काला हो या गोरा, सभी रंग खुबसूरत और कुदरत की विविधता का प्रतीक : डॉ वीना गुप्ता
विश्व ट्रेड यूनियन संघ, वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन ने 24 जून को रंगभेद के खिलाफ संघर्ष को समर्थन के लिए दुनिया भर की ट्रेड यूनियन से आह्वान किया था । सीटू ने भी देश की सभी यूनियन से रंगभेद के खिलाफ संघर्ष को समर्थन के साथ साथ धर्म जाति लिंग भाषा और क्षेत्र पर आधारित भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और वर्गीय एकजुटता को मजबूत करने का आह्वान किया था।
इस मौके पर हम उत्तर प्रदेश की अपनी यूनियन के बीच आज से इन बिंदुओं पर विचार-विमर्श शुरू कर रहे हैं। पिछले कुछ समय में आप सभी ने यह जरूर पढ़ा होगा कि अमेरिका में काले एक अफ्रीकन व्यक्ति को अमेरिका की गोरी पुलिस वाले ने हत्या कर दी जिसके विरोध में पूरे देश में इतना मजबूत आंदोलन हुआ कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को छिपकर कुछ समय के लिए बकर में रहना पड़ा । इस आंदोलन में काले लोगों की बड़ी संख्या के साथ लोकतंत्र समानता में विश्वास रखने वाले गोरे लोगों ने भी भागीदारी की। हम अपने यूनियन की तरफ से इस आंदोलन को मजबूती के साथ समर्थन देते हैं।
आइए भारतीय परिपेक्ष में काले रंग को लेकर जो धारणाएं हैं और जो भेदभाव होता है उस पर कोई चर्चा करें। हमारे देश में काले रंग के प्रति नस्ल भेद की भावना तो नहीं है , लेकिन समाज के अंदर गहराई से काले रंग के प्रति कुछ अवधारणाएं बनी हुई है जो नकारात्मक हैं और ये जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं। इस साइलेंट violence के हम इतने आदि हो जाते हैं कि एक समाज के तौर पर इसमें हस्तक्षेप करना या इसका विरोध करना बिल्कुल भी जरूरी नहीं समझते।
सभी को याद होगा हमारी आजादी के आंदोलन का भी इस रंगभेद से गहरा संबंध है महात्मा गांधी अफ्रीका गए थे और उन्हें ट्रेन से फेंक दिया गया था । जिसके खिलाफ उन्होंने आंदोलन शुरू किया था।
इसका कारण यही था कि काले लोगों को ट्रेन की ऊंची श्रेणी में बैठने की इजाजत नहीं थी। गुलामी के दौर में भी बहुत सारे स्थान ऐसे थे जहां भारतीयों को जाने की इजाजत नहीं थी और सिर्फ अंग्रेजों के लिए आरक्षित थी आपने बहुत सी फिल्मों में डायलॉग सुना होगा यू ब्लडी इंडियन यू ब्लडी ब्लैक पूरे एशिया दक्षिण एशिया और अफ्रीका के सभी लोगों को ब्लैक्स की श्रेणी में माना जाता है लेकिन अमेरिका और दूसरे मुल्कों में यही ब्लैक जब अपने देश में आते हैं तो गोरे रंग का ऑब्सेशन इनके दिमाग से भी निकल नहीं पाता।
आइए भारतीय संदर्भों में काले रंग पर बात करें।
हमारे समाज में जब शिशु जन्म लेता है तभी से रंग पर चर्चा शुरू हो जाती है। अगर बेटी पैदा हुई और उसका रंग काला हुआ तो लोग कहते हैं कि अरे , एक टोंलड़की ऊपर से काली । इसकी शादी में तो बहुत पैसा खर्च होगा उसकी शादी कैसे होगी । ऐसा लगेगा की परिवार पर दोहरा संकट आया है , एक तो लड़की का दूसरा उसके काला होने का।
और अगर लड़का काला पैदा हुआ, टिप्पणी तो करेंगे पर चिंता कम है क्योंकि सुझाव आ जाता है कि इसकी शादी किसी गोरी लड़की से कर देना नस्ल सुधर जाएगी।
काला रंग देखकर बचपन से ही रिश्तेदार, मोहल्लेदार, पड़ोसी, जान पहचान वाले सभी सलाह देनी और नुस्खे बताना शुरू कर देते हैं, हल्दी चंदन दूध उबटन, खीरा, संतरा और इनसे भी काम ना चले तो गोरेपन की क्रीम ।
इसका दुहरा नुकसान होता है । पहला कि बच्चों में कम उम्र में ही मनोवैज्ञानिक तरीके से ऐसी मानसिकता बना दी जाती है कि गोरा रंग श्रेष्ठ होता है , दूसरी बात ये कि एक अनावश्यक कार्य अपने को गोरा कैसे बनाएं इसमें समय की बर्बादी होती है, तीसरा गोरेपन की क्रीम से कोई गोरा तो नहीं होता लेकिन करोड़ों रुपए इस नाम पर कॉस्मेटिक कंपनियां कमा कर ले जाती हैं। गोरेपन की क्रीम का बहुत बड़ा व्यापार है कि अब इन्होंने लड़कों के लिए भी गोरेपन की क्रीम बनानी शुरू कर दी है और उसकी भी बहुत ज्यादा सेल हो रही है। बच्चों को समझाने की जरूरत है कि जितना पैसा वे गोरेपन की क्रीम पर खर्च कर रहे हैं उस पैसे से कम से कम कुछ फल खरीद कर खा ले।
आप लोग जरा याद करिए की पहले बच्चों के खेलने के लिए गुड़िया हमारे स्थानीय परिवेश की होती थीं। राजस्थान की, गुजरात की, हर प्रदेश की, पहाड़ की, गांव की गुड़िया और ये घर मे स्थानीय मार्केट में आती थी । वह हमारे ही परिवेश की होती थी ।
दिल्ली में डॉल्स म्यूजियम है जिसमें हमारे हर प्रदेश और दुनिया भर के हर देश की गुड़िया हैं।
लेकिन धीरे-धीरे इसकी जगह बार्बी नाम की इंटरनेशनल गुड़िया ने ले ली आज यही गुड़िया हर परिवार की चाहत बन गई है ।
दुबली पतली गोरे रंग की भूरे बाल नीली आंखें वाली यह गुड़िया उच्च मध्य वर्ग से मध्य वर्ग होते हुए बाजार के माध्यम से हर घर में पहुंच गई और अनजाने में ही यह ऐसा मानक हमारी बच्चों के मन में बैठ गया कि वह दुबले होने स्लिम होने को भी खूबसूरती का हिस्सा समझने लगी। हमारी बच्चियां वैसे ही खून की कमी का शिकार हैं, अब
बिना समझे डायटिंग करके अपना समय और सेहत दोनों खराब कर रही हैं। उच्च और मध्य वर्गीय महिलाओं का तो ये प्रिय विषय है । गोरा रंग, और डायटिंग की वहशत ने इनके दिल और दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है।
आज बार्बी का बहुत बड़ा कारोबार है । टीवी पर किड्स प्रोग्राम में, डेली सोप, फिल्म्स और सीरियलों में इसको दिखाया जाता है। इसका विज्ञापन का बाजार बहुत बड़ा है। नई पीढ़ी तो भूल ही गई होगी की कितनी तरह की गुड़िया कभी आया करती थी बार्बी के माध्यम से एक खूबसूरत लड़की का मानक बच्चियों में लड़कों में भी और परिवारों में भी धीरे से पहुंचा दिया गया है।
कुछ लोगों ने एक काले रंग की गुड़िया लैला नाम से बाजार में लांच की, पर सफल नहीं हो पाई क्योंकि ये सिर्फ रंग का मामला नहीं बल्कि बाजार की रणनीतिक लड़ाई का भी मसला है। कई तरह की गुड़िया नजर में हैं, पर बार्बी सब से ऊपर और हर जगह है। अब बार्बी का घर, किचेन,गार्डन, सब खिलौनों पर बार्बी का ही कब्जा है।
मनु स्मृति और कुछ अन्य साहित्य में गौर वर्ण को आर्यों, योद्धाओं के साथ संबद्ध किया गया है। इसलिए कुछ लोग रंग के आधार पर जाति को पहचानने की भी कोशिश करते हैं ऐसे लोगों के लिए ही राहुल सांकृत्यायन जैसे महान लोगों ने लिखा है कि गोरे रंग की श्रेष्ठता के प्रति आसक्ति मन का वहम है आजकल काले पंडित और गोरे रंग के हरिजन व अनुसूचित जाति के लोग बड़ी तादाद में देखे जा सकते हैं, फिर भी तुच्छ मानसिकता के लोग काले रंग के साथ जातियों की पहचान को जोड़ते हैं। हिंदुत्व के उभार के साथ गोरे रंग के प्रति जातिय और धार्मिक पूर्वाग्रह और ज़्यादा बढ़े हैं।
शायरों और कवियों ने भी काले रंग को बदनाम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इन्होंने गोरे रंग की नायिका की कल्पना की है और उसकी तारीफ में बहुत सी कविताएं लिखी जिससे लड़कियों और लड़कों के कोमल मन में गोरे रंग से आसक्ति होने लगती है । फिल्म में भी नायक नायिका गोरे होते हैं, साइड हीरो काला हो सकता है।
यही नहीं हम अपने बुरे वक्त को और मुसीबतों को भी काले रंग के साथ ही मनसूब करते हैं जैसे बुरे वक्त को मुसीबतों की काली रात, अपराधियों और घटिया लोगों की सूची को काली सूची, गैर कानूनी ढंग से कमाए धन को काला धन आदि।
अपशकुन के साथ भी काले रंग को जोड़ा गया । काली बिल्ली का रस्ता काटना, काला कुत्ता, काला सांप, काला कौवा और किसी पर किसी का बुरा चाहने के लिए काला जादू और जादू के लिए अमावस की काली रात, नजर ना लगे इसके लिए काला धागा, काला टीका, शनि के बुरे ग्रह को डालने के लिए काली उड़द और काली धातु लोहे का दान आदि। टोटके और तंत्र के लिए काली अंधेरी रात, बुराई को भी काली ताकत, कहा गया। रात्रिचर पक्षियों को भी अपशकुन और तंत्र से जोड़ा गया जैसे उल्लू, चमगादड़, सियार आदि। राक्षसों, चुड़ेलों जैसे काल्पनिक चरित्र भी बच्चों की कहानियों में काले ही हैं। डकैतों, और चोरों को भी काला ही चित्रित किया जाता है।
मुखतर सी बात यह है कि जितना भी बुराइयां, अपशगुन, समाज विरोधी और इंसानियत के दुश्मन चीजें हैं उन सब के साथ काले रंग को जोड़ा दिया गया।
इंसान में कुछ पसंद, नापसंद जन्म से ही होती हैं तो कुछ उनकी परवरिश और परिवेश पर भी निर्भर होती है। ऐसे में अनजाने में ही काले रंग के प्रति यह पूर्व धारणा जो शिशु के रूप में या किशोरावस्था में अवचेतन मन में बैठ जाती है वही आगे चलकर कभी-कभी एक ग्रंथि ऑब्सेशन और नफरत का रूप ले लेती है।
इन सभी अवधारणाओं का शोषण और वर्गीय आधार है लेकिन काले रंग की सुंदरता को हमें समझना चाहिए ।अंधेरी रात कोई भी इतनी अंधेरी नहीं होती कि बिल्कुल भी रोशनी ना हो ।
और फिर अंधेरी रात में अपने शहर अपने गांव को देखना, रात की खामोशी में चांद तारो और आसमान को पढ़ना, दिन भर बेचैन रहे शहर को आधी रात मैं निश्चल पड़े देखना, और दूर दूर तक फैली फसल को देखकर भविष्य के सपने बुनना, और दिन भर बस टैक्सी कारो और भीड़ से पर रात में खाली, अकेली ,खामोश सड़क को स्ट्रीट लाइट में देखना एक चमत्कारिक अनुभव है । रात का अंधेरा ना हो तो यह फुर्सत के पल कैसे मिलेंगे। हमें समझना होगा कि काली बिल्ली भी उतनी ही मासूम है जितने किसी और दूसरे रंग की बिल्ली दरअसल जानवरों को भी इंसान ने अपनी कहानियों में फिट करने के लिए बहुत सी बुराइयां आरोपित कर दें जैसे लोमड़ी का चालाक होना शेर जंगल का राजा बता देना, आदि।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिवेश को देख कर, उसका विश्लेषण करके इन बुराइयों को दूर करना होगा। यह धारणा है बहुत से पढ़े लिखे लोगों में भी हैं इसका संबंध पढ़ाई लिखाई से नहीं है मैंने देखा है ट्विटर पर बहुत लोग एक वरिष्ठ पत्रकार को कलुआ कलुआ कहकर मजाक उड़ाते हैं क्योंकि वह बेबाकी से सरकार की पोल खोलता है। कलुआ कहकर एक वह उसके वक्तव्य की गंभीरता और गहराई को अपने विक्रत हंसी से कम करना चाहते हैं। यहां यहां ये रंगभेद एक गाली बन जाता है।
सिर्फ गोरे और काले रंग ही नहीं बल्कि कुछ बच्चे जन्म से अति सफेद होते हैं जो सूरजमुखी बच्चे कहलाते हैं, कुछ लोगों में उम्र बढ़ने के साथ उनकी त्वचा का मेलोनी न खत्म होने लगता है और वहां पर सफेद चकते दिखाई देने लगते हैं । यह किसी बीमारी का सूचक नहीं बल्कि एक प्राकृतिक तरीके से घटना है इनके साथ भी भेदभाव करने की कोई जरूरत नहीं है , और ना ही नफरत की।
कुदरत ने जो कुछ भी दिया है उसे समझने की और उसका सम्मान करने की आवश्यकता है संकीर्णता कि नहीं हृदय को विशाल बनाने की जरूरत है।
हमारे चारों तरफ बच्चियों पर बच्चों पर कमजोर पर जुल्मो रहे हैं हम इन से नफरत करें, इस समाज व्यवस्था से नफरत करें जो शोषण पर टिकी है। उनसे क्यों नफरत करते हैं जो कुदरत की बनाई चीज है जिस पर इंसान का कोई अख्तियार नहीं।
हम सब को काले रंग के प्रति नापसंदगी से बचना होगा, हम कोशिश करनी चाहिए कि
रंग से सम्बन्धित टिप्पणी ना करें
रंगभेद सें जुड़ी कहावतें ना सुनाएं
काले रंग को शुभ अशुभ से ना जोड़ें
जानवरों और पक्षियों में भी रंग के आधार पर भेद, या शुभ अशुभ ना करे
जब अन्य लोग रंगभेद की बात करें तो
विनम्रता से बहस करें
बच्चों को सभी रंगों के प्रति आदर और प्रेम का भाव पैदा करे, विविधता को स्वीकारने की दिशा मेंपहला कदम है ये।
साथियों आप अपनी यूनियन में, और परिवार में, इस विषय पर बात करें अन्य परिवारों में भी बात करें अगर कुछ शंकाएं सवाल हो तो मेरे व्हाट्सएप नंबर पर भेज दे .
धन्यवाद
विश्व ट्रेड यूनियन संघ, वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन ने 24 जून को रंगभेद के खिलाफ संघर्ष को समर्थन के लिए दुनिया भर की ट्रेड यूनियन से आह्वान किया था । सीटू ने भी देश की सभी यूनियन से रंगभेद के खिलाफ संघर्ष को समर्थन के साथ साथ धर्म जाति लिंग भाषा और क्षेत्र पर आधारित भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और वर्गीय एकजुटता को मजबूत करने का आह्वान किया था।
इस मौके पर हम उत्तर प्रदेश की अपनी यूनियन के बीच आज से इन बिंदुओं पर विचार-विमर्श शुरू कर रहे हैं। पिछले कुछ समय में आप सभी ने यह जरूर पढ़ा होगा कि अमेरिका में काले एक अफ्रीकन व्यक्ति को अमेरिका की गोरी पुलिस वाले ने हत्या कर दी जिसके विरोध में पूरे देश में इतना मजबूत आंदोलन हुआ कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को छिपकर कुछ समय के लिए बकर में रहना पड़ा । इस आंदोलन में काले लोगों की बड़ी संख्या के साथ लोकतंत्र समानता में विश्वास रखने वाले गोरे लोगों ने भी भागीदारी की। हम अपने यूनियन की तरफ से इस आंदोलन को मजबूती के साथ समर्थन देते हैं।
आइए भारतीय परिपेक्ष में काले रंग को लेकर जो धारणाएं हैं और जो भेदभाव होता है उस पर कोई चर्चा करें। हमारे देश में काले रंग के प्रति नस्ल भेद की भावना तो नहीं है , लेकिन समाज के अंदर गहराई से काले रंग के प्रति कुछ अवधारणाएं बनी हुई है जो नकारात्मक हैं और ये जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं। इस साइलेंट violence के हम इतने आदि हो जाते हैं कि एक समाज के तौर पर इसमें हस्तक्षेप करना या इसका विरोध करना बिल्कुल भी जरूरी नहीं समझते।
सभी को याद होगा हमारी आजादी के आंदोलन का भी इस रंगभेद से गहरा संबंध है महात्मा गांधी अफ्रीका गए थे और उन्हें ट्रेन से फेंक दिया गया था । जिसके खिलाफ उन्होंने आंदोलन शुरू किया था।
इसका कारण यही था कि काले लोगों को ट्रेन की ऊंची श्रेणी में बैठने की इजाजत नहीं थी। गुलामी के दौर में भी बहुत सारे स्थान ऐसे थे जहां भारतीयों को जाने की इजाजत नहीं थी और सिर्फ अंग्रेजों के लिए आरक्षित थी आपने बहुत सी फिल्मों में डायलॉग सुना होगा यू ब्लडी इंडियन यू ब्लडी ब्लैक पूरे एशिया दक्षिण एशिया और अफ्रीका के सभी लोगों को ब्लैक्स की श्रेणी में माना जाता है लेकिन अमेरिका और दूसरे मुल्कों में यही ब्लैक जब अपने देश में आते हैं तो गोरे रंग का ऑब्सेशन इनके दिमाग से भी निकल नहीं पाता।
आइए भारतीय संदर्भों में काले रंग पर बात करें।
हमारे समाज में जब शिशु जन्म लेता है तभी से रंग पर चर्चा शुरू हो जाती है। अगर बेटी पैदा हुई और उसका रंग काला हुआ तो लोग कहते हैं कि अरे , एक टोंलड़की ऊपर से काली । इसकी शादी में तो बहुत पैसा खर्च होगा उसकी शादी कैसे होगी । ऐसा लगेगा की परिवार पर दोहरा संकट आया है , एक तो लड़की का दूसरा उसके काला होने का।
और अगर लड़का काला पैदा हुआ, टिप्पणी तो करेंगे पर चिंता कम है क्योंकि सुझाव आ जाता है कि इसकी शादी किसी गोरी लड़की से कर देना नस्ल सुधर जाएगी।
काला रंग देखकर बचपन से ही रिश्तेदार, मोहल्लेदार, पड़ोसी, जान पहचान वाले सभी सलाह देनी और नुस्खे बताना शुरू कर देते हैं, हल्दी चंदन दूध उबटन, खीरा, संतरा और इनसे भी काम ना चले तो गोरेपन की क्रीम ।
इसका दुहरा नुकसान होता है । पहला कि बच्चों में कम उम्र में ही मनोवैज्ञानिक तरीके से ऐसी मानसिकता बना दी जाती है कि गोरा रंग श्रेष्ठ होता है , दूसरी बात ये कि एक अनावश्यक कार्य अपने को गोरा कैसे बनाएं इसमें समय की बर्बादी होती है, तीसरा गोरेपन की क्रीम से कोई गोरा तो नहीं होता लेकिन करोड़ों रुपए इस नाम पर कॉस्मेटिक कंपनियां कमा कर ले जाती हैं। गोरेपन की क्रीम का बहुत बड़ा व्यापार है कि अब इन्होंने लड़कों के लिए भी गोरेपन की क्रीम बनानी शुरू कर दी है और उसकी भी बहुत ज्यादा सेल हो रही है। बच्चों को समझाने की जरूरत है कि जितना पैसा वे गोरेपन की क्रीम पर खर्च कर रहे हैं उस पैसे से कम से कम कुछ फल खरीद कर खा ले।
आप लोग जरा याद करिए की पहले बच्चों के खेलने के लिए गुड़िया हमारे स्थानीय परिवेश की होती थीं। राजस्थान की, गुजरात की, हर प्रदेश की, पहाड़ की, गांव की गुड़िया और ये घर मे स्थानीय मार्केट में आती थी । वह हमारे ही परिवेश की होती थी ।
दिल्ली में डॉल्स म्यूजियम है जिसमें हमारे हर प्रदेश और दुनिया भर के हर देश की गुड़िया हैं।
लेकिन धीरे-धीरे इसकी जगह बार्बी नाम की इंटरनेशनल गुड़िया ने ले ली आज यही गुड़िया हर परिवार की चाहत बन गई है ।
दुबली पतली गोरे रंग की भूरे बाल नीली आंखें वाली यह गुड़िया उच्च मध्य वर्ग से मध्य वर्ग होते हुए बाजार के माध्यम से हर घर में पहुंच गई और अनजाने में ही यह ऐसा मानक हमारी बच्चों के मन में बैठ गया कि वह दुबले होने स्लिम होने को भी खूबसूरती का हिस्सा समझने लगी। हमारी बच्चियां वैसे ही खून की कमी का शिकार हैं, अब
बिना समझे डायटिंग करके अपना समय और सेहत दोनों खराब कर रही हैं। उच्च और मध्य वर्गीय महिलाओं का तो ये प्रिय विषय है । गोरा रंग, और डायटिंग की वहशत ने इनके दिल और दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है।
आज बार्बी का बहुत बड़ा कारोबार है । टीवी पर किड्स प्रोग्राम में, डेली सोप, फिल्म्स और सीरियलों में इसको दिखाया जाता है। इसका विज्ञापन का बाजार बहुत बड़ा है। नई पीढ़ी तो भूल ही गई होगी की कितनी तरह की गुड़िया कभी आया करती थी बार्बी के माध्यम से एक खूबसूरत लड़की का मानक बच्चियों में लड़कों में भी और परिवारों में भी धीरे से पहुंचा दिया गया है।
कुछ लोगों ने एक काले रंग की गुड़िया लैला नाम से बाजार में लांच की, पर सफल नहीं हो पाई क्योंकि ये सिर्फ रंग का मामला नहीं बल्कि बाजार की रणनीतिक लड़ाई का भी मसला है। कई तरह की गुड़िया नजर में हैं, पर बार्बी सब से ऊपर और हर जगह है। अब बार्बी का घर, किचेन,गार्डन, सब खिलौनों पर बार्बी का ही कब्जा है।
मनु स्मृति और कुछ अन्य साहित्य में गौर वर्ण को आर्यों, योद्धाओं के साथ संबद्ध किया गया है। इसलिए कुछ लोग रंग के आधार पर जाति को पहचानने की भी कोशिश करते हैं ऐसे लोगों के लिए ही राहुल सांकृत्यायन जैसे महान लोगों ने लिखा है कि गोरे रंग की श्रेष्ठता के प्रति आसक्ति मन का वहम है आजकल काले पंडित और गोरे रंग के हरिजन व अनुसूचित जाति के लोग बड़ी तादाद में देखे जा सकते हैं, फिर भी तुच्छ मानसिकता के लोग काले रंग के साथ जातियों की पहचान को जोड़ते हैं। हिंदुत्व के उभार के साथ गोरे रंग के प्रति जातिय और धार्मिक पूर्वाग्रह और ज़्यादा बढ़े हैं।
शायरों और कवियों ने भी काले रंग को बदनाम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इन्होंने गोरे रंग की नायिका की कल्पना की है और उसकी तारीफ में बहुत सी कविताएं लिखी जिससे लड़कियों और लड़कों के कोमल मन में गोरे रंग से आसक्ति होने लगती है । फिल्म में भी नायक नायिका गोरे होते हैं, साइड हीरो काला हो सकता है।
यही नहीं हम अपने बुरे वक्त को और मुसीबतों को भी काले रंग के साथ ही मनसूब करते हैं जैसे बुरे वक्त को मुसीबतों की काली रात, अपराधियों और घटिया लोगों की सूची को काली सूची, गैर कानूनी ढंग से कमाए धन को काला धन आदि।
अपशकुन के साथ भी काले रंग को जोड़ा गया । काली बिल्ली का रस्ता काटना, काला कुत्ता, काला सांप, काला कौवा और किसी पर किसी का बुरा चाहने के लिए काला जादू और जादू के लिए अमावस की काली रात, नजर ना लगे इसके लिए काला धागा, काला टीका, शनि के बुरे ग्रह को डालने के लिए काली उड़द और काली धातु लोहे का दान आदि। टोटके और तंत्र के लिए काली अंधेरी रात, बुराई को भी काली ताकत, कहा गया। रात्रिचर पक्षियों को भी अपशकुन और तंत्र से जोड़ा गया जैसे उल्लू, चमगादड़, सियार आदि। राक्षसों, चुड़ेलों जैसे काल्पनिक चरित्र भी बच्चों की कहानियों में काले ही हैं। डकैतों, और चोरों को भी काला ही चित्रित किया जाता है।
मुखतर सी बात यह है कि जितना भी बुराइयां, अपशगुन, समाज विरोधी और इंसानियत के दुश्मन चीजें हैं उन सब के साथ काले रंग को जोड़ा दिया गया।
इंसान में कुछ पसंद, नापसंद जन्म से ही होती हैं तो कुछ उनकी परवरिश और परिवेश पर भी निर्भर होती है। ऐसे में अनजाने में ही काले रंग के प्रति यह पूर्व धारणा जो शिशु के रूप में या किशोरावस्था में अवचेतन मन में बैठ जाती है वही आगे चलकर कभी-कभी एक ग्रंथि ऑब्सेशन और नफरत का रूप ले लेती है।
इन सभी अवधारणाओं का शोषण और वर्गीय आधार है लेकिन काले रंग की सुंदरता को हमें समझना चाहिए ।अंधेरी रात कोई भी इतनी अंधेरी नहीं होती कि बिल्कुल भी रोशनी ना हो ।
और फिर अंधेरी रात में अपने शहर अपने गांव को देखना, रात की खामोशी में चांद तारो और आसमान को पढ़ना, दिन भर बेचैन रहे शहर को आधी रात मैं निश्चल पड़े देखना, और दूर दूर तक फैली फसल को देखकर भविष्य के सपने बुनना, और दिन भर बस टैक्सी कारो और भीड़ से पर रात में खाली, अकेली ,खामोश सड़क को स्ट्रीट लाइट में देखना एक चमत्कारिक अनुभव है । रात का अंधेरा ना हो तो यह फुर्सत के पल कैसे मिलेंगे। हमें समझना होगा कि काली बिल्ली भी उतनी ही मासूम है जितने किसी और दूसरे रंग की बिल्ली दरअसल जानवरों को भी इंसान ने अपनी कहानियों में फिट करने के लिए बहुत सी बुराइयां आरोपित कर दें जैसे लोमड़ी का चालाक होना शेर जंगल का राजा बता देना, आदि।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिवेश को देख कर, उसका विश्लेषण करके इन बुराइयों को दूर करना होगा। यह धारणा है बहुत से पढ़े लिखे लोगों में भी हैं इसका संबंध पढ़ाई लिखाई से नहीं है मैंने देखा है ट्विटर पर बहुत लोग एक वरिष्ठ पत्रकार को कलुआ कलुआ कहकर मजाक उड़ाते हैं क्योंकि वह बेबाकी से सरकार की पोल खोलता है। कलुआ कहकर एक वह उसके वक्तव्य की गंभीरता और गहराई को अपने विक्रत हंसी से कम करना चाहते हैं। यहां यहां ये रंगभेद एक गाली बन जाता है।
सिर्फ गोरे और काले रंग ही नहीं बल्कि कुछ बच्चे जन्म से अति सफेद होते हैं जो सूरजमुखी बच्चे कहलाते हैं, कुछ लोगों में उम्र बढ़ने के साथ उनकी त्वचा का मेलोनी न खत्म होने लगता है और वहां पर सफेद चकते दिखाई देने लगते हैं । यह किसी बीमारी का सूचक नहीं बल्कि एक प्राकृतिक तरीके से घटना है इनके साथ भी भेदभाव करने की कोई जरूरत नहीं है , और ना ही नफरत की।
कुदरत ने जो कुछ भी दिया है उसे समझने की और उसका सम्मान करने की आवश्यकता है संकीर्णता कि नहीं हृदय को विशाल बनाने की जरूरत है।
हमारे चारों तरफ बच्चियों पर बच्चों पर कमजोर पर जुल्मो रहे हैं हम इन से नफरत करें, इस समाज व्यवस्था से नफरत करें जो शोषण पर टिकी है। उनसे क्यों नफरत करते हैं जो कुदरत की बनाई चीज है जिस पर इंसान का कोई अख्तियार नहीं।
हम सब को काले रंग के प्रति नापसंदगी से बचना होगा, हम कोशिश करनी चाहिए कि
रंग से सम्बन्धित टिप्पणी ना करें
रंगभेद सें जुड़ी कहावतें ना सुनाएं
काले रंग को शुभ अशुभ से ना जोड़ें
जानवरों और पक्षियों में भी रंग के आधार पर भेद, या शुभ अशुभ ना करे
जब अन्य लोग रंगभेद की बात करें तो
विनम्रता से बहस करें
बच्चों को सभी रंगों के प्रति आदर और प्रेम का भाव पैदा करे, विविधता को स्वीकारने की दिशा मेंपहला कदम है ये।
साथियों आप अपनी यूनियन में, और परिवार में, इस विषय पर बात करें अन्य परिवारों में भी बात करें अगर कुछ शंकाएं सवाल हो तो मेरे व्हाट्सएप नंबर पर भेज दे .
धन्यवाद
No comments:
Post a Comment