Friday, July 31, 2020

62 साल में आंगनवाड़ी की छंटनी का आदेश वापस नही हुआ तो, कोर्ट से विधानसभा तक और संसद से सड़क तक आन्दोलन होगा


सरकार ने 62 वर्ष में निकालने का आदेश वापस ना लिया तो कोर्ट का सहारा लेना होगा





 

62 वर्ष की workers को सेवा से अलग करने के विरोध में महिला आंगनवाड़ी संघ के अध्यक्ष और आंगनवाड़ी कर्मचारी यूनियन की अध्यक्ष ने पत्र लिखकर इस आदेश को वापस लेने की मांग की है.

 

संयुक्त मोर्चे के अध्यक्ष, तथा महिला आंगनवाड़ी संघ के अध्यक्ष गिरीश कुमार पांडे ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर गरिमा यादव विशेष सचिव बाल विकास एवं पुष्टाहार के आदेश को निरस्त करने की मांग कि है. 30 जुलाई को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा है कि इस आदेश पर माननीय उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है इसलिए यह आदेश  न्यायालय की अवमानना भी है। माननीय उच्च न्यायालय में रिट संख्या 9/13 अभी तक लंबित है, इसलिए इस पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता. गिरीश कुमार पांडे ने मुख्यमंत्री से कोरोना आपातकाल के दौर में कोरोना वॉरियर को राहत प्रदान करने की बजाय उन्हें उत्पीड़ित करके कोरोना की लड़ाई को कमजोर करने और सरकार को बदनाम करने वाले अफसरों पर कार्यवाही करने की भी मांग की.

संयुक्त मोर्चे की संयोजक, और आंगनवाड़ी कर्मचारी यूनियन की प्रदेश अध्यक्ष वीना गुप्ता ने बताया कि यदि 10 दिन के अन्दर सरकार ने ये आदेश वापस नही लिया तो, महिला आंगनवाड़ी और आंगनवाड़ी कर्मचारी यूनियन दोनों कोर्ट का रास्ता भी अपनाएंगे और आन्दोलन को तेज़ किया जायेगा. श्रम संगठनों ने कोर्ट से लेकर सड़कों तक संघर्ष के लिए कमर कस ली है, आने वाले दिनों में संघर्ष और तेज़ होगा. सरकार लोक डाउन का फायदा उठाकर एक के बाद एक दमन का कदम उठा रही है,इसलिए लॉक डाउन होते हुए भी who के निर्देशों का पालन करते हुए  संघर्ष भी तेज़ किया जायेगा .

Wednesday, July 29, 2020

उन्नाव की मृत आंगनवाड़ी वर्कर स्व0 कामिनी निगम के परिवार को मिला 50 लाख का चेक, बेटे ने फेसबुक पर दी जानकारी



उन्नाव की मृत आंगनवाड़ी वर्कर स्व0 कामिनी निगम के परिवार को मिला 50 लाख का चेक, बेटे देवेश निगम ने निम्नलिखि शब्दों में धन्यवाद व्यक्त किया :-

कुछ दिन पूर्व मेरी माँ #कोरोना_योद्धा स्व. #कामिनी_निगम की #कोरोना से हुई आकस्मिक मृत्यु के कारण #सदर_विधायक_बड़े_भाई_पंकज_गुप्ता जी के अथक प्रयासों प्रदेश सरकार द्वारा आज मेरे #पिता जी को 50 लाख रुपए का चेक #जिलाधिकारी_महोदय#पंकज भइया द्वारा दिया गया ।
इस सहायता और सहयोग के लिए बड़े #भाई
Pankaj Gupta
जी और #जिलाधिकारी_महोदय का हृदय से आभार ...
इन परिस्थितियों में जिन्होंने मेरा साथ दिया उन्हें भी कोटि कोटि #धन्यवाद ...🙏
#ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरी माँ को अपने श्री चरणों मे स्थान दें ।

Tuesday, July 28, 2020

मास्क न पहनने पर किसी बकरे की गिरफ़्तारी नहीं हुई : मीडिया संस्थानों ने इस भ्रामक खबर को सुर्खी बनाया

हास्यास्पद गलत ख़बर


27 जुलाई को एक अजीबोग़रीब ख़बर सुर्ख़ियों में रही कि एक बकरे को मास्क न पहनने की वजह से कानपुर पुलिस ने ‘गिरफ़्तार’ कर लिया. IANS की इस ख़बर को नेशनल हेरल्डओडिशा पोस्ट और न्यूज़ 18 इंग्लिश ने रिपोर्ट किया.न्यूज़18 को यह स्टोरी इतनी महत्वपूर्ण लगी कि इसे तेलुगू और बांग्ला में भी पब्लिश किया गया. चैनल ने पुलिस का एक वीडियो ब्रॉडकास्ट किया जिसमें वो बकरे को जीप में रखकर ले जा रही है.

पुलिस की गाड़ी में धकेले जा रहे बकरे का वीडियो मीडिया और सोशल मीडिया पर घूम रहा है. एक ट्विटर यूज़र ने कहा कि एक आदमी ने बेकनगंज पुलिस पर उसके बकरे को जबरदस्ती ले जाने का आरोप लगाया है. कानपुर पुलिस ने यूज़र को रिप्लाई किया कि दादामियां चौराहे पर लॉकडाउन के दौरान एक बकरा लावारिस घूम रहा था जिसे बेकनगंज पुलिस थाने लाया गया और बाद में उसके मालिक मोहम्मद अली पुत्र खनीकुज्जमा को सौंप दिया गया.

ऑल्ट न्यूज़ ने बेकनगंज पुलिस से संपर्क किया. हुमें बताया गया कि एक पुलिस वैन गुज़र रही थी तो स्थानीय लोगों ने बताया कि एक लावारिस बकरा गली में घूम रहा है. पुलिस ने कहा, “हम बकरे को पुलिस थाने ले आए ताकि वह खो न जाए और उसके मालिक को बुलवाया. वो आया और बकरे को ले गया. मास्क न पहनने के कारण हमने बकरे को गिरफ़्तारकर लिया, ये ख़बर पूरी तरह से गलत है.हमने बकरे के मालिक मोहम्मद अली को उनका स्टेटमेंट लेने के लिए कॉल किया तो वो इस अजीब ख़बर पर हंस पड़े. उन्होंने कहा, “पुलिस ने हमारी मदद की. हमारा बकरा खो जाता अगर वो उसे लेकर थाने न आते और मुझे न बताते.

हमने अनवरगंज पुलिस स्टेशन के सर्किल ऑफ़िसर सफ़ीउद्दीन बेग से भी संपर्क किया, जिनका स्टेटमेंट कई मीडिया संस्थानों ने पब्लिश किया था. उन्होंने कहा कि एक आदमी बिना मास्क के घूम रहा था, उसके पास बकरा था. पुलिस ने उसे पकड़ना चाहा तो वह बकरे को छोड़कर भाग गया. हालांकि उनका वर्जन बेकनगंज पुलिस के बयान से अलग है, CO बेग ने कहा कि मास्क न पहनने के कारण बकरे को अरेस्ट करने की ख़बर हास्यास्पद है. उन्होंने कहा, “क्या ऐसा हो भी सकता है

यानी IANS की अगुवाई
 कई मीडिया संस्थानों ने एक बेकार स्टोरी को सच्ची ख़बर के रूप में पब्लिश किया. यह बताना 
बकवास है कि पुलिस ने मास्क न पहनने के लिए एक बकरे को अरेस्टकर लिया जबकि भारत की सड़कें आवारा जानवरों (बिना मास्क के) से भरी पड़ी हैं. 

इस खबर का पर्दा फाश ऑल्ट न्यूज़ ने किया है.
इस खबर के लिए ऑल्ट न्यूज़ का आभार 

आंगनवाड़ी संगठनों ने दिया हड़ताल का नोटिस : who निर्देशों का पालन करते हुए 7 व 8 अगस्त को आंगनवाड़ी की हड़ताल और 9 अगस्त को सत्याग्रह,

                                        लॉक डाउन : वर्कर के उत्पीडन का सरकार को अवसर 

                                            उत्पीडन का प्रतिकार भी ज़ारी रहेगा  

7, 8 व् 9  अगस्त का अभियान सफल करो 


24 july को प्रदेश के प्रमुख केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संघ  INTUC, AITUC, HMS, CITU ,in  ट्रेड यूनियन संघों से सम्बद्ध आंगनवाड़ी यूनियन कि एक वर्चुअल बैठक आयोजित कि गयी जिसकी अध्यक्षता गिरीश पाण्डेय तथा सञ्चालन वीना गुप्ता ने किया. बैठक में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन के आह्वान पर 7 व्  8 को  हड़ताल तथा 9 को अंग्रेजों,भारत छोडो दिवस पर भारत बचाओ दिवस मनाने का निर्णय लिया गया. इस निर्णय के बाद चारों ही यूनियन कि तरफ से सरकार को हड़ताल का नोटिस भेज दिया गया. बैठक में aituc से चंद्रशेखर,intuc से दिलीप श्रीवास्तव और शिशिर शर्मा,citu से वीना गुप्ता और चमन आरा, hms से गिरिश पाण्डेय, माया सिंह  और सुनंदा तिवारी  उपस्थित थे. सरकार को अखिल भारतीय हड़ताल और 9 अगस्त को सत्याग्रह हेतु स्ट्राइक नोटिस की कोपी यहाँ प्रेषित की जा रही है.

                                                                      वीना गुप्ता  


                                                  हड़ताल का नोटिस 

सेवा में 
सचिव 
महिला एवं बाल विकास विभाग 
लखनऊ  (यू.पी.)
विषय :who निर्देशों का पालन करते हुए 7 व 8 अगस्त को आंगनवाड़ी की  हड़ताल और 9 अगस्त को सत्याग्रह का नोटिस 

महोदय

आपको सूचित किया जाता है कि निम्न हस्ताक्षर कर्ता  यूनियनों ने निम्न लिखित मांगों पर  केंद्रीय ट्रेड यूनियन संघों इंटक एटक सीटू और एचएमएस द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सात एवं आठ अगस्त को अखिल भारतीय हड़ताल में भागीदारी करने का फैसला लिया है। डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित सभी मापदंडों एवं शारीरिक दूरी का पालन करते हुए हम सभी इस हड़ताल में भागीदारी करेंगे और 9 अगस्त को , आजादी के आंदोलन के महत्वपूर्ण दिवस 9 अगस्त भारत छोड़ो दिवस को मनाएंगे।

हमारी मांगें

 कोविड 19 की पुष्टि होने वाले मामलों की संख्या में भारत की स्थिति को देखा जाए तो वर्तमान में एशिया में भारत में सबसे अधिक मामले हैं और दुनियाभर के मामलों में भारत चैथे नम्बर पर है। लेकिन अभी भी संतोषजनक बात यह है कि भारत में कोविड से मामले घातक होने की दर, वैश्विक दर से अपेक्षाकृत कम है। हम सभी जानते हैं कि यह हमारे चिकित्सा और स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स के महान योगदान के कारण ही संभव हो पाया है।

कोविड 19 के सामुदायिक प्रसार को रोकने में मदद करने वाले फ्रंटलाइन वर्कर्स में योजनाकर्मी यानी स्कीम वर्कर्स सबसे आगे हैं। इन श्रमिकों में 60 लाख महिला मजदूर है, इन श्रमिकों में 10 लाख आशा वर्कर्स और फैसिलिटेटर्स हैं, जो घर-घर जाकर सर्वे करते हैं, लोगों को शिक्षित करते हैं और क्वॉरेंटाइन केंद्रों में लोगों की देखभाल करते हैं इनमें करीब 26 लाख आंगनवाड़ी वर्कर्स और हेल्पर्स हैं, जो आईसीडीएस के तहत काम करते हैं और आशा वर्कर्स के समान ड्यूटी कर रहे हैं इसके साथ-साथ आंगनवाड़ी वर्कर्स व हैल्पर्स  लाभार्थियों को घर-घर जाकर पोषाहार बांट रहे हैं, योजना श्रमिकों का एक और हिस्सा करीब 27 लाख मिड डे मील वर्कर्स हैं जो स्कूल जाने वाले बच्चों को घर-घर राशन पहंुचा रहे हैं और सामुदायिक केंद्रों और क्वारंटाइन केंद्रों में भी अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। इन श्रमिकों में 108 एंबुलेंस वर्कर्स समेत राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अन्य कर्मचारी भी शामिल हैं। यह सभी वर्कर्स अपने और अपने परिवारों के जीवन को दांव पर लगाकर समुदाय में ज़मीनी स्तर पर काम में जुटे हुए हैं।

बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि इनमें से अधिकतर को किसी भी प्रकार के सुरक्षात्मक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, इन्हें मास्क व सैनिटाइजर तक भी उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इनमें से बहुत से श्रमिकों को कोरोना कैरियर यानी कोरोना के वाहक कहकर उन पर हमले किए जा रहे हैं। योजना श्रमिकों के कोविड-19 से संक्रमित होने की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। कोविड-19 से संक्रमित बहुत से योजना श्रमिकों के लिए इलाज करावाना भी मुश्किल हो रहा है अस्पतालों की तो बात ही क्या कहें। बहुत से ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें आशा वर्कर्स, आंगनवाड़ी वर्कर्स, मिड डे मील वर्कर्स व अन्य योजना श्रमिकों की कोविड से संक्रमित होने के कारण मौतें भी हुई है। बहुत से मामलों में इनके कोविड-19 के टेस्ट भी नहीं किए गए और इन्हें आपकी सरकार द्वारा घोषित बीमा की राशि भी नहीं मिली। इसके अलावा  बीमा में वर्कर्स के अस्पताल में भर्ती होने और क्वारेंटाइन के खर्चे भी शामिल नहीं है, इन खर्चों को वर्कर्स को अपनी जेब से करना पड़ रहा है।

जैसा कि आपने कई बार अपने भाषणों में उल्लेख किया है, योजना श्रमिकों द्वारा प्रदान की गई सेवाएं अति महत्वपूर्ण हैं। लेकिन, संसदीय स्थायी समितियों और 45 वें और 46 वें भारतीय श्रम सम्मेलन सहित विभिन्न मंचों की सिफारिशों के बावजूद इन श्रमिकों के सामने आने वाली चुनौतियों को कभी भी किसी भी स्तर पर ध्यान में नहीं रखा गया है। इन्हें मजदूर के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है और न्यूनतम मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जाता। वर्षों की सेवा के बाद भी इनके लिए कोई सामाजिक सुरक्षा या पेंशन नहीं है। यहां तक कि मिड डे मील श्रमिकों को मात्र 1000रू महीना मानदेय मिलता है लेकिन यह मामूली राशि भी इन्हें नियमित रूप से भुगतान नहीं की जा रही है। 

डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ जैसी विभिन्न एजेंसियों ने आने वाले समय में बड़े पैमाने पर गरीबी बढ़ने के कारण आजीविका की हानि, उचित सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की कमी, और परिणामस्वरूप भूख और कुपोषण से होने वाली मौतों (छह महीने के भीतर पांच साल से कम उम्र के 3 लाख बच्चों की मौतों सहित!) की चेतावनी दी है। ऐसे में यह बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि सरकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित सेवाओं की योजनाओं को मजबूत करे और इन सेवाओं में कार्यरत योजना श्रमिकों के योगदान को मान्यता दे। 

हम यह भली भांति जानते है कि महामारी से लड़ने के लिए वित्तीय संसाधनों को जुटाना ज़रूरी है। 

हम आपसे आग्रह करते हैं कि राष्ट्रहित में दी जा रही सेवाओं के सर्वोपरि महत्व को देखते हुए आप तुरंत हस्तक्षेप करें और इन मुद्दों को हल करें।

हमारी मांगें 

1. सभी आंगनवाड़ी वर्कर्स व हैल्पर्स के लिए सुरक्षात्मक उपकरण प्रदान करो, विशेषकर स्वास्थ्य क्षेत्र में। नियंत्रण क्षेत्रों और रेड जोन में लगे हुए वर्कर्स के लिए पीपीई किट दो। सभी फ्रंटलाइन श्रमिकों की बार-बार, निरंतर और फ्री कोविड -19 टेस्ट किए जाएं।
2. सभी वर्कर हेल्पर को 50 लाख रुपये का बीमा कवर दो जिसमें ड्यूटी पर होने वाली सभी मौतों को कवर किया जाए। पूरे परिवार के लिए कोविड -19 के उपचार का भी कवरेज दिया जाए।
3. केंद्र प्रायोजित योजनाओं आईसीडीएस, एनएचएम और मिड डे मील स्कीम को पर्याप्त आर्थिक आवंटन कर स्थाई बनाओ। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए जीडीपी का 6 प्रतिशत आवंटित करो। 
4. 45वें व 46वें भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिशों के अनुसार योजना श्रमिकों को मजदूर के रूप में मान्यता दो, सभी योजना श्रमिकों को 21000 रू प्रतिमाह न्यूनतम वेतन दो, 10000रू प्रतिमाह पेंशन तथा  ईएसआई, पीएफ आदि प्रदान करो।
5. मौजूदा बीमा योजनाएं (ए) प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, (बी) प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और (सी) आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बीमा योजना - सभी योजनाओं को सभी योजना कर्मियों को कवर करते हुए सार्वभौमिक कवरेज के साथ ठीक से लागू किया जाए।
6. कोविड -19 ड्यूटी में लगे सभी कांट्रैक्ट व योजना श्रमिकों के लिए प्रति माह 10,000 रू का अतिरिक्त कोविद जोखिम भत्ता भुगतान किया जाए। सभी लंबित बकायों का भुगतान तुरंत किया जाए। 
7. ड्यूटी पर रहते हुए संक्रमित हुए सभी लोगों के लिए न्यूनतम दस लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
8. 62 वर्ष की वर्कर्स को निकालना बन्द करो। ओडिशा राज्य की तर्ज पर सभी आंगनवाड़ी वर्कर व हेल्पर को  7500 रू0  प्रति माह पेंशन दो।
9. केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए बजट आवंटन बढ़ाया जाए। 
10. टैक्स के दायरे के बाहर के सभी लोगों को मुफ्त और पर्याप्त कोविड टेस्ट और उपचार की सुविधाएं प्रदान की जाएं। क्वारेंटाइन केंद्रों और अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित की जाए। 
11. लाभार्थियों के  लिए 7500 रुपये प्रति माह और ज़रूरतमंदों के लिए मुफ्त राशन/भोजन की व्यवस्था की जाए। सभी के लिए नौकरियां और आय सुनिश्चित किए जाएं। 
12. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए। स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा सहित बुनियादी सेवाओं के निजीकरण के प्रस्ताव को वापस लिया जाए।
13. भोजन के अधिकार और शिक्षा के अधिकार की तरह सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा के अधिकार के लिए कानून बनाया जाए।
14. वित्त जुटाने के लिए, ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट’ जैसी परियोजनाओं पर खर्चा बचाया जाए।  संसाधनों के लिए अति धनी वर्गों पर कर लगाया जाए।
                                                                                             भवदीय

            दिलीप श्रीवास्तव          चन्द्र शेखर                 गिरीश पाण्डेय             वीना गुप्ता 
               INTUC                 AITUC                  HMS                 CITU           



       

Monday, July 27, 2020

उत्तर प्रदेश सरकार का नया आदेश : आईसीडीएस को खत्म करने का सुनियोजित प्रयास

Sunday, July 26, 2020

मध्य प्रदेश सरकार ने कोरोना ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने पर आंगनबाड़ी वर्कर और सहायिकाओं के परिवार की महिला सदस्यों को नौकरी देने की घोषणा की.


मध्य प्रदेश सरकार की राहत 


        कोरोना के संकटकाल में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और           सहायिकाओं ने साहस का परिचय देते हुए सेवा            भावना की मिसाल कायम की है। 

        मध्य प्रदेश सरकार ने फैसला लिया है कि राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत यदि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका की ड्यूटी लगाई जाती है और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता/सहायिका कोविड-19 (कोरोना) के दौरान कर्तव्य पालन करते हुए दिवंगत होने पर तथा भविष्य में राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय आपदा घोषित होने पर अगर इनकी ड्यूटी लगाई जाती है और इस दौरान उनकी मृत्यु हो जाती है तो उनके परिवार की महिला सदस्य को नौकरी मिलेगी। संबंधित परिवार की महिला को निर्धारित अर्हताएं पूर्ण करने की स्थिति में नियुक्तिकर्ता अधिकारी, बाल विकास परियोजना अधिकारी द्वारा उन्हें सीधे नियुक्त किया जाएगा।


Thursday, July 23, 2020

उन्नाव में कोरोना योद्धा या बीमा से नहीं, स्टेट डिजास्टर रेस्पोंस फण्ड से, 18 जुलाई,2020 को मृत आंगनवाड़ी वर्कर के वारिस को 50 लाख का भुगतान स्वीकृत

    

कोरोना संक्रमण से मृत आंगनवाड़ी को 50 लाख मुआवजा मिलने का प्रदेश का पहला मामला 

जिंदगी की कोई कीमत नहीं लगा सकता , ना ही मां कि जगह कोई ले सकता है. लेकिन मुआवजा मिलने से ज़ख्म पर कुछ मरहम ज़रूर लग जाता है. 18 july, उन्नाव जनपद की शहर परियोजना में मो0 कासिफ अली सराय की रहने वाली आंगनवाड़ी वर्कर कामिनी निगम की  कोरोना संक्रमण के कारण दुखद मृत्यु हो गयी  थी. बीमार होने पर उचित इलाज़ भी नहीं मिल पाया था.

मृत आंगनवाड़ी वर्कर स्व0 कामिनी निगम की मृत्यु पर आंगनवाड़ी संगठनों ने कोरोना सर्वे के दौरान covid से सुरक्षा कवच जैसे मास्क,SANITISER,PPE किट,  बहुत मुखर होकर आवाज़ उठाई थी. कोरोना ड्यूटी के दौरान संक्रमण से मृत्यु होने पर आशा वर्कर को 50 लाख मुआवजा देने की घोषणा केंद्र सरकार ने की थी, लेकिन आंगनवाड़ी को मुआवज़े कि घोषणा नहीं कि थी. इस कारण आंगनवाड़ी लगातार इस बीमे से आंगनवाड़ी को भी कवर करने की मांग कर रही थी.  

स्व0 कामिनी निगम के परिवार को भी 50 लाख का मुआवजा देने की मांग जोर शोर से उठ रही थी. cdpo संघ ने भी इस मांग को मजबूती से उठाया था. 

आंगनवाड़ी यूनियन के अतिरिक्त सम्बंधित अधिकारीयों ने भी इस मुआवज़े को दिलाने के लिए प्रयास किया. ये प्रयास आज सफल हुए और मात्र 5 दिन के अन्दर मुआवज़े की राशी 50 लाख स्वीकृत हो गयी. ADM, फाइनेंस उन्नाव, राकेश कुमार सिंह ने आज ही 50 लाख कि राशी स्टेट डिजास्टर रेस्पोंसे फण्ड से स्व0 कामिनी निगम के वारिस को देने की स्वीकृती दी थी. 

उम्मीद है कि सरकार आंगनवाड़ी कि कोरोना ड्यूटी के दौरान सुरक्षा के इंतजाम के लिए भी ठोस कदम उठाएगी .


 

Wednesday, July 22, 2020

नागपंचमी पर गुडिया पीटने पर समाज रोक लगाये महिला विरोधी प्रथायें,अब बर्दाश्त नहीं.डॉ वीना गुप्ता

            सामाजिक न्याय और समानता में यकीन  करने वाला हर स्त्री पुरुष आवाज़ उठाये                                                                .



                                                     महिला पुरुष असमानता को बढ़ने वाली समाज में बहुत सी मान्यताएं, प्रथाएं, और रूढ़ियाँ हैं. उन सब के विस्तार में ना जाकर आज में इस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक प्रचलित कुरीति के बारे में बताने जा रही हूं,जो ना सिर्फ स्त्री विरोधी बल्कि स्त्री हिंसा को सही ठहराने की मानसिकता विकसित करती है। परंपरा के नाम पर यह पाखंड लड़कों के मन में यह मानसिकता डालता है कि लड़कियों को पीटना बहुत सामान्य सी चीज है और लड़कियों के मन में भी यह डर अगर वह गलती करें तो उनकी पिटाई होना सामान्य सी घटना है। शायद कुछ लोग शोध करें तो बताएं कि इस प्रथा के क्या क्या सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हैं, पर यह है बहुत भयावह और बर्बर रिवाज़ .

रिवाज़ इस प्रकार है कि  नाग पंचमी के दिन छोटी लड़कियां अपनी थाली में सजाकर अपनी गुड़िया को लेकर और साथ में मिठाई वगैरह लेकर गांव में तालाब की तरफ जाती हैंवहां पर लड़के मिठाई खा लेते हैं और लड़कियां गुड़िया को पानी में फेंक देती हैंं और लड़के गुड़िया कोे खुशी से पीटते हैं.

जब कुछ लोगों से इस बारे में बात की तो उन्होंने इस रिवाज़ के पीछे चार प्रचलित कहानियां बतायीं, कहानियां तो कई हैं, पर उनके निष्कर्ष निम्न लिखित हैं -

  • दो कहानियों का निष्कर्ष है कि औरतों के पेट में बात नहीं रुकती इसलिए उन्हें श्राप मिला है कि वह साल में दिन पीटी जाएंगी
  •  दूसरी कहानी का निष्कर्ष है की ओर से सोच कर कुछ काम नहीं करती इसलिए उन्हें श्राप मिला है कि वह साल में दिन पीटी जाएंगे.
  • तीसरी कहानी का निष्कर्ष है की स्त्री ने अगर प्रेम किया,  तो फिर पूरा समाज  मिलकर पीटेगा। महिला के परिवार को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को यह हक है कि यदि महिला अपनी इच्छा से किसी से प्रेम करें तो समाज द्वारा पीटा जाना न्याय संगत है।

जो स्त्री घर में मान बहन बेटी बनकर हमारे रिश्तों में बंधी है, उसी के स्त्री के प्रतीक के रूप में गुड़िया को बेरहमी के साथ छड़ी से पीट-पीटकर उसे तहस-नहस कर देते हैं। लड़कों के लिए यह उत्सव है लेकिन लड़कियों के मन में यह डराने वाला अनुभव है। किसी भी लड़की को अपनी प्रिय गुड़िया को पीटा जाना, पीट-पीटकर खत्म कर दिया जाना उसे अंदर तक दुखी कर जाता है। और जब इस परंपरा के लिए तैयारी होती है और इसको किया जाता है तो निश्चित ही घर में परिवार में समाज में इसकी चर्चा भी होती होगी कि इस पर्व और रिवाज़ को क्यों मनाया जाता है. ये भी बताया जाता होगा कि औरत के पेट में बात नहीं पच सकती या उसे अकल नहीं होती, बिना सोचे समझे काम कर गुजराती है, या फिर किसी से प्रेम कर लिया तो ये तो सब से बड़ा अपराध कर दिया. यह सारी बातें एक ऐसी मानसिकता का निर्माण करती है जो स्त्री को कमतर समझने, उसे कम अक्ल समझने, और स्त्री हिंसा को जायज ठहराने की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं।

समाज में गैर बराबरी और भेदभाव को सही ठहराने के लिए बहुत सी सांस्कृतिक परंपराएं और प्रथाएं समाज में चली आ रही हैं । आज उच्च शिक्षित होकर और आधुनिक जीवन की सारी सुविधाओं को पाकर भी समाज सामाजिक न्याय और की बराबरी के मूल्यों को आत्मसात नहीं कर पा रहा है. इन मूल्यों को अपनाना तो दूर कि बात, बल्कि उसके अंदर की हिंसा और नफरत लगातार बढ़ती जा रही है. हमारे भारतीय समाज में और खासकर उत्तर प्रदेश में स्वयं की श्रेष्ठता और दूसरों को कमतर समझने की भावना इतनी गहराई से व्याप्त है की अपने परिवार में भी ये असमानता और नफ़रत बनी राखी है.

जी हां यह नफरत, यह अपने से कमतर समझने का भाव, स्वयं को सर्व श्रेष्ठ समझने का भाव, बनाये रखने के लिए दूसरों को लगातार नीचा दिखाना भी ज़रूरी होता है. सर्वोच्चता के इसी अहंकार को बनाये , इस असमानता को बनाये रखने, यथास्थिति को स्थिर रखने के लिए समाज का उच्च वर्ग अपने पद व् पावर से ऐसे माहौल को बनाए रखता है कि कमज़ोर बिना कहे ही सर नीचा रखे. 

समाज में इतनी ज्यादा स्त्री विरोधी परंपरा , प्रथा, रिवाज़ और लोकाचार हैं कि कि खुद स्त्रियां भी चाहे या ना चाहे पर उन्हें परिवार, या लोकाचार के नाम पर निभाहने ही पड़ते हैं. बहुत ही सीमित परिवेश में रह रही in महिलाओं के लिए त्यौहार ही  मायके वालों से मिलने, समाज से मिलने या बाज़ार के दर्शन का और रूटीन ज़िन्दगी से अलग कुछ करने का अवसर देते हैं.

कुछ तो अंध आस्था के कारण तो कुछ खुद को परिवार कि नज़र में श्रेष्ठ साबित करने के लिए महिलायें भी खूब बढ़ चढ़ कर भाग लेती हैं. हमारे ऐसे सैकड़ों रिवाज और प्रथाएं हैं जो स्त्री विरोधी हैं ।

मैंने अपने जीवन में हिंसा के  हिंसा के बहुत से मामले देखें और बहुत नजदीक से देखें। लेकिन इस परंपराके नाम में ही अंदर से हिला दिया। इस उत्सव का नाम है गुड़िया पीटने की परंपरा । मन के अंदर बैठीमासूम सी गुड़िया को पीट पीट कर मारने कि कल्पना ने ही मन को बेचैन कर दिया। इस तरह की परंपराओं या रिवाजों को बिल्कुल रोकने की जरूरत है। परंपरा के नाम पर बर्बरता हिंसा और दासता का महिमामंडन नहीं  करने दिया जा सकता। किसी महिला  पर होने वाले अत्याचार से कहीं ज्यादा खतरनाक है मन के अंदर बल्कि बाल मन के अंदर हिंसा के प्रति आकर्षण और सजा के रूप में हिंसा को सही ठहराती लड़कों को भी नहीं पता जिस खुशी से हो गुड़िया को छड़ी से पीटते हैं उनके मन के अंदर क्या बदलाव ला रही है, या उन लड़कियां जिनकी गुड़िया को पीटा जा रहा है उनकेदिल पर क्या गुजर रही है कैसा डर और वहशत उनके दिल पर गुजर रही होगी ।

क्या यह परंपरा इस बात को बढ़ावा नहीं देगी कि घर की हर चीज पर पहला हक लड़के का है कि घर की महत्वपूर्ण बातें लड़की या औरतों को मत बताओ। औरतों से राय मत करो क्योंकि उनमें समझ कम होती है. लड़की अगर किसी काम से भी बिना किसी आकर्षण के किसी लड़के से बात करें तो उस पर हिंसा करना उसके भाई का ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लड़कों के लिए जायज है। 

 

यही परम्पराओं के नाम पर वे रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ हैं, जो लड़कियों के प्रति in पूर्व धारणाओं को कि लड़की के पेट में बात नहीं रुकती, या वह कोई भेद नहीं रख सकती, कम अक्ल होती है हमेशा समाज में उसके प्रति रहती हैं. लड़की कितना भी पढ़ ले नौकरी कर ले लेकिन समाज की नजर में यही नजरिया उनके प्रति रहता है. अगर कोई पति अपनी पत्नी से मशविरा कर ले, और इत्तफाक से उसकी सलाह को मान भी ले, तो उसे बड़ा निंदनीय मन जाता है. और इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि स्त्री खुद खुद अपने न से अपने को भी इसी लायक समझाने लगाती है. अपवाद बहुत सारे हैं बहुत सारी लड़कियां परंपराएं तोड़कर आगे आ रही हैं, आगे भी बढ़ रही है.

रूलिंग क्लास समाज को नियंत्रित करने के बहुत से तरीके अपनाती है, रिवाजों,परम्पराओं के नाम पर स्त्री दासता के विसुअल्स का महिमा मंडन, स्त्री को बदलाव के लिए प्रयास करने से रोकता है. वह खुद हीन भावना से ग्रस्त हो जाती है. स्त्री कि पिटाई होने पर कोई बीच में नहीं बोलता, अधिकांश लौग सोचते हैं कि औरत कि ही गलती होगी. ये तो आज कि हकीकत है कि पुलिस ठाणे में औरत रिपोर्ट दर्ज करने जाए तो पुलिस का पूछ ताछ का तरीका ऐसा होता है कि जैसे वही स्त्री पीड़ित नहीं, बल्कि ज़ुल्म करने वाली है. 

किसी भी परंपरा या प्रथा को बिना सोचे समझे मनाते रहना तार्किक रूप से विचार ना करना , उसे आलोचनात्मक रूप से ना देखना एक सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है। इसलिए आधुनिक होना ही काफी नहीं है प्रगतिशील होना भी जरूरी है और समाज के प्रगतिशील जनवादी और समतावादी मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोगों को अपने परिवारों में इस प्रथा को रोकना चाहिए समाजके डर से यह सब कर रहे हैं इसलिए हम भी करें ऐसी दलील ना दें, इससे बड़ी कमजोर दलील और कोई हो ही नहीं सकती ।

कहानियां चाहे जो कहें पर एक कुरीति को, समाज विरोधी रुढ़ि को मानना बंद करना चाहिए. परंपरा के नाम पर महिलाओं को अपमानित करने वाली परम्पराओं के खिलाफ औरतों को ही नहीं पुरुषों को भी खड़ा होना चाहिए. में सभी युवाओं से भी अपील करुँगी कि वे गुडिया पीटने कि प्रथा में भागीदारी ना करें, त्यौहार ख़ुशी मानाने के लिए होते हैं, किसी का मन दुखी करके क्या हम खुश रह सकते हैं.

इसलिए मिलकर खुशी से साथ साथ इस पर्व पर सब मिलकर गुडिया को झूला झुलायें, अन्य सांस्क्रतिक और खेल कि गतिविधियाँ करें .

महिलाओं के ऊपर बढती हिंसा के हालात में ये ज़रूरी है कि लोग इस कुप्रथा के खिलाफ तार्किक बात रखें, अंध-श्रधा का विरोध करें.

परिशिष्ट : गुडिया पीटने की परंपरा से जुड़े मिथक और लोक कहानियाँ  


  1. पहली कहानी : पुरानी कथाओं के अनुसार गरुड़ को नागों का शत्रु माना जाता है। ये कथा भी एक नाग एवं एक गरुड़ की हैं। जिसमें एक नाग एक गरुड़ से अपनी जान बचाने का प्रयास कर रहा था और यहाँ वहाँ छिपता फिर रहा था। बचते बचाते इधर उधर भागते समय उसे एक स्त्री दिखाई दी। उसने उस स्त्री से प्रार्थना की कि वो उसे कहीं छुपा ले जिससे कि वो उस गरुड़ से बच सके। महिला ने नाग को छिपा तो लिया। किंतु स्वभाववश वह इस बात को ना छुपा सकी कि उसने एक सर्प को छुपाया है। उस स्त्री ने एक-एक करके सभी को यह बात बता डाली कि उसने एक नाग को गरुड़ से बचाने के लिए छिपाया है। इससे नागदेव ने क्रोधित होकर महिला को श्राप दे दिया। कि साल में एक बार एक ऐसा दिन आया करेगा जब तुम सब पीटी जाओगी। यही कारण है कि यह आज भी एक कथा के रूप में प्रचलित है। इस कथा के अनुसार ऐसा करना एक परम्परा ही बन गयी। नाग पंचमी के दिन इसे एक श्राप पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। लड़कियां कपड़े की गुड़िया बनाकर पास की नदी या तालाब में गुड़िया को फेंकती है और लड़के उन गुड़िया की पिटाई करते हैं।








  1. दूसरी कहानी: कहा जाता है कि तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी. इसके बाद तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या की शादी राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में हुई, जब वह व्याह कर ससुराल आई तो उसने यह राज एक सेविका को बताया और कहा कि वह किसी से न बोले. लेकिन उस सेविका ने इस बात को किसी दुसरे महिला को बता दी. इस तरह से यह बात पूरे नगर में फ़ैल गयी. इस बात से क्रोधित होकर तक्षक के राजा ने नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया. उसे इस बात का गुस्सा था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती. तभी से गुड़िया पीटने की परंपरा मनाई जाती है.

  2. तीसरी कहानी : भाई-बहन की कहानी से जुड़ी है भाई भगवान शिव का परम भक्त था और वह रोज मंदिर जाता था. मंदिर में उसे एक नागदेवता के दर्शन होते थे. वह लड़का रोजाना उस नाग को दूध पिलाने लगा और धीरे-धीरे दोनों में प्रेम हो गया. इसके बाद लड़के को देखते ही सांप अपनी मणि छोड़कर उसके पैरों में लिपट जाता था. इसी तरह एक दिन सावन के महीने में भाई-बहन मंदिर गए थे. मंदिर में नाग लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया. बहन ने जब देखा तो उसे लगा की नाग उसके भाई को काट रहा है. बहन ने अपने भाई की जान बचाने के लिए नाग को पीट-पीट कर मार डाला. इसके बाद जब भाई ने पूरी कहानी सुनाई तो लड़की रोने लगी. फिर लोगों ने कहा कि नाग देवता का रूप होते हैं इसलिए दंड तो मिलेगा चूंकि यह गलती से हुआ है इसलिए कालांतर में लड़की की जगह गुड़िया को पीटा जाएगा.

  3. ये कहानी राजा की बेटी की हैं  राजा की बेटी थी, जिसका नाम गुडिया था। वह दूसरे राज्य के राजा के बेटे से प्रेम करने लगती है। दुश्मन राज्य के युवराज से प्रेम की बात गुडिय़ा के भाइयों को स्वीकार नहीं होती जिसके चलते वह गुडिय़ा की बीच चौराहे पर पिटाई कर देते हैं। उसे चौराहे पर इतना पीटा जाता है कि उसकी मौत हो जाती है। गुडिय़ा की मौत के बाद उसके सातों भाई समाज में यह घोषणा करते हैं कि जो भी ऐसा करेगा, उसे चौराहे पर इसी तारह पीट-पीट कर मार दिया जायेगा.  इसके बाद हर साल गुडिया पीटने की प्रथा शुरू हुई. 

  4. नोट :  भाषा वैज्ञानिक ही बता सकते हैं कि गुडिया शब्द की उत्पत्ति, इस प्रथा से जुडी है या नहीं. 

  1. गुड्डा गुडिया के खेल और लोरियां गुजरे जमाने की बात है। नागपंचमी के दिन हम बच्चे नदी तालाब में पुतरी पीटने जाते थे। गर्मी की छुट्टियों में दो महीने जिज्जी लोग पुतरा-पुतरी बनाती थीं। उनकी शादी भी होती थी। नागपंचमी के आसपास स्कूल शुरू होती थी तो पुतरी-पुतरे समारोह पूर्वक विसर्जित किए जाते थे। हम लोग बेसरम के डंडों से उन पुतरों को पीटपीट कर लड़कियों को चिढाते थे।            जयराम शुक्ल, कवि,(ने अपने बचपन को याद करते हुए लिखा है)  साभार सोशल मीडिया