Tuesday, October 20, 2020

महिला हिंसा (2)जातिगत गालियां :

 महिला हिंसा (2)

जातिगत गालियां भी हिंसा का वैसा ही रूप है जैसा कि महिलाओं को लक्षित करके दी जाने वाली गालियां। जाति के नाम पर दी जाने वाली बहुत सी गालियां समाज में सामाजिक स्वीकृति के रूप में मुहावरों के रूप में प्रचलित हो गई हैं ।यहां तक की जाति के नाम से को भी गाली की तरह प्रयोग किया जाता है। सभी जानते हैं कि जाति का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कुछ पिछड़ी जातियां अनुसूचित जातियां सामाजिक संसाधन ना होने के कारण गरीब रह गई और गरीबी के कारण वे आधुनिक संसाधन और शिक्षा सभी से वंचित रहें लेकिन अब वह आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं तो उनको सपोर्ट देने की जरूरत है जिस तरह आजादी के बाद महिलाएं शिक्षा प्राप्त करने लगी उन्हें सरकार, परिवार और समाज ने सहयोग किया , यह सहयोग आज भी किया जाना चाहिए । शिक्षा में आगे बढ़ने वाले छात्र-छात्राओं पर उत्पीड़न दमन अत्याचार सामाजिक अपराध है जो पूरे समाज के विकास को अवरुद्ध करता है ।
किसी ने कहा है कि अगर किसी रेखा को छोटा करना हो तो उसके सामने एक बड़ी रेखा खींच दो। अगर आपके सामने कोई ज्यादा टैलेंटेड, ज्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति है और आप उसे नीचा दिखाना चाहते हैं तो आप उससे ज्यादा मेहनत करें उससे ज्यादा टैलेंट और उससे ज्यादा प्रतिभा को पाने की कोशिश करें । वैसे तो अगर आप सचमुच में प्रतिभाशाली हैं तो इतनी विनम्रता जरूर होगी कि दूसरे की प्रतिभा का सम्मान करें और मिलकर कुछ नया करने की कोशिश करें।
लेकिन समाज में कुछ लोग डिग्री को एक दिखावे की वस्तु समझते हैं ताकि अपनी प्रतिभा ज्ञान पद और प्रतिष्ठा से दूसरों को नीचा दिखाया जा सके। यही वह लोग हैं जो मेहनत करने की बजाय गाली के माध्यम से तानों के माध्यम से अपने से छोटी जाति के लोगों को, अपने से छोटे सामाजिक दर्जे के व्यक्ति को ताने देकर गाली देकर उनका मनोबल कम करके उन्हें हीन भावना से ग्रस्त करके अपना रुतबा और वर्चस्व कायम करना चाहते हैं।
21वीं सदी के दूसरे दशक के खत्म हो रहा है लेकिन आज भी जाति के नाम पर उत्पीड़न और दमन करने के साथ-साथ शिक्षित व्यक्ति भी और शिक्षण संस्थानों में एकेडमिक संस्थानों में बड़े-बड़े इंस्टिट्यूट में जाति के नाम पर उत्पीड़न किया जाता है यह बहुत ही अफसोस की बात है लेकिन यह गौर करने वाली बात है की उच्च संस्थान में बैठा व्यक्ति अपने रुतबे और अपने पद का इस्तेमाल दूसरे की प्रतिभा को दबाने या दमन करने में, उसका मानसिक उत्पीड़न करने में खुशी का अनुभव करता है ।
इस तरह के व्यक्ति के वर्चस्व के व्यवहार को अपने को श्रेष्ठ समझने के अहंकार को , मानसिक विकृति की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और ऐसे व्यवहार को आपराधिक कृत्य के रूप में देखा जाना चाहिए।
जाति के नाम पर मानसिक उत्पीड़न इतनी ज्यादा है कि मुंबई में डॉ पायल तड़वी जो एक बहुत ही पढ़ी लिखी डॉक्टर थी,उसने आत्महत्या कर ली क्योंकि सबके सामने उसको उसकी जाति को लेकर दिए जाते थे और वह ये प्रताड़ना बर्दाश्त नहीं कर पाई।
रोहित वेमुला का अात्महत्या से पहले लिखा पत्र पढ़ें तो महसूस होता है कि रोहित वेमुला की मौत सिर्फ वजीफा न मिलने के कारण नहीं बल्कि लंबे समय तक जातीय उत्पीड़न और उपेक्षा के कारण पैदा हुआ समाज के प्रति अविश्वास भी है।
रोहित वेमुला हो या पायल तड़वी यह मौत एक तरफ तो उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याप्त जातिवाद की निकृष्ट और बहुत ही घटिया उपस्थिति को बताती हैं वहीं दूसरी तरफ इन संस्थानों में उत्पीड़न की शिकायतों को अनदेखा करना और जानबूझकर इन कमजोर तबको को एक अन्याय पूर्ण और क्रूरता पूर्ण वातावरण बनाए रखने के संस्थान प्रमुख के intention ko bhee dikhati है। वातावरण क्रूरता पूर्ण नफरत भरे समानता और अन्याय को बढ़ाने वाले वातावरण में को बनाने में इन संस्थानों और इन संस्थानों के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों और एक ऐडमिशंस के भी निर्मम व्यवहार निर्माण उपेक्षा पूर्ण व्यवहार को भी परिलक्षित करती है । शिक्षा संस्थानों में संस्थान प्रमुखों का उपेक्षा पूर्ण व्यवहार संस्था में अध्ययन कर रहे छात्र-छात्राओं में संस्था द्वारा न्याय और समानता के व्यवहार ना किए जाने के प्रति भी उनके मन में गहरी असुरक्षा की भावना पैदा करता है।
आज ही के अखबार में एक खबर थी एक अस्पताल की इमरजेंसी में एक आदिवासी डॉक्टर ने मरीज का इलाज किया तो परिवार वालों ने उस डॉक्टर की पिटाई की क्योंकि परिवार वाले अपनी जाति के डॉक्टर से ही या किसी अन्य उच्च जाति के डॉक्टर को ही अपना मरीज दिखाना चाहते थे किसी आदिवासी डॉक्टर को नहीं ।
जो जीवन बचाता है उसके प्रति ही जब इतना घटिया वयवहार है तो समझना होगा कि यह बीमारी कितनी गहरी है जख्म सड़ रहा है, सड़ांध निकल रही है लेकिन हम ऑपरेशन की बजाय इसे ढकने के लिए लगातार पट्टी बांध रहे हैं।
इसी तरह जानवरों के नाम पर जाति के नाम पर महिला शरीर के नाम पर बहुत ही निर्ममता, निर्लज्जता, अश्लीलता के साथ गालियों का प्रयोग समाज में किया जाता है इस को रोकना बेहद जरूरी है।बलात्कार रोकने की दिशा में ये पहला कदम है।

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