाना भी ज़रूरी होता है. सर्वोच्चता के इसी अहंकार को बनाये , इस असमानता को बनाये रखने, यथास्थिति को स्थिर रखने के लिए समाज का उच्च वर्ग अपने पद व् पावर से ऐसे माहौल को बनाए रखता है कि कमज़ोर बिना कहे ही सर नीचा रखे. 

समाज में इतनी ज्यादा स्त्री विरोधी परंपरा , प्रथा, रिवाज़ और लोकाचार हैं कि कि खुद स्त्रियां भी चाहे या ना चाहे पर उन्हें परिवार, या लोकाचार के नाम पर निभाहने ही पड़ते हैं. बहुत ही सीमित परिवेश में रह रही in महिलाओं के लिए त्यौहार ही  मायके वालों से मिलने, समाज से मिलने या बाज़ार के दर्शन का और रूटीन ज़िन्दगी से अलग कुछ करने का अवसर देते हैं.

कुछ तो अंध आस्था के कारण तो कुछ खुद को परिवार कि नज़र में श्रेष्ठ साबित करने के लिए महिलायें भी खूब बढ़ चढ़ कर भाग लेती हैं. हमारे ऐसे सैकड़ों रिवाज और प्रथाएं हैं जो स्त्री विरोधी हैं ।

मैंने अपने जीवन में हिंसा के  हिंसा के बहुत से मामले देखें और बहुत नजदीक से देखें। लेकिन इस परंपराके नाम में ही अंदर से हिला दिया। इस उत्सव का नाम है गुड़िया पीटने की परंपरा । मन के अंदर बैठीमासूम सी गुड़िया को पीट पीट कर मारने कि कल्पना ने ही मन को बेचैन कर दिया। इस तरह की परंपराओं या रिवाजों को बिल्कुल रोकने की जरूरत है। परंपरा के नाम पर बर्बरता हिंसा और दासता का महिमामंडन नहीं  करने दिया जा सकता। किसी महिला  पर होने वाले अत्याचार से कहीं ज्यादा खतरनाक है मन के अंदर बल्कि बाल मन के अंदर हिंसा के प्रति आकर्षण और सजा के रूप में हिंसा को सही ठहराती लड़कों को भी नहीं पता जिस खुशी से हो गुड़िया को छड़ी से पीटते हैं उनके मन के अंदर क्या बदलाव ला रही है, या उन लड़कियां जिनकी गुड़िया को पीटा जा रहा है उनकेदिल पर क्या गुजर रही है कैसा डर और वहशत उनके दिल पर गुजर रही होगी ।

क्या यह परंपरा इस बात को बढ़ावा नहीं देगी कि घर की हर चीज पर पहला हक लड़के का है कि घर की महत्वपूर्ण बातें लड़की या औरतों को मत बताओ। औरतों से राय मत करो क्योंकि उनमें समझ कम होती है. लड़की अगर किसी काम से भी बिना किसी आकर्षण के किसी लड़के से बात करें तो उस पर हिंसा करना उसके भाई का ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लड़कों के लिए जायज है। 

 

यही परम्पराओं के नाम पर वे रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ हैं, जो लड़कियों के प्रति in पूर्व धारणाओं को कि लड़की के पेट में बात नहीं रुकती, या वह कोई भेद नहीं रख सकती, कम अक्ल होती है हमेशा समाज में उसके प्रति रहती हैं. लड़की कितना भी पढ़ ले नौकरी कर ले लेकिन समाज की नजर में यही नजरिया उनके प्रति रहता है. अगर कोई पति अपनी पत्नी से मशविरा कर ले, और इत्तफाक से उसकी सलाह को मान भी ले, तो उसे बड़ा निंदनीय मन जाता है. और इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि स्त्री खुद खुद अपने न से अपने को भी इसी लायक समझाने लगाती है. अपवाद बहुत सारे हैं बहुत सारी लड़कियां परंपराएं तोड़कर आगे आ रही हैं, आगे भी बढ़ रही है.

रूलिंग क्लास समाज को नियंत्रित करने के बहुत से तरीके अपनाती है, रिवाजों,परम्पराओं के नाम पर स्त्री दासता के विसुअल्स का महिमा मंडन, स्त्री को बदलाव के लिए प्रयास करने से रोकता है. वह खुद हीन भावना से ग्रस्त हो जाती है. स्त्री कि पिटाई होने पर कोई बीच में नहीं बोलता, अधिकांश लौग सोचते हैं कि औरत कि ही गलती होगी. ये तो आज कि हकीकत है कि पुलिस ठाणे में औरत रिपोर्ट दर्ज करने जाए तो पुलिस का पूछ ताछ का तरीका ऐसा होता है कि जैसे वही स्त्री पीड़ित नहीं, बल्कि ज़ुल्म करने वाली है. 

किसी भी परंपरा या प्रथा को बिना सोचे समझे मनाते रहना तार्किक रूप से विचार ना करना , उसे आलोचनात्मक रूप से ना देखना एक सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है। इसलिए आधुनिक होना ही काफी नहीं है प्रगतिशील होना भी जरूरी है और समाज के प्रगतिशील जनवादी और समतावादी मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोगों को अपने परिवारों में इस प्रथा को रोकना चाहिए समाजके डर से यह सब कर रहे हैं इसलिए हम भी करें ऐसी दलील ना दें, इससे बड़ी कमजोर दलील और कोई हो ही नहीं सकती ।

कहानियां चाहे जो कहें पर एक कुरीति को, समाज विरोधी रुढ़ि को मानना बंद करना चाहिए. परंपरा के नाम पर महिलाओं को अपमानित करने वाली परम्पराओं के खिलाफ औरतों को ही नहीं पुरुषों को भी खड़ा होना चाहिए. में सभी युवाओं से भी अपील करुँगी कि वे गुडिया पीटने कि प्रथा में भागीदारी ना करें, त्यौहार ख़ुशी मानाने के लिए होते हैं, किसी का मन दुखी करके क्या हम खुश रह सकते हैं.

इसलिए मिलकर खुशी से साथ साथ इस पर्व पर सब मिलकर गुडिया को झूला झुलायें, अन्य सांस्क्रतिक और खेल कि गतिविधियाँ करें .

महिलाओं के ऊपर बढती हिंसा के हालात में ये ज़रूरी है कि लोग इस कुप्रथा के खिलाफ तार्किक बात रखें, अंध-श्रधा का विरोध करें.

परिशिष्ट : गुडिया पीटने की परंपरा से जुड़े मिथक और लोक कहानियाँ  


  1. पहली कहानी : पुरानी कथाओं के अनुसार गरुड़ को नागों का शत्रु माना जाता है। ये कथा भी एक नाग एवं एक गरुड़ की हैं। जिसमें एक नाग एक गरुड़ से अपनी जान बचाने का प्रयास कर रहा था और यहाँ वहाँ छिपता फिर रहा था। बचते बचाते इधर उधर भागते समय उसे एक स्त्री दिखाई दी। उसने उस स्त्री से प्रार्थना की कि वो उसे कहीं छुपा ले जिससे कि वो उस गरुड़ से बच सके। महिला ने नाग को छिपा तो लिया। किंतु स्वभाववश वह इस बात को ना छुपा सकी कि उसने एक सर्प को छुपाया है। उस स्त्री ने एक-एक करके सभी को यह बात बता डाली कि उसने एक नाग को गरुड़ से बचाने के लिए छिपाया है। इससे नागदेव ने क्रोधित होकर महिला को श्राप दे दिया। कि साल में एक बार एक ऐसा दिन आया करेगा जब तुम सब पीटी जाओगी। यही कारण है कि यह आज भी एक कथा के रूप में प्रचलित है। इस कथा के अनुसार ऐसा करना एक परम्परा ही बन गयी। नाग पंचमी के दिन इसे एक श्राप पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। लड़कियां कपड़े की गुड़िया बनाकर पास की नदी या तालाब में गुड़िया को फेंकती है और लड़के उन गुड़िया की पिटाई करते हैं।








  1. दूसरी कहानी: कहा जाता है कि तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी. इसके बाद तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या की शादी राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में हुई, जब वह व्याह कर ससुराल आई तो उसने यह राज एक सेविका को बताया और कहा कि वह किसी से न बोले. लेकिन उस सेविका ने इस बात को किसी दुसरे महिला को बता दी. इस तरह से यह बात पूरे नगर में फ़ैल गयी. इस बात से क्रोधित होकर तक्षक के राजा ने नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया. उसे इस बात का गुस्सा था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती. तभी से गुड़िया पीटने की परंपरा मनाई जाती है.

  2. तीसरी कहानी : भाई-बहन की कहानी से जुड़ी है भाई भगवान शिव का परम भक्त था और वह रोज मंदिर जाता था. मंदिर में उसे एक नागदेवता के दर्शन होते थे. वह लड़का रोजाना उस नाग को दूध पिलाने लगा और धीरे-धीरे दोनों में प्रेम हो गया. इसके बाद लड़के को देखते ही सांप अपनी मणि छोड़कर उसके पैरों में लिपट जाता था. इसी तरह एक दिन सावन के महीने में भाई-बहन मंदिर गए थे. मंदिर में नाग लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया. बहन ने जब देखा तो उसे लगा की नाग उसके भाई को काट रहा है. बहन ने अपने भाई की जान बचाने के लिए नाग को पीट-पीट कर मार डाला. इसके बाद जब भाई ने पूरी कहानी सुनाई तो लड़की रोने लगी. फिर लोगों ने कहा कि नाग देवता का रूप होते हैं इसलिए दंड तो मिलेगा चूंकि यह गलती से हुआ है इसलिए कालांतर में लड़की की जगह गुड़िया को पीटा जाएगा.

  3. ये कहानी राजा की बेटी की हैं  राजा की बेटी थी, जिसका नाम गुडिया था। वह दूसरे राज्य के राजा के बेटे से प्रेम करने लगती है। दुश्मन राज्य के युवराज से प्रेम की बात गुडिय़ा के भाइयों को स्वीकार नहीं होती जिसके चलते वह गुडिय़ा की बीच चौराहे पर पिटाई कर देते हैं। उसे चौराहे पर इतना पीटा जाता है कि उसकी मौत हो जाती है। गुडिय़ा की मौत के बाद उसके सातों भाई समाज में यह घोषणा करते हैं कि जो भी ऐसा करेगा, उसे चौराहे पर इसी तारह पीट-पीट कर मार दिया जायेगा.  इसके बाद हर साल गुडिया पीटने की प्रथा शुरू हुई. 

  4. नोट :  भाषा वैज्ञानिक ही बता सकते हैं कि गुडिया शब्द की उत्पत्ति, इस प्रथा से जुडी है या नहीं. 

  1. गुड्डा गुडिया के खेल और लोरियां गुजरे जमाने की बात है। नागपंचमी के दिन हम बच्चे नदी तालाब में पुतरी पीटने जाते थे। गर्मी की छुट्टियों में दो महीने जिज्जी लोग पुतरा-पुतरी बनाती थीं। उनकी शादी भी होती थी। नागपंचमी के आसपास स्कूल शुरू होती थी तो पुतरी-पुतरे समारोह पूर्वक विसर्जित किए जाते थे। हम लोग बेसरम के डंडों से उन पुतरों को पीटपीट कर लड़कियों को चिढाते थे।            जयराम शुक्ल, कवि,(ने अपने बचपन को याद करते हुए लिखा है)  साभार सोशल मीडिया 



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