आभासी चमक को असल रोशनी पर हावी करने
कि कोशिश
अब झुमका गिरा रे
नहीं, झुमका मिला रे, बरेली में झुमका
चौराहा का उदघाटन

अब झुमका गिरा रे नहीं, झुमका मिला रे......बरेली के जिस झुमके की सालों से तलाश थी आखिरकार वो मिल ही गया। जी हां, आपने ठीक सुना ... 1966 में आई फिल्म 'मेरा साया'
का राजा मेहंदी अली खान का लिखा और मदन मोहन के संगीत निर्देशन में तैयार गाना "झुमका गिरा रे" तो आपको याद ही होगा, इस सुपरहिट गाने से बरेली जिले का नाम लोगों की जुबां पर छा गया था। बरेली की सीमा पर ही उसकी एक विशिष्ट पहचान स्थापित हो गई। ये झुमका 32 फुट उंचा और 270 किलो वजन का है. 9 फरवरी,2020 को बरेली में मुरादाबाद और दिल्ली मार्ग पर परसाखेड़ा के जीरो प्वाइंट, पर इस झुमके चौराहा का केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने कमिश्नर और कई विधायकों की मौजूदगी में उद्घाटन किया। इसमें कुल 18 लाख का खर्च आया है जिसमे 8 लाख का झुमका और 10 लाख झुमका चौराहा की साज़ सज्जा में खर्च हुआ. इस पर आने वाला खर्च को स्थानीय संगठनों, बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, रूहेलखंड मेडिकल कॉलेज,और स्थानीय संगठनों ने बरेली विकास प्राधिकरण के नेतृत्व में किया. झुमके को बनाने में पीतल नगरी कहे जाने वाले मुरादाबाद के प्रसिद्ध कारीगरों ने चार महीने तक रोजाना 16-18 घंटे काम किया । झुमके में महीन नक्काशी का काम भी नजर आएगा। जीरो प्वॉइंट तिराहा पर लगाया गया ये झुमका मुरादाबाद और दिल्ली मार्ग पर आपका स्वागत करेगा. यहाँ लाइटिंग, फुलवारी और सेल्फी प्वॉइंट भी बनाया गया है । बरेली की सीमा पर स्थापित हुआ झुमका करीब दो सौ मीटर दूर से लोगों को नजर आएगा। बरेली विकास प्राधिकरण ने 2016 में झुमके से शहर को पहचान दिलाने के
लिए प्रोजेक्ट बनाया। झुमके के 28 डिजाइन
प्राधिकरण को मिले। मुंबई के डिजायनर रजनीश अग्रवाल का झुमका चुना गया।
बरेली में झुमका चौराहा स्थापित करके
बरेली की नई पहचान को उससे वाबस्ता करने की कोशिश की जा रही है बरेली जो मशहूर है बरेली के
मांझे के लिए जिसे पतंग उड़ाने वाले आज भी चीन के मांझे से बेहतर मानते हैं. बरेली
पतंगों के लिए मशहूर हैं, सुरमे के लिए मशहूर है, जंग ए आज़ादी में हिस्सेदारी के
लिए, साहित्य और शायरी के लिए, बेंत का फर्नीचर और जरी ज़रदोज़ी के लिए. लेकिन इन सब
से इतर, फ़िल्मी गीत के इस झुमके का जिक्र
देश के प्रधानमंत्री ने बरेली में चुनाव के दौरान किया, और उनकी पार्टी के सांसद और
श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने इसका उदघाटन करते हुए इसे बरेली की पहचान बताया.
बरेली के सुरमें के बारे में जरूर आपने सुना होगा जरी और जरदोजी के काम ने फैशन
इंडस्ट्री में बरेली की एक बहुत बड़ी पहचान है और बांस बरेली भी आपने जरूर सुना
होगा यहां बांस का बनाया हुआ फर्नीचर व् सजावट के सामान का लघु उद्योग के रूप में
घर घर में काम होता है ।
बरेली की सबसे पुरानी पहचान सुरमें के
साथ जुड़ी है जिन दिनों सरमाया काजल को आंखों की रोशनी के लिए फायदेमंद माना जाता
था और सुरमे को काजल से बेहतर बनाया जाता माना जाता था तब बरेली का सुरमा दूर-दूर
तक जाता था इसको लगाने के लिए कलात्मक रूप से बहुत खूबसूरत धातु की सुरमेदानी बनाई
जाती थी जिनमें को रखा जाता था पुराने फिल्मी गीतों में सुरमेदानी और सुरमे का
ज़िक्र भी आपको मिलेगा. आंखों की चमक
बढ़ाने वाला सुरमा यहां पर 200 साल से बनता आ रहा है।
सुरमा बनाने के लिए सऊदी अरब से कोहिकूर नाम का पत्थर लाया जाता है। जिसे
छह महीने गुलाब जल में फिर छह महीने सौंफ के पानी में डुबो के रखा जाता है. सुखने
पर घिसाई की जाती है. फिर इसमें सोना, चांदी और बादाम का अर्क मिलाया जाता है.इस जानतोड़ महनत
करने वाला काम भी gst और नोटब्न्दी कि भेंट चढ़ गया है.
मांझा
और पतंग कुटीर उद्योग के रूप में बरेली में पर लेकिन उचित सहयोग और समर्थन न मिलने के कारण उद्योग ख़तम होने की तरफ जा रहे हैं. लोकसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि बरेली के मांझे के बिना गुजरात कि पतंग नहीं उड़ सकती, अब उसी मांझे पर संकट के बादल छा गए हैं। मांझा उद्योग 200 साल पुराना है और त्योहारों पर लोग पतंग उड़ा कर खुशिया मनाते चले आ रहे है। नायलॉन के मांझे के बाद नोटबंदी और अब कोर्ट के आदेश से मांझा से जुड़े लोग प्रभावित होंगे। मांझे के बाद पतंग उद्योग भी प्रभावित होगा क्योंकि सादे डोर से पतंग तो उड़ जाएगी लेकिन पेंच नहीं लड़ पाएंगे जिससे प्रतियोगिताएं नहीं हो पाएंगी। पतंग चाहे जहां भी उड़े उसमें मांझा बरेली का ही होगा ये कहावत बरेली में खूब बोली जाती है। इसका कारण ये है कि बरेली का मांझा देश भर में तो सप्लाई होता ही है। साथ ही विदेशों में भी मांझे की सप्लाई की जाती है। कई देशों में बरेली के मांझे की सप्लाई होती हैं। बाज़ार से ख़रीदे गए कांच को पहले तोड़ा
और कूटा जाता है. बाद में चक्की पर उसका पाउडर तैयार होता है. कांच को बहुत बारीक
पीसे जाने के बाद चावल के मांड और अलग अलग रंगों में मिलाकर आटे की तरह गूंदा जाता
है. उसके बाद मांझा बनाने वाले अपनी उंगलियों की हिफ़ाज़त के वास्ते उन पर सद्दी
लपेट लेते हैं. सद्दी की ही खिंची डोरियों पर इस गुंदे हुए कांच के आटे को ख़ास
तरीके से घिसा जाता है और उसके सूखने का इंतज़ार किया जाता है.मांझे के तैयार हो
जाने के बाद उसे बांस की बनी घिर्रियों में लपेटा जाता है. यह काम भी काफ़ी मशक्कत
वाला होता है और इसमें हथेलियां छिल जाया करती हैं. हाथों में ज़ख्म हो जाते हैं,
खून रिसने लगता है. दिन भर बिना आराम किये 12-13 घंटे काम करने के बाद 120 से 150
रुपये मिलता है, वह भी सीजन के दिनों में. पतंग के शौकीनों के लिए बरेली का मांझा एक बेहद जरूरी चीज थी दूर-दूर से पतंग उड़ाने वाले बरेली से माझा और विभिन्न डिजाइनों में बनी हुई यहां की पतंगे लेने के लिए आते थे.
बेंत का फर्नीचर जिसकी वजह से बरेली को बांस बरेली भी कहा जाता है इसकी एक अलग
पहचान बयां करते हैं. बेंत का फर्नीचर टोकरिया अटैची सजावटी सामान रैक आदि आज भी
हर परिवार का हिस्सा है बल्कि दूर-दूर तक मशहूर है.
बरेली की जरी और जरदोजी के काम में
बरेली को सारी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि और विदेशी मुद्रा दोनों
दिलवाई जरी और जरदोजी के बरेली के कारीगर दिल्ली और मुंबई के बड़े-बड़े फैशन हाउस
में जाकर कढ़ाई का काम करते हैं बड़े-बड़े एक्सपोर्ट हाउस किसी विशेष असाइनमेंट पर
इन्हें सपरिवार बुलाकर काम करवाते हैं. वहां मुंबई और दिल्ली रह कर कई कई महीने
बिताते हैं. देवदास फिल्म लहंगा या फिर फिल्मी हीरो हीरोइन हीरोइन की शादी में पहना
जाने वाला लहंगा उसकी कढ़ाई के लिए बरेली के ही कारीगरों को बुलाया जाता है यह
कारीगर जब सपरिवार काम के लिए इन शहरों में आते हैं तो ना तो उनकी पूरा मेहनत का
मुआवजा मिलता है ना किसी तरह की सुविधा उनके बच्चे और बीवियां उनके सहयोगी के रूप
में काम करती हैं लेकिन उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती ज्यादातर लोग ठेके पर ही काम
करवाते हैं और जो लोग इनके घरों में आकर काम पे जाते हैं बड़े-बड़े फैशन हाउस के
एजेंट छोटी छोटी गलती के नाम पैसा काट लेते हैं. ज़री ज़रदोज़ी साढे आठ
लाख जरी कारीगर जिसमे ढाई लाख महिलाएं हैं. बहुत सारे इन कारीगरों ने बताया कि 1 घंटे में 40 की आय होती है उनके माता-पिता या
बच्चे सहयोगी के रूप में काम करते हैं जैसे सुई में धागा डाल कर तैयार रखना धागों
को सुलझाना मोती की लड़ी बनाना आदि बारे बारे घंटे लगातार काम करते हैं खाना खाकर
भी आराम नहीं करते कर पाते जिस कारण झुके झुके कपड़े पर झुके झुके आंखें और कमर और
हाथों में कई तरह की बीमारियां हो जाती है ना बुढ़ापे का कोई ठिकाना ना स्वास्थ्य
और चिकित्सा की कोई सुविधा इनके बनाए और जरदोजी के वस्त्र सारी दुनिया में फैले
हुए एशियाई मुल्कों के लोग शादी के लिए या विशेष अवसरों के लिए मंगवाते हैं पूरी
दुनिया में इनका एक्सपोर्ट फैला हुआ है लेकिन यह कारीगर बीमारी भूखमरी और
ठेकेदारों के धोखे का शिकार है नाइन के बच्चों के लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था है
अस्पतालों की कोई उचित व्यवस्था इन हालात में बहुत अच्छे अच्छे कारीगर इस हुनर को
छोड़कर रिक्शा चलाना जैसे मामूली काम कर रहे हैं. बरेली छोटे और मंझोले उद्योगों
का ही नहीं
बरेली 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केंद्र था। मेरठ से शुरू हुए विद्रोह की खबर 14 मई 1857 को बरेली पहुंची. शाम
चार बजे तक बरेली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो चुका था। अंग्रेजी निशान उतार
फेंककर बरेली में स्वतंत्रता का हरित ध्वज फहराते ही नेटिव तोपखाने के मुख्य
सूबेदार बख्त खान ने सारी नेटिव सेना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।
फिर
उन्होंने अंतिम रुहेला शासक हाफ़िज़
रहमत खान के पोते, खान
बहादुर खान के नाम का जयघोष करके दिल्ली के
बादशाह के सूबेदार की हैसियत से रुहेलखंड का शासन भी अपने हाथ में लिया। 11 माह तक
बरेली आजाद रहा। इस अवधि के दौरान खान बहादुर खां ने शोभाराम को अपना दीवान बनाया, 13 मई 1858 को भीषण युद्ध के बाद ब्रिटिश
शासन बहाल हुआ। कुछ विद्रोहियों को पकड़ लिया गया और उन्हें मौत की सजा दी गई खान
बहादुर खान को कोतवाली में फांसी दे दी गई। उन्हें
पुरानी जिला जेल के सामने दफन किया गया जहां आज भी उनकी मजार है। खान बहादुर खान
के अतिरिक्त 257 अन्य क्रांतिकारियों को भी कमिश्नरी के समीप एक बरगद के पेड़ के
नीचे फांसी दे दी गयी।
ये
समृद्ध इतिहास है बरेली कि मह्नात्काश जनता का, यहाँ के कारीगरों का, मजदूरों और
किसानों का. नयी आभासी पहचानों को स्थापित करने के पीछे इस असली इतिहास को गुमनामी
में डालना है. खाए अघाए, और कॉर्पोरेट और पूंजीवादी मीडिया और संस्कृति में भटकते
अधिकारी, कर्मचारी, युवा इसी को असली इतिहास समझने का भ्रम लिए सेल्फी लेने में
व्यस्त हैं,और वर्तमान हिंदुत्व कि राजनीती के लिए तो यह बहुत ही उपयुक्त है.
इसीलिये श्रम मंत्री ने राहत कि सांस लेकर कहा कि सब पूछते थे कि झुमका कहाँ है,
अब इतने सालों बाद जवाब मिला है, मीडिया भी इस खबर को इस तरह प्रचारित कर रहा है जैसे
कुम्भ के मेले में बिछड़ा भाई मिल गया हो.
बरेली कि पहचान है बरेली के कारीगरों
की बरेली के मेहनतकश की. यह गौर करने लायक बात है की ऐतिहासिक रूप से जिन चीजों के
लिए बरेली मशहूर है उसके स्थान पर एक कृत्रिम या आभासी पहचान को बरेली के साथ
जोड़कर और स्मारक बना कर युवाओं को आकर्षित करने का जो प्रयत्न किया गया है वह
सिर्फ बरेली की अस्मिता को हल्के में ले बल्कि उसके हालात और उसकी
उपेक्षा करना भी है।
बरेली
में मजदूर वर्ग आन्दोलन का संघर्ष शील इतिहास रहा है, यहाँ सीटू का राज्य सम्मलेन
भी हो चूका है. अब महनतकाश वर्ग को ही बरेली के इतिहास और संघर्षों कि विरासत को
आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी है.
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