Saturday, October 17, 2020

महिला हिंसा के खिलाफ आवाज उठाएं, खुद से वादा करें, ना गाली देंगे, ना गाली देने देंगे


शब्दों की हिंसा बंद करें और कराएं

गालियों पर रोक लगाएं

इस वक्त औरतों के खिलाफ हिंसा में बहुत बढ़ोतरी हुई है। छोटी बच्चियों से लेकर बूढ़ी औरतों तक सब हिंसा की शिकार हैं। इस हिंसा में बलात्कार, छेड़छाड़, छेड़छाड़ से तंग आकर आत्महत्या, एसिड अटैक, गैंगरेप, नशा देकर पोर्न फिल्म बनाना, लड़कियों की ट्रैफिकिंग, उन्हें वेश्यावृत्ति में धकेला जाना, प्रेम के नाम पर धोखा और शादी का वादा करके महीनों तक बलात्कार, कमजोर तबकों, गरीबों को सबक सिखाने, छोटी जाती को औकात याद दिलाने या बताने, उन्हें बर्बाद करने के लिए सबक सिखाने के लिए महिलाओं पर हिंसा की वारदातें भी शामिल है।

महिलाओं पर अप्रत्यक्ष हिंसा

कई तरह की अप्रत्यक्ष हिंसा भी महिलाओं के साथ हो रही है बढ़ती हिंसा के कारण माता पिता बच्चियों का बाल विवाह कर रहे हैं और इस तरह हिंसा के डर से एक और हिंसा में बच्ची को धकेल दिया जाता है। शराब का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है और इस शराब के कारण घरेलू हिंसा में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, बेरोजगारी के कारण पैसे की कमी, घर खर्च की समस्या और इसकी भी गाज महिला पर ही गिर रही है । महिला पर हो रही हिंसा की क्रूरता ने सारी हदें पार कर दी है। पुरुष धड़ल्ले से दूसरी औरत से संबंध बनाते हैं और औरत का एतराज करने पर उसे घर से निकालने की धमकी, औरत अगर तलाक चाहे तो महीनों सालों तक मुकदमों में ही उलझी रहे इस बीच क्या करें और कहां रहे ये असुरक्षा की भावना घरेलू हिंसा को चुपचाप स्वीकार कराने के लिए मजबूर करती है। औरतों के बीच मानसिक तनाव और मानसिक बीमारी बहुत बढी है । अगर हमें इसकी झलक देखनी है तो हम किसी भी जारत, मज़ार, धर्मगुरुके पास महिलाओं की बढ़ती हुई भीड़ के रूप में देख सकते हैं।
लोकतांत्रिक संस्थानों में भी महिला विरोधी विचार
महिला को जहां से राहत मिल सकती थी उन सभी संस्थानों को दक्षिणपंथी राजनीति ने घोर पुरुष वर्चस्व वादी ओजार में बदल दिया है। महिला को यहां राहत मिलने की बजाय इस तरह से शिकंजे में कसा जाता है की प्रचलित मान्यताएं,महिला विरोधी मान्यताएं मजबूत हो और महिला खुद अपने ऊपर होने वाले अपराध की जिम्मेदार खुद ही साबित हो जाए । घटनाओं को इस प्रकार से प्रदर्शित किया जाता है, झूठ और कुतर्कों के आधार पर ऐसी कहानी बनाई जाती है कि साबित हो जाए कि महिला स्वयं ही अपने ऊपर होने वाली हिंसा अत्याचार और अन्याय की दोषी है । थाने,अस्पताल, वकील,प्रशासनिक अधिकारी, सांसद, विशातात समेत मीडिया पीडिता से ही इन्क्वारी करते हैं. ये सभी संसथान और jan प्रतिनिधी भी महिला विरोधी मानसिकता से ग्रस्त हो गए हैं.
महिला को ही अपने ऊपर होने वाली हिंसा का दोषी ठहराने की मानसिकता क्यों ?
और इस मानसिकता से किसका फायदा ?
सवाल उठता है सच का साथ ना देकर झूठ का साथ देने से क्या किसी का कुछ फायदा होता है। हां होता है, जब प्रचलित मामलों में महिला हिंसा के लिए महिला को ही दोषी ठहराया जाता है तो पूरे समाज में माहौल बनता है कि हिंसा करने वाला पुरुष नहीं बल्कि महिलाएं स्वयं अपने ऊपर होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं। और फिर हिंसा के डर से महिलाओं को घर से ना निकलने और निकलें तो जरूरी काम से किसी के संरक्षण में निकले ये बात समाज में स्थापित होती है। जिस कारण अकेली निकलने वाली, काम करने वाली साहसी महिलाओं, शासन से सवाल पूछने वाली, सरकारी नीतियों के बारे में समाज को जागरूक करने वाली, अपने काम का मुनासिब वेतन मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की मांग करने वाली, सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाली, अपने बच्चों के भूख बीमारी गरीबी बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठाने वाली महिलाओं को चुप करने की और घर के अंदर बिठाने की साजिश की जा रही है। इस तरह आवाज उठाने वालों में महिलाएं जो समाज की आधी आबादी हैं को बिल्कुल अलग करके आंदोलनों की आधी ताकत को कम करने की कोशिश है। इन महिलाओं को उनकी औकात बताते हुए कहा जाता है कि वह घर के अंदर ही रहे बाहर निकली तो हिंसा का शिकार होंगी, घर की इज्ज़त जाएगी।
इस बात को समाज में स्थापित करके सत्ता संस्थान समाज की महिलाओं को भी पीड़ित महिला के खिलाफ वातावरण का हिस्सा बनाकर पुरुषों के समर्थन में खड़ा कर लेते हैं। महिला हिंसा को कानून व्यवस्था का मामला बता कर औरतों को घर में रहने की सलाह से फायदा किसको होता है, फायदा उन राजनीतिक दलों को होता है जो जनता को लूटने में लगे होते हैं, और जनता की सेवा का सरोकार ख़तम कर देते हैं क्योंकि महिलाओं को घर में बिठा कर, समाज की आधी आबादी को अपने बच्चों की भूख बीमारी कुपोषण बेरोज़गारी के खिलाफ लड़ाई से दूर करके लड़ाई को कमजोर करने की साज़िश है। ये महिला को मानवीय गरिमा, समानता, न्याय, आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक भागीदारी से वंचित करने का सुनियोजित षड़यंत्र है।
औरतों के खिलाफ हिंसा रोकने के के लिए दो तरफ से पहल हो सकती है एक पहल कदमी सरकार की तरफ से कि वह महिला हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनाएं और उससे भी ज्यादा सख्ती से क्रियान्वयन करें और जब सरकार का रवैया महिला हिंसा के प्रति इतना सख्त होगा तो निश्चित ही मीडिया अखबार एवं अन्य संस्थान भी महिला हिंसा के खिलाफ वातावरण का निर्माण करेंगे, और हिंसा में कमी आ सकती है। दूसरी पहलकदमी समाज की तरफ से होनी चाहिए ताकि स्त्री विरोधी रूढ़ियों परंपराओं धारणा को तोड़ने के लिए समाज आगे आए। समाज की पहल कदमी बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकारी नेता कर्मचारी सभी समाज से आते हैं और समाज में बदलाव की एक लहर आएगी तो उसका प्रभाव इन सब पर भी पड़ेगा दरअसल दोनों ही चीजें एक दूसरे की पूरक हैं फिलहाल दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा के प्रभावी होने के कारण स्त्रियों के प्रति भी पितृसत्तात्मक वर्चस्व वादी हिंसात्मक नकारात्मकता और विचारधारा हावी हो रही है।
आंकड़ों के अनुसार सिर्फ घरेलू हिंसा में ही बढ़ोतरी नहीं हुई है बल्कि समाज में भी हिंसा बढ़ी है और इसके फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों जैसे वेश्यावृत्ति बाल वेश्यावृत्ति पोर्नोग्राफी एवं ट्रैफिकिंग में महिलाओं के इस्तेमाल में भी बढ़ोतरी हुई है। इसी के साथ शादी के लिए दुल्हन खरीदने, सेरोगेसी जैसे क्षेत्रों में उत्पीड़न बहुत ज़्यादा बढ़ा है। हिंसा महिलाओं पर ही नहीं बच्चों, पर गरीब, हाशिए, आदिवासी, अल्पसंख्यकों पर भी बढी है। इसलिए महिला हिंसा पर काम करते समय हमें हर तरह की हिंसा को जहां में रखना होगा और वाक्तन फबक्तान सभी तरह की हिंसा के खिलाफ भी लड़ना होगा।
महिला हिंसा के खिलाफ शुरुआत कहाँ से करें ....
जैसा मैंने पहले कहा की शुरुआत सरकार और समाज दोनों की तरफ से होनी चाहिए । समाज की तरफ से एक आंदोलन के रूप में हमें शुरुआत करनी चाहिए। सामाजिक दबाव पड़ेगा तो सरकार को भी कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा पर सवाल यही है शुरुआत कहां से करें महिला हिंसा पर जब हम बात करते हैं तो इतने सारे मुद्दे हैं और इन मुद्दों में पहला कदम पहला मुद्दा कौन सा हो, ये एक जरूरी सवाल है क्योंकि शुरुआत ही बहुत महत्वपूर्ण है। एक बार इस विषय पर जब हमने शुरुआत कर दी तो समाज से बहुत से लोग हमारे साथ आएंगे और साथ ही बहुत सारे सुझाव भी आएंगे फिर आगे का रास्ता हम तय कर सकते हैं ।
मेरा विचार है कि महिला हिंसा के खिलाफ शुरुआत हमें महिलाओं पर होने वाली मानसिक व भावनात्मक हिंसा के खिलाफ आवाज उठा कर करनी चाहिए । इस हिंसा का बहुत बड़ा कारण गालियां हैं।
हमें अपने परिवेश में चाहे वो परिवार हो या समाज गालियों पर रोक लगाने की पहल कदमी करके महिला हिंसा के खिलाफ अभियान की शुरुआत करनी चाहिए।
गालियों के प्रति हमारा समाज और हम इस कदर अनुकूलित हो गए हैं कि यह हमें कोई गलत बात नहीं लगती है हमारे सामने ही परिवार में बाजार में यहां तक कि अब तो दफ्तरों में भी गाली देना आम बात हो गई है। बात बात पर लोग गाली देते हैं यहां तक की रोटी को आटे को दाल चावल के साथ साथ रिश्तों को भी जैसे भैया भाई भतीजे मां बाप हो या कोई समस्या या बीमारी को, सभी को गाली देकर बात करते हैं। यहां तक की बहुत खुश होंगे या दुखी होंगे तो उसे भी वयक्त करने के लिए भी कोई ना कोई गाली ही देंगे। प्यार जताने के लिए भी और नफरत जताने के लिए भी गाली देकर ही बात करते हैं।
गालियों पर रोक लगाने से इसके कई कारण हैं गालियां यां तो स्त्री के शरीर के नाम पर होती हैं , कुछ करने के नाम पर होती हैं, शरीर को क्षत-विक्षत करने के नाम पर होती हैं , स्त्री अंगों को लक्षित करके दी जाने वाली गालियां मैं लोग इतना आनंद लेते हैं कि आज नए दौर में नए भारत में पढ़े-लिखे भारत में गाली एक आम चीज बनती जा रही है पढ़े लिखो के बीच में भी गाली देकर बात करना जैसे प्यार से बात करना हो गया है।यह गाली की बात मैंने सबसे पहले क्यों उठाई क्योंकि गाली एक मानसिकता तैयार करती है किसी की मां की बहन की गाली, स्त्री अंगों को लक्षित कर के दी जाने वाली गाली असलियत में बलात्कार का ही एक काल्पनिक रूप है। गालियों के द्वारा वर्चस्व को कायम करना यह भी एक मर्दानगी का रूप है हम देखते हैं कि पुलिस औरतों के बीच सबसे पहले गालियों का ही योग करती है इतनी गंदी गालियों का प्रयोग करती हैं की एक धरने के दौरान रात में जब एक पार्क में महिलाएं रुकी हुई थी तो उनके बीच में जाकर इतनी गंदी गालियां दी गई जिस ने लाठीचार्ज से भी ज्यादा खतरनाक काम किया कई महिलाएं डिप्रेशन का शिकार हो गई और काफी दिनों तक उनको यह शिकायत रही कि उन्हें नींद नहीं आती, आंख बन्द करते ही कान में वह गंदी गालियां याद आती हैं जिसमें गालियों के अलावा यह सब भी कहा गया था कि तुम धरना प्रदर्शन में मजा लेने आती हो तुम्हारे घर वाले तो तुम्हारी कमैंखाने को आज़ाद छोड़ देते हैं यहां पर तो तरह-तरह की अनैतिक कार्य करने के लिए आती हो और यह करती हो वह करती हो आदि। ये भाषा का भयंकर दुरुपयोग था। भाषा की हिंसा को रोकना सबसे पहला कदम होना चाहिए इसके लिए परिवार अपने बच्चों को भाइयों को शुरू से ही गाली ना देने का हिदायत दे और इस पर सख्ती से अमल करवाएं।
अब समस्या है कि जो बड़े हैं वह तो गाली दिए बिना मानेंगे नहीं उनको भी किसी ना किसी तरह सत्याग्रह करके मनाया जाए कि वह गाली ना दें अगर वह अपनी आगे की नस्लों को सुधारना चाहते हैं तो गाली देना बंद करना ही होगा।
आजकल एक और ट्रेनड चला है युवाओं में गाली देने का यूट्यूब के विभिन्न चैनल है जहां युवाओं का सबसे लोकप्रिय चैनल और युवाओं को का मोस्ट इनफ्लुएंशल youtuber अपनी बात को गाली से ही शुरु करता है । 20 million उस एक लड़के के रजिस्टर्ड दर्शक हैं। ऐसे ना जाने कितने चेनल हैं, जहां सिर्फ गालीबौर अश्लीलता की baat karke ग्राहक बनाए जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा भले ही गाली देकर आए या अश्लील बातें करके यही सोशल मीडिया का विशेषकर यूट्यूब का बिजनेस मॉडल है। यहीं वर्तमान सड़ती पूंजीवादी व्यवस्था का मॉडल।
एक और ट्रेंड नजर पर आ रहा है कि लड़कियों के बीच में भी गाली देने को एक सामान्य चाहिए बनाने की कोशिश की जा रही है । फिल्म के माध्यम से गाली देने और दरूपीकर गाली देने वाले महिला चरित्र आम हो रहे हैं। इस तरह गालियों की संस्कृति को आम जनता की संस्कृति बताकर हिंसा को बढ़ाना, पितृसत्तात्मक विचारों कि पुनर्स्थापना की साज़िश को समझना बहुत ज़रूरी है।
इसलिए यह बात समझने की बेहद जरूरत है कि गालियां मानसिक हिंसा का एक रूप है जो किसी भी स्तर पर शारीरिक हिंसा से कम नहीं है और गालियां स्त्री को ना सिर्फ मनोरोगी बनाती हैं, उसे समाज में दीन हीन, सम्मान हीन स्थान सुनिश्चित करती हैं। घरेलू औरत जो कही बाहर कोई काम करने नहीं जाती घर का काम करती है सिर्फ , या कभी रिश्तेदारी में चली गई जब उसे घर में रोज गाली सुनने को मिलती है और वह इस गाली को महसूस करती है तो वह मनोरोगी हो जाती है लाखों ऐसी मनोरोगी औरतें जारतो, मजारों और बहुत सारे धर्म गुरुओं के पास जाती मिलेंगी ।
गालियां बलात्कार के लिए जमीन तैयार करती हैं इसीलिए अगर गालियों पर रोक लगाने में समाज में गालियों के हानिकारक प्रभाव के बारे में विचार विमर्श करने में हम सफल देते हैं तो काफी हद तक हिंसा के खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं ।
क्योंकि पुरुष सिर्फ गाली नहीं देते हैं, बल्कि गाली के साथ जो वाक्य जोड़ते हैं वह पुरुषों के लिए तो सिर्फ एक अपने वर्चस्व को कायम करने के लिए अपनी ताकत दिखाने का जरिया होता है लेकिन एक स्त्री के लिए वह यातना के समान होता है आप कहीं भी देखिए गाली सुनकर स्त्री हमेशा असहज हो जाती है इधर-उधर देखने लगती है गाली के माहौल में कोई भी महिला नहीं बैठना चाहती।
यह हमें समझना पड़ेगा समाज को भी समझना पड़ेगा कि महिला की अवमानना के लिए जब पुरुष गाली देते हैं तो स्वयं भी अपनी सांस्कृतिक और मानवीय गरिमा को ख़तम करते हैं। गाली खाना तो किसी भी महिला को पसंद नहीं है लेकिन गाली देकर पुरुष भी अपनी इज्जत में कोई इजाफा नहीं करते हैं ।
पुरुष पुरुषों के बीच में भले ही अपनी तारीफ के पुल बांध ले लेकिन समाज में इन पुरुषों की भर्त्सना होनी चाहिए ।
गालियां महिलाओं और बच्चों पर दूरगामी प्रभाव डालती हैं। जिस घर के पुरुष बहुत जल्दी से गुस्से में आकर गाली।बकने लगते हैं, उस परिवार की महिलाएं और बच्चे घर में मेहमान के आने पर या महिला के मायके से आने वालों के सामने हमेशा सहमें रहते हैं कि कहीं उन्हें किसी छोटी सी गलती पर गालियां ना सुननी पड़े ।
ऐसे परिवार के लोग किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में जाते हैं हमेशा इस आतंक में रहते हैं कि कहीं सबके सामने गाली खा कर बेइज्जत ना होना पड़े ।
अब आप ही बताइए हमारे समाज की यह कैसी रीत है जो गालियां दे दूसरे के लिए आतंक का माहौल बनाएं उसकी समाज प्रशंसा करें और अगर कोई महिला उसका प्रतिरोध करें तो उसे घर तोड़ने वाली सबर ना होने वाली जैसे विशेषण से शोभित करें । यानी सब की हमदर्दी गाली देने वाले के साथ हैं उसके गुस्से के साथ है क्योंकि वह पुरुष है और घर का प्रमुख है इसलिए स्त्री और बच्चों का कर्तव्य है कि वह चुपचाप उसकी गालियां सुने । ऐसा इसलिए होता है अगर पुरुष सार्वजनिक जगह पर अपने परिवार को या पत्नी को गालियां देता है तब भी लोग उसका समर्थन करते हैं और उसे समझाने की बात करते हैं और उसकी गालियों का विरोध ना करके गालियों का कारण ढूंढते हैं कि कोई ना कोई बात महिला ने ऐसी जरूर करी होगी जिस कारण उस पुरुष को गुस्सा आया है। यह पूरे समाज की प्रवृत्ति है, सत्ताधीश जानते हैं कि यदि किसी महिला के विरोध को उन्होंने स्वीकार कर लिया तो फिर वह महिला कल उनके सत्ता संस्थान को भी चुनौती देगी इसलिए चाहे वह उनके दुश्मन के घर की महिल हो, चाहे वह जिस जाति से नफरत करते हैं उस जाति की महिला हो, जिस धर्म से नफरत करते हैं उस धर्म की महिला हो, सब मिलकर उस महिला का विरोध ही करेंगे, क्योंकि एक बार उस महिला के दर्द को स्वीकार करने का मतलब है पुरुषों की सत्ता के भी हिल जाने का खतरा।
हमारे समाज का अनुकूलन ही इस प्रकार का है की जो ताकतवर है,जिसके पास सत्ता है संपत्ति है संसाधन है वह भले ही गलत करें पर उसका मूक समर्थन सभी करते हैं और जो उनका प्रतिरोध करें उसे सत्ता विरोधी करार दिया जाएगा। दक्षिणपंथी राजनीति पूरे देश का नियंत्रण इसी तरह करती है। प्रतिगामी विचारों परंपराओं द्वारा परिवार से लेकर समाज और समाज से देश तक इसी प्रकार नियंत्रण स्थापित किया जाता है। प्रतिगामी परम्पराओं और पिछड़ेपन का महिमामंडन, स्त्री विरोधी वातावरण को स्थाई बनाने के लिए स्त्रियों को ही संगठित करके ख डा किया जाता है, साथ में धर्म गुरु, मीडिया, फिल्म्स, साहित्य, और फिर इन क्षेत्रों में काम करने वाले।ऐसे लोगों को अवॉर्ड जो 8अंप्रतिगमी सोच का।समर्थन करें। पुलिस, प्रशासन में तो ढूंढ कर ऐसे लोगों को भरा जाता है जो स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी, गरीब विरोधी विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो
कुल मिलाकर ये दक्षिण पंथी राजनीति का एक महिला विरोधी राजनीति का पैकेज है जो जरा भी लीक से हटकर चलने वाली महिलाओं पर झूठा दोषारोपण, फिर उत्पीड़न, सार्वजनिक निंदा, सजा, चरित्रहीन बताना, समाज के लिए घातक, यहां तक कि अब तो अपनी कॉलोनी के लिए घातक बताकर, न्यायालय के निर्णय का इस्ट्ज़ार किए बिना , सोशल मीडिया पर निर्लज्जता के साथ महिलाओं पर टूट पड़ने को तैयार रहता है।
गाली देने वाला 5 या 7 गाली देकर चुप नहीं होता बल्कि 10 से 20 मिनट तक गालियां इस तरह देता है , और महिला की देह को इस तरह क्षत विक्षत करता है जैसे किसी टैंक ने खड़ी फसल को रौंद दिया हो । गालियों की अपनी शब्दावली है जो रहस्यमई तरीके से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मैं जाती रहती है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम अपने संगठनों में अपने परिवार में अपने परिवेश में गालियों पर रोक लगाने पर बात करें सामाजिक विमर्श करें और अपने भाइयों मित्रों बुजुर्गों रिश्तेदारों को अमानवीय और क्रूर होने से बचाने का काम करें यह भी मानवता की ही एक सेवा है।


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