ख़्वाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी
विश्वविद्यालय ने अपने 21 नवंबर के चौथे दीक्षांत समारोह में कुलाधिपति श्रीमती आनंदी बेन पटेल ने विश्वविद्यालय के नाम
से "उर्दू अरबी फारसी" हटाने की बात कही थी. इस मौके पर आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक व मुस्लिम
राष्ट्रीय मंच के संरक्षक इंद्रेश कुमार के साथ नदवा कॉलेज के प्राचार्य डॉ.
सईदुर्रहमान आज़़मी को डी-लिट की मानद उपाधि दी है। इसके अलावा शिया धर्मगुरु
मौलाना कल्बे जव्वाद नक़वी और स्वामी सारंग को पीएचडी की मानद उपाधि भी दी
है।
इंद्रेश कुमार को लेकर आपत्तियां : ऐसा नहीं है कि इंद्रेश कुमार आरएसएस के नेता हैं केवल इसलिए उनका
विरोध हो रहा है। दरअसल उनके ऊपर गंभीर आरोप रहा है।आपको बता दें कि राजस्थान में
अजमेर स्थित ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की मज़ार पर 11 अक्टूबर, 2007 को बम ब्लास्ट हुआ
था। जिसमें 3 लोगों की मौत हो गई थी और क़रीब 15 लोग घायल हुए थे। विस्फोट के बाद
राजस्थान पुलिस को तलाशी के दौरान लावारिस एक बैग मिला था, जिसमें टाइमर लगा
जिंदा बम मिला था। इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दी गई
थी। जिसने 13 लोगों को धमाके का दोषी पाया था।यूपीए-1 सरकार के दौरान जाँच
में इंद्रेश कुमार का नाम भी इस मामले में सामने आने से राजनीति गर्मा गई थी।
लेकिन एनआईए ने तीन अप्रैल, 2017 को अपनी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए इंद्रेश कुमार समेत 4 लोगों को क्लीन चिट
दे दी। जाँच एजेंसी ने कहा कि इन लोगों के खिलाफ केस चलाने के लिए पर्याप्त सबूत
नहीं मिल सके हैं। इस समय इंद्रेश कुमार आरआरएस प्रचारक के साथ संघ से संबद्ध
संस्था मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संरक्षक भी हैं। कलवे जव्वाद ने भी संसदीय
चुनावों में राजनाथ सिंह और बीजेपी का खुला समर्थन किया था. इंद्रेश कुमार को
उपाधि दिए जाने पर नागरिक समाज और शिक्षा जगत से गंभीर आपत्तियां आई हैं . शिक्षा
जगत से लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले मानते हैं की सत्ता पक्ष को ख़ुश करने के लिए
विश्वविद्यालय प्रशासन से संघ से जुड़े एक व्यक्ति को उपाधि दी है।
विश्वविद्यालय के नाम में से उर्दू
अरबी-फारसी हटाए जाने की राज्यपाल के बयान पर शिक्षाविदों और समाजी कार्यकर्ताओं का
कहना है कि वह भी उसी पृष्ठभूमि से आती हैं जहाँ कहा जाता है कि उर्दू के शब्दों
को और प्रेमचंद को पाठक्रम से हटा दिया जाये। इसी लिए उनको विश्वविद्यालय के नाम
के साथ उर्दू अरबी-फारसी उचित नहीं लग रहा है। उर्दू उत्तर को उत्तर प्रदेश में
दूसरी भाषा का दर्ज़ा प्राप्त है, लेकिन संघ, बीजेपी और इसके आनुषांगिक संगठन अखिल
भारतीय विद्यार्थी परिषद् मुस्लिम विरोध में उर्दू को भी निशाना बना रहे हैं. 2018
में अखिल
भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के नेताओं उर्दू भाषा की किताबों का ही विरोध
कर दिया। दरअसल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) के अधीन
चलने वाली राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद (एनसीपीयूएल) की ओर से इन दिनों उन
शिक्षण संस्थानों में कम दामों पर किताबें मुहैया कराई जा रही हैं जहां उर्दू
विभाग हैं। बरेली कॉलेज में भी उर्दू से बीए और एमए के कोर्स चलते हैं। कुछ दिन
पूर्व एनसीपीयूएल की तरफ से कॉलेज से अनुमति मांगी गई थी। शनिवार को परिषद की बस
दिल्ली से उर्दू की किताबें लेकर कॉलेज पहुंची। इसमें कोर्स से जुड़ी और उर्दू
साहित्य की किताबें थी। उर्दू के छात्र किताबें खरीद रहे थे, तभी एबीवीपी के कुछ नेता वहां पहुंच गए और किताबें देखने लगे।
उर्दू की किताबें देख एबीवीपी ने विरोध करना शुरू कर दिया। थोड़ी देर में एबीवीपी के कई नेता वहां पहुंच गए। बस के साथ आए लोगों को हड़काने लगे। उर्दू विभाग की शिक्षिका डॉ. शाव्या त्रिपाठी ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन एबीवीपी नेताओं ने उनके साथ भी अभद्रता की। इस तरह कि घटनाएं आम होती जा रही हैं. तरक्की ए उर्दू हिन्द, up कि वाईस प्रेसिडेंट डॉ वीना गुप्ता ने कहा, “ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय से उर्दू, अरबी-फारसी का हटाया जाना सरकार कि तंग नज़री को दिखता है, और में इसकी आलोचना करती हूँ. उर्दू या किसी भी भाषा को मज़हब से जोड़ना बहुत दुर्भाग्य पूर्ण है. hindi की तरक्की भी उर्दू के साथ जुडी है. अफ़सोस कि आरएसएस देश के समाजी, सांस्कृतिक और भाषा की तरक्की के बारे में कोई जानकारी नहीं रखती. ये सोच आने वाले कल को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ही नाम को हटाने की बात करेगी.”
उर्दू की किताबें देख एबीवीपी ने विरोध करना शुरू कर दिया। थोड़ी देर में एबीवीपी के कई नेता वहां पहुंच गए। बस के साथ आए लोगों को हड़काने लगे। उर्दू विभाग की शिक्षिका डॉ. शाव्या त्रिपाठी ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन एबीवीपी नेताओं ने उनके साथ भी अभद्रता की। इस तरह कि घटनाएं आम होती जा रही हैं. तरक्की ए उर्दू हिन्द, up कि वाईस प्रेसिडेंट डॉ वीना गुप्ता ने कहा, “ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय से उर्दू, अरबी-फारसी का हटाया जाना सरकार कि तंग नज़री को दिखता है, और में इसकी आलोचना करती हूँ. उर्दू या किसी भी भाषा को मज़हब से जोड़ना बहुत दुर्भाग्य पूर्ण है. hindi की तरक्की भी उर्दू के साथ जुडी है. अफ़सोस कि आरएसएस देश के समाजी, सांस्कृतिक और भाषा की तरक्की के बारे में कोई जानकारी नहीं रखती. ये सोच आने वाले कल को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ही नाम को हटाने की बात करेगी.”


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