- जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त (ब्रेष्त) की कवितायें
- प्रचार की ज़रूरत - बैर्तोल्त ब्रेष्त
- आदमखोरों के लिए
- जर्मन युद्ध प्रवेशिका / बैर्तोल्त ब्रेष्त / उज्ज्वल भट्टाचार्य
- नगरवासियों के लिए पाठ्यपुस्तक : बैर्तोल्त ब्रेष्त की लम्बी कविता
- खदेड़ने की वजह थी -मैं पला बहैसियत मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य
- फिर भी तुम खामोश हो
- जब फ़ासिस्ट मज़बूत हो रहे थे , अंग्रेजी से अनुवादः रामकृष्ण पाण्डेय
- एस.ए.^ सैनिक का गीत (बेर्टोल्ट ब्रेष्ट)
- आठ हजार गरीब लोगों का नगर के बाहर इकट्ठा होना
- शासन करने की कठिनाई : अनुवादः विश्वनाथ मिश्र
- एक पढ़ सकने वाले कामगार के सवाल
- कसीदा सीखने के लिए ज़बरदस्त उबकाई की घड़ी - बैर्तोल्त ब्रेष्त
- ज़बरदस्त उबकाई की घड़ी - बैर्तोल्त ब्रेष्त
- नेक आदमी से पूछताछ - बैर्तोल्त ब्रेष्त
- नाटक लिखनेवाले का गीत - बैर्तोल्त ब्रेष्त
1.प्रचार की ज़रूरत - बैर्तोल्त ब्रेष्त
1
यह मुमकिन है कि हमारे देश में सबकुछ वैसा नहीं है,
जैसा कि होना चाहिए था.
लेकिन इसमें कोई शक़ नहीं कि प्रचार ठीकठाक चल रहा है.
यहाँ तक कि भूखों को भी मानना पड़ेगा
कि खाद्यमंत्री बड़ा अच्छा भाषण देता है.
2
सरकार ने जब सिर्फ़ एक दिन में
हज़ार लोगों को मौत के घाट उतारा,
न कोई जाँच न अदालत का फ़ैसला
प्रचार मंत्री ने महान नेता के धीरज की तारीफ़ की
कि वह मारने से पहले इतने लम्बे अरसे तक इंतज़ार करते रहे
और ये बदमाश अपनी दौलत और इज़्ज़त का मज़ा लेते रहे
क्या गज़ब का भाषण था,
कि सिर्फ़ मरने वालों के रिश्तेदार ही नहीं,
बल्कि कसाई ख़ुद भी रो पड़े थे.
3
और फिर जब एक दिन साम्राज्य के सबसे बड़े हवाई जहाज़ में
आग लग गई, क्योंकि उसमें जल उठने वाली गैस भरी गई थी
ताकि न जलने वाली गैस जंग के लिये बचाई जा सके,
मरने वालों के ताबूत के सामने हवाई यातायात मंत्री ने वचन दिया
कि वह हिम्मत नहीं हारेंगे, और इसके बाद
चारों ओर तालियां बजने लगी. यहाँ तक कि ताबूतों से भी
तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी.
4
और कितना लाजवाब है
कूड़े और महान नेता की किताब के लिए प्रचार !
हर शख़्स को पढ़ना पड़ा महान नेता की किताब
वह जहाँ भी पड़ी रही हो.
चीथड़ा इकट्ठा करने के लिए शक्तिशाली गोयरिंग ने
ख़ुद को सबसे बड़ा चीथड़ा संग्राहक घोषित किया
और चीथड़ा रखने के लिए राजधानी के बीचोबीच
एक महल बनाया गया
जो शहर जितना ही विशाल था.
5
एक अच्छा प्रचारक
कूड़े के ढेर को सुरम्य पर्वत बना देता है.
अगर घी न मिले, वह साबित कर देता है
कि पतली कमर हर इन्सान के लिये अच्छी है.
जब वह चौड़ी सड़क बनाने की डींग हाँकता है
हज़ारो लोग ख़ुश हो जाते हैं, मानो उन्हें मोटरगाड़ी मिल गई हो.
भूखों मरनेवालों और जंग में जान देनेवालों की कब्र पर वह
पौधे रोपता है. लेकिन उसकी नौबत आने से काफ़ी पहले ही वह
अमन की बात करता है, जब कि तोप की गाड़ियां चल पड़ी होती हैं.
6
क़ायदे के प्रचार से ही यह मुमकिन था
कि करोड़ों लोगों को यकीन हो गया
कि सेना का निर्माण शांति के किले का निर्माण है
और हर नया टैंक एक शांति कपोत है
और सेना का हर नया दस्ता एक सबूत है
अमन से प्यार का.
7
बहरहाल : अच्छे भाषण से भले ही बहुत कुछ मिले,
सबकुछ तो नहीं मिलता. कुछ लोग
यह भी कहने लगे हैं : अफ़सोस,
गोश्त की बात सुनने से पेट नहीं भरता
और पैंट-कोट का नाम सुनने से बदन में गर्मी नहीं आती.
जब योजना मंत्री नये शानदार लिबास के कसीदे गढ़ता है
पानी नहीं बरसना चाहिए, वर्ना
श्रोताओं के फटे कपड़े भीगकर तार-तार हो जाएंगे.
8
प्रचार के मकसद के बारे में
और एक बात लाज़मी है : प्रचार जितना बढ़ता जाता है,
बाकी सारी चीज़ें उतनी ही घटने लगती हैं.
2.आदमखोरों के लिए :( बैर्तोल्त ब्रेष्त )अनुवाद - Ujjwal Bhattacharya
ज़्यादा मीनमेख नहीं निकालना चाहिए.
हाँ और ना के बीच
फ़र्क़ बहुत अधिक नहीं होता है.
सफ़ेद पन्ने पर लिखना एक अच्छी बात है
सोना और शाम को खाना भी.
जिस्म पर ताज़ा पानी, हवा
क़ायदे की पोशाक
क ख ग
पेट की सफ़ाई !
जिस घर में किसी को फाँसी लगी हो
वहाँ फंदे का ज़िक्र
क़तई ख़ूबसूरत नहीं है.
और कीचड़ में
मिट्टी और बालू के बीच
बहुत ज़्यादा फ़र्क़ करने से
कोई बात बनती नहीं है.
आह !
जिसे सितारों से भरे आसमान का
अंदाज़ा हो वो
अपनी ज़बान बंद ही रखे तो बेहतर है.
( वर्ष 1922 )
ब्रेष्त की कविताओं के संग्रह एकोत्तरशती से।( अनुवाद - उज्ज्वल भट्टाचार्य )
3. जर्मन युद्ध प्रवेशिका / बैर्तोल्त ब्रेष्त / उज्ज्वल भट्टाचार्य
एक
बड़े लोगों के लिए
खाने का ज़िक्र छोटी बात है ।
इसका मतलब है कि वे
खा चुके हैं ।
छोटों को धरती से जाना है
बिना लजीज़ गोश्त का
स्वाद लिए हुए ।
उनमें ताक़त नहीं रह जाती
यह सोचने की कि कहाँ से वे आए हैं और
कहाँ उन्हें जाना है,
सुहानी शामों के दौरान ।
ऊँचे पर्वत और विशाल समुद्र
देखने का उन्हें मौक़ा ही नहीं मिला
जबकि उनका वक़्त ख़त्म हो चला है ।
छोटे लोगों को अगर
छोटी बातों की फ़िक्र न हो
वे कभी बड़े नहीं बनेंगे ।
दो
भूखों की रोटी खाई जा चुकी है
गोश्त क्या होता है लोगों को पता नहीं । बेकार ही
जनता ने पसीना बहाया है ।
पुन्नाग के बाग
उजड़ चुके हैं ।
हथियारों के कारख़ानों की चिमनियों से
धुआँ निकल रहा है ।
तीन
रंगसाज़[1] आनेवाले महान समय की बात करता है
जंगल फैल रहे हैं अभी ।
खेत लहलहाते हैं अभी ।
शहर साबुत हैं अभी ।
इंसान सांस लेते हैं अभी ।
चार
कैलेण्डर में अभी उस दिन का ज़िक्र नहीं है.
सारे महीने, सारे दिन
अभी ख़ाली पड़े हैं । इनमें से
एक दिन पर निशान लगाया जाएगा ।
पाँच
कामगार चीख़ते हैं रोटी की ख़ातिर.
व्यापारी चीख़ते हैं बाज़ार की ख़ातिर.
बेरोज़गार भूखे थे । अब
भूखे हैं काम करनेवाले ।
अब तक गोद में धँसे बेकार हाथों में फिर से हरकत है :
वे बारूद के गोले बना रहे हैं ।
छह
जो मेज़ पर से गोश्त छीन लेते हैं
वे सन्तोष की सीख देते हैं ।
जिनके लिए पूजा चढ़ाई जानी है
वे त्याग की माँग करते हैं ।
छककर खा चुकनेवाले भूखों को बताते हैं
उस महान समय के बारे में, जो कभी आएगा ।
जो साम्राज्य को सर्वनाश के कगार पर ले जा रहे हैं,
कहते हैं — शासन चलाना बेहद कठिन है
आम आदमी के लिए ।
सात
ऊपरवाले कहते हैं : शान्ति और युद्ध
अलग-अलग चीज़ों से बने हैं ।
लेकिन तुम्हारी शान्ति और तुम्हारा युद्ध
हवा और तूफ़ान जैसे है ।
युद्ध तुम्हारी शान्ति से पैदा होता है
माँ की कोख से बेटे की तरह ।
उसके होते हैं
माँ की तरह भयानक नाक-नक़्श ।
तुम्हारा युद्ध सिर्फ़ उसे ख़त्म कर डालता है
जो तुम्हारी शान्ति ने
रख छोड़ा था ।
आठ
रंगसाज़ जब लाउडस्पीकर से शान्ति पर भाषण देता है
सड़क बनानेवाले सड़क पर नज़र डालते हैं
और देखते हैं
घुटने की गहराई तक कंक्रीट
भारी टैंकों की ख़ातिर ।
रंगसाज़ शान्ति की बात करता है ।
दुखती पीठ सीधी करते हुए
तोप की नली पर अपने भारी हाथ टिकाकर
लोहा ढालनेवाले उसकी बात सुनते हैं ।
बमवर्षक के पायलट मोटर बन्द करते हैं
और सुनते हैं —
रंगसाज़ शान्ति की बात कर रहा है ।
पेड़ काटनेवाले खड़े-खड़े सुनते हैं ख़ामोश जंगल में
किसान हल चलाना बन्द करते हैं और कान खड़े कर लेते हैं
औरतें रुक जाती हैं, जिन्हें खेत पर खाना पहुँचाना है :
अधजुते खेत में लाउडस्पीकर लगी एक गाड़ी खड़ी है । वहाँ से
सुनाई देता है कि रंगसाज़ शान्ति की बात कर रहा है ।
नौ
जब ऊपरवाले शान्ति की बात करते हैं
मामूली लोगों को पता होता है
कि युद्ध होगा ।
जब ऊपरवाले युद्ध की निन्दा करते हैं
लामबन्दी के आदेश पर दस्तख़त हो चुके होते हैं ।
ऊपरवालों की
एक कमरे में बैठक हो रही है ।
सड़क पर आम आदमी की
सारी उम्मीदें ख़त्म हो चुकी हैं ।
दस
युद्ध जो आने वाला है
वो पहला युद्ध नहीं है । उससे पहले भी
दूसरे युद्ध हो चुके हैं ।
पिछला ख़त्म हुआ
तो कुछ विजेता रहे बाकी पराजित ।
पराजितों के बीच मामूली लोग
भूखे रहे । विजेताओं के बीच भी
भूखे रहे मामूली लोग ।
ग्यारह
चिथड़ी कमीज़वाले इंसान :
कपड़ों के कारख़ानों में
बुनते हैं वे तुम्हारे लिए एक कमीज़
जिसे चीथड़ा तुम नहीं करोगे ।
तुम जो काम पर जाते हो घण्टों पैदल चलकर
फटे हुए जूतों में : वो गाड़ी
जो तुम्हारे लिए बन रही है, उसमें
फौलादी चादर है ।
अपने बच्चों के लिए दूध जुटाने की ख़ातिर
ढालते हो तुम बड़ा सा बोतलनुमा बर्तन
जो दूध के लिए नहीं है । कौन
उससे पीएगा ?
बारह
दीवार पर खड़िया से लिखा था :
युद्ध होना चाहिए !
जिसने लिखा था
वह खेत रहा ।
तेरह
ऊपरवाले कहते हैं :
यह गौरव की बात है.
नीचे वाले कहते हैं :
यह क़ब्र की बात है ।
चौदह
युद्ध जो आने वाला है
वो पहला नहीं है । उससे पहले भी
दूसरे युद्ध हो चुके हैं ।
पिछला ख़त्म हुआ
तो कुछ विजेता रहे बाकी पराजित ।
पराजितों के बीच मामूली लोग
भूखे रहे । विजेताओं के बीच भी
भूखे रहे मामूली लोग ।
पन्द्रह
ऊपरवाले कहते हैं, सेना के बीच
भाईचारे का राज है ।
यह सच है कि नहीं, तुम देख सकते हो
खाने के कमरे में ।
सबके दिल में
एक सी हिम्मत होनी चाहिए । लेकिन
थालियों में
दो तरह के खाने ।
सोलह
जब कूच का समय आता है, बहुतों को पता नहीं होता
कि दुश्मन उनकी पहली पाँत में चल रहा है ।
वो आवाज़, जो उन्हें हुक़्म देती है
दुश्मन की आवाज़ है ।
वो, जो दुश्मन की बात कर रहा है
ख़ुद दुश्मन है ।
सत्रह
जनरल, तुम्हारा टैंक एक मज़बूत गाड़ी है ।
रौंद सकता है जंगल को और पीस डालता है सैकड़ों इंसानों को ।
लेकिन उसमें एक कमी है :
उसे एक ड्राइवर चाहिए ।
जनरल, तुम्हारा बमवर्षक मज़बूत है ।
तूफ़ान से तेज़ उड़ सकता है और हाथी से भी ज़्यादा ढो सकता है ।
लेकिन उसमें एक कमी है :
उसे एक मेकेनिक चाहिए ।
जनरल, इंसान बड़े काम का है ।
वह उड़ सकता है और जान ले सकता है ।
लेकिन उसमें एक कमी है :
वह सोच भी सकता है ।
अट्ठारह
युद्ध जब शुरू होगा
शायद तुम्हारे भाई बदल जाएँगे
उनके चेहरे पहचानने लायक नहीं रहेंगे ।
लेकिन तुम्हें वैसा ही बने रहना है ।
वे लाम पर जाएँगे, यूँ नहीं
कि किसी कसाईख़ाने की ओर, बल्कि
मानो कि कोई क़ायदे का काम हो । सबकुछ
वे भूल चुके होंगे ।
लेकिन तुम्हें कुछ भी नहीं भूलना है ।
तुम्हारे हलक में वे जलती शराब उड़ेल देंगे
दूसरों के गले भी तर होंगे ।
पर तुम्हें होश में रहना है ।
उन्नीस
रंगसाज़ कहेगा, कहीं कुछ मुल्क जीते गए हैं
लेकिन तुम अपनी रसोई में बैठे होगे, वहाँ
जहाँ मामूली साग पक रहा होगा ।
रंगसाज़ कहेगा
वह एक क़दम भी पीछे नहीं हटेगा
और तुम काग़ज़ जैसे जैकेट को टटोलोगे ।
जब वहाँ जीत के घण्टे बजेंगे
तुम्हें अपने नुक़सान का हिसाब लगाना होगा ।
बीस
ढिंढोरची जब अपना युद्ध शुरू करेगा
तुम्हें अपना युद्ध जारी रखना है ।
सामने उसे दुश्मन दिखेंगे, लेकिन
जब वह पीछे मुड़कर देखे, उसे
वहाँ भी दुश्मन दिखने चाहिए :
जब वह अपना युद्ध शुरू करेगा
चारों ओर उसे दुश्मन ही दुश्मन दिखने चाहिए ।
उसके एस० एस०[2] के गुर्गों के खदेड़े हुए
जो वहाँ कूच कर रहे हैं
उन्हें उसके खिलाफ़ कूच करना चाहिए ।
बूट फटे होंगे, लेकिन अगर
वे मज़बूत चमड़े के भी बने हों,
उन्हें पहनकर कूच करने वाले उसके दुश्मन होने चाहिए ।
खाने को तुम्हें कम ही मिलेगा, लेकिन अगर ज़्यादा भी मिले
तुम्हें वह जायकेदार नहीं लगना चाहिए ।
एस० एस० के उनके गुर्गों की नींद हराम कर दो ।
ताकि उन्हें हर बन्दूक जाँचनी पड़े
कि वह भरी हुई है या नहीं, हर जाँचने वाले को
उसे जाँचना पड़े कि वे जाँचते हैं या नहीं ।
जो कुछ उसके पास जाए, वह बरबाद होना चाहिए और
जो कुछ उससे मिले, उसके खिलाफ़ उनका इस्तेमाल हो ।
जो उसके खिलाफ़ लड़ता है, वह हिम्मतवाला है ।
जो उसके इरादों को नाकाम करे, वह होशियार है ।
सिर्फ़ जो उससे लड़ता है, वही जर्मनी का मददगार है ।
मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य
शब्दार्थ
हिटलर अपनी युवावस्था में चित्रकार बनना चाहता था, लेकिन नाकाम रहा। ब्रेष्त उसे कलाकार के बदले पेण्टर यानी दीवार वग़ैरह रंगनेवाला रंगसाज़ कहते हैं।
विरोधियों को कुचलने के लिए बनाया गया नाज़ी सिपाहियों का कुख्यात दल
Bertolt Brecht बैर्तोल्त ब्रेष्त (मूल जर्मन भाषा में ठीक यही उच्चारण है) ने सोलह वर्ष की उम्र में कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था। अपनी उच्च शिक्षा समाप्त करने के बाद ब्रेष्त अपने शहर आउसबर्ग से बर्लिन आ गए, जहाँ उनकी मुलाक़ात नाट्य-निर्देशक एरविन पिसकातर से हुई। दोनों ने मिल कर राजनैतिक नाटक थियेटर की स्थापना की। ब्रेष्त और पिसकातर दोनों ही नाज़ी विरोधी थे, इसलिए अपने थियेटर के लिए ब्रेष्ट ने जो भी नाटक लिखे, वे सभी फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ थे और उनकी भाषा व्यंग्य से भरपूर होती थी। जर्मनी की सरकार को इन दोनों की गतिविधियाँ पसन्द नहीं आईं, इसलिए सरकार ने ‘राजनैतिक नाट्य थियेटर’ पर प्रतिबन्ध लगा दिया। ब्रेष्त पर भी रोक लगा दी गई। ब्रेष्त पहले जर्मनी छोड़ कर फ़िनलैण्ड चले गए और इसके बाद वहाँ से अमेरिका चले गए। द्वितीय विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद ही वे फिर से यूरोप वापिस लौटे। अपने जीवन काल में ही बैर्तोल्त ब्रेष्त बेहद लोकप्रिय लेखक बन चुके थे। उनका कहना था कि वे कवि नहीं हैं, जितनी भी कविताएँ उन्होंने लिखी हैं, वे उनके नाटकों का ही हिस्सा हैं। ‘पहली बार’ के पाठकों के लिए आज पेश है ब्रेष्ट की एक लम्बी कविता, जिसका हिन्दी में पहली बार मूल जर्मन भाषा से अनुवाद किया है उज्ज्वल भट्टाचार्य ने।
4.नगरवासियों के लिए पाठ्यपुस्तक : बैर्तोल्त ब्रेष्त की लम्बी कविता
मूल जर्मन से अनुवाद - उज्ज्वल भट्टाचार्य
एक
विदा लो अपने साथियों से स्टेशन पर
सुबह शहर जाओ गलाबन्द जैकेट पहन कर
कोई कमरा ढूँढ़ो और फिर अगर तुम्हारा साथी खटखटाए
मत खोलो दरवाज़ा, मत खोलो,
बल्कि
सारे निशान मिटा डालो!
अगर माँ-बाप मिल जाएँ हैम्बर्ग या किसी दूसरे शहर में
बग़लें झाँको, घूम जाओ मोड़ पर, पहचानो मत उन्हें
चेहरा ढक लो टोपी से, जो उनसे तोहफ़े में मिला था
मत दिखाओ, अपना चेहरा मत दिखाओ
बल्कि
सारे निशान मिटा डालो!
खाओ गोश्त, जो मौजूद है! बचाना नहीं है!
पानी बरसे, तो किसी भी घर में घुस जाओ,
बैठ जाओ किसी भी कुर्सी पर, जो मौजूद हो
पर बैठे मत रह जाना! और अपनी टोपी मत छोड़ जाना!
मैं कहता हूं तुमसे :
सारे निशान मिटा डालो!
कुछ भी कहना हो, दो बार मत कहना
अगर अपने विचार दूसरों के मुँह से सुनाई दे : नकार जाओ।
जिसने दस्तख़त न किया हो, जो अपनी तस्वीर न छोड़ गया हो
जो मौजूद ही न था, जिसने कुछ कहा ही नहीं
कैसे वह किसी की पकड़ में आ सकता है !
सारे निशान मिटा डालो!
ख़याल रखना, अगर मौत की सोचते हो
क़ब्र पर कोई पत्थर न लगे जो बता दे कि तुम वहाँ पड़े हो
साफ़-साफ़ अक्षरों में, जो तुम्हें दिखा दे
तुम्हारी मौत की तारीख़ बता दे और तुम्हें पकड़वा दे!
फिर कहता हूँ :
सारे निशान मिटा डालो!
(ऐसा मुझसे कहा गया था)
1926
दो
हम तुम्हारे पास हैं ऐसी एक घड़ी में, जब तुम्हें पता चलता है
कि तुम पाँचवें पहिए हो
और तुम्हारी उम्मीद तुम्हें छोड़ जाती है।
हमें लेकिन
अभी तक इसका पता नहीं है।
हम देखते हैं
कि तुम बात करने में हड़बड़ाने लगते हो
तुम कोई लफ़्ज़ ढूँढ़ते हो, जिसे ले कर
भागा जा सके
क्योंकि तुम चाहते हो
कोई सनसनी न पैदा की जाए।
बातों के बीच तुम उठ खड़े होते हो
तुम भुनभुनाने लगते हो, जाना चाहते हो
हम कहते हैं : ठहरो! और हमें पता चल जाता है
कि तुम पाँचवें पहिए हो~।
लेकिन तुम बैठ जाते हो।
यानी कि तुम बैठे रहते हो हमारे पास ऐसी एक घड़ी में
जब हमें पता चल जाता है कि तुम पाँचवें पहिए हो।
तुम्हें लेकिन
इसका पता नहीं रहता है~।
हमारी सुनो : तुम
पाँचवें पहिए हो
यह मत सोच लेना कि मैं, चूंकि मैं ऐसा कहता हूँ,
बदमाश हूँ
गँड़ासे की ओर हाथ मत बढ़ाओ, बल्कि
एक गिलास पानी पी लो।
मुझे पता है, तुम अब सुन नहीं रहे हो
लेकिन
चीख़ो मत कि दुनिया खराब है
इसे धीरे से कहो।
क्योंकि चार पहिए बहुत अधिक नहीं हैं
बल्कि पाँचवाँ पहिया
और दुनिया ख़राब नहीं है
बल्कि
मर चुकी है।
(यह तुम सुन चुके हो !)
1926
तीन
हम तुम्हारे घर से जाना नहीं चाहते हैं
हम चूल्हे को तोड़ना नहीं चाहते हैं
हम हँड़िया को चूल्हे पर रखना चाहते हैं.
घर, चूल्हा और हँड़िया रह सकते हैं
और तुम्हें गायब होना है आसमान में धुएँ की तरह
जिसे कोई नहीं रोकता।
अगर तुम हमसे चिपके रहते हो, हम दूर चले जाएँगे
अगर तुम्हारी औरत रोती है, हम टोपियों से चेहरे ढक लेंगे
पर अगर वे तुम्हें पकड़ ले जाते हैं, हम तुम्हारी ओर इशारा करेंगे
और कहेंगे : यही रहा होगा।
हमें पता नहीं, क्या आने वाला है, और हमारा कोई सुझाव भी नहीं
पर तुम्हें हम कतई नहीं चाहते हैं।
जब तक तुम गायब न हो जाओ
खिड़कियों का पर्दा गिरा हुआ रखा जाए, ताकि कहीं सुबह न हो जाए।
शहरों को बदलने की इजाज़त दी जाएगी
लेकिन तुम्हें नहीं।
पत्थरों से बातें की जाएँगी
पर तुम्हें हम ख़त्म करना चाहते हैं
तुम्हें जीना नहीं है।
किन्हीं भी झूठों पर हमें यक़ीन करना पड़े :
तुम्हें नहीं होना है।
(ऐसे ही बोलते हैं हम अपने पुरखों से)
1926
चार
मुझे पता है, मुझे किस चीज़ की ज़रूरत है.
मैं, बस, यूँ ही शीशे में झाँकती हूँ
और देखती हूँ कि मुझे
अधिक नींद की ज़रूरत है, वो मर्द
जो मेरा है, नुकसान पहुँचाता है मुझे।
जब मैं ख़ुद को गुनगुनाते पाती हूँ, कहती हूँ मैं :
आज मैं ख़ुशदिल हूँ, यह अच्छा है
मेरी चमड़ी के लिए।
मैं कोशिश करती हूँ
कि दुरुस्त और तन्दुरुस्त रहा जाए, लेकिन
जान मैं नहीं लड़ाऊँगी, इससे
चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगती हैं।
बाँटने लायक मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन
अपना हिस्सा मेरे लिए काफ़ी है.
सावधानी से खाती हूँ मैं, जीती हूँ
धीमी चाल से, मैं तरफ़दार हूँ
बीच के रास्ते की।
(उनको मैंने इसी तरह कोशिश करते देखा है)
1927
पाँच
मैं गर्द हूँ। अपने-आपसे
मुझे कोई उम्मीद नहीं है, सिवाय
कमज़ोरी, बेईमानी और सड़न के
पर अचानक एक दिन मुझे लगता है :
चीज़ें सुधरेंगी, हवा से तन चुका है
मेरा पाल, आ चुका है वक़्त मेरा, मैं
गर्द के बजाय कुछ बेहतर बन सकती हूँ –
तुरन्त मैं उसमें जुट गई।
चूँकि मैं गर्द थी, देखा मैंने
जब मैं पी कर मस्त हुआ करती थी, पड़ी रहती थी
बस यूँ ही कहीं और मुझे पता नहीं होता था
कौन मुझ पर सवार है, अब मैं पीती नहीं हूँ –
मैं तुरन्त इससे बाज़ आई।
अफ़सोस कि मुझे
महज़ ज़िन्दा भर रहने के लिए
करना पड़ा काफ़ी कुछ जो मुझे महँगा पड़ा,
ज़हर तो इस कदर लिया, जो
चार बैलों के लिए काफ़ी होता, लेकिन
सिर्फ़ इसी तरीके से
ज़िन्दा रह पाना मुमकिन था; कभी-कभी तो मैं
अफ़ीम भी लेती रही, और मेरा चेहरा
मुरझाए पत्ते सा रह गया
लेकिन फिर मैंने शीशे में झाँक कर देखा
और तुरन्त मैं इससे बाज़ आई।
ज़ाहिर है कि उन्होंने कोशिश की, मुझे सिफ़िलिस का रोगी
बनाने की, लेकिन उनसे यह
हो नहीं पाया; सिर्फ़ वे मुझे
सँखिया ही दे पाए : मेरे
आगे-पीछे नालियाँ थीं, जिनमें से
मवाद निकलता गया दिन रात। किसने
सोचा होगा कि इस क़िस्म की औरत
फिर कभी मर्दों का दिमाग फेर सकती है ? –
मैंने तुरन्त इसका बीड़ा उठाया।
ऐसा मर्द मुझे मंजूर न था, जिसने
मेरे लिए कुछ किया नहीं, और लिया मैंने
हर किसी को जिसकी मुझे ज़रूरत थी। मुझमें
शायद ही कोई अहसास रह गया है, मेरे अन्दर सूखा ही रह जाता है
लेकिन
अक्सर मुझे लगता है, पलड़ा कभी ऊपर है कभी नीचे, लेकिन
कुल मिला कर ऊपर ही।
अभी तक ऐसा है कि मैं अपने दुश्मन उस औरत को
कुतिया कहा करती हूँ और उसे दुश्मन समझती हूँ, क्योंकि
कोई मर्द उसकी ओर ताकता है।
लेकिन एक साल के अन्दर
मेरी यह आदत छूट जाएगी –
मैं इसका बीड़ा उठा चुकी हूँ।
मैं गर्द हूँ, लेकिन
हर चीज़ मेरे काम आनी चाहिए, मैं
ऊपर चढ़ती जा रही हूँ, मेरे बिना
काम नहीं चलेगा, मैं आने वाले कल की योनि हूँ
जल्द ही मैं गर्द नहीं रह जाऊँगी, बल्कि
बन जाऊँगी मज़बूत कंक्रीट, जिससे
शहर बनाए जाते हैं।
(एक औरत को मैंने ऐसा कहते सुना)
1927
छह
वह सड़क से गुज़रता गया, टोपी गर्दन पर लटकी थी !
वह हर इन्सान की ओर ताकता गया और गर्दन हिलाता गया
वह हर शो केस के सामने खड़ा रह गया
(और हर किसी को पता है कि वह ख़त्म हो चुका है !)
उन्हें उसकी बात सुननी चाहिए थी, उसने कहा था कि वो
अपने दुश्मन के साथ संजीदगी से बातें करेगा
अपने मकान मालिक का रवैया उसे पसन्द नहीं है
सड़क भी ठीक से साफ़ नहीं की गई है
(दोस्तों को उससे कोई उम्मीद नहीं रह गई है)
बहरहाल वह अभी एक मकान बनवाएगा
बहरहाल वह अभी सोच कर देखेगा
बहरहाल वह फ़ैसला देने में जल्दबाज़ी नहीं करेगा
(वह ख़त्म हो चुका है, उसके अन्दर कुछ नहीं रह गया है)
(मैंने लोगों को ऐसा कहते सुना है)
1926
सात
ख़तरे की बात मत कीजिए.
झँझरी से हो कर आप यूँ भी टँकी तक नहीं पहुँच सकते :
आपको बाहर आना पड़ेगा।
बेहतर होगा कि अपनी केतली आप छोड़ जाइए
आपको देखना है कि आप ख़ुद बच निकल सकें।
पैसे तो आपके पास होने ही चाहिए
मैं पूछूँगा नहीं, वे आपको मिले कहाँ से
लेकिन पैसों के बिना आपको आने की ज़रूरत ही नहीं।
और यहाँ आप रह नहीं सकते, महाशय!
यहाँ लोग आपको जानते हैं।
अगर मैं आपको ठीक से समझ सका हूँ
इससे पहले कि आप आसरा छोड़ दें
कुछ एक कबाब तो आप खाना ही चाहेंगे।
अपनी बीवी को रहने दीजिए, जहाँ वो है !
उसकी ख़ुद दो बाँहें हैं
इसके अलावा उसकी दो जाँघें हैं
(जिनसे आपको अब कोई मतलब नहीं, महाशय !)
देखिए कि आप ख़ुद बच निकल सकें!
अगर आपको अभी और कुछ कहना है, फिर
मुझे कह डालिए, मैं उसे भूल जाऊँगा।
अब आपको अपने नज़रिए की हिफ़ाज़त नहीं करनी है :
कोई नहीं रह गया है, जो आपको देखे।
अगर आप बच कर निकल सकें
फिर आप उससे कहीं अधिक कर चुके होंगे
जितना एक इन्सान को करना होता है।
धन्यवाद देने की कोई ज़रूरत नहीं।
1926
आठ
अपने उन सपनों को भूल जाओ कि तुम्हारे साथ
अलग ही सा बर्ताव किया जाएगा।
तुम लोगों की माँ ने तुमसे जो कहा था
ज़रूरी नहीं कि वो सच हो!
अपने करार जेब में ही रखे रहो
उन पर यहाँ अमल नहीं किया जाएगा।
अपनी इन उम्मीदों को भूल जाओ
कि तुम्हें सदर चुनने की सोची गई है।
पर क़ायदे से अपनी तैयारी जारी रखो
तुम्हें बिल्कुल दूसरे तरीके से पेश आना है
ताकि तुम्हें रसोई में बर्दाश्त कर लिया जाय।
तुम्हें अपना कखग अभी सीखना है.
और यह कखग है :
तुमसे निबट लिया जाएगा।
सोचने की ज़रूरत नहीं, कि तुम्हें कहना क्या है :
तुमसे कुछ भी पूछा नहीं जाएगा।
खाने वाले सब आ चुके हैं
ज़रूरत है, तो सिर्फ़ कीमे की।
लेकिन इसकी वजह से
तुम्हें हिम्मत नहीं हारनी है !
1926
नौ
एक इनसान से चार माँगें
अलग-अलग दिशाओं से अलग-अलग वक़्त में
यहाँ तुम्हारा घर है
यहाँ तुम्हारी चीज़ों के लिए जगह है
अपने असबाब को पसन्द के मुताबिक रख लो
कहो, तुम्हें किस चीज़ की ज़रूरत है
यहाँ चाभी है
यहाँ रह जाओ।
यहाँ हम सबके लिए जगह है
और तुम्हारे लिए एक कमरा बिस्तर के साथ
तुम काम कर सकते हो अहाते में
तुम्हारी अपनी अलग थाली है
हमारे पास रहो
यहाँ सोने की तुम्हारी जगह है
बिस्तर तरोताज़ा है
अभी उसमें कोई सोया हुआ था।
अगर तुम छिद्रान्वेषी हो
फिर गमले के पानी में जस्ते का चम्मच धो लो
फिर वह साफ़ हो जाएगा
कोई बात नहीं, यहाँ रहो।
यह है कमरा
जल्दी करो, नहीं तो वहाँ भी रह सकते हो
रात भर के लिए, पर उसके पैसे अलग से देने पड़ेंगे
तुम्हें परेशान नहीं करूँगा
और हाँ, मैं नाराज़ नहीं हूँ।
यहाँ तुम उतने ही क़ायदे से हो, जितना कि और कहीं।
यानी कि यहाँ रह सकते हो।
1926
दस
अगर मैं बेजान तरीके से
तुमसे बातें करता हूँ
बिल्कुल सूखे अल्फ़ाज़ में
तुम्हारी ओर देखे बिना
(लगता है मैं तुम्हें पहचानता नहीं
तुम्हारी ख़ास बनावट और परेशानियों को)
फिर मैं वैसे ही बातें करता हूँ
जैसी कि सच्चाई है
(कड़वी सच्चाई, तुम्हारी बनावट के ज़रिये बेहद ईमानदार
जिसे तुम्हारी परेशानियों की परवाह नहीं)
और मुझे लगता है कि तुम इसे जानते नहीं
1927
5. मैं पला बहैसियत मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य
- बैर्तोल्त ब्रेष्त
मैं पला बहैसियत
खाते-पीते लोगों के बेटे के. माता-पिता ने
मेरे गले में टाई बांध दी और मुझे सिखाया
काम लेते रहने का आदी बनना
और हुक़्म चलाने में माहिर बनना. लेकिन
जब मैं बड़ा हुआ और देखा अपने चारों ओर
पसन्द नहीं आए मुझे अपने वर्ग के लोग
पसन्द नहीं आया हुक्म चलाना और काम लेना
और मैं चल पड़ा अपना वर्ग छोड़कर
गए-बीते लोगों की ओर.
इस तरह
उन्होंने पाला-पोसा एक बेईमान को, उसे सीख दी
अपनी हुनर की, और उसने
उनका भेद खोल दिया, दुश्मन के सामने.
हां, मैं उनके राज़ खोलता हूं. जनता के बीच
खड़ा हूं मैं और कहता हूं
कैसे वे धोखा देते हैं, और आगाह करता हूं आनेवाली विपदाओं से,
क्योंकि मैं
उनके इरादों से वाक़िफ़ हूं.
रिश्वत खाए हुए उनके पादरियों की लातिन भाषा का
हूबहू अनुवाद करता हूं मैं बोलचाल की भाषा में, और वो ढपो…
महान लेखक बर्तोल्त ब्रेख्त की कुछ फासीवाद/दमन विरोधी रचनाएं
6. फिर भी तुम खामोश हो
बदकिस्मत लोगो
7. जब फ़ासिस्ट मज़बूत हो रहे थे , अंग्रेजी से अनुवादः रामकृष्ण पाण्डेय
8. एस.ए.^ सैनिक का गीत (बेर्टोल्ट ब्रेष्ट)
9 आठ हजार गरीब लोगों का नगर के बाहर इकट्ठा होना
10. शासन करने की कठिनाई : अनुवादः विश्वनाथ मिश्र
11. एक पढ़ सकने वाले कामगार के सवाल
बर्तोल्त ब्रेख्त
किसने बनाया सात द्वारों वाला थीब?
किताबों में लिखे हैं सम्राटों के नाम।
क्या सम्राट पत्थर ढो-ढोकर लाये?
और बार-बार विनष्ट बैबीलोन
किसने उसे हर बार फिर से बनाया?
किन घरों में रहते थे सोना जैसे चमकते लीमा के मजूरे?
कहां बिताई शाम, जब चीन की दीवार बनकर ख़त्म हुई, उसके राजगीरों ने?
महान रोम भरा पड़ा है विजय तोरणों से।
किसने उन्हें खड़ा किया?
किस पर हासिल की सीजरों ने जीत?
चारणगीत समृद्ध बैंजटियम में क्या महल ही महल थे वहां रहनेवालों के लिए?
दन्तकथा के अटलाण्टिस में भी
उस राज, जब समन्दर उसे निगल गया, चीखे होंगे डूबनेवाले अपने गुलामों की खातिर।
नौजवान सिकन्दर ने भारत जीता।
अकेले उसने?
सीज़र ने गालों को मात दी।
क्या उसके साथ एक रसोइया तक न था?
स्पेन का फिलिप रोता रहा, जब उसका बेड़ा तहस-नहस हो गया।
और कोई नहीं रोया?
सातसाला जंग में फ्रेडरिख द्वितीय की जीत हुई।
जीता कौन उसके अलावा?
हर पन्ने पर एक जीत।
किसने पकाए जीत के भोज?
हर दस साल पर एक महान पुरूष।
किसने चुकाए उनके हिसाब?
इतनी सारी रपटें
इतने सारे सवाल।
12.कसीदा सीखने के लिए - बैर्तोल्त ब्रेष्त
आसान सी बात सीख लो.
जिनका वक़्त आ चुका है
उनके लिए कभी देर नहीं होती.
सीखो कखग, यह काफ़ी नहीं, लेकिन
सीखो इसे. हिम्मत न हारो.
शुरू करो. तुम्हें सबकुछ जानना है.
तुम्हें नेता बनना है.
निर्वासित इन्सान, सीखो.
जेल के क़ैदी, सीखो.
रसोई में औरत, सीखो.
बड़े-बुजुर्गों, सीखो !
तुमको नेता बनना है.
बेघर इन्सान, स्कूल चलो !
ठिठुरनेवाले, जानकारी हासिल करो !
भूखे इन्सान, पकड़ो किताब : ये है हथियार.
तुम्हें नेता बनना है.
शर्माओ मत पूछने से, साथी.
कुछ भी मान नहीं लेना है
ख़ुद परखो !
जो तुमने ख़ुद पता नहीं किया
वह तुम्हें पता नहीं.
हर चिट्ठे की जाँच करो
पैसे तुम्हें चुकाने हैं.
हर चीज़ का हिसाब रखो
पूछो : ये आया कहाँ से ?
तुम्हें नेता बनना है.
1930-31
13. ज़बरदस्त उबकाई की घड़ी - बैर्तोल्त ब्रेष्त
क्योंकि मुझे अब पसंद नहीं रह गई
यह दुनिया.
और ख़ासकर हैरानी से मैं देखता हूँ
इन्सान नाम के इस जीव को, मैं
जिसकी तरह हूँ, ख़ासकर यह जीव
मुझे बेहद नापसंद है. ख़ुद मेरा अपना वजूद भी,
मान लेता हूँ मैं, मुझे पसंद नहीं और इसलिए और
दूसरी वजहों से भी, जिनका मुझे पता नहीं
चाहता हूँ एक अरसे से, भाग जाना इस दुनिया से और
ख़ुद अपने-आप से
और चाव से मैं
कूद पड़ता. चमकती ठंडी घड़ी में,
बिना कुढ़न, क्योंकि मैं
पस्त हूँ, और चाहता,
दूर हो जाना
बिना अहसास के.
1924
(ब्रेष्त की कविताओं के संग्रह एकोत्तरशती से)
[3:34 PM, 5/5/2021] veenagupta rte:
14. नेक आदमी से पूछताछ - बैर्तोल्त ब्रेष्त
सामने आओ : हमने सुना है
कि तुम एक नेक आदमी हो.
तुम बिकाऊ नहीं हो, लेकिन बिजली
जो तुम्हारे मकान पर गिरती है, वह भी
बिकाऊ नहीं है.
तुम जो कुछ कहते हो, उस पर टिके रहते हो
तुमने कहा क्या ?
तुम ईमानदार हो, अपना विचार व्यक्त करते हो
कौन से विचार ?
तुम हिम्मती हो.
किसके खिलाफ़ ?
तुम होशियार हो.
किसकी ख़ातिर ?
तुम अपने फ़ायदे की नहीं सोचते हो.
फिर किसकी सोचते हो ?
तुम एक अच्छे दोस्त हो.
अच्छे लोगों के भी ?
सुनो : हमें पता है
तुम हमारे दुश्मन हो. इसलिये हम तुम्हें
अब दीवार पर खड़ा कर देंगे. लेकिन तुम्हारी नेकी को देखते हुए
और अच्छे कामों को
एक अच्छी दीवार पर खड़ा करेंगे और तुम्हें भून देंगे
अच्छी गोलियों से अच्छी बंदूक से और दफ़नाएंगे
एक अच्छे फ़ावड़े से अच्छी धरती के नीचे.
1935-36
15. नाटक लिखनेवाले का गीत - बैर्तोल्त ब्रेष्त
1
मैं नाटक लिखनेवाला हूँ. मैं दिखाता हूँ
जो कुछ मैंने देखा है. इन्सानों के बाज़ार में
मैंने देखा है, कैसे इन्सानों का व्यापार होता है, यह
मैं दिखाता हूँ, मैं, नाटक लिखनेवाला.
कैसे वे योजनाओं के साथ कमरे में एक-दूसरे के पास आते हैं
या डंडे लेकर या बटुए के साथ
कैसे वे सड़कों पर खड़े रहते हैं और इंतज़ार करते हैं
कैसे वे एक-दूसरे के लिए जाल बिछाते हैं
उम्मीद से भरे हुए
कैसे वे मिलने का समय तय करते हैं
कैसे वे एक-दूसरे को फंदे पर लटकाते हैं
कैसे वे प्यार करते हैं
कैसे वे लूट का माल बचाते हैं
कैसे वे भकोसते हैं
यह मैं दिखाता हूं.
जिस तरह वे एक-दूसरे को पुकारते हैं, मैं रिपोर्ट देता हूँ.
कैसे एक माँ अपने बेटे से बात करती है
मालिक कैसे नौकर को आदेश देता है
कैसे एक औरत अपने मर्द को जवाब देती है.
हुक़्…
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