Sunday, May 2, 2021

फैज़ अहमद फैज़

 उट्ठो अब माटी से उट्ठो

जागो मेरे लाल
अब जागो मेरे लाल
तुम्हरी सेज सजावन कारन
देखो आई रैन अँधियारन
नीले शाल-दोशाले ले कर
जिन में इन दुखियन अँखियन ने
ढ़ेर किये हैं इतने मोती
इतने मोती जिनकी ज्योती
दान से तुम्हरा, जगमग लागा
नाम चमकने.
उट्ठो अब माटी से उट्ठो
जागो मेरे लाल
अब जागो मेरे लाल
घर-घर बिखरा भोर का कुन्दन
घोर अँधेरा अपना आँगन
जाने कब से राह तके हैं
बाली दुल्हनिया बाँके वीरन
सूना तुम्हरा राज पड़ा है
देखो कितना काज पड़ा है
बैरी बिराजे राज सिंहासन
तुम माटी में लाल
उठो अब माटी से उठो,जागो मेरे लाल
हठ न करो माटी से उठो,जागो मेरे लाल
जागो मेरे लाल


चलो फिर से मुस्कुराएं

चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल जलाएं

जो गुज़र गयी हैं रातें
उन्हें फिर जगा के लाएं
जो बिसर गयी हैं बातें
उन्हें याद में बुलायें
चलो फिर से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं

किसी शह-नशीं पे झलकी
वो धनक किसी क़बा की
किसी रग में कसमसाई
वो कसक किसी अदा की
कोई हर्फे-बे-मुरव्वत
किसी कुंजे-लब से फूटा
वो छनक के शीशा-ए-दिल
तहे-बाम फिर से टूटा

ये मिलन की, नामिलन की
ये लगन की और जलन की
जो सही हैं वारदातें
जो गुज़र गयी हैं रातें
जो बिसर गयी हैं बातें
कोई इनकी धुन बनाएं
कोई इनका गीत गाएं
चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल लगाएं










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