मैं नास्तिक क्यों हूँ : भगत सिंह
स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है।" इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।
मै नास्तिक क्यों हूँ
यह बहस
का विषय है कि क्या मैं अपने अहंकार और दंभ के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी
ईश्वर के अस्तित्व पर अविश्वास करता हूँ.? मुझे कभी भी
ऐसा नहीं लगा था कि भविष्य में कभी मुझे इस तरह की बहस में उलझना पड़ेगा. अपने दोस्तों (यदि मेरा दोस्ती का दावा अनधिकृत नहीं है)
के साथ कुछ चर्चाओं के परिणामस्वरूप, मुझे एहसास हुआ है कि उनमे से कुछ दोस्त, जो मुझे केवल थोड़े समय से ही
जानने के बावजूद, मेरे
बारे में जल्दबाजी में इस निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि मेरी नास्तिकता मेरी
मूर्खता है, और मेरे
मिथ्या गर्व का परिणाम है। तब भी यह एक गंभीर समस्या है. मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि में इन मानवीय
दुर्बलताओं से ऊपर हूँ। आखिरकार मैं एक मनुष्य से अधिक कुछ नहीं हूँ । कोई भी इससे
अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। गर्व मानवीय विशेषताओ मे से एक है, और ये मेरे व्यक्तित्व में भी है.
अपने
दोस्तों के बीच में, मैं तानाशाह के रूप में जाना जाता हूं, कई बार मुझे
शेखी बघारने वाला तक कहा गया. कुछ हमेशा शिकायत करते रहते हैं कि मैं एक “बॉस” कि तरह हूँ, अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। हां, यह बात कुछ हद तक सही है। इस आरोप से मैं इनकार नहीं करता। इसे
अहंकार/वैनगलोरि कहा जा सकता है।
जहां तक
हमारे समाज के घिनौने, अप्रचलित, और सड़े हुए मूल्यों का सवाल है, मैं एक चरम संदेहवादी हूं। लेकिन यह सवाल अकेले मुझे ही चिंतित नहीं करता।
मुझे अपनी सोच और अपने विचारों पर गर्व है। लेकिन ये खोखला गर्व नहीं है. गर्व या
घमंड आप जो भी कहें, दोनों का अर्थ है अपने व्यक्तित्व का
अतिरंजित मूल्यांकन. क्या मेरी नास्तिकता मेरे अनावश्यक अहंकार के कारण है,
या मैंने लम्बे समय तक गहराई से विचार करने के बाद ईश्वर में यकीन
करना बंद कर दिया. मैं अपने विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ. सबसे पहले आइये,
गर्व और घमंड के बीच अंतर करें, क्योंकि ये
दोनों दो अलग-अलग चीज़ें हैं.
मैं यह
कभी नहीं समझ पाया कि निराधार, बेबुनियाद गर्व या खोखला घमंड किसी
व्यक्ति को ईश्वर पर विश्वास करने से कैसे रोक सकता
है। मैं वस्तुतः किसी महान
व्यक्ति की महानता को उसी स्थिति में स्वीकार करने से
इनकार कर सकता हूँ, जब मुझे या तो बिना गंभीर प्रयासों के शोहरत मिल गयी हो,
या फिर मेरे पास महान बनने के लिए ज़रूरी बेहतर मानसिक क्षमता ना हो. यहा तक तो समझना आसान है, लेकिन ये
कैसे संभव है कि सिर्फ अपने अहंकार के कारण एक आस्तिक
नास्तिक बन जाए. इन हालात में दो बाते सम्भव है या तो मनुष्य ये समझ ले कि दैविय शकतिय उसके अधिकार में है,
अथवा एक क़दम आगे बढ़ कर खुद को ही भगवन
घोषित कर दे इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं हो सकता। पहली अवस्था में तो वह ईश्वर के अस्तित्व को सिधे नकारता ही नहीं है। दूसरी
अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है । मेरे तर्क इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह खुद ईश्वर
होने का दावा करता है या अपने ऊपर एक परम सत्ता के रूप
में ईश्वर के अस्तित्व को मानता है. दोनों ही स्थितियों
में वह आस्तिक या ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखने वाला है. वह नास्तिक नहीं है. में इन दोनों ही विचारों को नहीं मानता. यही बिंदु में आपके सामने लाना चाहता हूँ.में तो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्व ज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व से इनकार करता हूँ. ऐसा क्यों ? में इस निबंध में आगे इस पर बात करूँगा. यहाँ में बस यही बात जोर देकर
कहना चाहता हूँ कि मैं अहंकार, गर्व,
दंभ के कारण नास्तिक नहीं हूँ, और ना ही मैं
स्वयं ईश्वर, छद्म ईश्वर या कोई
अवतार हूँ. कम से कम एक बात तो सत्य है कि गर्व या अहंकार के कारण इस विचार का विकास नहीं हुआ है. इस सवाल के जवाब के लिए आइये सच को देखें. मेरे दोस्तों का कहना है कि दिल्ली बम केस और
लाहौर षडयन्त्र केस के बाद जो बेपनाह शोहरत मिली,
उससे मेरा दिमाग फिर गया.
आइये, बात
करते हैं कि ये आरोप क्यों गलत है.
मैंने इन
घटनाओं के बाद ईश्वर पर विश्वास करना नहीं छोड़ा. मुझे जब कोई नहीं जानता था,
मैं तब भी एक नास्तिक था. कम से कम एक
कालेज का एक विद्यार्थी तो अपने बारे में ऐसी कोई अतिरंजित धारणा नहीं पाल सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले
जाये। ये सच है मैं कुछ कॉलेज अध्यापकों का प्रिय था पर कुछ अन्य मुझे नापसंद करते
थे. मैं कभी भी मेहनती या पढ़ाकू लड़का नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का
कोई मौका ही न मिल सका गर्व करने का मौक़ा ही ना मिल सका. मैं अपने स्वभाव मैं बहुत
सतर्क और भविष्य के प्रति कुछ निराशावादी था. मैं अपने विचारों में पूरी तरह
नास्तिक ना था. मैं अपने पिता कि देखरेख और अभिरक्षा में बड़ा हुआ. वह पक्के आर्य
समाजी थे. एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं हो
सकता। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद मुझे डी.ए.वी. स्कूल, लाहौर भेजा गया. मैं पूरे एक साल छात्रावास में रहा। वहाँ प्रातः कालीन और
सायं कालीन प्रार्थना के अतिरिक्त में घंटों बैठा मन्त्र जपता रहता था. उस वक़्त
में पक्का आस्तिक था. बाद में मैं अपने पिता के साथ रहने लगा. वे अपने धार्मिक
विचारों में बहुत उदार थे. जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षाओं की वजह से देश की
स्वतन्त्रता के उद्देश्य के लिये मैंने अपना जीवन समर्पित किया. किन्तु वे नास्तिक नहीं थे. उनका ईश्वर सर्वव्यापी सत्ता थी. उन्होंने
मुझे रोजाना प्रार्थना करने कि सलाह दी. इस तरह मेरी परवरिश हुई. असहयोग आन्दोलन
के दिनों में मैंने नेशनल कालेज में दाखिला लिया। कोलिज के इन दिनों में ही सभी
तरह की धार्मिक वाद-विवाद पर सोचते हुए ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह पैदा होने लगा.
इस सच्चाई के बावजूद भी ईश्वर में मेरा यक़ीन अटूट और मज़बूत था. मैंने दाढ़ी और केश
बढ़ा लिए.( सिख धार्मिक परंपरा के अनुसार) इसके बावजूद भी मैं कभी भी सिख धर्म या
अन्य किसी धर्म के प्रति खुद में विश्वास ना जगा पाया. लेकिन ईश्वर में मेरी अडिग
और अटूट आस्था थी.
इसके बाद मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। जिस
नेता से सबसे पहले मेरा सम्पर्क हुआ, उन्हें तो खुद को नास्तिक घोषित करने का साहस ही
नहीं था. इस मामले में वे किसी निष्कर्ष पर पहुँचने में असमर्थ थे. मैं जब भी उनसे
ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल करता, वे मुझे यही जवाब देते,
“जब इच्छा हो, तुम विश्वास कर सकते हो.”
दूसरे नेता, जिनके सम्पर्क में आया, वे पक्के आस्तिक थे. मुझे उनका नाम का ज़िक्र करना चाहिए. ये थे आदरणीय
कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल. वे काकोरी षड्यंत्र
केस के सिलसिले में आजीवन कारवास की सजा काट रहे थे । उनकी एकमात्र पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ के पहले पृष्ठ से ही ईश्वर की
महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। इस किताब के दूसरे भाग के अंतिम पृष्ठों को देखिये,
आप पाएंगे एक रहस्यवादी कि तरह उन्होंने ईश्वर की महिमा में गीत
गाये हैं. यह उनके विचारों का स्पष्ट प्रतिबिम्ब है.
अभियोजन के अनुसार, पूरे भारत में जो रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) पर्चा
बाँटा गया था, वह शचीन्द्र नाथ सान्याल के बौद्धिक श्रम
का परिणाम था. अक्सर ये होता है कि क्रांतिकारी गतिविधियों में नेता अपने सर्वाधिक
प्रिय विचारों को व्यक्त करता है, मत भिन्नता के बावजूद अन्य
कार्यकर्ताओं को बिना विरोध के सहमत होना पड़ता है.
उस पर्चे का एक पूरा पैराग्राफ ईश्वर, और ईश्वर की लीला जिसे हम इंसान
नहीं समझ सकते की प्रशंसा से भरा हुआ है. यह निरा रहस्यवाद है. मैं जिस बात की तरफ इशारा करना चाहता हूँ, वह ये है कि
ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का विचार रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) में पैदा भी
नहीं हुआ था. काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में
गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ घोर आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद
राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न
सके। मैंने उन सब में सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो
कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहा करता था, ‘'धर्म मनुष्य
की दुर्बलता अथवा मानव ज्ञान के सीमित होने का परिणाम है. वह भी आजीवन निर्वासन की
सजा भोग रहा है। लेकिन उनहोंने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं
की।
इस समय
तक मैं केवल एक रोमान्टिक क्रान्तिकारी, अपने नेताओं का अनुयायी था। अब अपने कन्धों पर
ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। कुछ समय के लिए, घोर विरोध
ने पार्टी के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया. बहुत से नेता और कुछ उत्साही
कामरेड पार्टी का उपहास उड़ाने लगे. वे हमारी मजाक उड़ाते थे. मेरे मन में भी ये डर
पैदा हो गया किसी दिन में खुद ही इसे व्यर्थ और आशारहित काम ना मान लूँ. यह मेरे
क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की अदम्य इच्छा मेरे ह्रदय में भर गयी. मैंने स्वयं से कहा, विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनने के लिए ज्यादा से ज्यादा पढो,
अपने मत के समर्थन में तर्कों से लैस होने के लिए अध्ययन करो. मैंने
गंभीरता के साथ अध्ययन करना शुरू कर दिया। इससे मेरी पूर्ववर्ती आस्थाओं और
मान्यताओं में मूलगामी परिवर्तन हुए. हमारे
पूर्ववर्तियों के हिंसात्मक उपायों के रुमानीपन का स्थान गम्भीर विचारों ने ले
लिया. न रहस्यवाद ! न ही अन्धविश्वास ! यथार्थवाद अब हमारी विचार प्रक्रिया का
आधार बना। भयंकर आवश्यकता होने पर ही, अतिवादी तरीकों को
अपनाया जा सकता है, लेकिन जन आंदोलनों में हिंसा का परिणाम
उल्टा ही होता है. मैंने अपने तरीकों पर काफी बात कि है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण था
उस विचारधारा कि स्पष्ट समझ जिसके लिए हम लम्बा संघर्ष कर रहे थे. क्योंकि उस वक़्त
कोई चुनावी गतिविधी नहीं थी, मुझे विभिन्न लेखकों द्वार
प्रतिपादित भिन्न – भिन्न विचारों के अध्ययन का मौक़ा मिला.
मैंने अराजकतावादी बाकुनिन को पढ़ा, कुछ किताबें
साम्यवाद के जनक मार्क्स की भी पढी. मैंने लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लेखकों को पढ़ा, जो अपने देश में
सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बकुनिं कि किताब ईश्वर और राज्य
में व्यक्त विचार भले ही किसी निष्कर्ष पर ना पहुँचते हो, लेकिन
इस विषय पर एक रोचक पुस्तक है.
बाद में मुझे निरलम्ब
स्वामी की पुस्तक ‘सहज
ज्ञान,(कॉमन सेंस)’ मिली। इसमें
एक तरह की रहस्यवादी नास्तिकता थी। इस विषय में मेरी दिलचस्पी बढती जा रही थी. 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का पूरा यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परम आत्मा
द्वारा विश्व को बनाने, चलाने, और
नियंत्रित करने की बात का कोई मज़बूत आधार नहीं है. मैंने अपने अविश्वास के बारे
में अपने दोस्तों से बात की । मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की । मैंने खुद
को खुलेआम नास्तिक घोषित कर दिया. इसका क्या अर्थ था इस पर हम आगे चर्चा करेंगे.
मई 1927 में मैं लाहौर में
गिरफ़्तार हुआ। गिरफ्तारी अचानक हुई. मुझे ज़रा भी अनुमान नहीं था कि पुलिस मेरी
तलाश में है. मैं एक बाग़ में से गुज़र रहा था कि
अचानक पुलिस ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया. इस बात का मुझे खुद बहुत आश्चर्य हुआ
कि मैं बहुत शांत रहा. मेरा अपने ऊपर पूरा
नियंत्रण था. मुझे हिरासत में ले लिया गया. अगले दिन मुझे रेलवे पुलिस के लोकअप
में ले जाया गया. रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफसरों
से कई दिनों की बातचीत के बाद मैंने अनुमान लगाया कि उन्हें काकोरी दल के साथ मेरे
संबंधों के बारे में कुछ सूचना थी. मुझे ऐसा भी लगा कि क्रांतिकारी आन्दोलन में
मेरी गतिविधियों के बारे में भी उन्हें कुछ सूचना थी. उन्होंने मुझे बताया कि
काकोरी केस की सुनवाई के समय में लखनऊ में था, ताकि
अभियुक्तों को छुड़ाने की योजना बना सकूं. उन्होंने यह भी कहा कि योजना की स्वीकृती
के बाद हमने कुछ बम हासिल किये और उनमे से एक बम परीक्षण के तौर पर 1926 में दशहरा
के मौके पर भीड़ पर फेंका गया. उन्होंने मुझे इस शर्त पर रिहा करने का प्रस्ताव
दिया कि मैं क्रांतिकारी पार्टी की गतिविधियों पर
एक बयान दे दूँ. इसके एवज़ में मुझे आजाद किया जायेगा, इनाम
भी दिया जाएगा, और मुखबिर की तरह कोर्ट में पेश भी नहीं किया
जायेगा. उनके प्रस्तावों पर मैं अपनी हंसी ना रोक
पाया. ये सब वाहियात बाते थी. हम जैसे विचारों के लोग अपनी ही निर्दोष जनता पर बम
नहीं फेंका करते। एक दिन सी.आई.डी के तत्कालीन वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन मेरे
पास आये. काफी देर तक सहानुभूति जताने वाली बातें करने के बाद उन्होंने मुझे ये
खबर सुनाई, जो उनकी नज़र में बहुत दुखद थी, कि यदि मैंने वैसा बयान नहीं दिया जैसा वे चाहते हैं, तो मजबूर होकर उन्हें मुझ पर काकोरी काण्ड में शासन के विरुद्ध लड़ाई छेड़ने
के षड्यंत्र और दशहरा बम काण्ड के सिलसिले में हुई क्रूर हत्याओं के लिए मुकदमा
चलाना पडेगा. इसके बाद उनहोंने बताया कि उनके पास मुझे सजा दिलाने और फांसी पर चढाने
के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं. मैं पूरी तरह निर्दोष था, लेकिन
में यह मानता था कि पुलिस चाहे तो ऐसा करने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त ताक़त है.
उसी दिन
से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की प्रार्थना करने के लिये
फुसलाना शुरू किया। पर मैं ठहरा नास्तिक। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता
था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने की शेखी बघारता हूँ
या ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। अपने मन
में बहुत वाद विवाद के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि में आस्तिक होने का
दिखावा तक नहीं कर सकता, और ना ही
ईश्वर की प्रार्थना कर सकता हूँ. नहीं, मैंने प्रार्थना कभी
नहीं की. यही असली परीक्षा थी और मैं इसमें से सफल होकर निकला था. ये मेरे विचार
थे. एक पल के लिए भी मुझे अपना जीवन बचाने का विचार नहीं आया. इस तरह में पक्का
नास्तिक तब भी था, और पक्का नास्तिक आज भी हूँ. इस अग्नि
परीक्षा में खरा उतरना आसान काम न था। आस्तिकता मुश्किलों को आसान बना देती है,
यहाँ तक कि उन्हें खुशगवार भी बना सकती है. व्यक्ति को ईश्वर में एक
मज़बूत सहारा और, उसके नाम से राहत मिल जाती है। यदि आपका
ईश्वर में विश्वास नहीं है तो आपको अपने ऊपर भरोसा करने के अलावा कोई और विकल्प
नहीं है. आंधी और तूफ़ान में अपने पैरों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है.
परीक्षा की ऐसी घड़ी में अहंकार, अगर हो भी तो कपूर की तरह उड़
जाता है, और व्यक्ति प्रचलित विश्वासों को ठुकराने की हिम्मत
नहीं जुटा पाता. अगर व्यक्ति ऐसे प्रचलित विश्वासों के खिलाफ सचमुच बगावत करता है
तो मानना पड़ेगा कि ये सिर्फ अहंकार नहीं, बल्कि उसके अन्दर
कुछ अद्भुत ताक़त है. आज बिलकुल ऐसी ही स्थिति है.
सबसे पहले तो हम सब जानते हैं कि हमारे मुकदमे का क्या फैसला होगा. हफ्ते भर में
वह सुना भी दिया जायेगा. मैं अपना जीवन एक उद्देश्य पर न्योछावर करने जा रहा हूँ,
इससे बड़ी रहत और क्या हो सकती है ! ईश्वर में विश्वास करने वाला
हिन्दू राजा के रूप में पुनर्जन्म की उम्मीद कर सकता है, एक
मुस्लिम या इसाई अपनी मुसीबतों और कुर्बानियों के बदले इनाम के रूप में जन्नत की
विलासिता के सपने देख सकता है. मैं किस बात की उम्मीद करूँ ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर कसेगा और मेरे
पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, सब कुछ समाप्त हो
जायेगा. और अधिक स्पष्टता के साथ आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो वही क्षण
सम्पूर्ण अंत का होगा, मेरी आत्मा वहीं समाप्त हो जायेगी,
आगे कुछ न रहेगा। यदि में “ पुरस्कार” की दृष्टी से देखने का साहस कर पायुं तो ये छोटा सा संघर्षमय जीवन,
जिसका ऐसा कोई अंत शानदार अंत नहीं है, ही मेरा
पुरस्कार होगा. यही सब कुछ है. इस जीवन या परलोक में बिना किसी स्वार्थपूर्ण इरादे
के, या बिना किसी पुरस्कार की इच्छा के, बिलकुल अनासक्त भाव के मैनें अपना जीवन
आज़ादी के उद्देश्य के लिए समर्पित किया है. इसके अलावा में कुछ नही कर सकता था.
जिस दिन
बड़ी संख्या में स्त्री और पुरुष इस साहस के साथ आगे आयेंगे कि मानवता की सेवा और
उसे कष्टों और पीड़ा से मुक्त करने के अतिरिक्त उनके जीवन के आगे कोई और विकल्प
नहीं है, उसी दिन
आजादी के नए युग का सूत्रपात होगा. वे इस जन्म या अगले जन्म में पुरस्कार पाने या
राजा बनने के लिए नहीं बल्कि अपने उत्पीड्कों, अत्याचारियों,
शोषकों के खिलाफ दासता का जुआ उतार फेंकने के लिए, शांति और स्वतंत्रता की स्थापना के लिए वे इस कठिनाइयों से भरे लेकिन
गौरवपूर्ण रास्ते पर चलेंगे. क्या इस उद्देश्य के प्रति समर्पण से उन्हें जो गर्व
होगा, उसे अहंकार या दंभ कहा जा सकता है.? उन पर ऐसा लांछन लगाने की हिम्मत कौन करेगा ? अगर
कोई ऐसा करेगा, तो में कहूंगा कि वह या तो मूर्ख है या
धूर्त. ऐसे व्यक्ति को अकेला छोड़ दो क्योंकि वह ह्रदय से उठने वाले आवेग, महान भावनाओं, और अनुभूतियों की गहराई को नहीं समझ
सकता. उसका दिल मृत है, हृदयहीन मांस का बेजान लोथड़ा. उसका
निश्चय कमज़ोर है, उसकी भावनाएं दुर्बल हैं. निहित स्वार्थों
के कारण सत्य को देखने में अक्षम है. हमें अपने विचारों में दृढ़ विश्वास से जो
ताकत मिलती है, उस पर हमेशा ही अहंकार का विशेषण उछाल दिया
जाता है.
आप किसी
प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिये, किसी ऐसे नायक या व्यक्ति की आलोचना करके देखिये
जिसके बारे में लोग सोचते हों कि उसकी आलोचना की ही नहीं जा सकती. क्या होगा ?
कोई भी आपके दावों का तर्कपूर्ण जवाब नहीं देगा, इतना ही नहीं वे आपको दम्भी या अहंकारी कह कर मजाक उड़ायेंगे. इसका कारण
मानसिक जड़ता है. निर्मम आलोचना और स्वतंत्र चिंतन, क्रन्तिकारी
सोच के दो आवश्यक गुण हैं.
जैसे, मान लिया कि महात्मा जी महान हैं,
उनकी आलोचना नहीं हो सकती, वह बहुत ऊँचे उठ
चुके हैं, इसलिए वह राजनीती, धर्म,
अर्थ शास्त्र, या नीति शास्त्र के विषय में जो
कुछ भी कहेंगे सही ही होगा. आप उनसे सहमत हों या ना हों,
लेकिन आपको उनके कहे को सच मानना ही पड़ेगा. ये रचनात्मक सोच नहीं
है. इससे हम आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि कई क़दम पीछे चले जाते
हैं.
हमारे पूर्वजों ने किसी
परम सत्ता के प्रति विश्वास बना लिया था। इसलिए जो भी व्यक्ति उस परम सत्ता या उस
विश्वास या उस परम आत्मा की वैधता को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, काफ़िर
और गद्दार कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने प्रबल हैं कि उनका खण्डन नहीं हो सकता
और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का
भय दिखा कर भी दबाया नहीं जा सकता तो उसे अहंकारी या दम्भी कह कर उसका मजाक बनाया
जायेगा. तो फिर हम ऐसी बहस में अपना समय क्यों नष्ट करें. ये सवाल लोगों के सामने
पहली बार आया है, इसलिए इस लम्बी बहस की उपयोगिता है.
जहाँ तक पहले सवाल का
सम्बन्ध है,मैंने ये
स्पष्ट कर दिया कि मैं अहंकार के कारण नास्तिक
नहीं बना. सिर्फ मेरे पाठक ही ये फैसला कर सकते हैं कि मेरे तर्कों में कुछ वजन है
या नहीं. में जानता हूँ कि अगर में आस्तिक होता तो इन हालात में मेरी जिंदगी आसन
हो गयी होती, बोझ हल्का हो गया होता. ईश्वर में मेरे अविश्वास
ने मेरी परिस्थितियों को बहुत निष्ठुर बना दिया है, आगे ये
परिस्थितिया और भी बदतर हो सकती हैं. थोडा सा रहस्यवाद मेरी परिस्थितियों को
काव्यात्मक मोड़ दे सकता है. लेकिन में अपने अंत का सामना करने के लिए किसी नशे का
सहारा नहीं लेना चाहता. में एक यथार्थवादी व्यक्ति हूँ. मैं अपनी इस प्रवर्ती पर
विवेक से काबू पाना चाहता हूँ. मैं इन प्रयासों में हमेशा सफल नहीं रहा हूँ. लेकिन
इंसान का कर्तव्य है कि वह बार-बार प्रयास करे. सफलता तो संयोग और परिस्थितियों पर
निर्भर करती है.
अब हम दूसरे सवाल पर आते
हैं : यदि अहंकार अविश्वास का कारण नहीं है तो, ईश्वर में सदियों पुराने विश्वास को ठुकराने का कोई
ठोस तर्क होना चाहिए. हाँ, मैं इसी सवाल पर आता हूँ. मेरा
विचार है कि कोई भी इंसान, जिसमे थोड़ी सा भी विवेक है,
वह अपने चारों और के जीवन और लोगों को तर्कशीलता से ही समझना चाहता
है. जहाँ भी ठोस प्रमाण नहीं मिलते, रहस्यवादी दर्शन दबे
पाँव हावी हो जाता है. जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि मेरे एक क्रांतिकारी
मित्र अक्सर कहा करते थे "दर्शन मानवीय कमजोरी का परिणाम है.” हमारे पुरखों ने संसार के क्यों और कैसे, और इसके
अतीत, वर्तमान, और भविष्य के रहस्यों
को सुलझाने के लिए फुर्सत से विचार किया, तो प्रत्यक्ष
प्रमाणों के अभाव में उन्होंने अलग-अलग ढंग से इस समस्या को हल करने का प्रयास
किया. यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों के बुनियादी सिद्धांत पर भारी मतभेद
मिलते हैं. कभी-कभी ये मतभेद बहुत ही विरोधी और शत्रुतापूर्ण रूप ले लेते हैं.
पूर्व और पश्चिम के
दर्शनों में मतभेद है. प्रत्येक गोलार्द्ध में बहुत सी विचार प्रणालियों में आपस
में भी मतभेद हैं. एशिया के धर्मों में मुस्लिम धर्म और हिन्दू विश्वासों में ज़रा
भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है.
स्वयं ब्राह्मणवाद भी आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे परस्पर विरोधी मतों में बंटा है.
पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक भी है। उसने ईश्वर की सत्ता को चुनौती दी थी। कुछ आधार
भूत सवालों पर इन सभी में मत भिन्नता है, लेकिन इनमे से हर
एक स्वयं के धर्म को सच्चा धर्म होने का दावा करता है. यही है सारी बुराई की जड़.
प्राचीन चिंतकों के विचारों और प्रयोगों का विकास करके भावी संघर्षों के लिए
वैचारिक हथियार से स्वयं को लैस करने के स्थान पर हम थके हुए, कामचोर, आलसी और धर्मान्धों की तरह अपने अपने
रुढ़िवादी धर्मों से चिपके बैठे रहकर मानवीय जागृती को एक ठहरे पानी के तालाब में
बदल दिया है.
तरक्की के पक्ष में खड़े हर इंसान के लिए ज़रूरी है
कि वह पुरातन विश्वास के हर सिधांत की आलोचना करे. उसे एक एक करके पुराने विश्वास
के हर सूत्र को चुनौती देनी होगी. उसे एक एक बात को विस्तार के साथ समझ कर
विश्लेषण करना होगा. यदि कोई कठोर तर्कशीलता से सोच विचार कर किसी दार्शनिक मत में
विश्वास करता है , तो उसका
विश्वास प्रशंसनीय है. हो सकता है उसकी तर्कशक्ति भ्रान्ति पूर्ण या गलत हो. लेकिन
अभी भी मौक़ा है कि उसे सुधार जा सके, क्योंकि इस इंसान के
जीवन का निदेशक सिद्धांत विवेक या तर्क है. लेकिन विश्वास, में कहूँ तो अंध
विश्वास घातक है. ये इन्सान से उसकी समझने की शक्ति छीनकर उसे प्रतिक्रियावादी बना
देता है. जो इन्सान यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे तो पुरातन विश्वासों की
सच्चाई को चुनौती देनी ही होगी. यदि विश्वास तर्क के हमलों को सहन नहीं कर पाता है,
तो स्वयं ही ध्वस्त हो जाता है. इसके बाद उसका काम नए दर्शन के लिए
ज़मीन तैयार करना होना चाहिए. खैर, ये तो नकारात्मक पक्ष है.
इसके बाद सकारात्मक काम शुरू होता है, जिसमे पुरातन दर्शन की
कुछ सामग्री का नए दर्शन के स्तंभों के निर्माण में प्रयोग किया जा सकता है. जहाँ
तक मेरा सम्बन्ध मै मानता हूँ कि इस क्षेत्र में मुझे
पर्याप्त ज्ञान नहीं है. मेरी तीव्र इच्छा थी कि में पूरब के प्राचीन दर्शन का
अध्ययन नकारुं, लेकिन ऐसा करने के लिए ना पर्याप्त समय मिला और ना ही कोई अवसर. जहाँ तक मेरे पुरातन विश्वासों
को ठुकराने का सवाल है, ये एक विश्वास के साथ दूसरे विश्वास
के टकराने का मामला नहीं, बल्कि मैं तो पुरातन विश्वासों की
असर को ठोस तर्कों से चुनौती दे सकता हूँ. हम
प्रकृती में विश्वास रखते हैं, और ये मानते हैं कि इन्सान की
तरक्की इंसान के प्रकृति पर नियंत्रण पर निर्भर करती है. इसके पीछे कोई चेतन शक्ति
नहीं है. यही हमारा दर्शन है.
नास्तिक होने के नाते, में आस्तिकों से कुछ सवाल पूछता
हूँ.
1. यदि आप यकीन करते हैं कि सर्व शक्तिमान, सर्वव्यापी, और सर्वज्ञानी ईश्वर ने ये धरती, ये संसार बनाया है,
तो कृप्या पहले मुझे ये बताइए कि उसने ये दुनिया क्यों बनायीं. ऐसी
दुनिया जिसमे असंख्य दुःख, तकलीफें और मुसीबतें हैं, जहाँ एक भी इंसान सुकून व शांति के साथ नहीं रहता.
2. आपसे प्रार्थना
करता हूँ कि ये ना कहें कि ये उसका कानून है. यदि वह किसी कानून से बंधा है तो वो
सर्व शक्तिमान नहीं है. ये भी ना कहें कि ये उसकी खुशी है. नीरो ने सिर्फ एक रोम
जलाया था, उसने तो
थोड़े ही लोगों की जान ली थी. लेकिन इतिहास में उसका क्या स्थान है ? हम उसे किस नाम से याद करते हैं ? दुनिया भर में
उसकी अपमानजनक लानत मलामत की जाती है. नीरो को अत्याचारी, हृदयहीन
और दुष्ट बताते हुए उसकी कटु निंदा में ना जाने कितने पृष्ठ काले किये गए हैं. एक
चंगेज़ खान, जिसने अपनी खुशी के लिए हजारों लोगों को जान ली,
हम उससे नफ़रत करते हैं. अब आप बताएं, आप किस
तरह उसके (ईश्वर की) कृत्यों का समर्थन कर सकते हैं, जो
लोगों पर क्रूरता और त्रासदिया लाने में चंगेज़
खां से बहुत आगे है.
मैं पूछता हूँ, कि उस सर्व शक्तिमान ने ये दुनिया बनायीं ही क्यों,
जिंदा नरक के सिवा कुछ भी नहीं. एक ऐसी जगह जहाँ गहरी बेचैनी स्थायी
है ? क्या आपके पास इन सवालों के जवाब हैं ?
उसने (ईश्वर) इंसान को बनाया ही क्यों जबकि उसके
पास इंसान को ना बनाने की ताकत थी.? क्या आपके पास इन सवालों का कोई जवाब है? आप कहेंगे कि परलोक में पीड़ितों को पुरस्कार और कुकर्म करने वालों को दण्ड
मिलेगा. ठीक है, ठीक है तो फिर बताइए उस आदमी के कारनामों को
आप किस तरह सही ठहराएंगे जो पहले तो आपके शरीर को ज़ख्मों से छलनी कर दे, बाद में नर्म और राहत देने वाला मरहम लगाये.
तो फिर ग्लैडिएटर मुकाबलों के समर्थकों और आयोजकों
को किस तरह सही ठहराया जा सकता है, जिनमे अध-भूखे शेरो के सामने आदमी को फेंक दिया जाता
था, और अगर वह इस भयंकर मौत से जिंदा बच जाए तो तो उसकी खूब
देखभाल की जाती थी.
इसीलिये मैं पूछता हूँ, क्या (ईश्वर द्वारा) मनुष्य का
सृजन इस तरह के मज़े लेने के लिए किया गया है ?
अपनी आँखे खोलो और जेल की कालकोठरियों से भी गंदी
झुग्गी और झोंपड़ियों में भूख से मरते हुए करोड़ों लोगों को देखो, श्रमिकों का लहू पीते अमीर
पिशाचों को धैर्य से या चाहो तो उदासीनता से देखो. मानवीय उर्जा की इस बर्बादी के
बारे में सोचकर ज़रा सा भी कॉमन सेंस रखने वाला इंसान दहशत/ सदमे से कांपने लगेगा.
ज़रा देखो अमीर राष्ट्र, अपनी अतिरिक्त पैदावार को ज़रूरतमंद
और वंचितों में बांटने इंसानों के स्थान पर समुद्र में फेंक रहे हैं. राजाओं के
महल इंसान की अस्थियों से बनी बुनियाद पर खड़े है. उसे ये देखकर कहने दो,“ ईश्वर के राज में सब कुछ ठीक है.”
मेरा सवाल है, “ ये सब क्यों ?
आप खामोश हो, ठीक है. अब में अपने अगले बिंदु की तरफ बढ़ता हूँ.
हिन्दुओं, आप कहेंगे,” जो भी इस जन्म में
दुःख भोग रहा है, उसने अपने पिछले जन्म में ज़रूर पाप किये
होंगे.” दूसरे शब्दों में आप कहना चाहते हैं कि जो उत्पीड़क
हैं, वे अपने पूर्व जन्म में देवता तुल्य इंसान थे. मात्र
इसी कारण से आज उनके हाथ में सत्ता है. मैं सीधे शब्दों में कहता हूँ कि आपके
पूर्वज बहुत चालाक लोग थे. वे हमेश घटिया चाल चल कर लोगों से विवेक की क्षमता
छीनने की तलाश में रहते थे. आइये विश्लेषण करें कि इस तर्क में कितना दम है.
विधि शास्त्र के विशेषज्ञों की राय में दुष्कर्म
करने वाले को दिए जाने वाले दण्ड को तीन या चार कारणों से ही उचित ठहराया जाता
है. ये कारन हैं – बदला या प्रतिकार, सुधार
या दोषी को सुधारकर सही रास्ते पर लाना और निवारण या दण्ड का भी दिखाकर लोगों को
दुष्कर्म करने से रोकना. बदला लेने के सिद्धांत की सभी विचारकों ने भर्त्सना कर दी
है, निवारण का सिद्धांत भी अपनी कमियों के कारण खत्म होने की
कगार पर है. सुधार का सिद्धांत एकमात्र सर्व मान्य है, और
इंसानी तरक्की के लिए ज़रूरी समझी जाती है. इसका उद्देश्य अपराधी को सुधारकर उसे एक
शांतिप्रिय नागरिक में बदल देना है. अगर किसी इन्सान ने सचमुच कोई नुकसान पहुँचाया
है तो ईश्वर के दण्ड का सार क्या है ? तर्क करने की दृष्टी
से एक पल के लिए हम मान लेते हैं कि किसी इंसान ने पिछले जन्म में कुछ अपराध किया
है, और ईश्वर ने उसे दण्ड देकर गाय, बिल्ली
पेड़ या किसी और जानवर में बदल दिया है. आप ईश्वर के इन दण्ड की संख्या कम से कम 84
लाख बताते हैं. अब आप ही मुझे बताइए, दण्ड के नाम पर जारी इस
बेवकूफी का इंसान पर कोई सुधारात्मक प्रभाव पड़ा है. आप ऐसे कितने लोगों से मिले
हैं, जिन्होंने बताया हो कि पुराने जन्मों में पाप करने के
कारण वे पिछले जन्म में गधे बने थे.? निश्चय ही, ऐसा कोई नहीं मिला. पुराणों (पुनर्जन्म) का यह तथाकथित सिधांत एक परीकथा
के अतिरिक्त कुछ नहीं है. इस अकथनीय गन्दगी पर बहस का मेरा कोई इरादा नहीं है.
क्या आप सचमुच जानते भी हैं कि इस दुनिया में गरीब होना सबसे बड़ा पाप है. हाँ,
गरीबी एक पाप है, ये दण्ड है ! क्या वे,
सिद्धांतकार, विधिवेत्ता, कानून्वेत्ता जो ऐसे क़दम उठाने का प्रस्ताव करते हैं, जो इंसान को और ज्यादा घ्रणित पाप की कीचड़ में धकेल देते हैं. क्या
तुम्हारे सर्वज्ञानी ईश्वर को ये पता नहीं चला,या उसे इसका
तब पता चलता जब करोड़ों लोग अकथनीय दुःख और कष्ट झेलते.
आपके सिद्धांत के अनुसार उस इंसान का क्या भाग्य
होगा जो बिना किसी अपने पाप के छोटी जाति के परिवार में पैदा हो गया. वह गरीब है, इसलिए स्कूल नहीं जा सकता. ये
उसका भाग्य है कि ऊँची जाति में जन्म लेने वाले उससे अलगाव रखे और नफरत करें. उसकी
अज्ञानता, उसकी गरीबी, और दूसरों
उपेक्षापूर्ण वयवहार उसके ह्रदय को समाज के प्रति कठोर बना देगा. मान लो वह कोई
पाप करता है, तो उसके परिणामों को कौन भुगतेगा, ईश्वर, वह स्वयं, या समाज के
विद्वान् लोग ? स्वार्थी और घमंडी ब्राह्मणों
द्वारा जान बूझकर लोगों को अज्ञानी रखने के दण्ड के बारे में आपका क्या कहना है ?
अगर इन बेचारों के कानों में आपकी पवित्र पुस्तक वेदों के कुछ शब्द
भी अचानक पड़ जाते, तो ब्राह्मण दण्ड के रूप में उनके कानों
को गरम सीसे की धार से भरते थे. अगर ये लोग कोई पाप करते तो उसके लिए कौन
ज़िम्मेदार था ? किसको इसका नतीजा भुगतना पड़ता ?
मेरे प्रिय मित्रों, ये सिद्धांत विशेष अधिकार प्राप्त वर्गों ने गढे
हैं. उन्होंने सत्ता हथियाई , और जो धन-संपदा लुटी, उसे सही साबित करने के लिए in सिद्धांत की रचना की.
शायद लेखक अप्टन सिंक्लैयेर ने किसी जगह लिखा है, “ किसी
व्यक्ति को आत्मा की अमरता में यकीन दिला दो, फिर चाहे उसकी
सारी संपत्ति ले लो. वह खुद अपने लुटने की प्रक्रिया में तुम्हारी खुद मदद करेगा.”
धार्मिक उपदेशकों और सत्ताधारियों के इस गंदे गठजोड़ से जेल, फांसी, और कोड़े और सर्वोपरि ऐसे सिद्धांत की सौगात
मानवजाति को मिली है.
में पूछता हूँ, आपका सर्व शक्तिमान ईश्वर उस वक़्त इन्सान को क्यों
नहीं रोकता, जब वह कोई अपराध या पाप करने वाला होता है ?
ईश्वर के लिए तो यह बच्चों का खेल है. वह जंगबाज़ो को क्यों नहीं मार
देता ? वह उनके दिमाग से युधोंमाद को क्यों नहीं खत्म कर
देता ? इस तरह से तो ईश्वर ने मानवजाति को बहुत सी विपत्ति
और भयंकरता से बचा लेता. ईश्वर ब्रिटिशों/अंग्रेजों के मन में ऐसी मानवतावादी
भावनाएं क्यों नहीं पैदा कर देता कि वे स्वेच्छा से भारत छोड़ कर चले जाएँ. में
पूछता हूँ, ईश्वर पूंजीपति वर्ग के दिलों में परोपकार और
मानवता की भावना क्यों नहीं भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना निजी अधिकार
त्याग दें, और इस तरह श्रमजीवी मानव जाति को धन-तंत्र के
बंधन से मुक्त कर दे. आप समाजवाद के सिद्धांत की व्यवहारिकता पर बात करना चाहते
हैं, में इसे व्यवहारिकता में लागू करने की ज़िम्मेदारी आपके
सर्व शक्तिमान ईश्वर पर ही डालता हूँ. आम जनता के कल्याण के लिए समाजवाद के
सिद्धांत की विशेषता को आम लोग भी समझते हैं, लेकिन वे इसका
विरोध एक ही बहाने से करते हैं कि ये व्यवहारिक नहीं
है. इस मामले में सर्वशक्तिमान को आने दीजिये, और उन्हें
सारी चीज़ें व्यवस्थित करने दीजिये.
गोलमोल तर्क अब और नहीं, मैं बताता हूँ अंग्रेजों का शासन
हमारे ऊपर इसलिए नहीं है कि यह ईश्वर की इच्छा है, बल्कि
इसका कारण है कि हमारे अन्दर इनका विरोध करने का साहस और इच्छा शक्ति नहीं है.
वे ईश्वर की इच्छा से नहीं बल्कि, तोपों, बन्दूकों,
बमों, गोलियों, पुलिस,
फौज और सर्वोपरि हमारी उदासीनता के कारण एक देश का दूसरे देश द्वारा
शोषण के सर्वाधिक घृणित पाप को सफलतापूर्वक करते चले जा रहे हैं.
कहाँ है ईश्वर ?
ईश्वर कर क्या रहा है ?
क्या ईश्वर इन दुखों और तकलीफों का मज़ा ले रहा है ?
नीरो !
चंगेज़ खान !
उसका नाश हो !
अब निर्मित तर्क का एक और नमूना देखिये ! आप मुझसे
पूछोगे कि मैं मनुष्य और संसार की उत्पत्ति की व्याख्या किस प्रकार करूँगा.
चार्ल्स डार्विन ने इस विषय पर कुछ रोशनी डालने की कोशिश की है. उसकी किताब का
अध्ययन करें. निर्लम्ब स्वामी कि पुस्तक “ सहज ज्ञान (कॉमन सेंस)” पढ़िए.
आपको एक संतोषजनक जवाब मिलेगा. यह विषय जीव विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास से
सम्बंधित है. यह एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के आकस्मिक संयोग से पैदा हुई
नीहारिका/ नेब्युली से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई. कब? इसे
जानने के लिए इतिहास पढ़िए. इसी प्रक्रिया से अन्य जीव-जन्तु उत्पन्न हुए, और उनमे से ही लम्बे अरसे के बाद मनुष्य का विकास हुआ. डार्विन की किताब “
ओरिजिन ऑफ स्पीशीज” पढ़िए. इसके बाद का तमाम
विकास प्रकृति और मानव के बीच संघर्ष, तथा प्रकृति को अपने
हितों में इस्तेमाल करने के लिए मनुष्य के प्रयासों और प्रकृति के बीच अनवरत
संघर्ष के कारण हुई है.
आपका अगला सवाल ये होगा कि अगर किसी बच्चे ने
पिछले जन्म में कोई पाप नहीं किया है तो बच्चा जन्म से अँधा या लंगड़ा क्यों पैदा
होता है. इस समस्या को जीव विज्ञानियों ने इस घटना की बहुत ही संतोषजनक तरीके से
व्याख्या करके इसे मात्र एक जैव वैज्ञानिक घटना बताया है. उनके अनुसार गर्भावस्था
में होने वाली विकृती का पूरा उत्तरदायित्व गर्भ में शिशु की माता पिता द्वारा
देखभाल के कार्यों में सचेत ना रहने से होता है.
आप एक और सवाल मेरे ऊपर उछाल सकते हैं, हालांकि ये बहुत बचकाना सवाल है.
सवाल ये है- यदि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो इतने सारे
लोग उसमे यकीन क्यों करते हैं? मेरा उत्तर स्पष्ट और
संक्षिप्त है. लोग जिस तारह भूतों और बुरी आत्माओं में विश्वास करने लगे उसी तरह
ईश्वर में यकीन करने लगे, फर्क सिर्फ इतना है ईश्वर में
विश्वास लगभग सारी दुनिया है, और धर्म शास्त्र का दर्शन बहुत
विकसित है. यधपि, में आमूल परिवर्तनकामी दर्शन असहमत हूँ.
इनके अनुसार ईश्वर की उत्पत्ति शोसकों की चतुरता से हुई. शोषक एक परम सत्ता के
अस्तित्व का उपदेश देकर, फिर इस परम सत्ता या ईश्वर से अपनी
विशेषाधिकार प्राप्त स्थिती अधिकारो की स्वीकृती का दावा करके लोगों को अपने आधीन
रखना चाहते थे. मैं इसके ज़रूरी बिंदु से बिलकुल
सहमत हूँ कि, सभी विश्वास, धर्म,
मत, धार्मिक दर्शन, और
धार्मिक पन्थ और इसी तरह के अन्य संसथान आखिर में शोषणकारी और दमनकारी संस्थनों,
लोगों और वर्गों के समर्थक बन जाते हैं. किसी भी राजा के विरुद्ध
बगावत करना हमेशा ही धर्म में पाप रहा है.
ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा विचार है कि
जब इन्सान ने अपनी कमजोरियों, सीमाओं, और कमियों का एहसास किया तब उसने अपनी
कल्पना में ईश्वर का सृजन किया. इस प्रकार से उसके अपने जीवन में जो भी कठिन
परिस्थितियों और खतरे आ सकते थे, उनका सामना करने तथा अपनी
सुख समृधी के दिनों में अपने आवेग को नियंत्रित करने का साहस प्राप्त किया. ईश्वर
के मनमौजी कानूनों, और अभिभावकीय उदारता की तस्वीर को
विभिन्न रंगों से चित्रित किया गया. ईश्वर के मनमाने कानूनों और उसके क्रोध की बढ़
चढ़ कर चर्चा करके ईश्वर को एक निवारक तत्व के रूप में प्रचारित किया गया ताकि
इंसान समाज के लिए खतरा ना बन जाए.
ईश्वर व्यथित आत्मा की पुकार था, ये विश्वास किया जाता था कि जब
मुसीबत के वक़्त इंसान अकेला और असहाय खड़ा हो तो ईश्वर एक पिता, एक माता, एक बहन, एक भाई,
एक मित्र के रूप में साथ खड़ा रहेगा. वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी
कर सकता था. ईश्वर का विचार मुसीबत में पड़े व्यक्ति के लिए बहुत मददगार था.
समाज को ईश्वर में इस विश्वास के खिलाफ भी उसी तरह
संघर्ष करना होगा जिस तरह मूर्ति पूजा और अन्य धार्मिक संकीर्णताओं के खिलाफ
संघर्ष किया है. इस तरह इंसान अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करेगा. यथार्थवादी
बनकर , उसे अपने
विश्वास को एक तरफ फेंकना ही होगा, और सभी विपरीत हालात का
सामना हिम्मत ओर दिलेरी से करना होगा.
वस्तुतः यही मेरी स्थिति है.
मेरे दोस्तों, ये मेरा अहंकार नहीं,ये मेरी
विचार प्रक्रिया है जिसने मुझे नास्तिक बनाया. मैं नहीं सोचता कि ईश्वर में मेरा
विश्वास बढ़ाने से और उसकी प्रतिदिन प्रार्थना करने ( जिसे में किसी भी इंसान का
सबसे घटिया काम समझाता हूँ) से मैं अपनी स्थिती
में कुछ सुधार ला सकता या मेरी स्थिती और ख़राब हो गयी होती.
मैंने बहुत से नास्तिको को सभी मुसीबतों का
बहादुरी से सामना करने के बारे में पढ़ा है. मैं भी उन्ही की तरह कोशिश कर रह हूँ
कि में भी एक इन्सान की तरह आखिर तक, यहां तक कि फांसी के फंदे तक पर सर ऊँचा करके खड़ा
रहूँ. देखते हैं मैं कितना दृढ़ रह पाता हूँ,. मेरे एक मित्र ने प्रार्थना करने के लिए कहा था. मेरी नास्तिकता के बारे
में जानकार , उसने कहा ,"अपने अंतिम दिनों के आने तक, तुम ईश्वर को मानने लगोगे.”
मैंने कहा , “ नहीं, जनाब, ये कभी नहीं होगा. मैं इसे विश्वासघात और नैतिक पतन के कृत्य की तरह
समझूंगा. ऐसे घटिया स्वार्थपूर्ण उद्देश्य के लिए प्रार्थना कभी नहीं करूँगा.”
पाठकों और दोस्तों , क्या यह अंहकार है ?
यदि है, तो में इसके साथ खड़ा हूँ.
( Following information is From Marxist.org )
Written: October 5–6, 1930
Source/Translated: Converted from the original Gurmukhi (Punjabi) to Urdu/Persian script
by Maqsood Saqib;
translated from Urdu to English
by Hasan for marxists.org, 2006;
HTML/Proofread: Andy Blunden and Mike Bessler;
CopyLeft: Creative Common (Attribute & ShareAlike) marxists.org 2006.
पर उपलब्ध अंग्रेज़ी लेख के लेख का हिन्दी अनुवाद
डॉ वीना गुप्ता द्वारा दी लखनऊ पोस्ट के लिए किया गया.

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