अवतार सिंह पाश (9 September 1950 - 23 March, 1988) की कविताएं
सपने
सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आये
पसीने को सपने नहीं आते
शैल्फ़ों में पड़े इतिहास के ग्रन्थों को
सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाजिमी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाजिमी है
सपने इसीलिए सभी को नहीं आते
________________________
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना – बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्त काट लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है
सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर कत्ल-काण्ड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आँखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है
सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लाँघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुँकारता है
सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अँधेरा बन्द दरवाज़ों की चैगाठों पर
सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये
श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
(पाश की पंजाबी में प्रकाशित अन्तिम कविता, जनवरी, 1988)
अपनी असुरक्षा से
यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना ज़मीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाये
आँख की पुतली में ‘हाँ’ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है
हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझे थे क़ुर्बानी-सी वफ़ा
लेकिन ’गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
’गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है
’गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
कीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है
’गर देश की सुरक्षा ऐसी होती है
कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक़्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है।
दो और दो तीन
मैं प्रमाणित कर सकता हूँ -
कि दो और दो तीन होते हैं।
वर्तमान मिथिहास होता है।
मनुष्य की शक्ल चमचे जैसी होती है।
तुम जानते हो -
कचहरियों, बस-अड्डों और पार्कों में
सौ-सौ के नोट घूमते फिरते हैं।
डायरियाँ लिखते, तस्वीरें खींचते
और रिपोर्टें भरते हैं।
‘कानून रक्षा केन्द्र’ में
बेटे को माँ पर चढ़ाया जाता है।
खेतों में ‘डाकू’ मज़दूरी करते हैं।
माँगें माने जाने का ऐलान
बमों से किया जाता है।
अपने लोगों से प्यार का अर्थ
‘दुश्मन देश’ की एजेण्टी होता है।
और
बड़ी से बड़ी ग़द्दारी का तमग़ा
बड़े से बड़ा रुतबा हो सकता है
तो -
दो और दो तीन भी हो सकते हैं।
वर्तमान मिथिहास हो सकता है।
मनुष्य की शक्ल भी चमचे जैसी हो सकती है।
सच
तुम्हारे मानने या न मानने से
सच को कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
इन दुखते अंगों पर सच ने एक उम्र भोगी है।
और हर सच उम्र भोगने के बाद,
युग में बदल जाता है,
और यह युग अब खेतों और मिलों में ही नहीं,
फ़ौजों की कतारों में विचर रहा है।
कल जब यह युग
लाल किले पर बालियों का ताज पहने
समय की सलामी लेगा
तो तुम्हें सच के असली अर्थ समझ आयेंगे।
अब हमारी उपद्रवी जाति को
इस युग की फितरत तो चाहे कह लेना,
लेकिन यह कह छोड़ना,
कि झोंपड़ियों में फैला सच,
कोई चीज़ नहीं।
कितना सच है?
तुम्हारे मानने या न मानने से,
सच को कोई़ फ़र्क नहीं पड़ता।
भारत
भारत -
मेरे आदर का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयुक्त किया जाये
शेष सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।
इस शब्द का अभिप्राय
खेतों के उन बेटों से है
जो आज भी पेड़ों की परछाइयों से
वक़्त मापते हैं।
उनकी पेट के बिना, कोई समस्या नहीं
और भूख लगने पर
वे अपने अंग भी चबा सकते हैं।
उनके लिए जिन्दगी एक परम्परा है,
और मौत का अर्थ है मुक्ति।
जब भी कोई पूरे भारत की,
‘राष्ट्रीय एकता’ की बात करता है
तो मेरा दिल करता है -
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ,
उसे बताऊँ
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यन्त से सम्बन्धित नहीं
बल्कि खेतों में दायर हैं
जहाँ अनाज पैदा होता है
जहाँ सेंधें लगती हैं---
बेदख़ली के लिए विनय-पत्र
(इन्दिरा गाँधी की मृत्यु तथा इसके पश्चात सिखों के कत्ले-आम पर एक प्रतिक्रिया)
मैंने उम्र भर उसके खि़ला़फ़ सोचा और लिखा है
अगर उसके शोक में सारा ही देश शामिल है
तो इस देश में से मेरा नाम काट दो
मैं ख़ूब जानता हूँ नीले सागरों तक फैले हुए
इस खेतों, खदानों और भट्ठों के भारत को
वह ठीक इसी का साधारण-सा कोई कोना था
जहाँ पहली बार
जब मज़दूर पर उठा थप्पड़ मरोड़ा गया
किसी के खुरदुरे बेनाम हाथों में
ठीक वही वक़्त था
जब इस कत्ल की साज़िश रची गयी
कोई भी पुलिस नहीं ढूँढ़ सकेगी इस साज़िश की जगह
क्योंकि ट्यूबें केवल राजधानी में जगती हैं
और खेतों, खदानों, भट्ठों का भारत
बहुत अँधेरा है
और ठीक इसी सर्द-अँधेरे में होश सँभालने पर
जीने के साथ-साथ
जब पहली बार इस जिन्दगी के बारे में सोचना शुरू किया
मैंने ख़ुद को इसके कत्ल की साज़िश में शामिल पाया
जब भी भयावह शोर के पदचिह्न देख-देख कर
मैंने ढूँढ़ना चाहा टर्रा-र्रा-ते हुए टिड्डे को
शामिल पाया है, अपनी पूरी दुनिया को
मैंने सदा ही उसे कत्ल किया है
हर परिचित व्यक्ति की छाती में से ढूँढ़कर
अगर उसके कातिलों के साथ यूँ ही सड़कों पर निपटना है
तो मेरे हिस्से की सज़ा मुझे भी मिले
मैं नहीं चाहता कि केवल इसलिए बचता रहूँ
कि मेरा पता नहीं है भजन लाल बिश्नोई को -
इसका जो भी नाम है - गुण्डों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूँ
मैं उस पायलट की
कपटी आँखों में चुभता भारत हूँ
हाँ, मैं भारत हूँ चुभता हुआ उसकी आँखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें भी अभी काट दो
संविधान
यह पुस्तक मर चुकी है
इसे मत पढ़ो
इसके लफ़्ज़ों में मौत की ठण्डक है
और एक-एक पन्ना
ज़िन्दगी के अन्तिम पल जैसा भयानक
यह पुस्तक जब बनी थी
तो मैं एक पशु था
सोया हुआ पशु
और जब मैं जागा
तो मेरे इन्सान बनने तक
ये पुस्तक मर चुकी थी
अब अगर इस पुस्तक को पढ़ोगे
तो पशु बन जाओगे
सोए हुए पशु ।
~ पाश
पाश सत्तर के दशक में पंजाबी काव्य जगत के रौशन सितारा थे। वह अपने समाज और अपनी ज़मीन से सीधे जुड़े हुए कवि थे। अवतार सिंह संधू 'पाश' का जन्म नौ सितंबर 1950 में तलवंडी सलेम जिला जालंधर में हुआ था।
पाश की कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार आप पाठक की भूमिका भूल जाते हैं और अपने समय और अपने ख़ुद के वजूद से एक बार फिर साक्षात्कार करने लगते हैं, और एक ऐसे आत्मसंघर्ष में उतर पड़ते हैं जो अपने किसी बहुत नज़दीकी दोस्त के साथ अंतरंग ईमानदार बातचीत के दौरान ही मुमकिन हो सकता है।
अस्सी के दशक में राज्यसत्ता और खालिस्तानी आतंकवादियों के दोहरे फासिस्ट दबाव में पंजाब ने एक बार फिर जो झेला, वह उपनिवेशवादी दमन के गुज़रे हुए दौरों के भी पीछे चोड़ देने वाला था। इस बीहड़ दौर में पाश ने 'धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र' और 'सबसे ख़तरनाक' जैसी दस्तावेजी राजनीतिक कविताएं लिखीं।
पाश की कविताएं उस समय के गहरे इतिहास-बोध की कविताएं हैं, जो पूरी दुनिया और हमारे देश के स्तर पर एक विचित्र किस्म का, जटिल किस्म का संक्रमण-काल रहा है। पाश की कविताएं गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएं हैं। पाश की कविताओं की एक अपनी लय है जो पंजाबी लोक साहित्य की वाचिक परंपरा और वहां के जनसंघर्षों के सुदीर्घ इतिहास की लोक-स्मृतियों के साथ ही वहां की मिट्टी, वहां की नदियों, वहां के नृत्यों-गीतों से रची हुई है। लेकिन इसके साथ ही साथ पाश की प्रगतिधर्मिता में पूरे भारतीय जन की स्मृति, परंपरा और समकालीन जीवन की गति का द्वंद्व भी है और पूरी दुनिया के लड़ते हुए लोगों के बिरादराना रिश्तों की बुनावट भी।
पंजाबी के प्रसिद्ध कवि बल्ली सिंह चीमा के मुताबिक, पंजाबी ही नहीं हिंदी के भी कई विद्वान लेखक पाश को उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताओं के चलते केवल नक्सलवादी आन्दोलन का ही कवि मानने की भूल कर बैठते हैं। चीमा कहते है, "मैं समझता हूँ कि यह पाश के साथ अन्याय है क्योंकि उसने पंजाबी जीवन के हर रंग को अपनी कविता में चित्रित किया है।"
चीमा बताते हैं, "बहुत कम लोग जानते हैं कि पाश 1967 में जालंधर में बीएसएफ में भर्ती हुए लेकिन तीन महीनों बाद छोड़ दिया। इसी दौरान उन्होंने जैन हाईस्कूल में नौवीं क्लास की पढ़ाई पूरी की। क्रांतिकारी आंदोलन में शिरकत करने के दौरान झूठे मुकदमों में कई बार जेल भेजे गए और कोर्ट से बाइज़्ज़त बरी किए गए। इसके बाद 1976 में दसवीं की पढ़ाई पूरी की और पंजाबी में 'ज्ञानी' की डिग्री भी ली जो बीए के समकक्ष होती है। पाश की काव्य प्रतिभा को देखते हुए पंजाब साहित्य आकादेमी ने 1950 में उन्हें एक साल का फेलोशिप दिया था। पाश ने 1978 में कर्पूरथला जिला के शेखपुर से जेबीटी की परीक्षा पास की थी। हाईस्कूल में पंजाबी का टीचर बनने के लिए ये परीक्षा पास करनी ज़रूरी होती है।"
पाश एक अच्छे कवि ही नहीं एक अच्छे संपादक भी थे। उन्होंने 1972 में ‘सियाड़’ नाम से एक पत्रिका भी निकाली थी बाद में वह कुछ समय तक ‘हेम ज्योति’ पत्रिका के संपादक भी रहे। जुलाई 1986 में कैलिफोर्निया से ‘एंटी 47 फ्रंट’ नाम की पत्रिका भी निकालते रहे।
पाश के तीन काव्य संग्रह उनके जीते जी पंजाबी में प्रकाशित हुए। 1970 में 'लौहकथा', 1973 में 'उड्ड्दे बाजाँ मगर', 1978 में 'साडे समियाँ विच'।
पाश के निधन के बाद 1989 में अमरजीत चंदन के संपादन में काव्य संग्रह 'खिल्लरे होए वर्के' प्रकाशित हुई।
पाश के काव्य संग्रह हिंदी में भी प्रकाशित हुए। पाश की शहादत के ठीक एक साल बाद 23 मार्च 1989 को 'बीच का रास्ता नहीं होता' प्रकाशित हुआ। हिंदी में उनके अन्य काव्य संग्रह हैं 'समय, ओ भाई समय', 'हम लड़ेंगे साथी', 'पाश के आस-पास', 'पाश की कविताएं'।
पंजाब में जब खालिस्तानी आतंकवाद अपने उफ़ान पर था और बहुत से साहित्यकारों ने चुप्पी साध रखी थी। पाश की कलम उस समय भी नहीं रूकी। पाश ने अपनी कविताओं के जरिये मोर्चे पर डटे रहे। 23 मार्च 1988 में आतंकवादियों (खालिस्तानियों) के हाथों अपने मित्र हंसराज के साथ अपने गांव में मारे गए।
पाश की कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार आप पाठक की भूमिका भूल जाते हैं और अपने समय और अपने ख़ुद के वजूद से एक बार फिर साक्षात्कार करने लगते हैं, और एक ऐसे आत्मसंघर्ष में उतर पड़ते हैं जो अपने किसी बहुत नज़दीकी दोस्त के साथ अंतरंग ईमानदार बातचीत के दौरान ही मुमकिन हो सकता है।
अस्सी के दशक में राज्यसत्ता और खालिस्तानी आतंकवादियों के दोहरे फासिस्ट दबाव में पंजाब ने एक बार फिर जो झेला, वह उपनिवेशवादी दमन के गुज़रे हुए दौरों के भी पीछे चोड़ देने वाला था। इस बीहड़ दौर में पाश ने 'धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र' और 'सबसे ख़तरनाक' जैसी दस्तावेजी राजनीतिक कविताएं लिखीं।
पाश की कविताएं उस समय के गहरे इतिहास-बोध की कविताएं हैं, जो पूरी दुनिया और हमारे देश के स्तर पर एक विचित्र किस्म का, जटिल किस्म का संक्रमण-काल रहा है। पाश की कविताएं गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएं हैं। पाश की कविताओं की एक अपनी लय है जो पंजाबी लोक साहित्य की वाचिक परंपरा और वहां के जनसंघर्षों के सुदीर्घ इतिहास की लोक-स्मृतियों के साथ ही वहां की मिट्टी, वहां की नदियों, वहां के नृत्यों-गीतों से रची हुई है। लेकिन इसके साथ ही साथ पाश की प्रगतिधर्मिता में पूरे भारतीय जन की स्मृति, परंपरा और समकालीन जीवन की गति का द्वंद्व भी है और पूरी दुनिया के लड़ते हुए लोगों के बिरादराना रिश्तों की बुनावट भी।
पंजाबी के प्रसिद्ध कवि बल्ली सिंह चीमा के मुताबिक, पंजाबी ही नहीं हिंदी के भी कई विद्वान लेखक पाश को उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताओं के चलते केवल नक्सलवादी आन्दोलन का ही कवि मानने की भूल कर बैठते हैं। चीमा कहते है, "मैं समझता हूँ कि यह पाश के साथ अन्याय है क्योंकि उसने पंजाबी जीवन के हर रंग को अपनी कविता में चित्रित किया है।"
चीमा बताते हैं, "बहुत कम लोग जानते हैं कि पाश 1967 में जालंधर में बीएसएफ में भर्ती हुए लेकिन तीन महीनों बाद छोड़ दिया। इसी दौरान उन्होंने जैन हाईस्कूल में नौवीं क्लास की पढ़ाई पूरी की। क्रांतिकारी आंदोलन में शिरकत करने के दौरान झूठे मुकदमों में कई बार जेल भेजे गए और कोर्ट से बाइज़्ज़त बरी किए गए। इसके बाद 1976 में दसवीं की पढ़ाई पूरी की और पंजाबी में 'ज्ञानी' की डिग्री भी ली जो बीए के समकक्ष होती है। पाश की काव्य प्रतिभा को देखते हुए पंजाब साहित्य आकादेमी ने 1950 में उन्हें एक साल का फेलोशिप दिया था। पाश ने 1978 में कर्पूरथला जिला के शेखपुर से जेबीटी की परीक्षा पास की थी। हाईस्कूल में पंजाबी का टीचर बनने के लिए ये परीक्षा पास करनी ज़रूरी होती है।"
पाश एक अच्छे कवि ही नहीं एक अच्छे संपादक भी थे। उन्होंने 1972 में ‘सियाड़’ नाम से एक पत्रिका भी निकाली थी बाद में वह कुछ समय तक ‘हेम ज्योति’ पत्रिका के संपादक भी रहे। जुलाई 1986 में कैलिफोर्निया से ‘एंटी 47 फ्रंट’ नाम की पत्रिका भी निकालते रहे।
पाश के तीन काव्य संग्रह उनके जीते जी पंजाबी में प्रकाशित हुए। 1970 में 'लौहकथा', 1973 में 'उड्ड्दे बाजाँ मगर', 1978 में 'साडे समियाँ विच'।
पाश के निधन के बाद 1989 में अमरजीत चंदन के संपादन में काव्य संग्रह 'खिल्लरे होए वर्के' प्रकाशित हुई।
पाश के काव्य संग्रह हिंदी में भी प्रकाशित हुए। पाश की शहादत के ठीक एक साल बाद 23 मार्च 1989 को 'बीच का रास्ता नहीं होता' प्रकाशित हुआ। हिंदी में उनके अन्य काव्य संग्रह हैं 'समय, ओ भाई समय', 'हम लड़ेंगे साथी', 'पाश के आस-पास', 'पाश की कविताएं'।
पंजाब में जब खालिस्तानी आतंकवाद अपने उफ़ान पर था और बहुत से साहित्यकारों ने चुप्पी साध रखी थी। पाश की कलम उस समय भी नहीं रूकी। पाश ने अपनी कविताओं के जरिये मोर्चे पर डटे रहे। 23 मार्च 1988 में आतंकवादियों (खालिस्तानियों) के हाथों अपने मित्र हंसराज के साथ अपने गांव में मारे गए।
credit: https://www.amarujala.com/wiki/pash-the-revolutionary-poet
- Full nameअवतार सिंह संधू ‘पाश’
- Born1950-09-09
- GenderMale
- Occupationकवि
- NationalityIndian
- Residenceतलवंडी सलेम, तहसील नकोदर, ज़िला जालंधर, पंजाब
- Spouseराजविंदर कौर संधू
- Spouse(Sex)Female
- Childविंकल संधू
- Child(Dob)1982-01-19
- Child(Sex)Female
- शिक्षापंजाबी में 'ज्ञानी' की डिग्री
- हिंदी कविता-संग्रहबीच का रास्ता नहीं होता, समय ओ भाई समय, हम लड़ेंगे साथी
- पंजाबी कविता-संग्रहलौहकथा, उड्ड्दे बाजाँ मगर, साडे समियाँ विच, खिल्लरे होए वर्के
- संपादन'सियाड़', 'हेम ज्योति', 'एंटी 47 फ्रंट' पत्रिका
No comments:
Post a Comment