केरल मॉडल पर अब पंजीरी बनाने का प्लांट 18 जिलों के 204 ब्लॉक में लगेगा.
ग्रामीण आजीविका मिशन ने देश के कई राज्यों का अध्ययन करके केरल राज्य के मॉडल पर स्थानीय स्तर पर पंजीरी बनने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है. उम्मीद है कि अब उत्तर प्रदेश में बच्चों के पोषाहार को अब बड़ी-बड़ी कंपनियों, ठेकेदारों, कुछ अधिकारियों के दुष्चक्र और चंगुल से निकला जा सकेगा.
इस योजना के अनुसार प्रदेश में भी आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए पंजीरी बनाने का काम स्वयं सहायता समूह की महिलायें करेंगी. केरल मॉडल के आधार पर प्रदेश के 18 जिलों के 204 ब्लॉक में पंजीरी प्लांट स्थापित किए जाएंगे। एक प्लांट पर 25 से 30 महिलाओं को रोजगार मिलेगा. इस पंजीरी को केंद्र तक पहुंचाने का कार्य भी समूह की महिलाएं आजीविका एक्सप्रेस नामक योजना से करेंगी.
आंगनवाड़ी कर्मचारी यूनियन की लम्बे समय से मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और भोजन का अधिकार कानून के अनुसार स्थानीय स्तर पर ही पंजीरी का निर्माण होना चाहिए. यूनियन ने इस पर खुशी व्यक्त करते हुए जल्दी से जल्दी इस योजना को लागु करने कि मांग भी कि है ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम लग सके.
प्रदेश में ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) ने यह पूरी कार्ययोजना तैयार करके सरकार के सामने प्रस्तुत की है। ग्रामीण आजीविका मिशन के निदेशक ने बताया कि वर्तमान में राज्य के 18 जिलों के 204 ब्लाकों में पहले चरण में एक-एक प्लांट लगाया जाएगा यह प्लांट ग्रामीण आजीविका मिशन के फंड से स्थापित किए जाएंगे, बाद में पंजीरी बनाने का काम अन्य जिलों में भी महिला समूह को दिया जाएगा जिन 18 जिलों को प्रथम चरण में यह प्लांट लगेंगे उनके नाम है.
जिला का नाम ब्लॉक कि
संख्या
1.
अलीगढ़ 12
2.
अंबेडकर नगर 9
3.
औरैया 7
4.
बागपत 6
5. बांदा 8
6.
बिजनौर 11
7.
चंदौली 9
8.
इटावा 8
9.
फतेहपुर 13
10. कन्नौज 8
11. लखनऊ 8
12. खीरी 15
13. मैनपुरी 9
14 . मिर्जापुर 12
15. प्रयागराज 20
16. सुल्तानपुर 14
17. उन्नाव 16
18. गोरखपुर 19
अगर ये प्लांट तेज़ी से लग जाते हैं और अपना काम शुरू कर देते हैं तो उम्मीद है कि स्थानीय स्तर पर पंजीरी का निर्माण होने से बच्चों को पौष्टिक और अपने स्वाद के अनुरूप पोषाहार मिलेगा जिससे कुपोषण दूर मिटाने में मदद मिलेगी।
THR टेक होम राशन कि वर्तमान स्थिती:
अभी तो उत्तर प्रदेश में पंजीरी की
गुणवत्ता, और नियमित व् पर्याप्त सप्लाई, पंजीरी सिंडिकेट/ पंजीरी माफिया के पंजों
में जकड़ी है. इस पंजीरी सिंडिकेट/पंजीरी माफिया में ठेकेदार,बड़ी कम्पनी के मालिक
और कमीशन खोर अधिकारी और नेता शामिल हैं.
जब से प्रदेश स्तर से अर्थात निदेशालय
स्तर से पंजीरी के ठेके होने शुरू हुए तभी से विभाग का फोकस icds से उद्देश्यों से
धीरे धीरे पूरी तरह हटकर पंजीरी के ठेके, कमीशन,और उपरी कमाई वसूलने का जरिया बन
गया है. ये मकडजाल, निदेशालय से लेकर परियोजना तक फैला है. आंगनवाड़ी केंद्र से रिपोर्ट लेने और केन्द्रों
कि निगरानी की जगह पोषाहार कमीशन कि वसूली और कमीशन वितरण की एक सुव्यवस्थित
श्रंखला स्थापित हो गयी है.
उत्तर प्रदेश में जब से केंद्रीकृत ठेके निदेशालय से होने शुरू हुए, पोषाहार THR अधिकारियों, ठेकेदारों, कम्पनियों और नेताओं के दुश्चक्र में फंसा है. टेक होम राशन भ्रष्टाचार का ऐसा साधन बन गया है कि icds की पूरी योजना का केंद्र बिंदु अपने उद्देश्य से हटकर मात्र कमीशन खोरी, और इस कमीशन खोरी को सही साबित करने के लिए प्रॉपर रिपोर्टिंग का मैनेजमेंट, और इस भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने वालों का दमन करना ही रह गया है.
पोषाहार/पंजीरी के सिंडिकेट/माफिया का बोलबाला
प्रदेश में टेक होम राशन की व्यवस्था जब से राज्य स्तर से होनी शुरू हुई, THR पूरी तरह भ्रष्टाचार और शोषण का साधन बन गया है. ठेकेदारों का निदेशालय में चक्कर लगाना बड़े-बड़े कंपनियों का बड़े अधिकारियों और नेताओं को प्रभावित करके अपने पक्ष में टेंडर डलवाना और उसके बाद कम मात्रा में और घटिया क्वालिटी का पोषाहार की सप्लाई करने के बीच में करोड़ों रुपए का घोटाला हो रहा था. जब भी सवाल उठा, बड़े बड़े अधिकारियों के घोटालों में नाम आए, लेकिन आखिर इसका ठीकरा कुछ आंगनवाड़ी के सर फूटा, और बाकी सब को बेदाग़ बताकर ट्रांसफर से ज्यादा कुछ सज़ा ना मिल सकी. कुछ अधिकारीयों ने सख्ती की भी कोशिश कि, ठेके के लिए सख्त नियम का जाल भी बनाया, लेकिन ये गठ्जोड़ इतना मज़बूत था कि कही ना कही से जाल में छेड़ हो ही जाता था.
केंद्रीकृत पोषाहार/पंजीरी की वयवस्था से
बच्चों का पोषाहार/पंजीरी इस सिंडिकेट/माफिया के लिए सोने का अंडा देने वाली
मुर्गी है. इस मुर्गी के कारण बच्चों के हितों पर जो डाका पड़ा उसकी भरपाई तो दूसरी
बात है, कही सुनवाई भी नहीं है.
देखें कि आखिर कैसे इतने लम्बे समय तक ये इतना बड़ा प्रदेश व्यापी घोटाला कैसे चलता रहा-
- पोषाहार की गुणवत्ता कि जांच नहीं
1. पोषाहार की गुणवत्ता जांचने का कोई मेकेनिजम विभाग ने नहीं बनाया. इसलिए जो शर्ते तै होती थी उनके जांचने का कोई planned सिस्टम नहीं था. बहुत दवाब पड़ा तो कभी जांच करवा ली. इस कारण बहुत ही घटिया क्वालिटी, कभी-कभी तो इतनी घटिया कि इसमें से बदबू आ रही होती या छोटा कीड़ा चल रहा होता ऐसा पोषाहार भी केंद्रों पर पहुंच जाता था। इसमें सबसे ज्यादा पीड़ित आंगनवाड़ी थी क्योंकि लाभार्थियों को लगता था वह पैसा खाकर खराब सामान की सप्लाई कर रही है. सरकार ने अच्छा ही भेजा होगा. दूसरी तरफ सुपरवाइजर और सीडीपीओ डीपीओ उच्च पदों पर होने के कारण इस खराबी के ज्यादा ज़िम्मेदार थे. लेकिन वे पोषाहार में सुधार या इस पर आवाज़ उठाने की बजाये आंगनवाड़ी वर्कर पर दवाब बनाते थे कि वह खराब पोषाहार किसी भी तरह मैनेज करे, नहीं तो उसकी सेवाएं समाप्त हो जाएंगी। इस तरह निदेशालय से लेकर स्थानीय स्तर तक ये नेटवर्क फ़ैल गया.
- पोषाहार कि सप्लाई केन्द्रों को कभी पूरी मात्र में नहीं हुई. हमेशा वजन में भी और संख्या में भी आपूर्ति कम ही रही.
- भ्रष्टाचार का नेटवर्क जिलों तक पहुंचा
2.
भ्रष्टाचार
की जड़ तो निदेशालय में थी, जिले और परियोजना
के स्टाफ को इसमें कुछ नहीं मिल रहा था, लेकिन इस पूरे भ्रष्टाचार को मैनेज करने
का काम तो ग्राउंड स्टाफ का ही था,उन्होंने भी कमाई का रास्ता निकाल लिया. जिला कार्यालय से वर्कर को उसके केंद्र के लाभार्थी कि संख्या
के आधार पर पोषाहार दिया जाता है. कुछ साल पहले तक, जब पोषाहार गोदाम से उठाया
जाता था वर्कर को आवश्यकता से दो या तीन कट्टे कार्यालय से ही कम मिलते हैं, और
हस्ताक्षर पूरे पोषाहार पर कराया जाता है. रजिस्टर पर हस्ताक्षर आदि करवाने में
बाबू भी शामिल रहते थे, तो इस तरह दफ्तर के बाबु आदि भी इस भ्रष्टाचार का हिस्सा बन गए.
- भ्रष्टाचार का मैनेजमेंट
इस कम पोषाहार को बच्चों में कैसे एडजस्ट करना है, ये सर दर्दी आंगनवाड़ी कि है. आंगनवाड़ी को केंद्र से लादकर अपने खर्चे पर ये कटटे केंद्र पर लाने होते थे. कुछ
वर्कर ने हो सकता है कि 1 या 2 कट्टा उसने भी खर्च निकालने को बेचा होगा. नतीजा ये
हुआ, लाभार्थी में कभी किसी को दिया किसी को नहीं, किसी को बहुत कम दे दिया. समाज
में आंगनवाड़ी कि छवि गिरने लगी. वर्कर समझ ही नहीं पायी कि इस पूरे नेटवर्क कि वह
आख़िरी पर महत्वपूर्ण कड़ी है, और हिसाब ठीक रखने के एवज़ में उसे कमिशन के 100
रुपये में से 10 पैसे मिलते हैं, जो पोषाहार ढूलाई में खर्च हो जाते हैं. 99
रुपये, 90 पैसे के खर्च को जस्टिफाई करने के बदले में उसे सिर्फ अधिकारीयों कि दया
मिली जिससे उसकी नौकरी चलती रही.
4.
इसी के साथ एक और
परिघटना घटी. बहुत सी वर्कर इस गोदाम से ही कट्टा चोरी के खिलाफ आवाज़ उठाने लगीं.
इन आवाज़ों को दबाने के लिए आंगनवाड़ी के बीच से कुछ ऐसी वर्कर छांट ली जो विरोध
करने वाली वर्कर को चुपचाप रहकर इस कमी को दबाने और चुपचाप नौकरी करने कि सलाह
देती, पोषाहार बिकवाने में मैडम का सहयोग करती, यूनियन बनाने कि कोशिश करने वालों
कि खबर अधिकारीयों को देती. भ्रष्टाचार को कवर करने वाली इन workers ने यूनियन
बनायीं और विभाग ने मान्यता भी दी. समस्या उठाने वाली यूनियन में workers के आने
पर रोक लगाकर आपस में ही विभाजन हो गया. विभाग के पास कुछ के मकान या वाहन किराये
पर लगे थे.दफ्तर और अधिकारी-कर्मचारियों ने आवाज़ उठाने वाली वर्कर के यहाँ छापा
डालने, ख़राब रिपोर्ट देने के नाम पर आवाज़ को दबाया गया.
- बाज़ार में बिकता पोषाहार
5.
ये
पोषाहार गोदामों से ही बिकने लगा था, इस तरह पूरे के पूरे ट्रक, लोडर पकडे जाने की
खबरें अखबारों में बहुत प्रमुखता से छपी. ट्रक, लोडर, में
पोशाहार पकडे जाने और डेयरी पर बिकने की बड़े स्तर पर मीडिया में रिपोर्ट आयीं, तो
पोषाहार केंद्र आने कि नीति तै कि गयी.
6.
अब
आंगनवाड़ी से नकद पैसे वसूले जाने लगे,
कीमत 300 से 500 तक . बात यही तक नहीं रुकी
क्योंकि पोषाहार के भ्रष्टाचार के तजुर्बे से आंगनवाड़ी से पैसा निचोड़ने का
रास्ता जो मिल गया था, और विभाग को भी समझ आ गया था कि आंगनवाड़ी मात्र कठपुतली है.
अब ऑडिट के नाम पर, सेंटर विजिट में रिपोर्ट ठीक लिखने के नाम पर,फ्लेक्सी फण्ड हो
या किसी अन्य मद का पैसा आधा पैसा अधिकारी को चाहिए था क्योंकि वाउचर उन्ही को पास
करना था.
- हास्यास्पद होता भ्रष्टाचार
7.
ये
भ्रष्टाचार कभी-कभी हास्यास्पद भी लगने लगता है, जब साड़ी का पैसा पहली बार आया तो
एक ही रंग कि साडी लेने के नाम पर सबको एक ही दूकान से साड़ी लेने को मजबूर किया
गया. कुछ अधिकारीयों ने थोक में साड़ी मंगवाकर खुद ही बेचने का काम किया, तो कुछ ने
अपने पति/पत्नी के नाम पर घर में दूकान खुलवा दी.यूनियन ने इसका विरोध किया तो
साड़ी बेचना तो बंद हो गया, नकद कमीशन ज़ारी है.
8.
2012
में जब हॉट कुक आंगनवाड़ी के खाते में आया तो आधा पैसा तो अधिकारी बिल पास करने के नाम
पर लेने लगे, और आधे पैसे का जो सामान आता था उसके लिए इन्होने दुकानें निर्धारित करदी.
बहुतों ने तो बेरोजगार परिवार को किराने कि दूकान खुलवा दी थी.
9.
जब
हॉट कुक ngo को दिया गया तो जिलों ने इस पर भी सेटिंग कर ली, किचेन चलाने से लेकर हॉट
कुक ट्रांसपोर्ट बच्चों कि गिनती आदि में खूब कमिं कि कोशिश की गयी.
10. सवाल
उठता है कि आंगनवाड़ी क्यों इस घोटाले में शामिल हैं ? ये विरोध कर्यों नहीं कराती,
इसके कई कारण हैं
11. इनकी नौकरी पूरी तरह अधिकारीयों के रहम ओ करम पर है. 2014 से पहले बंधुआ गुलाम के हालात थे. ज़रा see गलती होने पर 15 दिन से एक माह तक का मानदेय काट दिया जाता था, बिना स्पष्टीकरण के जब चाहे सेवा से हटा दिया जाता था . कोर्ट केस होने तथा यूनियन के संघर्ष के बाद ये हालात बदली है लेकिन इनके दिलों में आज भी खौफ बहुत है.
2014 के बाद बदलाव तो आया पर जागरूकता नहीं आई, icds का दृष्टिकोण, उद्देश्य,सरकार कि
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