Thursday, December 10, 2020

सत्ता के साथ किसानों का संघर्ष, शहर बनाम देहात का भी संघर्ष है

 सत्ता के साथ किसानों का संघर्ष

ये शहर बनाम देहात का भी संघर्ष है
किसानों का संघर्ष भारत के snobbery से ग्रस्त शहरी टटपुंजिया, अभिजात,पूंजीपति, वर्ग से भी है । इस दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हमें किसान आंदोलन के बारे में उठाए का रहे झूठे मुद्दों ने दिखाई दे रही है
पहला मुद्दा) धरने में किसान नहीं दीख रहे
जिन लोगों की तीसरी या चौथी पीढ़ी शहरों के अंदर है जिन्होंने कभी ज़मीन पर मेहनत नहीं की, श्रम के मूल्य को नहीं समझा उन सब लोगों को इस किसान संघर्ष में किसान ही नहीं दिखाई दे रहा है। शहरों में आयोजित बागवानी और फूल प्रतियोगिता में घर के नौकरों के बल पर गमलों में उगाए गए सुंदर फूलों के गमले हाथ में लेकर पुष्प प्रतियोगिता का इनाम जीतने वाले , या डॉग शो में बेस्ट डॉग का अवार्ड जीतने वालों के फूलों और कुत्तों की देखभाल भी उनके नौकर ही करते हैं। किताबी ज्ञान और पैसे के बल पर यह शहरी बुद्धिजीवी के बीच अपने ज्ञान का परचम लहराते हैं, और जीत की खुशी में पार्टी करते है।
इन्हे नहीं पता कि खेती किस तरह हमारे देश कि अर्थ व्यवस्था से जुड़ी है। सब नहीं पर अधिकांश व्यापार, नौकरी, निजी व्यवसाय करने वाले इन उच्च से लेकर निम्न मध्यवर्गीय लोग खुद को corporate ya पूंजीपति सें कम नहीं समझते। इन सभी शहरियों के अनुसार किसान गंदी मिट्टी में काम करते हैं गंदगी में रहते हैं उनके कपड़े साफ नहीं होते गांव की भाषा में बोलते हैं और शहरी आदमी के सामने तन के बात नहीं कर सकते।इन शहरों के अंदर जो snobbery का भाव कूट कूट कर भरा है , उसने आंखों पर पर्दा डाल रखा है। शहरी वर्ग इन ग्रामीण किसानों को घर या व्यापार में मजदूरी पर तो रख सकते हैं लेकिन बराबरी के स्तर पर इन्हें कोई इज्जत का दर्जा देने को तैयार नहीं है। किसानों से , महिलाओं यहां तक कि बच्चे भी कृशी कानूनों पर स्पष्टता से बात कर रहे हैं, सरकार के पत्र का जवाब दे रहे हैं, कानूनों का पॉइंट दर पॉइंट जवाब दे रहे हैं, ये सच सरकार इसलिए सरकार स्वीकार नहीं कर रही क्योंकि वह तो कॉरपोरेट के हाथ बिकी है, पर ये तथाकथित बुद्धिजीवी अपने अहंकार में सरकार के कदमों में पड़ा है ।
दूसरा मुद्दा ) किसानों को किसी ने बहकाया है
दूसरी तरफ सरकार, सरकार के बहुत से मंत्रियों समेत पत्रकार और बुद्धिजीवी यह कह रहे हैं कि किसान किसी के बहकावे में आ गए हैं। किसान बार-बार मीडिया के सामने आये, सरकार को पत्र लिखकर इन कानूनों की कमियों के बारे में बता रहे हैं इन कानूनों के पढ़ने वाले उनके जीवन के प्रभाव के बारे में बता रहे हैं लेकिन सरकार और उनके चाटुकार लागातार इनको भ्रमित करने वाली बात रिपीट कर रहे हैं। दरअसल सत्ता ऐसा माहौल बनाना चाहती है की किसान अज्ञानी और ना जानकार है, जिस तरह कभी गांव में होता था कि जो मुखिया जी ने कह दिया वह सही या गांव में किसी बड़े आदमी ने जो कह दिया वह सही क्योंकि उनके पास ज्यादा अक्ल है और ज्यादा समझ है इसी तरह सरकार यह वातावरण बनाती रही है कि सरकार के मंत्रियों अधिकारियों और अन्य समर्थकों के पास ज्यादा अक्ल है और वह जो कह रहे हैं वह किसानों को चुपचाप मान लेना चाहिए और किसानों को जो ने जो सुझाव दिए हैं वह किसानों की गलत समझ पर आधारित है ।
यह उसी तरह जैसे क्लास में कोई बच्चा अगर सेल्फ स्टडी करके क्लास में आता है, और अध्यापक के बताने से पहले सवाल का जवाब देने लगता है तो अध्यापक उस बच्चे को बड़ी पैनी नजर से देखता है ।
सरकार और उनके अधिकारी और अन्य अच्छी तरह जानते हैं कि किसान बेवकूफ नहीं है किसान को पता है कि कितने बीघे जमीन में कितना बीज लगेगा कितनी खाद लगेगी कितना कीटनाशक लगेगा और कितना पानी लगेगा। ये बात किसान खड़ा खड़ा हिसाब लगाकर आपको बता सकता है और सरकार के जो आईएएस अधिकारी हैं या कृषि विशेषज्ञ हैं उनसे पूछा जाए तो वह घंटों तक हिसाब लगाकर भी शायद ही बता पाए। वैसे मैं तो वैज्ञानिक विकास और तकनीक की बहुत कायल हूं, लेकिन किसान के अनुभव की भी कायल हूं कि वह बादल देख कर बता देता है बारिश कब होनी है और आंधी कब आएगी रंग देखकर बता देता है की फसल पकी है कि नहीं कब काटनी है आज या कल, जिस किसान को इतनी जानकारी है उसे बेवकूफ कह रहे है अज्ञानी कह रहे हैं। सालों तक बीजों को संरक्षित रखने, अनाज को संरक्षित रखने, पानी के स्रोतों को संरक्षित रखने पशुपालन और खेती पर आधारित न जाने कितने उद्योगों को शुरू करने का तरीका जिसने खोजा उस किसान को मूर्ख कह रहे हैं, इससे ज़्यादा अपमान और विद्रूप और क्या होगा।
1990 से जबसे उदारीकरण की आर्थिक नीतियां आई हैं, के बाद से अपने देश का मीडिया देखें तो फिल्मों में कोई भी ग्रामीण आधारित परिवेश आधारित या किसानों पर कोई फिल्म या नाटक नहीं आया टेलीविजन पर भी शहरी अभिजात और उच्च वर्ग का कब्जा है और उन्हीं की जिंदगी दिखाई देती है मीडिया में भी किसान का जिक्र आता है तो उनकी समस्याओं पर नहीं, बल्कि किसी सूखा पड़ने या बाढ़ पर ही।, खेती की नीतियों पर शायद ही किसी अखबार में कोई खबर आती हो खासतौर से हिंदी के अखबारों से तो खेती की नीति से संबंधित खबरें या लेख गायब ही रह ते है।
इन पिछले 30 सालों में गांव से स्कूल अस्पताल पंचायत घर साधन समितियां खाद और बिजली का सरकारी वितरण आदि की व्यवस्था जर्जर करके करके बिल्कुल ध्वस्त कर दी गई है। शिक्षा और इलाज पर किसानों का खर्च बेतहाशा बढा है खेती भी लाभ का धंधा नहीं रह गई है। लेकिन कोई और काम ना होने की स्थिति में खेती उनका एक काम तो है, इसे भी सरकार छीन लेना चाहती है।
तीसरा मुद्दा ) शहरी snobbery इस रूप में भी सामने आ रही है कि बार-बार शहरों की तरफ से यह बात उठाई जा रही है की रास्ते बंद है लोगों को परेशानी है इसलिए धरना बंद होना चाहिए। यह बात नई नहीं है।हर बार धरने के बाद मीडिया अगले दिन जाम लगी सड़कों की फोटो दिखाता है और जुलूस निकालने वालों की आलोचना करता है। सरकार की नीतियां ऐसी रही कि सारे संसाधन और सुविधाएं शहरों में केंद्रित होती गई और गांव इन सुविधाओं से वंचित होते गए ।
किसी भी कारण कर्मचारी, अधिकारी मंत्री नेता शहर में आए और यही आवास बना लिया एक नहीं कई कई मकान खरीद लिए अच्छी सड़कें बिजली पानी का इंतजाम हो गया। वाटर पार्क, नाइट क्लब, होटल, पब,शराब खाने/बार, सिनेमाघर, अच्छे स्कूल बच्चों के बहुमुखी विकास की अन्य सुविधाएं शहर में मिल गई तो इन्हें गांव के लोग उनके धरना आंदोलन इनके आराम में खलल मालूम देने लगे। क्या राजधानियों में आवास की नीति सरकार को नहीं बनानी चाहिए थी । दिल्ली, अब एकशहर से अब एक राज्य में बदलती जा रही है और वहां का मुख्यमंत्री दावा करता है कि वहां मिलने वाली सारी सुविधाएं सिर्फ वहां रहने वालों को मिलेंगे जैसे दिल्ली देश की राजधानी ना होकर इन नेताओं ने अपने घरेलू पैसे से दिल्ली का विकास किया है ।
दिल्ली ही नहीं लखनऊ और किसी भी अन्य राज्य की राजधानी के लिए आवास नीति जरूर होनी चाहिए। राजधानी पर जो पैसा अंधाधुंध खर्च होता है वह गांव के संसाधनों से ही कटकर आता है। अधिकारी भी बहुत से नीति बनाने वाले विभागों में होते हैं और वह इस तरह बजट का एलोकेशन करते हैं कि शहरों को अधिकतम सुविधाएं और शहरों के भी उन इलाके में ,जहां वे रहते हैं उसे अधिकतम सुविधाएं मिल सकें । शहर में नई कॉलोनी सिविल लाइन और पुराने शहर और पुरानी बस्ती का अंतर दिखाई देता है।
इस लड़ाई में किसानों का जीतना बेहद जरूरी है। अगर किसान जीता तो देश की बड़ी आबादी जीतेगी, और ये आंदोलन जागृति कि एक नई लहर लेकर आएगा, जो सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगी।
ग्रामीण भारत और शहर की सीमाओं से लगे क्षेत्र में देश की कुल मिलाकर 80 पर्सेंट आबादी रहती है, जिन्हें ना तो बुनियादी सुविधाएं मिली हैं और ना ही न्यूनतम मानवाधिकार।
अगली चुनौती है शहर और गांव की इस खाई को भरना ।
दरअसल सरकार कॉरपोरेट्स व वित्तीय पूंजी की सेवा में इस कदर निर्मम और क्रूर हो गई है कि अगर मुनाफे के लिए इंसान मरते हैं तो मरे।
आज इस पूंजी के दलालों ने भी यह बात साबित भी कर दी है।

Sunday, December 6, 2020

लव जिहाद के नाम पर हिंदू लड़कियों का उत्पीड़न और अपमान

 लव जिहाद के नाम पर हिंदू लड़कियों का उत्पीड़न और अपमान

देश में किसानों का इतना बड़ा आंदोलन चल रहा है और देश के हर कोने में किसान आंदोलित है किसानों के साथ-साथ युवा छात्र महिला संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के अंदर आर एस एस बी जे पी के से जुड़े युवा के लिए किसान कोई मुद्दा नहीं है वह तो टीम बनाकर कचहरी और मैरिज रजिस्ट्रार के कार्यालय पर ड्यूटी कर रहे हैं कि कोई हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़का शादी पंजीकरण के लिए आएं और वह उन्हें पकड़ ले। यह काम लंबे समय से यह युवा संगठन करते आ रहे हैं लेकिन विधेयक आने के बाद इन हिंदू संगठनों के युवाओं के हौसले बुलंद हैं, क्योंकि उनके कारनामों को कानूनी आधार मिल गया है। पकड़े जाने के बाद ये हिंदू युवती पर बहुत गंदी और अशोभनीय टिप्पणियां की जाती है।
पुलिस भी ऐसा ही व्यवहार करती है, जैसे उस लड़की ने घोर पाप किया हो और ये हिन्दू युवा ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वे नरक के कर्मचारी हैं और इन्हें उनके उत्पीड़न का पूरा हक मिल गया है।मेरे शहर में कल 6 दिसम्बर को ऐसी एक घटना के कारण मुझे ये पोस्ट लिखनी पड़ रही है।
मुस्लिम लड़कों के साथ और उनके परिवार के साथ जो व्यवहार किया जाता है उसका सब अनुमान लगा ही सकते हैं। मैं यहां पर उस लड़की पर होने वाले अत्याचार के बारे में बात कर रही हूं कि उस लड़की और लड़की के परिवार को इन हिंदू संगठनों द्वारा अपमानित और उत्पीड़ित किया जाता है, अशोभनीय और अश्लील फिकरे कसे जाते हैं , लड़की की शादी या तो वाहिनी के लड़के से या किसी और लड़के से शादी करने के लिए दबाव डाला जाता है और कहा जाता है कि लड़की मां बाप से कंट्रोल नहीं हो रही थी इसलिए मुसलमान लड़के से शादी कर रही थी वैसे कंट्रोल करने के लिए यह जरूरी है कि इसकी शादी तुरंत कर दी जाए ।
यह एक बहुत बड़ा उत्पीड़न और अत्याचार हो रहा है इस पर विवेकशील और तार्किक नजरिए के साथ हिंदू परिवारों हिंदू समाज को सोचने की आवश्यकता है।आर एस एस और बी जे पी से जुड़े हिंदू युवा और अन्य संगठन हिंदू लड़कियों की शादी में दहेज की समस्या और दहेज के कारण होने वाले उत्पीड़न और मौतों पर सवाल नहीं उठाते
अभी तक लव जिहाद का एक भी केस पकड़ में नहीं आया है, वैसे हिंदू मुस्लिम शादी के 5 केस पकड़े गए हैं। इन सभी केसों में लड़की ने शादी के लिए अपनी सहमति दी है। लेकिन समाज में एक ऐसा सांप्रदायिक और जहरीला माहौल बनाया जा रहा है जिसमें लड़कियां घर से बाहर ही ना निकल पाए, माता-पिता को यह लगे कि पढ़ाई इतनी जरूरी नहीं है जितना लड़की को किसी मुस्लिम लड़के से शादी करने से दूर रखना है। ऐसा करते हुए इन लड़कियों के माता-पिता समझ नहीं पा रहे हैं किस तरह लड़कियों को शिक्षा, उनके बहुमुखी विकास, नौकरी और आगे बढ़ने के समान अवसर से उसे उन्हें वंचित कर रहे हैं और ऐसा करके बेटियों और संविधान दोनों के सामने अपराध कर रहे हैं।
लव जिहाद के नाम पर हिंदू लड़कियों की शादी मुस्लिम लड़कों से ना होने देने के लिए जगह जगह r.s.s. से जुड़े हिंदू युवक युवतियों को पकड़ रहे हैं जो किसी मुस्लिम लड़के के साथ शादी करने के लिए कोर्ट या कचहरी आती ।
हिंदू युवा इस काम को लंबे समय से कर रहे थे लेकिन अब उन्हें इन युवतियों को पकड़ने का एक कानूनी आधार मिल गया है उनका कहना है कि किसी भी हिंदू लड़की की शादी मुस्लिम लड़के से नहीं होने देंगे ।
मेरा सवाल यहां यह है की हिंदू समाज में लड़कियों के विवाह से जुड़ी एक बहुत बड़ी कुरीति हे दहेज, और यह आज से नहीं पहले से चली आ रही है। यह कुरीति इतनी गहराई के साथ समाज के अंदर घुसी हुई है कि शादी एक तरीके का मोल भाव का ही व्यापार बन गई है। लड़की चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हो जब तक उसके साथ मोटा दहेज ना हो उसकी शादी होनी मुश्किल है उस पर भी सितम यह है कि मोटा दहेज देने के बाद भी लड़की की सुरक्षा और उसकी खुशी की कोई गारंटी नहीं है। दहेज के लिए पैसा जोड़ने के चक्कर में माता-पिता लड़कियों की पढ़ाई में कटौती करते हैं लड़की पैदा हो उस उस के जन्म से पहले ही टेस्ट कर आते हैं और लड़कियों का प्रतिशत या लिंग अनुपात समाज में भी लगातार गिरता जा रहा है इतनी गंभीर समस्याओं समस्याएं होने पर भी आर एस एस अपने युवा संगठनों से दहेज का बहिष्कार करने बिना दहेज के शादी करने सादगी के साथ शादी करने ऐसी शिक्षा पर जोर देने की बात नहीं कर रही है। बल्कि हो तो इसका उल्टा रहा है आर एस एस के बड़े-बड़े नेता बीजेपी के मंत्री अपने बच्चों की शादी बहुत शान और शौकत से कर रहे हैं मंत्री पूरे विभाग को अपने संतान की शादी में लगा देते हैं सरकारी खर्चे से मेहमानों की अगवानी करते हैं और मोटी रकम दिखावे पर खर्च करते हैं। आज जब आर एस एस पूर्ण बहुमत में है प्रदेश और देश में सरकार है तो एक ऐसी बुराई जिसने स्त्रियों का जीवन क्लेश से भर दिया है, उस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए यह क्यों नहीं आge आ रहे ।
अगर देश के प्रधानमंत्री बीजेपी अध्यक्ष या संघ प्रमुख युवाओं को एक आदेश दे दें कि आर एस एस से जुड़े युवा बिना दहेज के शादी करेंगे , सरकार दहेज विरोधी कानून को लागू करेंगे तो हिंदू लड़कियों का और हिंदू परिवारों का भला होगा।
समाज को सोचना चाहिए की आर एस एस और इनके हिंदू युवा लड़कियों की शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार इनके के मुद्दे क्यों नहीं उठाते हैं और इन महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से दूर रखने का माहौल बनाकर की बात करके एक आतंक का माहौल डर का माहौल समाज के अंदर क्यों बनाते हैं ।
दरअसल आर एस एस बी जे पी के पास समाज के गरीबों के लिए कोई कार्यक्रम विकास का नहीं है तो उनके अंदर डर पैदा कर कर रहे है ।जबकि हिंदू लड़कियों को इस तरह का कोई डर होना ही नहीं चाहिए क्योंकि समाज में जबरदस्ती कोई भी किसी से शादी नहीं कर सकता।
r.s.s. बीजेपी हिन्दुओं में मुसलमानों से डर का माहौल बना रहे हैं इससे उनके दो फायदे हैं एक तो हिंदू परिवारों को अपने नियंत्रण में रखना इस तरह से उनके वोट को अपने नियंत्रण में रखना और उनके अंदर यह अहसास पैदा करना कि हिंदू संगठन उनकी रक्षा कर रहे हैं, दूसरा मकसद है आर एस एस की जो महिलाओं के बारे में सोच है कि महिलाएं शिक्षा और रोजगार से दूर रहें सिर्फ घर के अंदर रहे, वही भूमिका में महिलाओं को रखना। लड़कियां उच्च शिक्षा के लिए बाहर ना निकले ना ही नौकरी करने के लिए जाएं और अगर ऐसा चाहे तो माता-पिता डर से बाहर ना जाने दे।
समाज के उच्च वर्ग या समृद्ध वर्ग के लिए यह कोई समस्या नहीं है बीजेपी के बहुत से नेता और उनके बच्चे आराम से मुस्लिमों के साथ पढ़ते भी हैं और शादी भी कर लेते हैं किसी को कोई एतराज नहीं होता लेकिन गरीबों के लिए ऐसा माहौल बना रहे हैं कि गरीब लड़कियां गरीब परिवार या सामान्य परिवार की लड़कियां आगे ना निकल पाए शिक्षा का जो प्रसार हुआ है उसमें पिछड़े दलित आदिवासी इन परिवारों की लड़कियां शिक्षा और नौकरी में आगे आई हैं और इस तरह इन परिवारों का सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण भी हुआ है सशक्तिकरण में लड़कियों की शिक्षा और उनके रोजगार भले ही चाहे छोटा सा हो उसकी बड़ी भूमिका है इसी पर आर एस एस की नजर है क्योंकि अगर सचमुच में उन्हें हिंदू लड़कियों से हमदर्दी है उनकी शिक्षा उनके रोजगार पर ध्यान दें ।
लेकिन ये तो शिक्षा रोजगार और प्रगति से वंचित करके जी हालत के अंधेरे में कैद करके औरत की हिफाजत के नाम पर लड़कियों की हिफाजत के नाम पर उन्हें डर आतंक असुरक्षा के गर्त में धकेल रहे हैं।

Friday, December 4, 2020

लव जिहाद का विचार हिंदू महिलाओं की घोर बेइज्जती

 लव जिहाद का विचार हिंदू महिलाओं की घोर बेइज्जती

आर एस एस नीत बी जे पी और इनके अनेकों हिन्दू संगठन लव जिहाद को लेकर बड़े चौकन्ने रहते हैं।
लव जिहाद को मोटे तौर पर इस तरह परिभाषित किया जाता है कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कों जैसे नाम रख के या हिंदू आइडेंटिटी बनाकर हिंदू लड़कियों से मिलकर प्रेम का नाटक करके शादी करते हैं फिर धोखा देते हैं।मुस्लिम लड़कों द्वारा किए गए इस कृत्य को लव जिहाद तथा इस लव जिहाद का नाम दिया जाता है। लव जिहाद के खिलाफ हिंदू लड़कियों को बचाने के लिए लव जिहाद के खिलाफ संघर्ष की जरूरत बताई जा रही है।
अब सवाल बड़ा यह है कि क्या हिंदू लड़कियों को इस बात की पहचान नहीं है कि कौन सही है कौन गलत, कौन उन्हें अपने प्रेम के जाल में फंसा कर धोखा देने का प्लान कर रहा है और कौन सच्चा प्रेम कर रहा है, क्या उन्हें कोई भी मूर्ख बना सकता है और इतना ज़्यादा मूर्ख बना दे कि बात शादी तक की आ जाए। क्या हिंदू माता-पिता यह बात नहीं समझ पा रहे हैं कि यह काल्पनिक खतरा दिखाकर उनकी बेटियों पर ही गलत इल्जाम लगाए जा रहे हैं और इल्जाम लगाने वाले उनके आस पास के जानकार लोग ही हैं।
लव जिहाद के मामले में हिंदू लड़की को इस तरह प्रस्तुत करना कि वह किसी भी लड़के के बरगलाने में आकर उससे शादी को तैयार हो जाएगी यह हिंदू लड़कियों की घोर बेज्जती है और लड़कियों की ही नहीं बल्कि उनके माता-पिता की भी घोर बेज्जती है ।
क्या हिंदू घरों में माता पिता अपनी लड़कियों को सही और गलत की समझ नहीं बताते हैं क्या हिन्दू लड़कियां शिक्षा पाकर भी सही और गलत में भेद नहीं कर पाती है, क्या हिंदू लड़कियां इतनी कमजोर है कि उन्हें हिंदू संगठनों और राजनीतिक दल की मदद की जरूरत पड़े।
यह भी सच है कि समाज में इस तरह के असामाजिक तत्व या धोखेबाज होते हैं जो किसी लड़की को धोखा देकर शादी कर सकते हैं लेकिन वह किसी भी धर्म के हो सकते हैं और किसी भी धर्म की लड़की को धोखा दे सकते हैं ।
क्या दूसरे धर्म की लड़कियां चाहे वह मुस्लिम हो सिख हो इसाई हो बुद्धिस्ट वह इतनी समझदार हैं कि वह प्रेम और धोखे में अंतर कर सकती हैं इसलिए उन्हें किसी प्रोटेक्शन की जरूरत नहीं है।

Tuesday, October 20, 2020

महिला हिंसा (2)जातिगत गालियां :

 महिला हिंसा (2)

जातिगत गालियां भी हिंसा का वैसा ही रूप है जैसा कि महिलाओं को लक्षित करके दी जाने वाली गालियां। जाति के नाम पर दी जाने वाली बहुत सी गालियां समाज में सामाजिक स्वीकृति के रूप में मुहावरों के रूप में प्रचलित हो गई हैं ।यहां तक की जाति के नाम से को भी गाली की तरह प्रयोग किया जाता है। सभी जानते हैं कि जाति का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कुछ पिछड़ी जातियां अनुसूचित जातियां सामाजिक संसाधन ना होने के कारण गरीब रह गई और गरीबी के कारण वे आधुनिक संसाधन और शिक्षा सभी से वंचित रहें लेकिन अब वह आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं तो उनको सपोर्ट देने की जरूरत है जिस तरह आजादी के बाद महिलाएं शिक्षा प्राप्त करने लगी उन्हें सरकार, परिवार और समाज ने सहयोग किया , यह सहयोग आज भी किया जाना चाहिए । शिक्षा में आगे बढ़ने वाले छात्र-छात्राओं पर उत्पीड़न दमन अत्याचार सामाजिक अपराध है जो पूरे समाज के विकास को अवरुद्ध करता है ।
किसी ने कहा है कि अगर किसी रेखा को छोटा करना हो तो उसके सामने एक बड़ी रेखा खींच दो। अगर आपके सामने कोई ज्यादा टैलेंटेड, ज्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति है और आप उसे नीचा दिखाना चाहते हैं तो आप उससे ज्यादा मेहनत करें उससे ज्यादा टैलेंट और उससे ज्यादा प्रतिभा को पाने की कोशिश करें । वैसे तो अगर आप सचमुच में प्रतिभाशाली हैं तो इतनी विनम्रता जरूर होगी कि दूसरे की प्रतिभा का सम्मान करें और मिलकर कुछ नया करने की कोशिश करें।
लेकिन समाज में कुछ लोग डिग्री को एक दिखावे की वस्तु समझते हैं ताकि अपनी प्रतिभा ज्ञान पद और प्रतिष्ठा से दूसरों को नीचा दिखाया जा सके। यही वह लोग हैं जो मेहनत करने की बजाय गाली के माध्यम से तानों के माध्यम से अपने से छोटी जाति के लोगों को, अपने से छोटे सामाजिक दर्जे के व्यक्ति को ताने देकर गाली देकर उनका मनोबल कम करके उन्हें हीन भावना से ग्रस्त करके अपना रुतबा और वर्चस्व कायम करना चाहते हैं।
21वीं सदी के दूसरे दशक के खत्म हो रहा है लेकिन आज भी जाति के नाम पर उत्पीड़न और दमन करने के साथ-साथ शिक्षित व्यक्ति भी और शिक्षण संस्थानों में एकेडमिक संस्थानों में बड़े-बड़े इंस्टिट्यूट में जाति के नाम पर उत्पीड़न किया जाता है यह बहुत ही अफसोस की बात है लेकिन यह गौर करने वाली बात है की उच्च संस्थान में बैठा व्यक्ति अपने रुतबे और अपने पद का इस्तेमाल दूसरे की प्रतिभा को दबाने या दमन करने में, उसका मानसिक उत्पीड़न करने में खुशी का अनुभव करता है ।
इस तरह के व्यक्ति के वर्चस्व के व्यवहार को अपने को श्रेष्ठ समझने के अहंकार को , मानसिक विकृति की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और ऐसे व्यवहार को आपराधिक कृत्य के रूप में देखा जाना चाहिए।
जाति के नाम पर मानसिक उत्पीड़न इतनी ज्यादा है कि मुंबई में डॉ पायल तड़वी जो एक बहुत ही पढ़ी लिखी डॉक्टर थी,उसने आत्महत्या कर ली क्योंकि सबके सामने उसको उसकी जाति को लेकर दिए जाते थे और वह ये प्रताड़ना बर्दाश्त नहीं कर पाई।
रोहित वेमुला का अात्महत्या से पहले लिखा पत्र पढ़ें तो महसूस होता है कि रोहित वेमुला की मौत सिर्फ वजीफा न मिलने के कारण नहीं बल्कि लंबे समय तक जातीय उत्पीड़न और उपेक्षा के कारण पैदा हुआ समाज के प्रति अविश्वास भी है।
रोहित वेमुला हो या पायल तड़वी यह मौत एक तरफ तो उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याप्त जातिवाद की निकृष्ट और बहुत ही घटिया उपस्थिति को बताती हैं वहीं दूसरी तरफ इन संस्थानों में उत्पीड़न की शिकायतों को अनदेखा करना और जानबूझकर इन कमजोर तबको को एक अन्याय पूर्ण और क्रूरता पूर्ण वातावरण बनाए रखने के संस्थान प्रमुख के intention ko bhee dikhati है। वातावरण क्रूरता पूर्ण नफरत भरे समानता और अन्याय को बढ़ाने वाले वातावरण में को बनाने में इन संस्थानों और इन संस्थानों के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों और एक ऐडमिशंस के भी निर्मम व्यवहार निर्माण उपेक्षा पूर्ण व्यवहार को भी परिलक्षित करती है । शिक्षा संस्थानों में संस्थान प्रमुखों का उपेक्षा पूर्ण व्यवहार संस्था में अध्ययन कर रहे छात्र-छात्राओं में संस्था द्वारा न्याय और समानता के व्यवहार ना किए जाने के प्रति भी उनके मन में गहरी असुरक्षा की भावना पैदा करता है।
आज ही के अखबार में एक खबर थी एक अस्पताल की इमरजेंसी में एक आदिवासी डॉक्टर ने मरीज का इलाज किया तो परिवार वालों ने उस डॉक्टर की पिटाई की क्योंकि परिवार वाले अपनी जाति के डॉक्टर से ही या किसी अन्य उच्च जाति के डॉक्टर को ही अपना मरीज दिखाना चाहते थे किसी आदिवासी डॉक्टर को नहीं ।
जो जीवन बचाता है उसके प्रति ही जब इतना घटिया वयवहार है तो समझना होगा कि यह बीमारी कितनी गहरी है जख्म सड़ रहा है, सड़ांध निकल रही है लेकिन हम ऑपरेशन की बजाय इसे ढकने के लिए लगातार पट्टी बांध रहे हैं।
इसी तरह जानवरों के नाम पर जाति के नाम पर महिला शरीर के नाम पर बहुत ही निर्ममता, निर्लज्जता, अश्लीलता के साथ गालियों का प्रयोग समाज में किया जाता है इस को रोकना बेहद जरूरी है।बलात्कार रोकने की दिशा में ये पहला कदम है।

Saturday, October 17, 2020

महिला हिंसा के खिलाफ आवाज उठाएं, खुद से वादा करें, ना गाली देंगे, ना गाली देने देंगे


शब्दों की हिंसा बंद करें और कराएं

गालियों पर रोक लगाएं

इस वक्त औरतों के खिलाफ हिंसा में बहुत बढ़ोतरी हुई है। छोटी बच्चियों से लेकर बूढ़ी औरतों तक सब हिंसा की शिकार हैं। इस हिंसा में बलात्कार, छेड़छाड़, छेड़छाड़ से तंग आकर आत्महत्या, एसिड अटैक, गैंगरेप, नशा देकर पोर्न फिल्म बनाना, लड़कियों की ट्रैफिकिंग, उन्हें वेश्यावृत्ति में धकेला जाना, प्रेम के नाम पर धोखा और शादी का वादा करके महीनों तक बलात्कार, कमजोर तबकों, गरीबों को सबक सिखाने, छोटी जाती को औकात याद दिलाने या बताने, उन्हें बर्बाद करने के लिए सबक सिखाने के लिए महिलाओं पर हिंसा की वारदातें भी शामिल है।

महिलाओं पर अप्रत्यक्ष हिंसा

कई तरह की अप्रत्यक्ष हिंसा भी महिलाओं के साथ हो रही है बढ़ती हिंसा के कारण माता पिता बच्चियों का बाल विवाह कर रहे हैं और इस तरह हिंसा के डर से एक और हिंसा में बच्ची को धकेल दिया जाता है। शराब का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है और इस शराब के कारण घरेलू हिंसा में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, बेरोजगारी के कारण पैसे की कमी, घर खर्च की समस्या और इसकी भी गाज महिला पर ही गिर रही है । महिला पर हो रही हिंसा की क्रूरता ने सारी हदें पार कर दी है। पुरुष धड़ल्ले से दूसरी औरत से संबंध बनाते हैं और औरत का एतराज करने पर उसे घर से निकालने की धमकी, औरत अगर तलाक चाहे तो महीनों सालों तक मुकदमों में ही उलझी रहे इस बीच क्या करें और कहां रहे ये असुरक्षा की भावना घरेलू हिंसा को चुपचाप स्वीकार कराने के लिए मजबूर करती है। औरतों के बीच मानसिक तनाव और मानसिक बीमारी बहुत बढी है । अगर हमें इसकी झलक देखनी है तो हम किसी भी जारत, मज़ार, धर्मगुरुके पास महिलाओं की बढ़ती हुई भीड़ के रूप में देख सकते हैं।
लोकतांत्रिक संस्थानों में भी महिला विरोधी विचार
महिला को जहां से राहत मिल सकती थी उन सभी संस्थानों को दक्षिणपंथी राजनीति ने घोर पुरुष वर्चस्व वादी ओजार में बदल दिया है। महिला को यहां राहत मिलने की बजाय इस तरह से शिकंजे में कसा जाता है की प्रचलित मान्यताएं,महिला विरोधी मान्यताएं मजबूत हो और महिला खुद अपने ऊपर होने वाले अपराध की जिम्मेदार खुद ही साबित हो जाए । घटनाओं को इस प्रकार से प्रदर्शित किया जाता है, झूठ और कुतर्कों के आधार पर ऐसी कहानी बनाई जाती है कि साबित हो जाए कि महिला स्वयं ही अपने ऊपर होने वाली हिंसा अत्याचार और अन्याय की दोषी है । थाने,अस्पताल, वकील,प्रशासनिक अधिकारी, सांसद, विशातात समेत मीडिया पीडिता से ही इन्क्वारी करते हैं. ये सभी संसथान और jan प्रतिनिधी भी महिला विरोधी मानसिकता से ग्रस्त हो गए हैं.
महिला को ही अपने ऊपर होने वाली हिंसा का दोषी ठहराने की मानसिकता क्यों ?
और इस मानसिकता से किसका फायदा ?
सवाल उठता है सच का साथ ना देकर झूठ का साथ देने से क्या किसी का कुछ फायदा होता है। हां होता है, जब प्रचलित मामलों में महिला हिंसा के लिए महिला को ही दोषी ठहराया जाता है तो पूरे समाज में माहौल बनता है कि हिंसा करने वाला पुरुष नहीं बल्कि महिलाएं स्वयं अपने ऊपर होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं। और फिर हिंसा के डर से महिलाओं को घर से ना निकलने और निकलें तो जरूरी काम से किसी के संरक्षण में निकले ये बात समाज में स्थापित होती है। जिस कारण अकेली निकलने वाली, काम करने वाली साहसी महिलाओं, शासन से सवाल पूछने वाली, सरकारी नीतियों के बारे में समाज को जागरूक करने वाली, अपने काम का मुनासिब वेतन मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की मांग करने वाली, सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाली, अपने बच्चों के भूख बीमारी गरीबी बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठाने वाली महिलाओं को चुप करने की और घर के अंदर बिठाने की साजिश की जा रही है। इस तरह आवाज उठाने वालों में महिलाएं जो समाज की आधी आबादी हैं को बिल्कुल अलग करके आंदोलनों की आधी ताकत को कम करने की कोशिश है। इन महिलाओं को उनकी औकात बताते हुए कहा जाता है कि वह घर के अंदर ही रहे बाहर निकली तो हिंसा का शिकार होंगी, घर की इज्ज़त जाएगी।
इस बात को समाज में स्थापित करके सत्ता संस्थान समाज की महिलाओं को भी पीड़ित महिला के खिलाफ वातावरण का हिस्सा बनाकर पुरुषों के समर्थन में खड़ा कर लेते हैं। महिला हिंसा को कानून व्यवस्था का मामला बता कर औरतों को घर में रहने की सलाह से फायदा किसको होता है, फायदा उन राजनीतिक दलों को होता है जो जनता को लूटने में लगे होते हैं, और जनता की सेवा का सरोकार ख़तम कर देते हैं क्योंकि महिलाओं को घर में बिठा कर, समाज की आधी आबादी को अपने बच्चों की भूख बीमारी कुपोषण बेरोज़गारी के खिलाफ लड़ाई से दूर करके लड़ाई को कमजोर करने की साज़िश है। ये महिला को मानवीय गरिमा, समानता, न्याय, आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक भागीदारी से वंचित करने का सुनियोजित षड़यंत्र है।
औरतों के खिलाफ हिंसा रोकने के के लिए दो तरफ से पहल हो सकती है एक पहल कदमी सरकार की तरफ से कि वह महिला हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनाएं और उससे भी ज्यादा सख्ती से क्रियान्वयन करें और जब सरकार का रवैया महिला हिंसा के प्रति इतना सख्त होगा तो निश्चित ही मीडिया अखबार एवं अन्य संस्थान भी महिला हिंसा के खिलाफ वातावरण का निर्माण करेंगे, और हिंसा में कमी आ सकती है। दूसरी पहलकदमी समाज की तरफ से होनी चाहिए ताकि स्त्री विरोधी रूढ़ियों परंपराओं धारणा को तोड़ने के लिए समाज आगे आए। समाज की पहल कदमी बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकारी नेता कर्मचारी सभी समाज से आते हैं और समाज में बदलाव की एक लहर आएगी तो उसका प्रभाव इन सब पर भी पड़ेगा दरअसल दोनों ही चीजें एक दूसरे की पूरक हैं फिलहाल दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा के प्रभावी होने के कारण स्त्रियों के प्रति भी पितृसत्तात्मक वर्चस्व वादी हिंसात्मक नकारात्मकता और विचारधारा हावी हो रही है।
आंकड़ों के अनुसार सिर्फ घरेलू हिंसा में ही बढ़ोतरी नहीं हुई है बल्कि समाज में भी हिंसा बढ़ी है और इसके फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों जैसे वेश्यावृत्ति बाल वेश्यावृत्ति पोर्नोग्राफी एवं ट्रैफिकिंग में महिलाओं के इस्तेमाल में भी बढ़ोतरी हुई है। इसी के साथ शादी के लिए दुल्हन खरीदने, सेरोगेसी जैसे क्षेत्रों में उत्पीड़न बहुत ज़्यादा बढ़ा है। हिंसा महिलाओं पर ही नहीं बच्चों, पर गरीब, हाशिए, आदिवासी, अल्पसंख्यकों पर भी बढी है। इसलिए महिला हिंसा पर काम करते समय हमें हर तरह की हिंसा को जहां में रखना होगा और वाक्तन फबक्तान सभी तरह की हिंसा के खिलाफ भी लड़ना होगा।
महिला हिंसा के खिलाफ शुरुआत कहाँ से करें ....
जैसा मैंने पहले कहा की शुरुआत सरकार और समाज दोनों की तरफ से होनी चाहिए । समाज की तरफ से एक आंदोलन के रूप में हमें शुरुआत करनी चाहिए। सामाजिक दबाव पड़ेगा तो सरकार को भी कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा पर सवाल यही है शुरुआत कहां से करें महिला हिंसा पर जब हम बात करते हैं तो इतने सारे मुद्दे हैं और इन मुद्दों में पहला कदम पहला मुद्दा कौन सा हो, ये एक जरूरी सवाल है क्योंकि शुरुआत ही बहुत महत्वपूर्ण है। एक बार इस विषय पर जब हमने शुरुआत कर दी तो समाज से बहुत से लोग हमारे साथ आएंगे और साथ ही बहुत सारे सुझाव भी आएंगे फिर आगे का रास्ता हम तय कर सकते हैं ।
मेरा विचार है कि महिला हिंसा के खिलाफ शुरुआत हमें महिलाओं पर होने वाली मानसिक व भावनात्मक हिंसा के खिलाफ आवाज उठा कर करनी चाहिए । इस हिंसा का बहुत बड़ा कारण गालियां हैं।
हमें अपने परिवेश में चाहे वो परिवार हो या समाज गालियों पर रोक लगाने की पहल कदमी करके महिला हिंसा के खिलाफ अभियान की शुरुआत करनी चाहिए।
गालियों के प्रति हमारा समाज और हम इस कदर अनुकूलित हो गए हैं कि यह हमें कोई गलत बात नहीं लगती है हमारे सामने ही परिवार में बाजार में यहां तक कि अब तो दफ्तरों में भी गाली देना आम बात हो गई है। बात बात पर लोग गाली देते हैं यहां तक की रोटी को आटे को दाल चावल के साथ साथ रिश्तों को भी जैसे भैया भाई भतीजे मां बाप हो या कोई समस्या या बीमारी को, सभी को गाली देकर बात करते हैं। यहां तक की बहुत खुश होंगे या दुखी होंगे तो उसे भी वयक्त करने के लिए भी कोई ना कोई गाली ही देंगे। प्यार जताने के लिए भी और नफरत जताने के लिए भी गाली देकर ही बात करते हैं।
गालियों पर रोक लगाने से इसके कई कारण हैं गालियां यां तो स्त्री के शरीर के नाम पर होती हैं , कुछ करने के नाम पर होती हैं, शरीर को क्षत-विक्षत करने के नाम पर होती हैं , स्त्री अंगों को लक्षित करके दी जाने वाली गालियां मैं लोग इतना आनंद लेते हैं कि आज नए दौर में नए भारत में पढ़े-लिखे भारत में गाली एक आम चीज बनती जा रही है पढ़े लिखो के बीच में भी गाली देकर बात करना जैसे प्यार से बात करना हो गया है।यह गाली की बात मैंने सबसे पहले क्यों उठाई क्योंकि गाली एक मानसिकता तैयार करती है किसी की मां की बहन की गाली, स्त्री अंगों को लक्षित कर के दी जाने वाली गाली असलियत में बलात्कार का ही एक काल्पनिक रूप है। गालियों के द्वारा वर्चस्व को कायम करना यह भी एक मर्दानगी का रूप है हम देखते हैं कि पुलिस औरतों के बीच सबसे पहले गालियों का ही योग करती है इतनी गंदी गालियों का प्रयोग करती हैं की एक धरने के दौरान रात में जब एक पार्क में महिलाएं रुकी हुई थी तो उनके बीच में जाकर इतनी गंदी गालियां दी गई जिस ने लाठीचार्ज से भी ज्यादा खतरनाक काम किया कई महिलाएं डिप्रेशन का शिकार हो गई और काफी दिनों तक उनको यह शिकायत रही कि उन्हें नींद नहीं आती, आंख बन्द करते ही कान में वह गंदी गालियां याद आती हैं जिसमें गालियों के अलावा यह सब भी कहा गया था कि तुम धरना प्रदर्शन में मजा लेने आती हो तुम्हारे घर वाले तो तुम्हारी कमैंखाने को आज़ाद छोड़ देते हैं यहां पर तो तरह-तरह की अनैतिक कार्य करने के लिए आती हो और यह करती हो वह करती हो आदि। ये भाषा का भयंकर दुरुपयोग था। भाषा की हिंसा को रोकना सबसे पहला कदम होना चाहिए इसके लिए परिवार अपने बच्चों को भाइयों को शुरू से ही गाली ना देने का हिदायत दे और इस पर सख्ती से अमल करवाएं।
अब समस्या है कि जो बड़े हैं वह तो गाली दिए बिना मानेंगे नहीं उनको भी किसी ना किसी तरह सत्याग्रह करके मनाया जाए कि वह गाली ना दें अगर वह अपनी आगे की नस्लों को सुधारना चाहते हैं तो गाली देना बंद करना ही होगा।
आजकल एक और ट्रेनड चला है युवाओं में गाली देने का यूट्यूब के विभिन्न चैनल है जहां युवाओं का सबसे लोकप्रिय चैनल और युवाओं को का मोस्ट इनफ्लुएंशल youtuber अपनी बात को गाली से ही शुरु करता है । 20 million उस एक लड़के के रजिस्टर्ड दर्शक हैं। ऐसे ना जाने कितने चेनल हैं, जहां सिर्फ गालीबौर अश्लीलता की baat karke ग्राहक बनाए जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा भले ही गाली देकर आए या अश्लील बातें करके यही सोशल मीडिया का विशेषकर यूट्यूब का बिजनेस मॉडल है। यहीं वर्तमान सड़ती पूंजीवादी व्यवस्था का मॉडल।
एक और ट्रेंड नजर पर आ रहा है कि लड़कियों के बीच में भी गाली देने को एक सामान्य चाहिए बनाने की कोशिश की जा रही है । फिल्म के माध्यम से गाली देने और दरूपीकर गाली देने वाले महिला चरित्र आम हो रहे हैं। इस तरह गालियों की संस्कृति को आम जनता की संस्कृति बताकर हिंसा को बढ़ाना, पितृसत्तात्मक विचारों कि पुनर्स्थापना की साज़िश को समझना बहुत ज़रूरी है।
इसलिए यह बात समझने की बेहद जरूरत है कि गालियां मानसिक हिंसा का एक रूप है जो किसी भी स्तर पर शारीरिक हिंसा से कम नहीं है और गालियां स्त्री को ना सिर्फ मनोरोगी बनाती हैं, उसे समाज में दीन हीन, सम्मान हीन स्थान सुनिश्चित करती हैं। घरेलू औरत जो कही बाहर कोई काम करने नहीं जाती घर का काम करती है सिर्फ , या कभी रिश्तेदारी में चली गई जब उसे घर में रोज गाली सुनने को मिलती है और वह इस गाली को महसूस करती है तो वह मनोरोगी हो जाती है लाखों ऐसी मनोरोगी औरतें जारतो, मजारों और बहुत सारे धर्म गुरुओं के पास जाती मिलेंगी ।
गालियां बलात्कार के लिए जमीन तैयार करती हैं इसीलिए अगर गालियों पर रोक लगाने में समाज में गालियों के हानिकारक प्रभाव के बारे में विचार विमर्श करने में हम सफल देते हैं तो काफी हद तक हिंसा के खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं ।
क्योंकि पुरुष सिर्फ गाली नहीं देते हैं, बल्कि गाली के साथ जो वाक्य जोड़ते हैं वह पुरुषों के लिए तो सिर्फ एक अपने वर्चस्व को कायम करने के लिए अपनी ताकत दिखाने का जरिया होता है लेकिन एक स्त्री के लिए वह यातना के समान होता है आप कहीं भी देखिए गाली सुनकर स्त्री हमेशा असहज हो जाती है इधर-उधर देखने लगती है गाली के माहौल में कोई भी महिला नहीं बैठना चाहती।
यह हमें समझना पड़ेगा समाज को भी समझना पड़ेगा कि महिला की अवमानना के लिए जब पुरुष गाली देते हैं तो स्वयं भी अपनी सांस्कृतिक और मानवीय गरिमा को ख़तम करते हैं। गाली खाना तो किसी भी महिला को पसंद नहीं है लेकिन गाली देकर पुरुष भी अपनी इज्जत में कोई इजाफा नहीं करते हैं ।
पुरुष पुरुषों के बीच में भले ही अपनी तारीफ के पुल बांध ले लेकिन समाज में इन पुरुषों की भर्त्सना होनी चाहिए ।
गालियां महिलाओं और बच्चों पर दूरगामी प्रभाव डालती हैं। जिस घर के पुरुष बहुत जल्दी से गुस्से में आकर गाली।बकने लगते हैं, उस परिवार की महिलाएं और बच्चे घर में मेहमान के आने पर या महिला के मायके से आने वालों के सामने हमेशा सहमें रहते हैं कि कहीं उन्हें किसी छोटी सी गलती पर गालियां ना सुननी पड़े ।
ऐसे परिवार के लोग किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में जाते हैं हमेशा इस आतंक में रहते हैं कि कहीं सबके सामने गाली खा कर बेइज्जत ना होना पड़े ।
अब आप ही बताइए हमारे समाज की यह कैसी रीत है जो गालियां दे दूसरे के लिए आतंक का माहौल बनाएं उसकी समाज प्रशंसा करें और अगर कोई महिला उसका प्रतिरोध करें तो उसे घर तोड़ने वाली सबर ना होने वाली जैसे विशेषण से शोभित करें । यानी सब की हमदर्दी गाली देने वाले के साथ हैं उसके गुस्से के साथ है क्योंकि वह पुरुष है और घर का प्रमुख है इसलिए स्त्री और बच्चों का कर्तव्य है कि वह चुपचाप उसकी गालियां सुने । ऐसा इसलिए होता है अगर पुरुष सार्वजनिक जगह पर अपने परिवार को या पत्नी को गालियां देता है तब भी लोग उसका समर्थन करते हैं और उसे समझाने की बात करते हैं और उसकी गालियों का विरोध ना करके गालियों का कारण ढूंढते हैं कि कोई ना कोई बात महिला ने ऐसी जरूर करी होगी जिस कारण उस पुरुष को गुस्सा आया है। यह पूरे समाज की प्रवृत्ति है, सत्ताधीश जानते हैं कि यदि किसी महिला के विरोध को उन्होंने स्वीकार कर लिया तो फिर वह महिला कल उनके सत्ता संस्थान को भी चुनौती देगी इसलिए चाहे वह उनके दुश्मन के घर की महिल हो, चाहे वह जिस जाति से नफरत करते हैं उस जाति की महिला हो, जिस धर्म से नफरत करते हैं उस धर्म की महिला हो, सब मिलकर उस महिला का विरोध ही करेंगे, क्योंकि एक बार उस महिला के दर्द को स्वीकार करने का मतलब है पुरुषों की सत्ता के भी हिल जाने का खतरा।
हमारे समाज का अनुकूलन ही इस प्रकार का है की जो ताकतवर है,जिसके पास सत्ता है संपत्ति है संसाधन है वह भले ही गलत करें पर उसका मूक समर्थन सभी करते हैं और जो उनका प्रतिरोध करें उसे सत्ता विरोधी करार दिया जाएगा। दक्षिणपंथी राजनीति पूरे देश का नियंत्रण इसी तरह करती है। प्रतिगामी विचारों परंपराओं द्वारा परिवार से लेकर समाज और समाज से देश तक इसी प्रकार नियंत्रण स्थापित किया जाता है। प्रतिगामी परम्पराओं और पिछड़ेपन का महिमामंडन, स्त्री विरोधी वातावरण को स्थाई बनाने के लिए स्त्रियों को ही संगठित करके ख डा किया जाता है, साथ में धर्म गुरु, मीडिया, फिल्म्स, साहित्य, और फिर इन क्षेत्रों में काम करने वाले।ऐसे लोगों को अवॉर्ड जो 8अंप्रतिगमी सोच का।समर्थन करें। पुलिस, प्रशासन में तो ढूंढ कर ऐसे लोगों को भरा जाता है जो स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी, गरीब विरोधी विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो
कुल मिलाकर ये दक्षिण पंथी राजनीति का एक महिला विरोधी राजनीति का पैकेज है जो जरा भी लीक से हटकर चलने वाली महिलाओं पर झूठा दोषारोपण, फिर उत्पीड़न, सार्वजनिक निंदा, सजा, चरित्रहीन बताना, समाज के लिए घातक, यहां तक कि अब तो अपनी कॉलोनी के लिए घातक बताकर, न्यायालय के निर्णय का इस्ट्ज़ार किए बिना , सोशल मीडिया पर निर्लज्जता के साथ महिलाओं पर टूट पड़ने को तैयार रहता है।
गाली देने वाला 5 या 7 गाली देकर चुप नहीं होता बल्कि 10 से 20 मिनट तक गालियां इस तरह देता है , और महिला की देह को इस तरह क्षत विक्षत करता है जैसे किसी टैंक ने खड़ी फसल को रौंद दिया हो । गालियों की अपनी शब्दावली है जो रहस्यमई तरीके से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मैं जाती रहती है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम अपने संगठनों में अपने परिवार में अपने परिवेश में गालियों पर रोक लगाने पर बात करें सामाजिक विमर्श करें और अपने भाइयों मित्रों बुजुर्गों रिश्तेदारों को अमानवीय और क्रूर होने से बचाने का काम करें यह भी मानवता की ही एक सेवा है।


Sunday, August 16, 2020

नयी शिक्षा नीति आंगनवाड़ी के लिए खतरे कि घंटी


नयी शिक्षा नीति में सरकार ने आंगनवाड़ी  वर्कर और हेल्पर के साथ धोखा किया है, बात तो शिक्षा अधिकार कानून का दायरा बढाकर 3 से 6 साल की आयु को भी को भी इसमें लाने की थी 

 

मोदी सरकार ने अपने पूरे पहले कार्यकाल में एवं दूसरे कार्यकाल में शुरू से लगातार यह बात कही है कि 3 से 6 साल तक के बच्चों को भी शिक्षा अधिकार कानून के अंतर्गत कवर किया जाएगा लेकिन इस नीति में कानून का दायरा बढ़ाने की बात नहीं की गई है अगर शिक्षा अधिकार कानून में 3 से 6 साल के उम्र के बच्चों को ले आते ईसीसी प्री प्राइमरी के लिए तब  आंगनवाड़ी केंद्रों में चलाने के लिए सरकार को बाध्य किया जा सकता था सरकार ने ऐसा नहीं किया और लगातार 6 साल तक आंगनवाड़ी को अध्यापिका बनाने का सपना दिखाकर आखिर में  आंगनवाड़ी केंद्रों की अस्तित्व को ही खत्म करने की तरफ कदम बढ़ा दिया। 

अब दूसरी बात आंगनवाड़ी वर्कर को भी प्रशिक्षण देकर शिक्षक बनाने की बात इस नीति में की गई है , लेकिन उसे शिक्षक का दर्जा मिलेगा यह यह बात नहीं कही गई है। आंगनवाड़ी के आंदोलन आंदोलन से सरकार परिचित है इसीलिए उन्हें यह महसूस कराया है कि सरकार आंगनवाड़ी केंद्र को मजबूत करेगी जबकि योजना सारी केंद्रों को कमजोर करने की और इन्हें खत्म करने की ही है। आंगनवाड़ी के प्रशिक्षण के लिए पहले से ही  निप्सेड का का सुव्यवस्थित तंत्र पूरे देश में है।

नयी शिक्षा नीति में ecce के इस हिस्से को पूरा पढ़कर कुछ सवाल उठते हैं-

  1.  3 से 6 साल के बच्चों को शिक्षा नीति में शामिल ही क्यों किया गया जबकि वे तो ecce के अंतर्गत और महिला और बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं, और अब 3 से 6 साल के बच्चों के लिए नयी शिक्षा नीति के अनुसार प्री प्राइमरी स्कूल खोले जा सकते हैं ?
  2. 3 से 6 साल के बच्चों को शिक्षा अधिकार कानून का हिस्सा या अलग से इसी तरह का ecce गारंटी कानून क्यों नहीं बनाया ?
  3. आंगनवाड़ी केंद्र के होते हुए अलग से बाल वाटिका कि क्या आवश्यकता है ? ऐसा क्या है बाल वाटिका में जो आंगनवाड़ी केंद्र में नहीं है.

 

ecce/इसीसीई/प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और स्कूल पूर्व शिक्षा में अंतर : एक शब्द आजकल बड़ा पॉपुलर हो रहा है वह प्री प्राइमरी एजुकेशन यह शब्द कहां से आया इतना प्रचलित हुआ कि इस एसईसी को पीछे छोड़ दिया स्कूल पूर्व शिक्षा यानी प्री प्राइमरी एजुकेशन और बाल देखभाल और विकास को समानार्थी समझने लगे। जबकि दोनों में बहुत अंतर है प्री प्राइमरी एजुकेशन का अर्थ है प्राइमरी कक्षा में दाखिला लेने से पहले बच्चे को मानसिक और शारीरिक रूप से स्कूल में पढ़ाई के लिए तैयार किया जाए और ईसीसी का अर्थ है प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा विकास के अंतर्गत बच्चों को के संज्ञानात्मक विकास भाषा परीवेश की समझ शारीरिक विकास आदि पर ध्यान दिया जाता है। तनाव मुक्त वातावरण मैं खेल संगीत बाल सुलभ गतिविधियों के माध्यम से बच्चे के शरीर उसकी भाषा उसकी संज्ञानात्मक क्षमताओं के विकास की ओर ध्यान दिया जाता है यह बहुत महत्वपूर्ण है शिशु के भावनात्मक आवश्यकता का भी बहुत ख्याल रखा जाता है।

 इस प्रकार ईसीसीई के अन्तर्गत शिशु के घर के सीमित वातावरण का विस्तार करते हुए उसे एक सामाजिक परिवेश में जहां अन्य बच्चे उसके साथ होते हैं उनके बीच इस विस्तार का मौका दिया जाता है। शिशु के इस प्रकार की वातावरण का उपलब्ध कराने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापक अध्यापिका की आवश्यकता होती है जो धैर्य और संयम के साथ शिशुओं के साथ इन शिशुओं के विकसित होने में शेरों की भूमिका निभाते हैं। इनकी शिक्षा हेतु विशेष क्यों निकाला शिक्षा प्रशिक्षण सामग्री बच्चों के लिए खेल खिलौने आदि तैयार किए जाते हैं जैसा की नई शिक्षा नीति में भी कहा गया है और दुनिया के सभी बाल शिक्षा विशेषज्ञों का भी कहना है के बच्चे के मस्तिष्क का अधिकांश विकास 5 साल की उम्र तक हो जाता है इसलिए 5 वर्ष की आयु तक विशेष प्रशिक्षित अध्यापक की देखरेख में बच्चों की देखरख की जानी चाहिए। ईसाइयों में ही उचित पोषण और स्वास्थ्य की देखभाल की भी जरूरत होती है क्योंकि यदि इस उम्र में शिशु कुपोषण का शिकार हो जाए या बीमारियों का शिकार हो जाए तो उसके आगे के विकासशारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।

 इसी सोच के साथ देश में1974 में बाल शिक्षा नीति को बनाया गया और इस बाल शिक्षा नीति के अनुरूप आंगनवाड़ी केंद्र की परिकल्पना की गई और 1975 में सीमित इलाकों में आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना की गई।मां के कुपोषित और एनीमिक होने का शिशु के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है इसलिए आंगनवाड़ी केंद्रों पर गर्भवती और धात्री महिलाओं के पोषण और टीकाकरण की ज़िम्मेदारी भी दी गई । विकसित देशों और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आंगनवाड़ी केंद्र में माता और धात्री के पोषण, शिशु के पोषण स्वास्थ्य की देखभाल टीकाकरणआदि सेवाओं की जिम्मेदारी आंगनवाड़ी केंद्रों की गईथी।

नई शिक्षा नीति में बाल विकास बाल मनोविज्ञान और बाल शिक्षा के स्थापित मानको और सिद्धांतों के विपरीत बहुत ही तिकड़म और चालाकी के साथ इसे  ईसीसीडी के पेपर में लपेट कर प्री प्राइमरी शिक्षा की शुरुआत कर दी है।

 

बहुत ही आकर्षक तरीके से ग्राफ बनाकर उम्र के बंटवारे के आधार पर अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश की है। नई शिक्षा नीति में उम्र का बंटवारा बिल्कुल अवैज्ञानिक और शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है सभी विकसित देशों में पढ़ने की 5 साल के बाद ही  मानी जाती है कुछ जगहों पर 5 प्लस को स्कूल मैं शिक्षा पाने के लिए बच्चे को शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार किया जाता है, और औपचारिक शिक्षा की शुरुआत हो जाती है।

 

सरकार ने स्कूल पूर्व शिक्षा की बात क्यों की है

 

आज के वक्त में इंजीनियरिंग कॉलेज खाली पड़े हैं मेडिकल संस्थानों नर्सिंग संस्थानों को मालिक चला नहीं पा रहे हैं फीस इतनी ज्यादा है यह चाहते हुए भी बच्चे एडमिशन नहीं ले पा रहे हैं ऐसे में प्री प्राइमरी के क्षेत्र में बड़े बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति और कॉरपोरेट अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के तहत प्राइवेट स्कूलों के साथ मिलकर इंटरनेशनल स्कूल खोल रहे हैं और इसकी फ्रेंचाइजी नीचे जिलो के अंदर दे रहे हैं और इसमें बच्चों से मोटी फीस वसूल करके और इस सिद्धांत के आधार पर की मजबूत बुनियाद पड़ेगी तो बच्चे का व्यक्तित्व का चौमुखी विकास होगा यह लुभावना नारा देकर खूबसूरत बिल्डिंग में तरह-तरह की पेंटिंग लगाकर विदेशी कार्टूनों के स्कूलों में पेंटिंग लगाकर साथ में अंग्रेजी का की किताबों और बोलने वाले अध्यापकों को रखकर एक लुभावना बाजार बना रहे हैं बन गया है आप क्यों की सरकारी स्तर पर 5 साल से अधिक के बच्चे को कक्षा एक में एडमिशन मिल सकता है तथा स्कूल पूर्व शिक्षा में प्राइवेट स्कूल खोलने की इजाजत नहीं थी जो लोग भी प्री प्राइमरी के नाम पर नर्सरी एलकेजी यूकेजी चला रहे थे वह मान्यता प्राप्त नहीं होता था शिक्षा अधिकारी उसे देख कर भी अनदेखी कर देते थे अब इस नीति के आने के बाद प्री प्राइमरी के यह सभी संस्थान औपचारिक हो जाएंगे । यही नहीं अब स्थानीय व्यापारी द्वारा भी फ्रेंचाइजी के माध्यम से निजी स्कूल के एक बड़े बाज़ार को वैधता हासिल हो गई है। सभी जानते हैं कि इन इंटरनेशनल स्कूलों में नर्सरी से ही किताबों का भारी बोझ बच्चों पर डाल दिया जाता है बस्ते से लेकर यूनिफार्म जूते मोजे खेल का सामान प्रतिदिन की गतिविधियां का सामान सब कुछ स्कूल से खरीदना पड़ता है इस समय प्री प्राइमरी स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफे का सबसे बड़ा साधन है आज उच्च शिक्षा संस्थानों और तकनीकी संस्थानों के मुकाबले प्री प्राइमरी स्कूल खोलकर खोलना कम जोखिम भरा और मोटे मुनाफे का स्रोत है।

 

 

ज्यादा से ज्यादा मुनाफा और जल्दी से जल्दी मुनाफा यह पूंजीवाद का खास  गुण है । इस के लिए एक से एक उन्नत मशीनों का प्रयोग करता है, बाजार में उत्पादों का ढेर लगा देता है, और डिस्प्लेजर ही सस्ते श्रम की तलाश में दुनिया भर में कहीं भी जा सकता है सरकार को प्रभावित करता है ताकि श्रमिकों को नियंत्रित करके कम से कम मजदूरी पर काम करा कर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाया जा सके नई शिक्षा नीति आई है मूल में भी यही नजरिया है दुनिया के सभी विकसित और शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने वाले देशों में बच्चे की शुरुआती 6 वर्ष की शिक्षा पर उसके स्वास्थ्य पोषण और सीखने पर जोर दिया जाता है इन चीजों का ख्याल रखा जाता है इसके लिए विशेष स्कीम है और योजना चलाई जाती है हमारे देश में अभी तक स्कूल पूर्व शिक्षा की कोई नीति लागू नहीं थी लेकिन आंगनवाड़ी के माध्यम से स्वास्थ्य शिक्षा और ध्यान दिया जा रहा था मनोवैज्ञानिक शिक्षा मनोविज्ञान के विशेषज्ञ और समाज शास्त्रियों के भी यही नजरिया है की  और 5 प्लस से स्कूल की तैयारी का साल होना चाहिए, औपचारिक शिक्षा की शुरुआत सिक्स प्लस से होनी चाहिए। 

निजी क्षेत्र में बड़े-बड़े निजी विद्यालयों में 3 साल की उम्र से ही प्री प्राइमरी स्कूल की शिक्षा, नर्सरी, एल के जी, यू के जी के नाम पर दी जा रही है।  यह तीनों साल  की शिक्षा कक्षा 1 में प्रवेश से पहले तैयारी के साल के रूप में देखे जाते हैं। पूंजीवादी शिक्षा का पैटर्न  यही है , यानी 3 साल की स्कूल पूर्व शिक्षा औपचारिक शिक्षा की प्रारंभिक स्टेज है और यह ईसीसीई या स्कूल पूर्व शिक्षा से बुनियादी रूप से भिन्न, और बहुत घटिया दर्जे कि है. 

नयी शिक्षा नीति ने आंगनवाड़ी के असतितव पर ही खतरा खड़ा कर दिया.

नयी नीति के नाम पर ये विकृती हमारे बच्चों के भी हक में नहीं है. इसी बात को समझने और समझाने की आज ज़रूरत है.

 

Friday, August 14, 2020

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की योगी सरकार ने आंगनवाड़ी स्कीम अन्दर से बिलकुल ख़तम कर दिया, बस खोल बचा है उसे भी खतम करने कि तैयारी है : वीना गुप्ता

 

आंगनवाड़ी केंद्र, आंगनवाड़ी वर्कर और आंगनवाड़ी हेल्पर को ख़त्म करने पर 

                     तुली उत्तर प्रदेश  सरकार 



उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस को बचाने के अभियान का अर्थ सिर्फ आंगनवाड़ी वर्कर हेल्पर को बचाना ही नहीं बल्कि करोड़ों शिशु गर्भवती माताओं और किशोरियों को कुपोषण और एनीमिया से बचाना, और स्वस्थ, शिक्षित उत्तर प्रदेश की नीव डालना भी है. प्रदेश में लगभग ढाई करोड़ से ज्यादा लाभार्थी आंगनवाड़ी में आते हैं, जबकि कवरेज 50 प्रतिशत से भी कम है. यहाँ तक कि भगवन श्री राम कि जग्न्मगाती अधोया शहर में परियोजना ही नहीं है. पिछले साल आधार ना होने के कारण 15 लाख लाभार्थी स्कीम से बाहर कर दिए गए. अभी लगभग 40 लाख प्रवासी मजदूर वापस आये हैं. अनेकों के साथ परिवार और बच्चे भी वापस आये है. lockdown में विभिन्न कारणों से बच्चों में कुपोषण, बढ़ा है और टीकाकरण भी ना होने के कारण स्वास्थ्य कि स्थिती ख़राब हो रही रही है. गाँव में आंगनवाड़ी को छोड़ कर और कोई ऐसा संस्थानिक केंद्र नहीं है महिलाओं और बच्चों को कोई राहत पहुंचा सके.

जब से yogi सरकार उत्तर प्रदेश में आई है, आंगनवाड़ी को अन्दर से बिलकुल खोखला कर दिया गया है. महामारी के इस दौर में जबकि आंगनवाड़ी अपनी जान जोखिम में डाल कर कोरोना वारियर की तरह संक्रमितों  का पता लगाने, क्वारंटाइन और आइसोलेशन में मरीजों की निगरानी करते हुए स्वयं संक्रमण का शिकार हो रही हैं और कई कि मृत्यु भी हुई है परन्तु सरकार ने कोई राहत उन्हें नहीं दी है. महामारी के दौर में उत्तर प्रदेश की सरकार आंगनवाड़ी वर्कर हेल्पर को उनके काम को स्वीकृति देने या मान्यता देने और उनकी प्रशंसा करने की बजाय उनकी वर्कर हेल्पर की छंटनी का आदेश का आदेश छल कपट के आधार पर कर रही है।

1.    62 वर्ष में हटाने के सरकारी आदेश में छल – कपट क्यों है :

·         2012 में सरकार ने आंगनवाड़ी की नियुक्ति और सेवा शर्तों को लेकर नियमावली तैयार की थी, इसमें कहा गया था जिनका भी अपॉइंटमेंट किया जाएगा, 62 साल की उम्र होने पर स्वत: ही उनकी मानदेय सेवा समाप्त हो जाएगी.( annexure 1)

·         कोई भी विवेकपूर्ण व्यक्ति इस बारे में कह सकता है कि यह नियमावली उन लोगों पर लागू होगी जिनकी नियुक्ति 2012 के बाद इस शासनादेश के आधार पर की जाएगी पूर्व में नियुक्त आंगनवाड़ी पर यह सेवा सेवा शर्तें लागू नहीं होंगी। किसी भी शासनादेश का प्रभाव भूतलक्षी नहीं होता। उन्हीं परिस्थितियों में भूतलक्षी हो सकता है जब कैबिनेट कि सिफारिश पर  माननीय गवर्नर इसकी घोषणा करें।

·         2013 में प्रदेश सरकार की तरफ से तत्कालीन निदेशक ने माननीय हाईकोर्ट में एफिडेविट देकर नई नियमावली जमा की जिसमे  उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्षों की होगी.   

·         कोर्ट में एफिडेविट जाने के बाद 2013 में ही तत्कालीन सरकार ने एक शासनादेश जारी करके पूर्व में आए 2012 के शासनादेश को निरस्त कर दिया था.       

·         एक बार फिर 2020 में उसी 2012 के निरस्त शासनादेश के आधार पर  सचिव ने आदेश जारी कर दिया है। इसी के आधार पर यूपी में आंगनवाड़ी को निकाला जा रहा है।  

·         शासन की नजरों में स्वयं को काबिल साबित करने के लिए आंगनवाड़ी की छटनी करने में अधिकारी तेजी से शासनादेश को लागू करने में लगे है।

2.    आइये समझें कि 62 वर्ष वाली आंगनवाड़ी के हटने से आईसीडीएस कैसे ख़तम होगी : 62 वर्ष की आंगनवाड़ी को हटाने से किस तरह  उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस  खत्म हो जाएगी. उत्तर प्रदेश में 2011 से कोई नई नियुक्ति नहीं हुई है तब से अब तक बहुत सारे केंद्र बिना  वर्कर के चल रहे हैं जिनमें से काफी केन्द्रों को सरकार ने मर्जर के नाम पर दूसरे केंद्रों से जोड़ दिया है इससे औपचारिक रूप से सरकार का काम तो चल गया लेकिन स्थानीय बच्चे आंगनवाड़ी की सुविधाओं से वंचित रह गए। अनुमान है कि लगभग 12 से 15% आंगनवाड़ी की सीटें रिक्त है. अब अगर यह 65 साल वाली आंगनवाड़ी को निकाल देते हैं तो करीब 25 से 30% जगह खाली हो जाएंगी।इस तरह कुल 35 से 40 परसेंट केंद्र खाली हो जाएंगे अर्थात उत्तर प्रदेश में लगभग  एक लाख केंद्र रिक्त हो जाएंगे। शासनादेश में इन केंद्रों को चलाने की जिम्मेदारी भी विभागीय अधिकारियों को सौंपी गई है इसका सीधा मतलब है कि जो 62 वर्ष से कम उम्र की वर्कर बचेंगी उनमे से एक वर्कर के पास तीन से पांच केंद्र देखने की जिम्मेदारी होगी. अब एक साथ 3 या 4 गांव के अंदर पोषाहार बांटना, रजिस्टर भरना, मंथली रिपोर्ट तैयार करना, आदि सभी काम वर्कर को करने होंगे और काम करने में कुछ ना कुछ चूक तो हो ही जाएगी, चूक ना भी हुई और अधिकारी असंतुष्ट हो गए तब भी उसे निकाले जाने का खतरा रहेगा।
इस तरह 62 वर्ष सें कम की जो वर्कर सेवा में बच भी जाएंगी उन पर काम का बोझ कई गुना बढ़ने के साथ-साथ निकालने का खतरा लगातार बना रहेगा।

3.    62 वर्ष की आंगनवाड़ी को हटाना महिलाओं को धीमी मौत में धकेलने के सामान है: सालों से आंगनवाड़ी वर्करों आंगनवाड़ी पेंशन और फंड की मांग कर रही है लेकिन सरकार का इस तरह कोई ध्यान नहीं है कि जिन लोगों ने जीवन भर समाज की सेवा में लगाया देश की सेवा में लगाया राष्ट्र निर्माण में लगाया आज एक एक पैसे को मोहताज हो रही है आंगनवाड़ी की भर्ती में एकल, विधवा, और गरीब महिला को वरीयता दी जाती है और आज इन्हीं महिलाओं को जिनका कोई सहारा नहीं है उन्हें काम से अलग किया जा रहा है । अनेकों से बात हुई उन्होंने बताया इस उमर में काफी पैसा तो उनका दवाई में ही खर्च हो जाता है। कोई सहारा नहीं है ना ज़मीन ना मकान कोरोना महामारी के समय सरकार इन सभी को एक धीमी मौत के मुंह में धकेल रही है ।

4.    आंगनवाड़ी केंद्र का महत्व :  उत्तर प्रदेश में गांव के अंदर 1000 की आबादी पर बस आंगनवाड़ी केंद्र ही है जो गाँव के अन्दर कोई बुनियादी रचना है. ये केंद्र गाँव में विकास के आंकड़े जुटाने, गाँव से हर तरह के सर्वे इकठ्ठा करने, राशनकार्ड से लेकर वोट बनवाने तक का काम अंजाम देने वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई है. सरकारी योजना का लाभ ग्रास रूट तक ले जाने, क्रियान्वयन की निगरानी करने वाली इकलौती वर्कर है. स्वयं ही आंगनवाड़ी केंद्र पर किशोरियों में कुपोषण और एनीमिया की कमी के लिए पोषाहार, स्कूल ड्राप आउट किशोरियों को प्रक्षिक्षण, गर्भवती व् धात्री को पोषाहार औत पोषण जागरूकता का कार्य, 6 साल तक के बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य, टीकाकरण, अन्य बीमारियों कि निगरानी और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का काम भी अंजाम देती हैं. संक्षेप में देखें तो शिक्षित,स्वस्थ,बचपन कि बुनियाद तैयार करना इनका काम है.इनका यही काम मजबूत देश के निर्माण में अहम् भूमिका निभा सकता है. सालों से workers पेंशन,एक मुश्त फण्ड के लिए मांग कर रही हैं, पर up सरकार ने ना तो  वर्कर कि समस्याओं पर और नही बुनियादी सुविधा, किचेन,खेल का मैदान, खेल का सामान, टॉयलेट,पीने का साफ़ पानी,आदि कि कोई सुविधा दी है.

5.    covid 19 के नियंत्रण की सफलता का श्रेय आंगनवाड़ी वर्कर और  आशा वर्कर दोनों को हीदिया जा सकता है। गांव में आंगनवाड़ी वर्कर लंबे समय से तैनात है हर घर का सर्वे उनके पास है रास्ते जानती हैं उन्हीं के साथ मिलकर आशाओं ने प्रदेश में लगभग 38.9 लाख़ प्रवासियों का सर्वे किया । आंगनवाड़ी वर्कर इस बीमारी को रोकने में और इसकी  निगरानी और नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कोरोना महामारी के द्वार में आंगनवाड़ी वर्कर को पुराना वारियर का दर्जा दिया गया ना करने पर किसी तरह की राहत राशि की घोषणा की गई। घर घर जाकर पोषाहार बंटवाया, इसके बावजूद विभाग ने जो भी मौखिक आदेश दिया आंगनवाड़ी वर्कर ने जी जान से वहां पर काम किया।

 बीजेपी की योगी सरकार ने आंगनवाड़ी को कैसे ख़तम किया.

आईसीडीएस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य 0 से 6 वर्ष के शिशु के मानसिक शारीरिक सामाजिक विकास की नीव रखना तथा 16 से 45 आयु वर्ग की महिलाओं एवं किशोरियों के पोषण एवं स्वास्थ्य स्तर में सुधार करना यह समाज के विकास का एक अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम है जो स्वस्थ समाज स्वस्थ प्रदेश और देश और स्वस्थ राष्ट्र की नीव डालता है पिछले  सालों में इस कार्यक्रम की नीव बिल्कुल खोखली कर दी गई है.  आइए इस स्कीम के अंतर्गत केंद्र से मिलने वाली सेवाओं, हॉट कुक, अति कुपोषित के पोषाहार, टेक होम राशन, स्कूल पूर्व शिक्षा, किशोरी बालिकाओं, टीकाकरण, का विश्लेषण करें और देखें कि वर्तमान में क्या स्थिति  है

b.    उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस विभाग सिर्फ प्रचार यानी पब्लीसिटी एवं दूसरे विभागों को लेबर फोर्स यानी वर्कर्स को आउट सोर्स करने की एजेंसी बन कर रह गया है. पंचायती राज, सामाजिक न्याय और समाज कल्याण, चुनाव आयोग, जनगणना, स्वास्थ्य विभाग के सभी सामुदायिक कार्यक्रमों में वर्कर को लगाया जाता है. ये सारे काम उनके आंगनवाड़ी से अतिरिक्त काम हैं. उन्हें 7 से 8 घंटे काम करना पदत है, और प्रशासनिक अधिकारीयों जैसे ज़िल्काधिकारी, तहसीलदार आदि का दवाब अलग से झेलना पदत है.

c.    हॉट कुक फूड/ ताज़ा गर्म भोजन : 3 से 6 वर्ष के बच्चों एवं गर्भवती धात्री महिलाओं के लिए हॉट कुक  यानी गरमा गरम खाने की व्यवस्था की जानी है. यह भोजन मार्च 2017 से बंद है यानी जब से योगी सरकार सत्ता में आई है हॉट कुक शुरू ही नहीं किया गया. जबकि ऐसी खबर है कि इसका पैसा केंद्र सरकार से लगातार उत्तर प्रदेश में आता रहा है कहां खर्च हो रहा है यह किसी को पता नहीं है. इस बारे में एक जांच भी मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली से आई थी जिसे प्रदेश के अधिकारियों ने दबा दिया.कई अधिकारीयों के ट्रान्सफर भी हुए, पर जांच दावा दी गयी. हमने भी बाल अधिकार आयोग में शिकायत कि. चारों तरफ से दबाव पड़ने के बाद प्रदेश सरकार ने एक आदेश निकाल कर आंगनवाड़ी के भोजन को सरकारी स्कूलों के साथ देने तथा शहरी क्षेत्रों में माता समिति के माध्यम से देने का आदेश दिया लेकिन वह अभी तक क्रियान्वित नहीं हो पाया है.

d.    शबरी संकल्प अभियान का उद्देश्य है अति कुपोषित एवं गंभीरता के स्तर तक कुपोषित बच्चों को पोषाहार एवं उनको पोषण पुनर्वास केंद्र में इलाज कराने की व्यवस्था करना इसके अंतर्गत अभी तक पिछले सालों में एक भी बच्चे को कोई सुविधा नहीं दी गई है ये अभियान भी प्रचार प्रसार तक सीमित रहा.

e.    icds बना पब्लिसिटी विभाग आंगनवाड़ी केंद्र सिर्फ प्रचार का केंद्र : आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों की नहीं उनके अभिभावकों की गतिविधियों का एक केंद्र बनकर रह गया है. प्रत्येक माह की 5 तारीख को बचपन दिवस 15 को ममता दिवस 25 को लाडली दिवस  यह सभी गतिविधियां करनी होती हैं जिसमें इन सभी गतिविधियों के लिए 3 महीने में एक बार ढाई रु० 250 प्रत्येक गतिविधि का इनको भुगतान किया जाता है, जबकि खर्च बहुत ज्यादा होता है. प्रत्येक माह सुपोषण मेला लगाया जाता है जिसके लिए इन्हें रु० 250 का भुगतान प्रत्येक माह होता है इसमें इन्हें रेसिपी बनाने का कंपटीशन एवं मां का दूध खाने पीने के बारे में सलाह आदि काउंसलिंग इन सबकी की जाती है यह पूरा का पूरा कार्यक्रम सिर्फ लोगों को समझाने और उनके बीच पोषण का प्रचार-प्रसार करने का काम हो गया यहां पर मिलने वाली सुविधाएं सभी बंद है.इस बीच गृह भ्रमण, कुपोषित बच्चों की पहचान आदि काम करने होते है.

f.     स्कूल पूर्व देखभाल शिक्षा (ECCE) के नाम पर माह में एक बार ecce दिवस मनाया जाता है जिसमे माँ के दूध का महत्व स्वास्थ्य संबंधी बातें बताई जाती है.

g.    टेक होम राशन जिसे पंजीरी भी कहा जाता है इसे 6 माह से 3 वर्ष तक के बच्चों के लिए दिया जाता है कितने बच्चे केंद्र में नामांकित हैं उनकी आधी संख्या के बच्चों के लिए ही यह पोषाहार केंद्रों पर रहा है और यह दबाव डाला जा रहा है कि जिनके आधार कार्ड बने हैं सिर्फ उन्हीं को पोषाहार दिया जाए. ऐसी स्थिति में आंगनवाड़ी के सामने जो समुदाय के साथ मिलकर काम करती हैं और जहां अभी सभी बच्चों के आधार नहीं बने हैं. बड़ी संकट की स्थिति पैदा हो जाती है कि वह उन बच्चों को कैसे मना करें जिन बच्चों के पास आधार कार्ड नहीं है. आधार ना होने के कारण 14 लाख बच्चे आंगनवाड़ी सेवाओं से बाहर कर दिए गए.

h.    तीन तोले पंजीरी/ यानी 30 ग्राम पंजीरी देकर कुपोषण दूर कर रही है योगी सरकार वर्तमान में 3 से 6 साल के बच्चों को लगभग  एक किलो का पैकेट दिया जा रहा है, जिस का  मतलब है 3 से 6 साल के बच्चों को  रोजाना 30 ग्राम या दूसरे शब्दों में तीन तोले पंजीरी  यानी भुना आटा और चीनी का मिश्रण देकर कुपोषण मिटा रही है। यही बुरा हाल 3 साल तक के बच्चों किशोरी, गर्भवती और धात्री का है.

i.      मोर्निंग स्नैक : योगी सरकार आने के बाद से बंद है.

j.      किशोरियों के लिए स्कीम SAG : 11 से 14 आयु वर्ग की स्कूल ड्राप आउट बालिकाओं के लिए प्रतिमाह डेढ़ किलो काला चना, ढाई किलो मोटा नाज और तीन माह में 450 ग्राम देसी घी मिलेगा. फिलहाल देने वाले सामान कि मात्रा वस्तुतः आधी कर दी और एक केंद्र पर अधिकतम 3 किशोरियों के लिए सभी के लिए भी  कुछ ही जिलों में भेजा है.

k.    वजन मशीने अभी तक मात्र एक बार बच्चो के वजन मापन के लिए झूला वाली, तथा एक बार गर्भवती के वजन के लिए पिछली सरकार द्वारा दी गयी थी. अधिकाँश मशीन ख़राब है.

l.      पिछले दरवाज़े से निजीकरण : स्वस्थ भारत प्रेरक : टाटा trust के सहयोग से सभी जिलों में स्वस्थ भारत प्रेरक की नियुक्ति की गयी है जो पोषण अभियान में सहयोग करेंगे. साथ ही फ़ोन, टेबलेट डाटा एंट्री आदि में सह्योग करेंगे. सहयोग के नाम पर ngo को देने कि तयारी है.

m.   पिछले दरवाज़े से निजीकरण:पोषण सखी : गर्भवती की देखभाल, केन्द्रों की निगरानी, अति कुपोषित को रेफेर करने में मदद आदि प्रदेश के 24 जिलों में कार्यरत, ये भी ngo से हैं.

n.    टीकाकरण कार्यक्रम : मुख्य कार्य आशा ANM का है, आंगनवाडी की सहयोगी भूमिका है, पर आंगनवाड़ी केंद्र पर टीकाकरण बंद.

o.    स्कूल हेडमास्टर के पास हाजिरी रजिस्टर रखने की शुरुआत,का अर्थ है कि आंगनवाड़ी का महिला और बाल विकास विभाग से शिक्षा विभाग में स्थानांतरण शुरू.

p.    लखनऊ की चिनहट और सीतापुर की खेराबाद परियोजना में लाभार्थियों को THR के स्थान पर सीधे बैंक से पैसा देने की योजना (DBT) की शुरुआत, जो

q.    एंड्राइड फ़ोन पर फोटो और रिपोर्टिंग: विभाग ने कुल  जिलों में फोन दिए, जिनमे से बहुतों कि बेटरी फट गयी. नेट का पैसा कभी नहीं मिला और रिपोर्टिंग व् फोटो पर बहुत जोर डाला गया. ऑनलाइन रिपोर्टिंग ना कर पाने के कारण भी वर्कर व् हेल्पर का बहुत उत्पीडन हो रहा है.

r.     पंजीरी की ठेकेदारी में पैसे का  भ्रष्टाचार तो अलग है, ये कभी भी पूरी मात्रा में नहीं आता है, ना गिनती में ना वजन में। गुणवत्ता बहुत ख़राब और इसके चेक करने की कोई व्यवस्था ही नहीं है।

6.    उत्तर प्रदेश में कुपोषण कि स्थिती : अक्तूबर, 2014 में जारी up राज्य  पोषण मिशन के  विजन डॉक्यूमेंट के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्रति वर्ष लगभग 5.5 लाख बच्चों की मृत्यु हो जाती है. जिसमे से लगभग 45 प्रतिशत की मृत्यु माँ और बच्चे के कुपोषण के कारण होती है. उत्तर प्रदेश में 3 साल से कम उम्र के 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के, 52 प्रतिशत बौने, और 19.5 प्रतिशत सूखा रोग से ग्रस्त हैं.... प्रजनन आयु में महिलाओं में खून की कमी है. 36 प्रतिशत परिवार ही पर्याप्त रूप से आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करते हैं. विटामिन (7 प्रतिशत) और जिंक का बहुत कम कवरेज है जो की बच्चों की बहतर प्रतिरक्षा और उत्तर जीवित के लिए दो महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक हैं.(स्रोत NFHS3, 2005-06) NFHS 4  , 2015-16 के अनुसार उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत बच्चे बौने,17.9 प्रतिशत बच्चे सूखा रोग से ग्रस्त हैं. 2 वर्ष से कम उम्र के लगभग 5 प्रतिशत बच्चे ही दो वक़्त पेट भर के भोजन कर पाते हैं.
कुपोषण में यूपी के 3 जिले टॉप पर हैं. नीति आयोग ने देश के सर्वाधिक 100 कुपोषित जिलों की सूची भी दी है, जिसमें उत्तर प्रदेश के कुल 29 जिले शामिल हैं और पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश के 3 जिले हैं. प्रदेश का बहराइच जिला राज्य में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कुपोषण में पहले नंबर पर है। आयोग की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई थी, जब यूपी के गोरखपुर में जापानी बुखार से पीडि़त बच्चों की इलाज के दौरान मौत के मामले सामने आए हैं। जापानी बुखार फैलने की एक वजह कुपोषण को भी माना जाता है।

7.    उत्तर प्रदेश में कुपोषण के कुछ आंकड़े (Malnutrition report):

§  10 में से 2 बच्चों का वजन जन्म के समय 2.5 किलो से कम,

§  हर 10 में से 4 बच्चे कुपोषण का शिकार,

§  2 में से 1 लड़की खून की कमी का शिकार,

§  तकरीबन 35 लाख बच्चे सूखा रोग से ग्रस्त,

§  93 लाख बच्चों की औसत लम्बाई कम,

§  45 फ़ीसदी 5 साल के बच्चे कम वजन के


आंकड़ों
के मुताबिक, अभी तक 3000 अधिकारियों ने उप्र में 6000 गांवों को गोद लिया है. विभागीय अधिकारी आंगनवाड़ी वर्कर पर दबाव डालते हैं कि पास से खर्च कर दो जब पैसा आएगा तब आपको दे दिया जाएगा आंगनवाड़ी वर्कर इस स्थिति में नहीं है इतना सारा खर्च अपनी जेब से कर सकें. 

उत्तर प्रदेश पहले से ही भयंकर कुपोषण कि स्थिती से गुज़र रहा है. lockdown, महामारी,बेरोज़गारी, प्रवासी मजदूरों का आना, नरेगा में काम ना मिलना आदि अनेकों समस्याओं से जूझ रहे उत्तर प्रदेश को कुपोषण, निरक्षरता, में फिर से धकेलने के षड्यंत्र पर बात करनी बेहद ज़रूरी है.