साहिर लुधियानवी (८ मार्च १९२१ - २५ अक्तूबर १९८०) एक प्रसिद्ध शायर तथा गीतकार थे । इनका जन्म लुधियाना में हुआ था और लाहौर (चार उर्दू पत्रिकाओं का सम्पादन, सन् १९४८ तक) तथा बंबई (१९४९ के बाद) इनकी कर्मभूमि रही।साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी साहिर है। उनका जन्म 8 मार्च 1921 में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। हँलांकि इनके पिता बहुत धनी थे पर माता-पिता में अलगाव होने के कारण उन्हें माता के साथ रहना पड़ा और गरीबी में गुजर करना पड़ा। साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् 1939 में जब वे गव्हर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।सन् 1943 में साहिर लाहौर आ गये और उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली कविता संग्रह तल्खियाँ छपवायी। ' तल्खियाँ ' के प्रकाशन के बाद से ही उन्हें ख्याति प्राप्त होने लग गई। सन् 1945 में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक बने। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक बने और इस पत्रिका में उनकी किसी रचना को सरकार के विरुद्ध समझे जाने के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ वारण्ट जारी कर दिया। उनके विचार साम्यवादी थे । सन् 1949 में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे बंबई (वर्तमान मुंबई) आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक बने।
फिल्म आजादी की राह पर (1949) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान, जिसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे, के लिये लिखे गीतों से मिली। फिल्म नौजवान का गाना ठंडी हवायें लहरा के आयें ..... बहुत लोकप्रिय हुआ और आज तक है। बाद में साहिर लुधियानवी ने बाजी, प्यासा, फिर सुबह होगी, कभी कभी जैसे लोकप्रिय फिल्मों के लिये गीत लिखे। सचिनदेव बर्मन के अलावा एन. दत्ता, शंकर जयकिशन, खय्याम आदि संगीतकारों ने उनके गीतों की धुनें बनाई हैं।उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जितना ध्यान औरों पर दिया उतना खुद पर नहीं । वे एक नास्तिक थे तथा उन्होंने आजादी के बाद अपने कई हिन्दू तथा सिख मित्रों की कमी महसूस की जो लाहौर में थे । उनको जीवन में दो प्रेम असफलता मिली - पहला कॉलेज के दिनों में अमृता प्रीतम के साथ जब अमृता के घरवालों ने उनकी शादी न करने का फैसला ये सोचकर लिया कि साहिर एक तो मुस्लिम हैं दूसरे ग़रीब, और दूसरी सुधा मल्होत्रा से । वे आजीवन अविवाहित रहे तथा उनसठ वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया
साहिर को समाज की हर नाइंसाफ़ी में अपने उस पिता का चेहरा नज़र आता था, जिससे डरकर उनकी माँ उन्हें लुधियाना से इलाहाबाद ले आई थी । उनकी मशहूर नज़्म ‘ ताजमहल’ पिता के इसी प्रतीकात्मक रूप के ख़िलाफ़ उनका काव्यात्मक कमेंट था । उनकी पंक्तियाँ हमारी बोलचाल का मुहावरा बन चुकी हैं -
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे
अब जब जब भी परछाइयाँ की सड़क से मैं गुज़रता हूँ तो साहिर की उस कविता की वे पंक्तियाँ जो उन्होंने अमृता प्रीतम को समर्पित की थीं गूंजने लगती हैं ।
तू भी कुछ परेशान है / तू भी सोचती होगी
तेरे नाम की शोहरत तेरे काम क्या आई ,
मैं भी कुछ पशेमां हूँ / मैं भी गौर करता हूँ
मेरे काम की अज़मत मेरे काम क्या आई ।
—————निदा फ़ाज़ली (विराने में टहलती यादों की परछाइयाँ इक लेख से ।) वाणी प्रकाशन , तमाशा मेरे आगे, प्रथम संस्करण 2006
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“ तल्खियाँ “ दूसरा एडिशन ,1945 , लाहौर (उर्दू)
भूमिका : अहमद नदीम क़ासमी
“तल्खियाँ “ 23 वाँ एडिशन, नवंबर,1980 , स्टार बुक सेन्टर दिल्ली ।
भूमिका : अमृता प्रीतम
“आओ कि कोई ख़्वाब बुनें” 1973 , नई दिल्ली (उर्दू)
“गाता जाये बंजारा “ 1974,नई दिल्ली (उर्दू)
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तस्वीर में :
साहिर के पिताजी (चौधरी फ़ज़ल मोहम्मद ,मृत्यु :1964)
अमृता के पिताजी : ( सरदार करतार सिंह ‘हितकारी’ )
अमृता ,1938 ,( लाहौर रेडियो स्टेशन ,रिकार्डिंग स्टूडियो)
जन्म : 8 मार्च 1921, लुधियाना
मृत्यु :25 अक्टूबर 1980, बंबई अब (मुंबई)
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साहिर लुधियानवी सही मानें में जादूगर शायर थे । जो इज़्ज़त और अहमियत हिन्दुस्तान की फ़िल्मी दुनिया में साहिर को हासिल थी, फिर किसी को नशीब न हुई । वह एक सच्चे और फ़ितरी शायर थे। उनका मजमुआ ‘तल्खियाँ ‘ बीसियों बार साया हुआ। इतनी मक़बूलियत उस ज़माने में उर्दू की किसी दूसरी किताब को न मिली । तक़रीबन पच्चीस -तीस वर्षों तक साहिर फ़िल्मी दुनिया के मकबूलतरीन शायर रहे ।
ग़ज़ल, नज़्म,गीत, भजन सब इसनाफ पर उनको ज़बरदस्त कुदरत हासिल थी । ‘तल्खियाँ ‘ के बाद उनका एक मजमुआ ‘ गाता जाए बंजारा, साया हुआ ।‘परछाइयाँ ‘ अमन-आलम के मौजू पर तवील नज़्म है जो एक किताब के रूप में साया हुई पर बाद में इसे उनके मजमुआ ‘आओ कि कोई ख़्वाब बुनें’ साया हुई ,उसमें शामिल की गई जिसकी भूमिका अली सरदार जाफ़री ने लिखी थी ।
साहिर को हुकुमत हिन्द ने 1971 में पद्मश्री का ख़िताब दिया और 1972 में सोवियत लैंड नेहरू एवार्ड पेश किया गया । उनकी मक़बूलियत का यह आलम था कि सड़कों और फ़ौजी चौकियों के नाम उनके नाम पर रखे गए ।
साहिर की की शायरी में बेसाख़्तगी, घुलावट,और ता ग़ज़ल की कैफ़ियत शुरू ही से मिलती है ।उनके लहजे में अजीबोग़रीब रंगीन और शादाबी थी, जिस मौजू को भी साहिर ने छुआ उसे लतीफ़ व रंगीन बना दिया । एहसास की दिलावेजी और रोमानियत की दिलकशी उनकी मक़बूलियत का सबसे बड़ा राज है। उनके यहाँ बनावट और तसन्नो ( दिखावा) नाम का भी नहीं और जज़्बात बहा ले जानेवाली कैफ़ियत है जो दामने -दिल को खींचतीं है और समाँ बांध देती है ।
- डा.गोपी चन्द नारंग
संम्पर्क सूत्र : उर्दू से देवनागरी में मैंने पेश किया ।
फ़न और शख़्सियत - 1994 बंबई संपादक- साबिर दत्त (उर्दू) से साभार !
साहिर लुधियानवी
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन[1] दौर[2] की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र[3] फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम[4] उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न[5] के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न[6] के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी[7] के, फ़रोग़-ए-वतन[8] के ख़्वाब
ज़िन्दाँ[9] के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन[10] के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल[11] के असास[12] थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात[13]
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग[14] है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
शब्दार्थ
कठिन
समय
सारी उम्र
तेज़ चलने वाली
कला की उँचाई तक पहुँचना
बेहतरीन कविता
जीने की कला
देश का विकास
जीवन
फ़ाँसी तक जाने वाला रस्ता
साकार करना
नींव
जीवन
पत्थर के नीचे हाथ दब जाना (मजबूरी)
श्रेणियाँ:
अहले-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं
हम पे ही ख़त्म नहीं मस्लक-ए-शोरीदासरी
चाक दिल और भी हैं चाक क़बा और भी हैं
क्या हुआ गर मेरे यारों की ज़ुबानें चुप हैं
मेरे शाहिद मेरे यारों के सिवा और भी हैं
सर सलामत है तो क्या संग-ए-मलामत की कमी
जान बाकी है तो पैकान-ए-कज़ा और भी हैं
मुंसिफ़-ए-शहर की वहदत पे न हर्फ़ आ जाये
लोग कहते हैं कि अरबाब-ए-जफ़ा और भी हैं
मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
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मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है
मुझे हंगामा-ए-जंग-ओ-जदल में कैफ़ मिलता है
मेरी फ़ितरत को ख़ूँरेज़ी के अफ़सानों से रग़्बत है
मेरी दुनिया में कुछ वक्त नहीं है रक़्स-ओ-नग़्में की
मेरा महबूब नग़्मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है
मगर ऐ काश! देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को
मैं जब तारों पे नज़रें गाड़कर आसूँ बहाता हूँ तसव्वुर बनके भूली वारदातें याद आती हैं
तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्दत से पहरों तिल्मिलाता हूँ
कोई ख़्वाबों में ख़्वाबीदा उमंगों को जगाती है
तो अपनी ज़िन्दगी को मौत के पहलू में पाता हूँ
मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत के नज़ारों से उल्फ़त है
मेरा दिल दुश्मन-ए-नग़्मा-सराई हो नहीं सकता
मुझे इन्सानियत का दर्द भी बख़्शा है क़ुदरत ने
मेरा मक़सद फ़क़त शोला नवाई हो नहीं सकता
जवाँ हूँ मैं जवानी लग़्ज़िशों का एक तूफ़ाँ है
मेरी बातों में रन्ग-ए-पारसाई हो नहीं सकता
मेरे सरकश तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है
कि जब मैं देखता हूँ भूक के मारे किसानों को
ग़रीबों को, मुफ़लिसों को, बेकसों को, बेसहारों को
सिसकती नाज़नीनों को, तड़पते नौजवानों को
हुकूमत के तशद्दुद को, अमारत के तकब्बुर को
किसी के चिथड़ों को और शहन्शाही ख़ज़ानों को
तो दिल ताब-ए-निशात-ए-बज़्म-ए-इश्रत ला नहीं सकता
मैं चाहूँ भी तो ख़्वाब-आवार तराने गा नहीं सकता
शब्दार्थ
सरकश - सरचढ़े । जंग-ओ-जदल - युद्ध और संघर्ष । कैफ़ - शांति । खूँरेजी - खूनखराबा । रग्बत - स्नेह । रक्स - नृत्य । आहंग - आलाप । तसव्वुर - खयाल, विचार याद । सोज - जलन । शिद्दत - तेज, प्रचण्डता । उल्फत - प्रेम । नग्मासराई - नग्में गाने वाला । फ़कत - केवल, सिर्फ़ । मुफ़लिस - गरीब । तकब्बुर - मगरूर, गुमान । ताब-ए-निशात - खुशी की जलन । बज़्म-ए-इश्रत - समाज की भीड़ या महफ़िल
मेरे गीत तुम्हारे हैं / साहिर लुधियानवी : साहिर लुधियानवी
मेरे गीत तुम्हारे हैं / साहिर लुधियानवी
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अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी
मौत के क़दमों की आहट भी, जीवन की अंगड़ाई भी
मुस्तकबिल की किरणें भी थीं, हाल की बोझल ज़ुल्मत भी
तूफानों का शोर भी था और ख्वाबों की शहनाई भी
आज से मैं अपने गीतों में आतश–पारे भर दूंगा
मद्धम लचकीली तानों में जीवन–धारे भर दूंगा
जीवन के अंधियारे पथ पर मशअल लेकर निकलूंगा
धरती के फैले आँचल में सुर्ख सितारे भर दूंगा
आज से ऐ मज़दूर-किसानों ! मेरे राग तुम्हारे हैं
फ़ाकाकश इंसानों ! मेरे जोग बिहाग तुम्हारे हैं
जब तक तुम भूके-नंगे हो, ये शोले खामोश न होंगे
जब तक बे-आराम हो तुम, ये नगमें राहत कोश न होंगे
मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें
फ़िक्रों-सुखन के ताजिर मेरे शे’रों को अशआर न मानें
मेरा फ़न, मेरी उम्मीदें, आज से तुमको अर्पन हैं
आज से मेरे गीत तुम्हारे दुःख और सुख का दर्पन हैं
तुम से कुव्वत लेकर अब मैं तुमको राह दिखाऊँगा
तुम परचम लहराना साथी, मैं बरबत पर गाऊंगा
आज से मेरे फ़न का मकसद जंजीरें पिघलाना है
आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊंगा
श्रेणी:नज़्म
सुबहे-नौरोज़ / साहिर लुधियानवी
सुबहे-नौरोज़ / साहिर लुधियानवी
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सुबहे-नौरोज़[1]
फूट पड़ी मशरिक से किरने
हाल बना माज़ी[2] का फ़साना, गूंजा मुस्तकबिल[3] का तराना
भेजे हैं एहबाब[4] ने तोहफ़े, अटे पड़े हैं मेज़ के कोने
दुल्हन बनी हुई हैं राहें
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के[5]
निकली है बंगले के दर से
इक मुफ़लिस दहकान[6] की बेटी, अफ़सुर्दा, मुरझाई हुई-सी
जिस्म के दुखते जोड़ दबाती, आँचल से सीने को छुपाती
मुट्ठी में इक नोट दबाये
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के
भूके, ज़र्द, गदागर[7] बच्चे
कार के पीछे भाग रहे हैं, वक़्त से पहले जाग उठे हैं
पीप भरी आँखें सहलाते, सर के फोड़ों को खुजलाते
वो देखो कुछ और भी निकले
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के
शब्दार्थ
↑ नव-दिवस का प्रभात
↑ अतीत
↑ भविष्य
↑ मित्र
↑ नववर्ष के
↑ किसान
↑ भिखारी
जश्ने ग़ालिब / साहिर लुधियानवी
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(यह नज़्म 1968 में लिखी गई)
इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,
तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।
तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,
अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।
सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,
अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।
उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,
यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।
जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,
उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।
आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,
मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।
जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,
उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।
ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,
उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।
ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,
कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,
मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।
यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,
हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।
गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,
हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं ।
तुर्बत= क़ब्र; मसकन= निवासस्थान; अक़ीदत - श्रद्धा, वादा-ए-फ़रदा= कल के लिए किया गया वायदा
ताजमहल / साहिर लुधियानवी
ताजमहल / साहिर लुधियानवी
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ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त[1]ही सही
तुझको इस वादी-ए-रंगीं[2]से अक़ीदत[3] ही सही
मेरी महबूब[4] कहीं और मिला कर मुझ से!
बज़्म-ए-शाही[5] में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त[6] जिस राह में हों सतवत-ए-शाही[7] के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी
मेरी महबूब! पस-ए-पर्दा-ए-तशहीर-ए-वफ़ा[8]
तू ने सतवत[9] के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर[10] से बहलने वाली
अपने तारीक[11] मकानों को तो देखा होता
अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़[12] न थे जज़्बे[13] उनके
लेकिन उन के लिये तशहीर[14] का सामान नहीं
क्योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस[15] थे
ये इमारात-ओ-मक़ाबिर,[16] ये फ़सीलें,[17]ये हिसार[18]
मुतल-क़ुलहुक्म[19] शहंशाहों की अज़मत के सुतूँ[20]
सीना-ए-दहर[21]के नासूर हैं ,कुहना[22] नासूर
जज़्ब है[23] जिसमें तेरे और मेरे अजदाद[24] का ख़ूँ
मेरी महबूब ! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सन्नाई[25] ने बख़्शी[26] है इसे शक्ल-ए-जमील[27]
उन के प्यारों के मक़ाबिर[28] रहे बेनाम-ओ-नमूद[29]
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ंदील[30]
ये चमनज़ार[31] ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श [32]दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!
शब्दार्थ
प्रेम का द्योतक
रमणीय स्थान
श्रद्धा
प्रेयसी
बादशाहों के दरबार
अंकित
राजसी वैभव
प्रेम के विज्ञापन के परदे के पीछे
राजसी वैभव
मक़बरों
अंधेरे
पवित्र
भावनायें
विज्ञापन
निर्धन
भवन और मक़बरे
परिकोटे
क़िले
आदेश देने में स्वतन्त्र
वैभव के खम्भे
संसार के वक्षस्थल के
पुराने
समाया हुआ है
पूर्वजों
कारीगरी
प्रदान की है
सुन्दर रूप
मक़बरे
अनाम और बिना निशान के
मोमबती
उद्यान
नक़्क़ाशी किए हुए
साहिर लुधियानवी
फ़नकार / साहिर लुधियानवी
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फ़नकार[1]
मैंने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ
आज दुक्कान पे नीलाम उठेगा उनका
तूने जिन गीतों पे रक्खी थी मोहब्बत की असास[2]
आज चाँदी के तराज़ू में तुलेगी हर चीज़
मेरे अफ़कार[3], मिरी शायरी, मिरा एहसास
जो तिरी ज़ात से मंसूब थे[4] उन गीतों को
मुफ़लिसी जिन्स[5] बनाने पर उतर आई है
भूक, तेरे रुख़े-रंगों के[6] फ़सानों के इवज़
चंद अशिया -ए- ज़रूरत की[7] तमन्नाई है
देख इस अर्सागहे - मेहनतो – सर्माया[8] में
मेरे नग्मे भी मिरे पास नहीं रह सकते
तेरे जलवे किसी ज़रदार[9] की मीरास सही
तेरे ख़ाके[10] भी मिरे पास नहीं रह सकते
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ
मैंने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे
शब्दार्थ
↑ कलाकार
↑ नींव
↑ रचनाएँ
↑ सम्बंधित थे
↑ खाद्य पदार्थ
↑ रंगीन चेहरे के
↑ ज़रूरत की चीज़ों की
↑ मेहनत और पूँजी के युद्ध-क्षेत्र में
↑ पूंजीपति
↑ रेखाचित्र
लब पे पाबन्दी नहीं एहसास पे पहरा तो है / साहिर लुधियानवी
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लब पे पाबन्दी नहीं एहसास पे पहरा तो है
फिर भी अहल-ए-दिल को अहवाल-ए-बशर कहना तो है
अपनी ग़ैरत बेच डालें अपना मसलक़ छोड़ दें
रहनुमाओ में भी कुछ लोगों को ये मन्शा तो है
है जिन्हें सब से ज्यादा दावा-ए-हुब्ब-ए-वतन
आज उन की वजह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है
बुझ रहे हैं एक एक कर के अक़ीदों के दिये
इस अन्धेरे का भी लेकिन सामना करना तो है
झूठ क्यूं बोलें फ़रोग़-ए-मस्लहत के नाम पर
जि़न्दगी प्यारी सही लेकिन हमें मरना तो है
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं / साहिर लुधियानवी
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं / साहिर लुधियानवी
साहिर लुधियानवी »
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रुह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं
रुह क्या होती है इससे उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं
रुह मर जाती है तो ये जिस्म है चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज
लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे
वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज
जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हम में है बे-इल्म परिन्दों में नहीं
हम जो इनसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हमसा वहशी कोई जंगल के दरिन्दों में नहीं
इक बुझी रुह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ
मैं न ज़िन्दा हूँ कि मरने का सहारा ढूँढ़ूँ
और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूँ
कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ
ज़िन्दगी क़हर के साँचों में ढलेगी कब तक
कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक।
श्रेणी:
नज़्म
समाज को बदल डालो
जुल्म और लूट के रिवाज़ को बदल डालो
समाज को बदल डालो ।
कितने घर हैं जिनमे आज रोशनी नहीं
कितने तन बदन हैं जिनमे जिंदगी नहीं
मुल्क और कौम के मिजाज़ को बदल डालो
समाज को बदल डालो ।
सैकड़ो की मेहनतों पर एक क्यों पले
ऊंच नीच से भरा निजाम क्यों चले
आज हैं यही तो ऐसे आज को बदल डालो
समाज को बदल डालो ।
समाज को बदल डालो
(समाज को बदल डालो-1970)
आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं
संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
एक धुँध से आना है, एक धुँध में जाना है
ये राह कहाँ से है, ये राह कहाँ तक है
ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है
संसार की हर शय का...
एक पल की पलक पर है, ठहरी हुई ये दुनिया
एक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है
संसार की हर शय का...
क्या जाने कोई किस पल, किस मोड़ पे क्या बीते
इस राह में ऐ राही, हर मोड़ बहाना है
संसार की हर शय का...
हम लोग खिलौने हैं, एक ऐसे खिलाड़ी के
जिसको अभी सदियों तक, ये खेल रचाना है
संसार की हर शय का...
साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन ( बर्मन दा ) की शुरुआती दौर 1951 से शुरू होती है फ़िल्म- बाज़ी, नौजवान, सज़ा से आज फ़िल्म सज़ा काएक गीत जिसे लता मंगेशकर ने गाया है पेश कर रहा हूँ :
तुम न जाने किस जहां में खो गए
हम भरी दुनिया में तन्हा हो गए
मौत भी आती नहीं
आस भी जाती नहीं
दिल को ये क्या हो गया
कोई शै भाती नहीं
लूटकर मेरा जहां, छुप गए हो तुम कहाँ ?
एक जाँ और लाख ग़म
घुट के रह जाए न दम
आओ ! तुम को देख लें
डूबती नज़रों से हम
लूटकर मेरा जहां, छुप गए हो तुम कहाँ ?
—- साहिर लुधियानवी
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने !
ताकि तू जान सके
तुझको परवान चढ़ाने के लिए
कितनी संगीन मराहिल से तेरी माँ गुज़री
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने !
ताकि तू देख सके
कितने पाँव मेरी ममता के कलेजे पे पड़े
कितने ख़ंजर मेरी आँखों, मेरे कानों में गड़े
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने !
मैं तुझे रहम के साये में न पलने दूँगी
जिन्दगानी की कड़ी धूप में न जलने दूँगी
ताकि तप- तप के तू फ़ौलाद बने
माँ की औलाद बने
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
जब तलक होगा तेरा साथ निभाऊँगी मैं
फिर चली जाऊँगी उस पार के सन्नाटे में
और तारों से तुझे झाँकूँगी
ज़ख़्म सीने में लिए फूल निगाहों में लिए
तेरा कोई भी नहीं मेरे सिवा
मेरा कोई भी नहीं तेरे सिवा
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने !
——-साहिर लुधियानवी
संगीत : ख़ैयाम, फ़िल्म : त्रिशूल, वर्ष :1978
गायिका : लता मंगेशकर
फ़िल्म:- ताज महल -1963
खुदा-ए-बर्तर तेरी ज़मीं पर, ज़मीं की खातिर ये जंग क्यों है
हर एक फ़तह-ओ-ज़फ़र के दामन पे खून-ए-इंसा रंग क्यों है
खुदा-ए-बर्तर ...
ज़मीं भी तेरी हैं हम भी तेरे, ये मिल्कियत का सवाल क्या है
ये कत्ल-ओ-ख़ूँ का रिवाज़ क्यों है, ये रस्म-ए-जंग-ओ-जदाल क्या है
जिन्हे तलब है जहान भर की, उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है ।
ग़रीब माँओ शरीफ़ बहनों को अम्न-ओ-इज़्ज़त की ज़िंदगी दे
जिन्हे अता की है तू ने ताक़त, उन्हे हिदायत की रोशनी दे
सरों में किब्र-ओ-ग़ुरूर क्यों हैं, दिलों के शीशे पे ज़ंग क्यों है ।
क़ज़ा के रस्ते पे जाने वालों को बच के आने की राह देना
दिलों के गुलशन उजड़ न जाए, मुहब्बतों को पनाह देना
जहां में जश्न-ए-वफ़ा के बदले, ये जश्न-ए-तीर-ओ-तफ़ंग क्यों है
आज मन बहुत दुखी है इस बात को लेकर की हमारे देश की जीवन रेखा कही जाने वाली गांगा में कौन लोग लाशें डाल रहे हैं, और सिपहसालार की जुबां चुप है, क्या साहिर साहब की रूह को ये देखकर आराम मिलेगा ये सवाल मुझे बेचैन कर जाता हैं...!!
जिन्होंने इतना सुंदर गीत लिखा था जो 1971 में बनी फिल्म गंगा तेरा पानी अमृत से लिया है।
गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए
युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए
गंगा तेरा पानी ...
दूर हिमालय से तू आई गीत सुहाने गाती
बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत सुख-संदेश सुनाती
तेरी चाँदी जैसी धारा मीलों तक लहराए
गंगा तेरा पानी ...
कितने सूरज उभरे-डूबे गंगा तेरे द्वारे
युगों-युगों की कथा सुनाएँ तेरे बहते धारे
तुझको छोड़ के भारत का इतिहास लिखा न जाए
गंगा तेरा पानी ...
इस धरती का दुख-सुख तूने अपने बीच समोया
जब-जब देश ग़ुलाम हुआ है तेरा पानी रोया
जब-जब हम आज़ाद हुए हैं तेरे तट मुस्काए
गंगा तेरा पानी ...
खेतों-खेतों तुझसे जागी धरती पर हरियाली
फ़सलें तेरा राग अलापें झूमे बाली\-बाली
तेरा पानी पी कर मिट्टी सोने में ढल जाए
गंगा तेरा पानी ...
तेरे दान की दौलत ऊँचे खलिहानों में ढलती
ख़ुशियों के मेले लगते मेहनत की डाली फलती
लहक-लहक कर धूम मचाते तेरी गोद में जाए
गंगा तेरा पानी ...
एक ही जैसा काफिया और लगभग एक ही जैसा रदीफ़ की चार जुदा गज़ले, साहिर लुधियावनी जैसे नामचीन शायरों की गज़ले आपकी खिदमत में पेश है। उम्मीद है आपको पसंद आएगी।
ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया
यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया
मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस क़दर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया
जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मुहब्बत का 'शकील'
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया
कैसे जीते हैं ये किस तरह जिए जाते हैं
अहल-ए-दिल की बसर-औक़ात पे रोना आया
जी नहीं आप से क्या मुझ को शिकायत होगी
हाँ मुझे तल्ख़ी-ए-हालात पे रोना आया
हुस्न-ए-मग़रूर का ये रंग भी देखा आख़िर
आख़िर उन को भी किसी बात पे रोना आया
कैसे मर मर के गुज़ारी है तुम्हें क्या मालूम
रात भर तारों भरी रात पे रोना आया
कितने बेताब थे रिम-झिम में पिएँगे लेकिन
आई बरसात तो बरसात पे रोना आया
हुस्न ने अपनी जफ़ाओं पे बहाए आँसू
इश्क़ को अपनी शिकायात पे रोना आया
कितने अंजान हैं क्या सादगी से पूछते हैं
कहिए क्या मेरी किसी बात पे रोना आया
अव्वल अव्वल तो बस एक आह निकल जाती थी
आख़िर आख़िर तो मुलाक़ात पे रोना आया
'सैफ़' ये दिन तो क़यामत की तरह गुज़रा है
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया
ग़ैर के लुत्फ़-ओ-इनायात पे रोना आया
और अपनों की शिकायात पे रोना आया
अक़्ल ने तर्क-ए-तअल्लुक़ को ग़नीमत जाना
दिल को बदले हुए हालात पे रोना आया
अहल-ए-दिल ने किए ता'मीर हक़ीक़त के सुतूँ
अहल-ए-दुनिया को रिवायात पे रोना आया
हम न समझे थे कि रुस्वाई-ए-उल्फ़त तो है
ऐ जुनूँ तेरी ख़ुराफ़ात पे रोना आया
वो भी दिन थे कि बहुत नाज़ था अपने ऊपर
आज ख़ुद अपनी ही औक़ात पे रोना आया
मना करते मगर इस तरह से लाज़िम भी न था
आप के तल्ख़ जवाबात पे रोना आया
छोड़िए भी मेरी क़िस्मत में लिखा था ये भी
आप को क्यूँ मेरे हालात पे रोना आया
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
हर पल का शायर : साहिर’ - सुरिन्दर देओल
साहिर की शायरी ने फै़ज़ जैसे प्रगतिवादी शायरों और राजनीतिक क्रान्ति की शायरी से बिल्कुल अलग रास्ता इख़्तियार किया और फ़िल्मों में अपनी ख़ास पहचान बनाने में कामयाब रहे। इसके बावजूद साहिर अपने लेखन में ग़रीबों की मुश्किलात, सामाजिक अन्याय और दबे-कुचलों के शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करते रहे। दरअसल इन दोनों ही शायरों के बीच की तुलना हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण गुत्थी रही और इस गुत्थी को सुलझा पाना कभी सम्भव नहीं हो पाया।
- गोपी चन्द नारंग
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अंगारे (1954)
सचिन देव बर्मन और साहिर लुधियानवी
लता मंगेशकर और कोरस
को: तुम तुम धूम धाम तुम तुम धुम धाम तुम तुम धूम धाम
नाचो गाओ नाचो गाओ नाचो गाओ मिल-जुल कर
ल: हे~ए~ए~ए राजदुलारी बिटिया री तोहे मेरी उमर लग जाये
को: जियो जियो जियो
ल: हे~ए~ए~ए राजदुलारी बिटिया री तोहे मेरी उमर लग जाये
को: जियो जियो जियो
ल: मेरी सूनी दुनियाँ में तू चन्दा बनके आई
को: आई रे आई चन्दा बनके आई
ल: ओ~ओ~ओ नैन की ज्योति आस की मोती दिल की ठण्डक लाई
को: लाई रे लाई दिल की ठण्डक लाई
ल: ओ~ओ~ओ राम करे रखवाली हो कभी तुझपे आँच न आये
को: जियो जियो जियो
ल: हे~ए~ए~ए राजदुलारी बिटिया री तोहे मेरी उमर लग जाये
को: जियो जियो जियो
को: तुम तुम धूम धाम तुम तुम धुम धाम तुम तुम धूम धाम
नाचो गाओ नाचो गाओ नाचो गाओ मिल-जुल कर
ल: हँसके लहके खिलके महके तेरी जीवन डाली
को: डाली रे डाली तेरी जीवन डाली
ल: ओ~ओ~ओ तुझको पाकर मैं ने सारे जग की दौलत पा ली
को: पा ली रे पा ली जग की दौलत पा ली
ल: ओ~ओ~ओ राम करे रखवाली हो कभी तुझपे आँच न आये
को: जियो जियो जियो
ल: हे~ए~ए~ए राजदुलारी बिटिया री तोहे मेरी उमर लग जाये
को: जियो जियो जियो
को: तुम तुम धूम धाम तुम तुम धुम धाम तुम तुम धूम धाम
नाचो गाओ नाचो गाओ नाचो गाओ मिल-जुल कर
ल: आँख मिचौली खेल रहे हैं सपने प्यारे प्यारे
सपने प्यारे प्यारे
आज गले से लग जा लग जा, आज गले से लग जा
प्यासी ममता तुझे पुकारे
प्यासी ममता तुझे पुकारे
प्यासी ममता तुझे पुकारे
राम करे रखवाली हो कभी तुझपे आँच न आये
को: जियो जियो जियो
ल: हे~ए~ए~ए राजदुलारी बिटिया री तोहे मेरी उमर लग जाये
मेरी उमर लग जाये
मेरी उमर लग जाये
मेरी उमर लग जाये
फ़िल्मी गीतों में किसी भी विषय पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ गीत सामान्यतः साहिर साहब का ही मिलेगा । मसलन
क़ौमी एकता : तू हिंन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा।
भाई : मेरे भइय्या मेरे चंदा तेरे बदले मैं ज़माने की कोई चीज ना लु।
क़व्वाली : ना तो कारवाँ की तलाश है ।
भजन : तोरा मन दर्पण कहलाये ।
कुदरत : नीले गगन के तले ।
फ़लसफ़ा: संसार से भागे फिरते हो, मैं ज़िंदगी का साथ निभाता
वग़ैरह फ़ेहरिस्त तो बहुत लम्बी है।
रात भर का है मेहमां अंधेरा
किसके रोके रूका है सवेरा
आ कोई मिलके तदबीर सोचें
सुख के सपनों की ताबीर सोचें
जो तेरा है वही ग़म है मेरा
रात जितनी भी संगीन होगी
सुबह उतनी ही रंगीन होगी
ग़म न कर ग़र है बादल घनेरा
—— साहिर लुधियानवी
—————
फ़िल्म : सोने की चिड़िया, वर्ष : 1958
संगीतकार : ओ.पी. नैयर ,
गायक/गायिका :मोहम्मद रफ़ी, आशा भोंसले
———————-
“ मैं एकमात्र ऐसा सफल संगीत निर्देशक हूँ, जिसने लता से एक भी गाना नहीं गवाया । आशा में कुछ ऐसे गायन गुण थे जो लता और शमशाद में नहीं थे । मैंने अपनी श्रेष्ठ धुनें आशा को दीं और उसने अपना पूरा गायन मुझे दे दिया ।”
—-ओ.पी. नैयर
(ओमकार प्रसाद नैयर )
गले आज तो मिल ले ज़ालिम
रस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है
इश्क़ इस तरह कि गुस्ताख़ तकाजे न करे
हुस्न मस्तूर भी, मजबूर भी, मगरूर भी है
गुरूरे-हुस्न के सदके मुहब्बत यूं नहीं करत भरी महफिल में ज़ाहिर दिल की वहशत यूं नहीं करते
ये माना तुम हसीं हो और तुम्हें हक़ है शरारत का किसी की जां पे बन जाए, शरारत यूं नहीं करते
जिसे तुम हुस्न कहते हो, वो काबा है निगाहों का अदब लाज़िम है, काबे की जियारत यूं नहीं करते
कुछ अपने हुस्न की खैरात दे दो हम फकीरों को किसी साइल को अपने दर से रुखसत यूं नहीं करते
हया और शर्म को हम हुस्न का जेवर समझते हैं
ये जेवर लुट के रह जाए, सखावत यूं नहीं करते (सखावत -दानशीलता)
तुम्हारी इक नज़र पर फैसला है ज़िंदगानी का मसीहा हो के बीमारों से गफ़लत यूं नहीं करते
मसीहा और हम!! इन कुफ़्र की बातों से बाज़ आओ
खुदा को छोड़कर बुत की इबादत यूं नहीं करते
आपने जो कहा वो ठीक सही, मेरा कहना भी कुछ बुरा तो नहीं
कि ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम रस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है....
(मस्तूर- veiled, hidden), (साइल –begger, petitioner)
माना कि अभी तेरे-मेरे
अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं
माटी का भी है कुछ मोल मगर
इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब
झूठे सिक्कों में न तौली जाएगी
वह सुबह कभी तो आएगी
शगुन (1964)
खय्याम और साहिर लुधियानवी
मोहम्मद रफ़ी
तुम चली जाओगी परछाईँयां रह जाएँगी
कुछ न कुछ हुस्न की रानाईयाँ रह जाएँगी
तुम के इस झील के साहिल पे मिली हो मुझसे
जब भी देखूंगा यहीं मुझको नज़र आओगी
याद मिटती है न कोई मंजर मिट सकता है
दूर जाकर भी तुम अपने को यहीं पाओगी
धुल के रह जाएगी झोंको में बदन की खुशबू
जुल्फ का अक्श घटाओं में रहेगा सदियों
फूल चुपके से चुरा लेंगे लबों की सुर्खी
ये जवां हुस्न फजाओ में रहेगा सदियो
इस धड़कती हुई शादाबो हसीं वादी में
ये न समझो कि जरा देर का किस्सा हो तुम
अब हमेशा के लिए मेरे मुकद्दर की तरह
इन नजारों के मुकद्दर का भी हिस्सा हो तुम
1968 में बनी फ़िल्म “नीलकमल” गुलशन नन्दा के उपन्यास पर बनी थी। इस फ़िल्म के लिए गीत साहिर ने लिखा था और संगीत रवि ने दिया था । फ़िल्म हिट रही और गाने भी लाजवाब थे।इस फ़िल्म के एक गीत जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था यूँ है :-
तुझको पुकारे मेरा प्यार
आजा मैं तो लुटा हूँ तेरी चाह में
तुझको पुकारे मेरा प्यार
दोनों जहां की भेंट चढ़ा दी मैंने चाह में तेरी
अपने बदन की ख़ाक मिला दी मैंने राह में तेरी
अब तो चली आ इस पार
इतने युगों से इतने दुखों को कोई सह न सकेगा
तेरी क़सम मुझे तू है किसी की, कोई कह न सकेगा
मुझसे है तेरा इकरार
आख़िरी पल है आख़िरी आँहें तुझे ढूँढ रही हैं
डूबती साँसें बुझती निगाहें तुझे ढूँढ रही हैं
सामने आजा इक बार
आजा मैं तो मिटा हूँ तेरी चाह में
तुझको पुकारे मेरा प्यार
——साहिर लुधियानवी
————-
(रमज़ान में विशेष तौर पर मरहूम मोहम्मद रफ़ी को नमन किया क्यों कि रमज़ान के अलविदा के दिन रमज़ान में उनका इंतेकाल हुआ था । उनका अंतिम गाया गीत ‘जिस रात के ख़्वाब आए, वो रात आई ‘ फ़िल्म ‘हब्बा ख़ातून “ के लिए जिसकी मौसीकी नौशाद साहिब की थी जो अली सरदार जाफ़री द्वारा बनायी गयी थी ।)
क्या आप ये जानते हैं कि "कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता हैं", "मेरे दिल में आज क्या हैं तू कहें तो मैं बता दूँ", "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा", "तुम अगर साथ देने का वादा करो", "ए मेरी ज़ोहराजबीं तुझे मालूम नहीं", “नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले", "अभी ना जाओ छोड़कर, के दिल अभी भरा नहीं" ऐसे सैकड़ों मधुर प्रेमगीतों के रचनाकार साहिर लुधियानवी का जन्म संयोग से
#अंतरराष्ट्रीय_महिला_दिवस के दिन यानी ८ मार्च को हुआ था।
साहिर लुधियानवी का जन्म ८ मार्च सन १९२१ को लुधियाना (पंजाब) के एक जागीरदार घराने में हुआ। साहिर का असली नाम अब्दुल हयी था । पिता फ़ज़ल मोहम्मद की ग्यारहवीं बीवी सरदार बेग़म उनकी मां थीं। साहिर उनका पहले और इकलौते बेटे थे । इसी कारण उनकी परवरिश बड़े प्यार से हुई।
लेकिन अभी वह बच्चे ही थे कि सुख के सारे दरवाज़े उसके लिए एकाएक बंद हो गए । फ़ज़ल मोहम्मद को अपनी बेशुमार दौलत पर ग़ुरुर था, उसी की वजह से उनकी अय्याशियाँ भी बढ़ने लगीं और उन्होंने बारहवीं शादी करने का फ़ैसला किया। अपने पति की इन अय्याशियों से तंग आकर साहिर की माँ ने पति से अलग होने का फ़ैसला किया । चूँकि लाहौर की अदालत में, १३ साल के साहिर ने पिता के मुक़ाबले माँ को अहमियत दी थी, इसलिए उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी उनकी माँ को सौंपी गयी । नतीजे में साहिर का अपने पिता और उनकी जागीर से कोई संबंध नहीं रहा । इसी के साथ साहिर और उनकी मां, दोनों का कठिनाइयों और निराशाओं का दौर शुरू हो गया।
मुक़दमा हार जाने पर पिता ने यह धमकी दी थी कि वह साहिर को मरवा डालेंगे। तब माँ ने अपने सारे क़ीमती ज़ैवर बेचकर साहिर की हिफ़ाज़त का बंदोबस्त किया । सुरक्षा गार्ड एक पल भी साहिर को अकेला नहीं छोड़ते थे । इस तरह पिता के प्रति घृणा भाव के साथ साहिर के मन में एक विचित्र सा भय भी पल रहा था । बचपन से ही साहिर ने अपनी माँ को, अपने लिए तमाम तरह के दुख-दर्द सहकर और मुश्किल हालात में जूझते हुए देखा था।
साहिर को पाल-पोसकर बड़ा करने के लिए मां को बड़ा कठिन संघर्ष करना पड़ा। यही संघर्ष फ़िल्म ‘त्रिशूल’ के लिये लिखे, साहिर के एक गीत में उभर कर आया है , जिसमें अकेली मां की भूमिका निभाने वाली वहीदा रहमान, अपने बेटे की परवरिश के लिए कई कठिनाइयों से लड़ती है।
" तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने, ताकि तू जान सके
तुझको परवान चढ़ाने के लिए
कितने संगीन मराहिल से तेरी मा गुज़री
कितने पाँव मेरे ममता के कलेजे पे पड़े
कितने ख़ंजर मेरी आँखों, मेरे कानों में गड़े "
साहिर ने जब बाक़ायदा शायरी शुरू की और फ़िल्मों के लिए गीत लिखना शुरू किये तो ग़रीबी-मुफ़लिसी, तंगहाली, सांप्रदायिकता, शोषण के ख़िलाफ़ उनकी नज़्में आकार लेने लगीं।
" ज़िंदगी भीक में नहीं मिलती ज़िंदगी बढ़ के छीनी जाती है
अपना हक़ संग-दिल ज़माने से छीन पाओ तो कोई बात बने।
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता सर उठाओ तो कोई बात बने।"
लुधियाना के ख़ालसा हाई स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद साहिर गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ लुधियाना में दाख़िल हुये। वहाँ की सियासी सरगर्मियों का उन पर असर होने लगा; और उस दौर के मशहूर शायर - इक़बाल, फ़ैज़, मजाज़, फ़िराक़ वगैरा की विद्रोही शायरी से भी वह रूबरू होने लगे। सन १९४५ में केवल २४ साल की उम्र में 'तल्ख़ियाँ' नाम से उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसकी वजह से उन्हें बतौर शायर बड़ी क़ामयाबी हासिल हुई। साहिर ने बचपन से ही जीवन की कठोर वास्तविकता का अनुभव किया था, जिसकी वजह से उन्होंने अपनी पहली किताब का नाम भी 'तल्ख़ियाँ' मतलब 'कड़वाहटें' रखा था।
साहिर ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रसिद्ध उर्दू पत्र ‘अदब-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ (लाहौर) और द्वैमासिक पत्रिका ‘सवेरा’ के संपादक की ज़िम्मेदारियाँ निभाई । 'सवेरा' पत्रिका में उनकी एक रचना छपी थी जिसे सरकार के विरुद्ध समझा गया और पाकिस्तान सरकार ने उनके ख़िलाफ़ वारंट भी जारी कर दिया था। सन १९४९ में साहिर अपनी माँ के साथ पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आ गये। उसके बाद अपना नसीब आज़माने के लिए बंबई शहर पहुँचे। फ़िल्म 'आज़ादी की राह पर' (१९४९) से उन्होंने गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई।
प्यार में नारी के समर्पण की भावना को साहिर से ज़्यादा शायद ही किसी गीतकार ने इतने खुबसूरत शब्दों में बयाँ किया होगा -
"आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाये
हृदय की पीड़ा देह की अगनी, सब शीतल हो जाये।"
साहिर ने अपने निजी जीवन में कई दफ़ा मोहब्बत की और वो ज़िंदगी में मोहब्बत की अहमियत से भी अच्छी तरह से वाक़िफ़ थे। उनका कहना था कि मोहब्बत भी तक़दीरवालों के हिस्से में आती है। शायद इसलिए उन्होंने लिखा था।
"मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी-कभी
होती है दिलबरों की इनायत कभी-कभी।"
लेखिका और शायरा अमृता प्रीतम और गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ साहिर के नाम जोड़े जाते हैं । अमृता प्रीतम ने तो साहिर से अपने प्यार को दुनिया के सामने कई बार ज़ाहिर भी किया था। साहिर के लिए उनकी मोहब्बत दिवानगी की हद तक थी। इस मोहब्बत को साहिर ने भी अपनी रचनाओं में ढ़ालते हुए कहा है -
" तुम मुझे भूल भी जाओ, तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है, मैंने तो मुहब्बत की है।"
पर अफ़सोस, साहिर को प्यार में कभी सफलता नहीं मिल सकी। शायद साहिर, अमृता से अपने दिल की बात कह नहीं पाते थे। उनके दिल में भले ही मोहब्बत ख़ामोशी से पलती रहती होगी लेकिन वह उसे अंजाम तक कभी ला नहीं पाये। इन्हीं उलझन भरे सवालों पर वह रूककर, आख़िर यह कह उठते हैं -
" वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।"
साहिर के गीतों में नारी की दुर्दशा और सामंती प्रवृत्तियों के प्रति रोष, तथा उनका विरोध एवं तीखी अभिव्यक्ति हैं । सन १९५५ में बनी फ़िल्म 'देवदास' का एक गीत आज भी पुरुष प्रधान समाज के अत्याचारों की सटीक कहानी बयाँ करने के लिए काफ़ी है, जिसमें नारी ख़ुद अपनी दर्दभरी दास्ताँ सुनाते हुए बोल उठती है।
" मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के
मेरी उम्र बह गई है मेरे आँसुओं में ढ़ल के
जो बहार बन के बरसे वह घटा कहाँ से लाऊँ
जिसे तू क़ुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ
तेरे दिल को जो लुभाए वह सदा कहाँ से लाऊँ "
साहिर को किसी इन्सान से शिकायत नहीं थी, उन्हें शिकायत थी तो समाज के उस ढ़ाँचे से जो इन्सान से उसकी इन्सानियत छीन लेता है। उसे शिकायत थी उस तहज़ीब से, उस संस्कृति से जहाँ मुर्दों को पूजा जाता हैं और ज़िंदा इन्सान को पैरों तले रौंदा जाता है। जहाँ किसी के दुःख-दर्द पर दो आँसू बहाना बुज़दिली समझा जाता है। देवियों की पूजा की जाती है और औरतों को इन्सान नहीं बल्कि जी बहलाने का खिलौना समझा जाता है। फ़िल्म ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ के गीत में साहिर ने यही बात स्पष्ट की है।
" लोग औरत को फ़क़त एक जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं ।
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ायम, ये गुनाहों का रिवाज़ "
हमारे इस घोर ढ़ोंगी और पाखंडी समाज के चेहरे पर से ये झूठी शराफ़त का नक़ाब उठाने की हिम्मत साहिर ने अपने गीतों में की है। साहिर ने महिलाओं के शोषण के लिए, उनपर होनेवाले अत्याचार के लिए पितृसत्ता और सामंतवादी व्यवस्था को दोषी ठहराया है। फ़िल्म साधना में उन्होंने इसका स्पष्ट विवरण दिया है, जहां वह महिलाओं को उपभोग की वस्तू बनानेवाली बर्बर व्यवस्था पर ऊँगली उठाते हैं।
" औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया
मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ, औरत के लिये रोना भी ख़ता
मर्दों के लिये लाखों सेजें, औरत के लिये बस एक चिता
मर्दों के लिये हर ऐश का हक़, औरत के लिये जीना भी सज़ा
मर्दों ने बनायी जो रस्में, उनको हक़ का फ़रमान कहा
औरत के ज़िन्दा जल जाने को, क़ुर्बानी और बलिदान कहा
क़िस्मत के बदले रोटी दी, उसको भी एहसान कहा
औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया "
नारी जीवन की पीड़ायें असहनीय हैं, यह साहिर भलीभाँती जानते थे । समाज के इस क्रुर और अमानवनीय ढ़ाँचे में नारी का दम निरंतर घुटता रहता है। समाज के इस बेरहम और ज़ालिम ढ़ांचे से परेशान होकर साहिर इस हद तक झुँझलाकर कह उठते हैं -
" जवानी भटकती है बद-कार बन कर
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर
यहाँ प्यार होता है बेपार बन कर
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है !"
साहिर ने पाया कि समाज में देह व्यापार का धंधा अपने पांव पसारे हुए है, जहां लाखों महिलाएँ दुनिया से कटकर बेबस ज़िंदगी जी रही हैं । वेश्या बनी नारी की उफ़नती पीड़ा, अँधेरे कोनों में व्याप्त वेदना, अपमानित जीवन का आतंक, आतंरिक विवशता, दीनहीन होने की वेदना को साहिर ने अपनी रचनाओँ में अभिव्यक्ति दी है । फ़िल्म ‘प्यासा’ में उनकी क़लम ऐसे ही ग़ैर इंसानी रिवाजों के ख़िलाफ़ तेज़ आग बरसाती है। उसमें समाज और उसके ठेकेदारों पर साहिर सवाल उठाते हैं, के आत्मसम्मान की बात करनेवाले वह लोग अब कहाँ हैं, क्या इन्हें अब तंग गलियों और अँधेरे कमरो में चलने वाले देह व्यापार नहीं दिखते ? सहमी हुयी नाबालिग़ लड़कियों को जब इस गहरी खाई में ढ़केला जाता है तब यह मानवता के रक्षक कहाँ होते हैं ? क्यों इस बर्बर प्रथा के ख़िलाफ़ इनकी आवाज़ उठती नहीं ?
" ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के, ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियाँ, ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचे ये गलियाँ ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं "
अपने गीतों के माध्यम से साहिर ने नारी जगत की दशा को उजागर किया है । ज़िंदगी के यथार्थ का दर्शन साहिर के नग़्मों की जान है । लेकिन साहिर यथार्थ के साथ-साथ ज्वलन्त आशावाद, उत्साह और दृढ़ विश्वास के शायर भी हैं । उन्होंने औरतों की बेहतरी,ख़ुशहाली एवं सुखद भविष्य वाले समाज की भी कल्पना की है । उन्हें यह यक़ीन था कि दुःख के ये काले बादल यक़ीनन दूर हो जायेंगे और न्याय, स्वतंत्रता और समानता की सुबह भी ज़रूर आयेगी ।
" दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज़्ज़त को न बेचा जाएगा
अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
भारतीय साहित्यिक दुनिया में, औरत पर सदियों से होते आ रहे ज़ुल्मों के ख़िलाफ़, इतनी शिद्दत से आवाज़ उठाने वाले भी शायद वह अकेले ही शायर रहे।
तुम एक बार मुहब्बत का इम्तिहान तो लो
मेरे जुनूँ मेरी वहशत का इम्तिहान तो लो
सलामे-शौक़ पे रंजिश भरा पयाम न दो
मेरे ख़ुलूस को हिर्सो- हवस का नाम न दो
मेरी वफ़ा की हक़ीक़त का इम्तिहान तो लो
न तख़्तो-ताज, न लालो-गुहर की हसरत है
तुम्हारे प्यार तुम्हारी नज़र की हसरत है
तुम अपने हुस्न की अज्मत का इम्तिहान तो लो
मैं अपनी जान भी दे दूँ तो ऐतिबार नहीं
कि तुमसे बढ़के मुझे ज़िन्दगी से प्यार नहीं
यूँ ही सही मेरी चाहत का इम्तिहान तो लो
-साहिर लुधियानवी
————-
फ़िल्म : बाबर , वर्ष : 1960
संगीत : रौशन ,गायक : मोहम्मद रफ़ी
इस मुश्किल दौर के लिए साहिर का पैग़ाम
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़ के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसना के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का
कैसी ख़ुशी ले के आया चाँद ईद का
ज़ुल्फ़ मचल के खुल-खुल जाए
चाँद में मस्ती घुल -घुल जाए
ऐसी ख़ुशी आज मिली, आँखों में नाम नहीं नींद का
जागती आंखें बुनती हैं सपने
तुमको बिठा के पहलू में अपने
दिल की लगी ऐसी बढ़ी, आँखों में नाम नहीं नींद का
आते ही तेरे चुटकी हैं कलियाँ
दिल बन - बन के धड़की है गलियाँ
ऐसी सजी रात मेरी,आँखों में नाम नहीं नींद का
कैसी ख़ुशी ले के आया चाँद ईद का
—- साहिर लुधियानवी
फ़िल्म : बरसात की रात , वर्ष : 1960
संगीत : रौशन , गायिका : लता मंगेशकर
( रमज़ान पर विशेष अग्रिम पेशकश । )
गीतकार साहिर के साथ वह ज़माना नौशाद के संगीत का भी था। फ़िल्म वाले हमेशा काम से ज़्यादा नाम के पीछे भागते हैं । नाम से ही यहाँ कलाकार के दाम तय होते हैं । एक निर्माता अपनी फ़िल्म में नौशाद के साथ साहिर को लेना चाहते थे । साहिर ने कहानी सुनी, पसन्द की। पारिश्रमिक जो साहिर ने माँगा, वह निर्माता ने स्वीकार किया, लेकिन बात वहाँ बनते- बनते बिगड़ गई, जब उन्हें मालूम हुआ, नौशाद को उनसे ज़्यादा रक़म दी जा रही हैं । उन्होंने प्रोड्यूसर के एडवांस के लिफ़ाफ़े को यह कह कर वापस कर दिया कि मैं स्वयं को शब्द से बड़ा नहीं मानता ।मैं आपकी फ़िल्म में इसी सूरत में काम कर सकता हूँ, जब मुझे आपके संगीतकार से एक रूपया ज़्यादा दिया जाएगा । निर्माता के बजट में साहिर की शर्त नहीं बैठ सकी और साहिर ने वह फ़िल्म नहीं की ।
—- निदा फ़ाज़ली
सूत्र : निदा फ़ाज़ली की किताब “ तमाशा मेरे आगे “ के एक लेख से साभार !
तस्वीर : नौशाद (चौधरी जिया इमाम की पुस्तक से )
ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहाँ सो रही है तू
आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर सलीब से
साहिर लुधियानवी
मोको पीहर में मत छेड़ रे बालम
भर ले धीरे जिगरिया में
मोको पीहर में मत छेड़ रे बालम
भर ले धीरे जिगरिया में
मोको पीहर में मत छेड़ रे बालम
भर ले धीरे जिगरिया में
इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़मे गाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर-मर के जीते हैं
जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्ज़त जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्ज़त को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इज़ारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
फ़आक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
जाने वो कैसे लोग थे जिनके, प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी, काँटों का हार मिला
ख़ुशियों की मंज़िल ढूँढी तो, ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़में चाहे तो, आहें सर्द मिली
दिल के बोझ को दूना कर गया, जो ग़मख़्वार मिला
बिछड़ गया हर साथी दे कर, पल दो पल का साथ
किसको फ़ुर्सत है जो थामे, दीवानो का हाथ
हमको अपना साया तक, अक्सर बेज़ार मिला
इसको ही जीना कहतें हैं तो, यूँ ही जी लेंगे
उफ़ ना करेंगे, लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला
-साहिर लुधियानवी
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से,
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं।
मेरे हमराह भी रुसवाईयां हैं मेरे माज़ी की,
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं।
तआर्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा।
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन,
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।
~ साहिर लुधियानवी
दीदी (1960)
सुधा मलहोत्रा और साहिर लुधियानवी
मुकेश और सुधा मलहोत्रा
राग: पहाड़ी
तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है
मेरे दिल की मेरे जज़बात की कीमत क्या है
उलझे उलझे से खयालात की कीमत क्या है
मैंने क्यों प्यार किया तुमने ना क्यों प्यार किया
इन परेशान सवालात की कीमत है
तुम जो ये भी ना बताओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है
जिन्दगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है
जुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत ही नहीं कुछ और भी है
भूख और प्यास की मारी हुयी इस दुनिया में
इश्क ही एक हकीकत नहीं कुछ और भी है
तुम अगर आँख चुराओ तो ये हक़ है तुमको
मैंने तुम से ही नहीं सब से मोहब्बत की है
तुमको दुनिया के ग़म-ओ-दर्द से फुरसत ना सही
सबसे उल्फत सही मुझसे ही मोहब्बत ना सही
मैं तुम्हारी हूँ यही मेरे लिये क्या कम है
तुम मेरे हो के रहो ये मेरी किस्मत ना सही
और भी दिल को जलाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है
छाई कारी बदरिया बैरनिया हो राम
घन बदरा गगनवा झुकन लागी हो
मोरे सजना बिदेसिया को न आये हो
छाई कारी बदरिया ...
झुलनो पे गावन की रुत आई रे
रतियाँ जगावन की रुत आई रे
कछु खो के पावन की रुत आई रे
मोरे सजना बिदेसिया को न आये हो
छाई कारी बदरिया ...
जावे कोई पी को लावे सखी
अकेले में कछु नाहि भावे सखी
हाय्! पुरवा पवन जी जलावे सखी
मोरे सजना बिदेसिया को न आये हो
छाई कारी बदरिया ...
Movie/Album: एक महल हो सपनों का (1975)
Music By: रवि
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: किशोर कुमार
देखा है ज़िन्दगी को, कुछ इतना करीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
देखा है ज़िन्दगी को...
कहने को दिल की बात, जिन्हें ढूँढते थे हम
महफ़िल में आ गए हैं वो अपने नसीब से
देखा है ज़िन्दगी को...
नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार
क़ीमत नहीं चुकाई गई एक गरीब से
देखा है ज़िन्दगी को...
तेरी वफ़ा की लाश पे, ला मैं ही डाल दूँ
रेशम का ये कफ़न, जो मिला है रक़ीब से
देखा है ज़िन्दगी को...
पयाम-ए-इश्क़ मुहब्बत हमें पसन्द नहीं
ये दिल्लगी ये शरारत हमें पसन्द नहीं
SahirLudhiyanvi
बजा नहीं था इज़हार बेक़रारी का
लिहाज़ कुछ तो किया होता पर्दादारी का
हया से इतनी बग़ावत हमें पसन्द नहीं
पयाम-ए-इश्क़ मुहब्बत हमें पसन्द नहीं
Film_babar
हमीं को हँस के सितारों ने भी नहीं देखा
नज़र मिला के बहारों ने भी नहीं देखा
किसी निगाह से दिल.ऽत हमें पसन्द नहीं
ये दिल्लगी ये शरारत हमें पसन्द नहीं
जो तख़्त-ओ-ताज के वारिस हैं उन का प्यार ही क्या
बदलने वाली निगाहों का ऐतबार ही क्या
हज़ूर की ये इनायत हमें प्सन्द नहीं
पयाम-ए-इश्क़ मुहब्बत हमें पसन्द नहीं
जीवन ज्योति (1953)
सचिन देव बर्मन और साहिर लुधियानवी
लता मंगेशकर
सो जा रे सो जा
सो जा रे सो जा मेरी अंखियों के तारे
मेरे राज-दुलारे, राज-दुलारे
ओ तोहे सपनों की नगरी से निंदिया पुकारे
सो जा रे सो जा
परियों के बालक तारों के भेस में
तुझको बुलाने आए चंदा के देस में
चंदा के देस में सपनों का राज है
मेरे मुन्ने के लिए फूलों का ताज है
राज-दुलारे
ओ तोहे सपनों की नगरी से निंदिया पुकारे
सो जा रे सो जा
रेशम की डोरी होवे चांदी का पलना
प्यार हिंडोले सदा झूले मोरे ललना
जीवन के फूल खिले, ठंडी हवाओं में
फूले-फले मेरी आंचल की छांव में
राज-दुलारे
ओ तोहे सपनों की नगरी से निंदिया पुकारे
सो जा रे सो जा
मुहब्बत तर्क की मैंने , गिरेबां सी लिया मैंने
ज़माने अब तो ख़ुश हो, ज़हर ये भी पी लिया मैंने
अभी ज़िन्दा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ये दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने
तुझे अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ घड़ियाँ तेरे ख़्वाबों कमें खोकर जी लिया मैंने
बस अब तो मेरा दामन छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने, बहुत दिन जी लिया मैंने
————- साहिर लुधियानवी
फ़िल्म : दोराहा , वर्ष : 1952
संगीत : अनिल विश्वास
गायक : तलत महमूद
(जिया जाए पिया आजा)_३
दिल का दर्द न जाने दुनियाँ जाने दिल तड़पाना
प्यार के दो बोलों के बदले दुश्मन हुआ ज़माना
हाय रे हाय दुश्मन हुआ ज़माना
दिल का दर्द न जाने दुनियाँ जाने दिल तड़पाना
उम्मीद ने ठोकर खाई है , दिल देके जुदाइ पाई है
तेरा ग़म है मेरी तनहाइ है
(पहले से न था ये जाना)_२
के दिल का आना है दिल से जाना
हाय रे हाय दुश्मन हुआ ज़माना
दिल क दर्द न जाने दुनियाँ जाने दिल तड़पाना
प्यार के दो बोलों के बदले दुश्मन हुआ ज़माना
हाय रे हाय दुश्मन हुआ ज़माना
आँखों मे जो आँसू आएंगे , तसवीर तेरी दिखलएंगे
हम थाम के दिल रह जाएंगे
(पहले से न था ये जाना)_२
के दिलका आना है दिल से जाना
हाय रे हाय दुश्मन हुआ ज़माना
दिल का दर्द न जाने दुनियाँ जाने दिल तड़पाना
प्यार के दो बोलों के बदले दुश्मन हुआ ज़माना
हाय रे हाय दुश्मन हुआ ज़माना
दिल का दर्द न जाने दुनियाँ जाने दिल तड़पाना
(जिया जाए पिया आजा)_३
चित्रपट:-नौजवान(1951)
तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दांव लगा ले
डरता है ज़माने की निगाहों से भला क्यों
इंसाफ़ तेरे साथ है इल्ज़ाम उठा ले
क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो
ख़ुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले
टुटे हुए पतवार हैं किश्ती के तो ग़म क्या
हारी हुई बाँहों को ही पतवार बना ले
—————-फ़िल्म :बाज़ी , वर्ष : 1951
गीत : साहिर लुधियानवी
संगीत : सचिन देव बर्मन
गायिका : गीता दत्त
ऎ मेरी जान मुझे हैरत-ओ-हसरत से न देख
हम में कोई भी जहाँनूर-ओ-जहाँगीर नहीं
तू मुझे छोड़, के ठुकरा के भी जा सकती है
मेरे हाथों में तेरा हाथ है ज़ंजीर नहीं॥
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें / साहिर लुधियानवी
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
देखा है ज़िन्दगी को कुछ इतने क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
कहनी थी दिल की बात जिन्हें ढूँढते थे हम
महफ़िल में आ गए हैं वो अपने नशीब से
नीलाम हो रहा था किसी नाजनीं का प्यार
क़ीमत नहीं चुकाई गई इक गरीब से
तेरी वफ़ा की लाश पे ला मैं ही डाल दूँ
रेशम का वो कफ़न दो मिला है रक़ीब से
—साहिर लुधियानवी
—————-
फ़िल्म: इक महल हो सपनों का, वर्ष : 1975
संगीत : रवि , गायक : किशोर कुमार
तुम माँ हो तुम्हीं से इंसां को ये जिस्म मिला और जान मिली
नेकी का चलन, ईमां की लगन, सच्चाई की पहचान मिली
तुम माँ हो तुम्हारे कदमों में जन्नत की बहारें पलती हैं
तालीम के गुलशन खिलते हैं तहज़ीब की की शम्एं जलती है
-साहिर लुधियानवी
( फ़िल्म - बाबर के एक गीत से ! ) वर्ष :1960
ख़ुद्दारियों के ख़ून को अर्ज़ां न कर सके
हम अपने जौहरों को नुमायाँ न कर सके
हो कर ख़राब-ए-मय तिरे ग़म तो भुला दिए
लेकिन ग़म-ए-हयात का दरमाँ न कर सके
टूटा तिलिस्म-ए-अहद-ए-मोहब्बत कुछ इस तरह
फिर आरज़ू की शम्अ फ़िरोज़ाँ न कर सके
हर शय क़रीब आ के कशिश अपनी खो गई
वो भी इलाज-ए-शौक़-ए-गुरेज़ाँ न कर सके
किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे
हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमाँ न कर सके
मायूसियों ने छीन लिए दिल के वलवले
वो भी नशात-ए-रूह का सामाँ न कर सके
स्रोत :
पुस्तक : Kulliyat-e-Sahir (पृष्ठ 36) रचनाकार : Sahir Ludhyanwi प्रकाशन : Farid Book Depot (pvt.) Ltd. New Delhi
आज मैं हूँ जहां, कल कोई और था
आज इतनी मुहब्बत न दो दोस्तो
कि मेरे कल की ख़ातिर न कुछ भी रहे
आज का प्यार थोड़ा बचाकर रखो
मेरे कल के लिए
कल जो गुमनाम है, कल जो सुनसान है
कल जो अनजान है, कल जो वीरान है
मैं को कुछ भी नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं
- साहिर लुधियानवी
( 1971 में पद्म श्री एवार्ड मिलने पर दुनिया भर के प्रशंसकों की
बधाई
पर कही “आज का प्यार थोड़ा बचाकर रखो” से कुछ अंश)
‘आओ की कोई ख़्वाब बुनें ‘ संकलन से साभार !
तस्वीर : प्रकाश पंडित (साहिर के मित्र) संपादित किताब से साभार !
इस नज़्म का शुरूआती हिस्सा मैंने इसलिए छोड़ दिया था कि 1973 में बनी फ़िल्म दाग में राजेश खन्ना जो हीरो थे उनकी आवाज़ में फ़िल्माया गया है और म्यूज़िक लक्ष्मी कान्त- प्यारेलाल की है । पर कुछ लोगों के अनुरोध पर इस हिस्से को पोस्ट कर रहा हूँ :-
आप क्या जाने मुझको समझते हैं क्या
मैं तो कुछ भी नहीं
इस क़दर प्यार, इतनी बड़ी भीड़ का
मैं रखूँगा कहाँ ?
इस क़दर प्यार रखने के काबिल नहीं
मेरा दिल, मेरी जान
मुझको इतनी मुहब्बत न दो दोस्तो
सोच लो दोस्तो !
प्यार इक शख़्स का भी अगर मिल सके
तो बड़ी चीज़ है ज़िन्दगी के लिए
आदमी को मगर सेमी मिलता नहीं,
ये भी मिलता नहीं
मुझको इतनी मुहब्बत मिली आप से
ये मेरा हक़ नहीं, मेरी तक़दीर है
मैं ज़माने की नज़रों में कुछ भी न था
मेरी आँखों में अब तक वो तस्वीर है
इस मुहब्बत के बदलेमें क्या नज्र दूँ
मैं तो कुछ भी नहीं
इज़्ज़तें,शुगरकेन, चाहतें, उल्फ़तें
कोई भी चीज़ दुनिया में रहती नहीं
————
इसके बाद जो उपर पंक्तियाँ पोस्ट की हैं शुरू होती है और नज़्म समाप्त होती है । इस नज़्म का शीर्षक “आज का प्यार थोड़ा बचाकर रखो “ है ।
नोट :दाग फ़िल्म के गीत साहिर लुधियानवी ने लिखी थी ।
तेरी मर्ज़ी से ऐ मालिक
हम इस दुनिया में आये हैं
तेरी रहमत से हम सबने ये जिस्म और जान पाए हैं
तू अपनी नज़र हम पर रखना
किस हाल में हैं ये ख़बर रखना
तेरी है ज़मीन तेरा आसमान
तू बड़ा मेहरबान
तू बक्शीस कर
सभी का है तू, सभी तेरे ख़ुदा मेरे तू बक्शीस कर...
तो हमें रखे
तू चाहे तो हमें मारे
तू चाहे तो हमें रखे
तू चाहे तो हमें मारे
ओ.. तेरे आगे झुकाके सर खड़े हैं
आज हम सारे ओ..
सबसे बड़ी ताक़त वाले तू चाहे तो हर आफत टाले
अलिफ़ लैला (1953)
श्याम सुन्दर और साहिर लुधियानवी
लता मंगेशकर
बहार आई, खिली कलियाँ, हँसे तारे, चले आओ
हमें जीने नहीं देते ये नज़ारे, चले आओ
बहार आई खिली कलियाँ
ज़ुबाँ पर आह बन-बन के तुम्हारा नाम आता है
मुहब्बत में तुम्हीं जीते, हमीं हारे, चले आओ
हमें जीने नहीं देते ...
कहीं ऐसा न हो दिल की लगी दिल ही को ले डूबे
बुझाए से नहीं बुझते ये अंगारे चले आओ
हमें जीने नहीं देते ...
काम, क्रोध और लोभ का मारा जगत न आया रास
जब -जब राम ने जन्म लिया तब-तब पाया बनवास
कलियुग तक चलती आई है सतयुग की ये रीत
सब कुछ हार चुके जब अपना, तब है राम की गीत
जुग बदले पर बदल न पाया अब तक ये इतिहास
छोड़ के अपने महल- दुमहले जंगल-जंगल फिरना
औरों के सुख- चैन की ख़ातिर दुख- संकट में घिरना
है यही राम के लेख की रेखा, आ गया अब विश्वास
राम हर इक जुग में आए पर कौन उन्हें पहचाना
राम की पूजा की जग ने पर राम का अर्थ न जाना
तकते-तकते बूढ़े हो गए धरती और आकाश
काम क्रोध और लोभ का मारा जगत न आया रास
जब - जब राम ने जन्म लिया तब- तब पाया बनवास
गीत : साहिर लुधियानावी
-फ़िल्म : बहुरानी . वर्ष : 1963
संगीत : सी. रामचन्द्र
——————————-
(सी . रामचन्द्र के साथ साहिर साहिब का बहुत कम साथ रहा पर इस फ़िल्म का यह भजन कालजयी कृति है । )
तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ
और दुआ देके परेशान सी हो जाती हूँ
मेरे बच्चे ! मेरे गुलज़ार के नन्हे पौदे
तुझको हालात की आँधी से बचाने के लिए
आज मैं प्यार के आँचल में छुपा लेती हूँ
कल ये कमजोर सहारा भी न हासिल होगा
कल तुझे काँटों भरी राह पे चलना होगा
ज़िन्दगानी की कड़ी धूप में जलना होगा
तेरे बचपन की जवानी की दुआ देती हूँ
और दुआ देके परेशान सी हो जाती हूँ ........,....”
—————-
साहिर साहिब ने ये इज़हार गीत के रूप में फ़िल्म ‘ मुझे जीने दो ‘ जिसे सुनील दत्त साहिब ने चंबल के डाकुओं के पृष्ठ-भूमि पर बनायी थी जिसका संगीत जयदेव जी ने दिया था । इस तवील गीत के लिए लता जी ने अपनी कालजयी आवाज़ दी है । इस गीत के सन्दर्भ में साहिर का अपनी माँ जी के प्रति अगाध श्रद्धा महसूस होता है ।इसलिए मैंने साहिर साहिब के माँ जी की तस्वीर पोस्ट की है ।
अकाइद वहम है, मज़हब- ख़याले- ख़ाम है साक़ी
अजल से ज़ेहने- इंसां बस्तए-औहाम है साक़ी
मुबारक हो जईफी को खिरद की फल्सफादानी
जवानी बेनियाजे- इबरते-अंजाम है साक़ी
मेरे सागर में मय है और तेरे हाथों में बर्बत
वतन की सरज़मीं में भूँक से कुहराम है साक़ी
ज़माना बरसके- पैकार है पुरहौल शोलों से
तेरे लब पर अभी तक नग्मए-ख़य्याम है साक़ी
-साहिर लुधियानवी
(इक ग़ज़ल के चंद शे’र “तल्खियाँ “ से)
तस्वीर में साहिर लुधियानवी
( ‘साहिर शख़्स और शायर ‘नाज़ सिद्दीक़ी की किताब से साभार ! उर्दू में फ़रवरी 1978 पंजाबी पुस्तक भंडार दिल्ली-110006 )
तेरी आवाज़
साहिर लुधियानवी
रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें
रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए
दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने
मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए
देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमक
देर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई में
अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिए
तो न आई मगर उस रात की पहनाई में
यूँ अचानक तिरी आवाज़ कहीं से आई
जैसे पर्बत का जिगर चीर के झरना फूटे
या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह
आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे
शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में
रंग सा फैल गया दिल के सियह-ख़ाने में
देर तक यूँ तिरी मस्ताना सदाएँ गूँजीं
जिस तरह फूल चटकने लगें वीराने में
तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी
फिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई है
और नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाब
मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है
रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूश
वही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र
वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म
वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर
तू मिरे पास न थी फिर भी सहर होने तक
तेरा हर साँस मिरे जिस्म को छू कर गुज़रा
क़तरा क़तरा तिरे दीदार की शबनम टपकी
लम्हा लम्हा तिरी ख़ुश्बू से मोअत्तर गुज़रा
अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रार
मैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों में
ढूँढ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ को
नग़्मा ओ शेर की उमडी हुई बरसातों में
अब तिरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती
तिरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जाएगी
और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है
गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी
तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले कर
मेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगे
चंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिए
मिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे
स्रोत :
पुस्तक : Kulliyat-e-Sahir (पृष्ठ 147)
साहिर साहब ने में फिल्म 'आजादी की राह पर' (1950) में अपना पहला गीत 'बदल रही है जिंदगी' लिखा था...
बदल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी ...
ये उजड़ी उजड़ी बस्तियां, ये लूट की निशानियाँ,
ये अजनबी पे अजनबी के ज़ुल्म की कहानियाँ,
अब इन दुखों के भार निकल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी...
जमीन पे सरसराहटें, फलक पे थरथराहटें,
फिजां में गूँजतीं है एक नए जहां की आहटें
मचल रही है जिंदगी, संवर रही है जिंदगी
बदल रही है जिंदगी...
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है,इबादत का इरादा है
जो दिल की धडकनें समझे, न आंखों की जबां समझे
नज़र की गुफ़्तगू समझे, न जज़्बों का बयां समझे
उसी के सामने उसकी शिकायत का इरादा है
सुना है हर जवां पत्थर के दिल में आग होती है
मगर जब तक न छेड़ो, शर्म के पर्दे में सोती है
ये सोचा है कि दिल की बात उसके रूबरू कर दें
हर इक बेजां तकल्लुफ़ से बग़ावत का इरादा है
मुहब्बत बेरुख़ी से और भड़केगी, वो क्या जाने
तबीयत इस अदा पर और फड़केंगी, वो क्या जाने
वो क्या जाने कि अपनी किस क़यामत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
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गीत: साहिर लुधियानवी
संगीत : रवि , फ़िल्म : हमराज़ , वर्ष : 1967
गायक : महेंद्र कपूर
आज करोना की भयंकर आपदा में रात दिन, घर परिवार को छोड़ देश की सेवा में जुटे सभी कोरोना योद्धा को सालम करते हुए साहिर साहब का लिखा नया दौर (1957) का ये गीत समर्पित करता हूँ...
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना
साथी हाथ बढ़ाना...
हम मेहनतवालों ने जब भी मिलकर क़दम बढ़ाया
सागर ने रस्ता छोड़ा पर्वत ने शीश झुकाया
फ़ौलादी हैं सीने अपने फ़ौलादी हैं बाँहें
हम चाहें तो पैदा कर दें, चट्टानों में राहें,
साथी हाथ बढ़ाना
मेहनत अपनी लेख की रेखा मेहनत से क्या डरना
कल ग़ैरों की ख़ातिर की अब अपनी ख़ातिर करना
अपना दुख भी एक है साथी अपना सुख भी एक
अपनी मंज़िल सच की मंज़िल अपना रस्ता नेक,
साथी हाथ बढ़ाना
एक से एक मिले तो कतरा बन जाता है दरिया
एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सेहरा
एक से एक मिले तो राई बन सकता है पर्वत
एक से एक मिले तो इन्सान बस में कर ले क़िस्मत,
साथी हाथ बढ़ाना
माटी से हम लाल निकालें मोती लाएँ जल से
जो कुछ इस दुनिया में बना है, बना हमारे बल से
कब तक मेहनत के पैरों में ये दौलत की ज़ंजीरें
हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने सपनों की तस्वीरें,
साथी हाथ बढ़ाना...
चंद कलियाँ निशात की चुन कर
मुद्दतों महवे यास रहता हूँ
तेरा मिलना खुशी की बात सही,
तुझसे मिल कर उदास रहता हूँ
- साहिर लुधियानवी
चन्द कलियाँ निशात की चुन कर
मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ।
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तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो क़हक़हे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
छुपा-छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गयी हो तुम
मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो
उम्मीद क्या है बस एक पेशो-ओ-पश है कुछ भी नहीं
मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो
ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाईयों पर रहम करो
वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं
मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो
मेरी फ़ना मेरे एहसास का तक़ाज़ा है
मैं न जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है
शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है
मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
खफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर
तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम
मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो
हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो
मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ
मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता
ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के तले
हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा
हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर
हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका
ये करख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा
ये शरहों पे रंगीन साड़िओं की झलक
ये झोँपड़ियों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशें
ये माल रोड पे कारों की रैल पैल का शोर
ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे
गली गली में बिकते हुए जवाँ चेहरे
हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छायी हुई
ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ
खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी
ये बात बात पे कानून और ज़ब्ते की गिरफ़्त
ये ज़ीस्क़ ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
ये ग़म हैं बहोत मेरी ज़िंदगी मिटाने को
उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो !!
______साहिर लुधियानवी
गरजत बरसत सावन आयो रे
लाए न संग में बिछड़े बलमवा, सखी का करूँ हाए
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे, तड़पे जियरवा नयन समान
पड़ गईं फीकी लाल चुनरिया, पिया नहीं आए
पल- पल छिन- छिन पवन झकोरे, लागे तन पर तीर समान
नैनन जल सूं भीगी सजरिया, अगन लगाए
गरजते - बरसत सावन आयो रे
लाए न संग में हमरे बिछड़े बलमवा, सखी का करूँ हाए
फ़िल्म : बरसात की रात , वर्ष : 1960
-गीत : साहिर लुधियानवी
संगीत : रौशन ,
गायक : सुमन कल्याण पुर और कमल बारोत
जहाँ बस्ती थी खुशियाँ, आज हैं मातम वहाँ
वक़्त लाया था बहारें वक़्त लाया है खिजां ।
वक़्त से दिन और रात, वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै गुलाम, वक़्त का हर शै पे राज ।
वक़्त की गर्दिश से है, चाँद तारों का निजाम
वक़्त की ठोकर में है क्या हुकूमत क्या समाज ।
वक़्त की पाबंद हैं आती जाती रौनकें
वक़्त है फूलों के सेज, वक़्त है काँटों का ताज ।
आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिजाज ।
वक़्त के आगे उड़ी कितनी तहजीबों की धूल
वक़्त के आगे मिटे कितने मजहब और रिवाज़ ।
हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं, मगर
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है।
हज़ारों चांद सितारों का खून होता है
तब एक सुबह फिज़ाओं पे मुस्कुराती है।
मेरे नदीम मेरे हमसफर ....
जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो ज़िन्दगी में नया रंग ला नहीं सकते।
जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते।
मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो |
(नज़्म: मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो)
राज़ की बात है, महफ़िल में कहें या न कहें
बस गया है कोई इस दिल में कहें या न कहें
कहें या न कहें
निगाहें मिलाने को जी चाहता है
दिल-ओ-जाँ लुटाने को जी चाहता है
वो तोहमत जिसे इश्क़ कहती है दुनिया
वो तोहमत उठाने को जी चाहता है
किसी के मनाने में लज़्ज़त वो पाई
कि फिर रूठ जाने को जी चाहता है
मेरा रूठ जाने को जी चाहता है
वो जलवा जो ओझल भी है सामने भी
वो जलवा चुराने को जी चाहता है
ओऽ जिस घड़ी मेरी निगाहों को तेरी दीद हुई
वो घड़ी मेरे लिए ऐश की तमहीद हुई
जब कभी मैंने तेरा चाँद-सा चेहरा देखा
ईद हो या कि न हो मेरे लिए ईद हुई
वो जलवा जो ओझल भी है सामने भी
वो जलवा चुराने को जी चाहता है
अल्लाह तेरो नाम,
#ईश्वर तेरो नाम... कोरोना की भयंकर आपदा में मुझे आज बार बार साहिर साहब के लिखे भजन की ये पंगतिया याद आ रही हैं, जो की उन्होंने फिल्म
#हमदोनों के लिए लिखी थी, इसे लाता दी ने गाया था, तथा संगीतबद्ध किया था जयदेव जी ने ...
इस धरती का रूप ना उजड़े
इस धरती का
रूप ना उजड़े
प्यार की ठंडी धूप ना उजड़े
प्यार की ठंडी
धूप ना उजड़े, सबको मिले, दाता
सबको मिले
सुख का वरदान
सबको सन्मति दे भगवान.
मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी-कभी
होती है दिल्बरों की इनायत कभी-कभी
शरमा के मुँह न फेर नज़र के सवाल पर
लाती है ऐसे मोड़ पर क़िस्मत कभी-कभी
खुलते नहीं हैं रोज़ दरिचे बहार के
आती है जान-ए-मन ये क़यामत कभी-कभी
तनहा न कट सकेंगे जवानी के रास्ते पेश आएगी किसीकी ज़रूरत कभी-कभी
फिर खो न जाएं हम कहीं दुनिया की भीड़ में
मिलती है पास आने की मुहलत कभी-कभी
होती है दिल्बरों की इनायत कभी-कभी
मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी ...
गजल (1964)
मदन मोहन और साहिर लुधियानवी
मोहम्मद रफ़ी
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह
तेरे सेहरे की ...
तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
ये मेरे शेर मेरे आखिरी नज़राने हैं
मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं
बेत-आ-लुख़ सी मुलाकात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे
तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे
ये मेरी ख़्वाहिश ये ख़यालात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
कौन कहता है चाहत पे सभी का हक़ है
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है
मुझसे कह दे ...
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
रंग और नूर की ...
हे..., नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले
ऐसे ही जग में, आती हैं सुबहें
ऐसे ही शाम ढले ...
शबनम के मोती, फूलों पे बिखरे
दोनों की आस फले ...
बलखाती बेलें, मस्ती में खेलें
पेड़ों से मिलके गले ...
नदिया का पानी, दरिया से मिलके
सागर किस ओर चले ... (हमराज)
प्लेबैक सिंगर मोहम्मद रफी साहब जी की
#पुण्यतिथि के अवसर पर.....शत् शत् नमन


ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का मस्तानों का
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है दुनिया का गहना
यहाँ चौड़ी छाती वीरों की
यहाँ भोली शक्लें हीरों की
यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में
मस्ती में झूमें बस्ती में
पेड़ों में बहारें झूलों की
राहों में कतारें फूलों की
यहाँ हँसता है सावन बालों में
खिलती हैं कलियाँ गालों में
कहीं दंगल शोख जवानों के
कहीं करतब तीर कमानों के
यहाँ नित-नित मेले सजते हैं
नित ढोल और ताशे बजते हैं
जब भी देखा तेरा चाँद सा चेहरा
ईद हो या ना हो मेरे लिए ईद है
साहिर लुधियानवी
{ तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं }
***
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल!
मचल रहा है किसी ख़्वाब-ए-मरमरी की तरह!!
हसींन फूल-हसीं पत्तियाँ-हसीं शाख़ें!
लचक रही हैं किसी,जिस्म-ए-नाज़नीं की तरह!
फ़िज़ा मे घुल से गए हैं,उफ़क के नर्म खुतूत!!
ज़मी हसींंन है ख़्वाबों की सरज़मीं की तरह!
तसउव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं!!
***
कभी गुमान की सूरत,कभी यकीं की तरह!
वो पेड़ जिनके तले,हम पनाह लेते थे!!
खड़े हैं आज भी साकित,किसी अमीं की तरह!
इन्हीं के साए मे फिर आज दो धड़कते दिल!!
ख़ामोश होंठों से कुछ कहने सुनने आए हैं!
न जाने कितनी कशाकश से,कितनी काविश से!!
ये सोते जागते,लम्हें चुरा के लाए हैं!
***
यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था!
इन्हीं से हमने,मोहब्बत की इब्तिदा की थी!!
धड़कते दिल से,लरज़ती हुई निगाहों से!
हुज़ूर-ए-ग़ैब मे,नन्ही सी इल्तिजा की थी!!
कि आरज़ू के कँवल,खिल के फूल हो जाएं!
दिल-ओ-नज़र की दुआएँ,क़बूल हो जाएं!!

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं...
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर!
नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए!!
ख़ुद अपने क़दमो की आहट से झेंपती डरती!
ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए!!
तसउव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं!
***
र'वाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ पर!
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है!!
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से!
मेरी खुली हुई बाहों मे झूल जाता है!!
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं!
***
मै फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े मे!
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है!!
न जाने आज मै क्या बात कहने वाला हूँ!
ज़बान ख़ुश्क है,आवाज़ रुकती जाती है!!
तसउव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं!
***
मेरे गले मे तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं!
तुम्हारे होंठों पे मेरे लबों के साए हैं!!
मुझे यकीं है कि हम-अब कभी न बिछड़ेंंगे!
तुम्हें गुमान है कि हम,मिल के भी पराए हैं!!
तसउव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं!
***
मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को!
अदाएँ-अज्ज़ो करम से उठा रही हो तुम!!
सुहाग रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं!
दबे सुरों मे वोही गीत गा रही हो तुम!!

तसउव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
आज ईद के मौक़े पर साहिर की लिखी यह क़व्वाली याद आ रही है।
ये मस्जिद है, वो बुतख़ाना, मक़सद तो है दिल को समझाना, चाहे ये मानो, चाहे वो मानो।