Thursday, December 10, 2020

सत्ता के साथ किसानों का संघर्ष, शहर बनाम देहात का भी संघर्ष है

 सत्ता के साथ किसानों का संघर्ष

ये शहर बनाम देहात का भी संघर्ष है
किसानों का संघर्ष भारत के snobbery से ग्रस्त शहरी टटपुंजिया, अभिजात,पूंजीपति, वर्ग से भी है । इस दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हमें किसान आंदोलन के बारे में उठाए का रहे झूठे मुद्दों ने दिखाई दे रही है
पहला मुद्दा) धरने में किसान नहीं दीख रहे
जिन लोगों की तीसरी या चौथी पीढ़ी शहरों के अंदर है जिन्होंने कभी ज़मीन पर मेहनत नहीं की, श्रम के मूल्य को नहीं समझा उन सब लोगों को इस किसान संघर्ष में किसान ही नहीं दिखाई दे रहा है। शहरों में आयोजित बागवानी और फूल प्रतियोगिता में घर के नौकरों के बल पर गमलों में उगाए गए सुंदर फूलों के गमले हाथ में लेकर पुष्प प्रतियोगिता का इनाम जीतने वाले , या डॉग शो में बेस्ट डॉग का अवार्ड जीतने वालों के फूलों और कुत्तों की देखभाल भी उनके नौकर ही करते हैं। किताबी ज्ञान और पैसे के बल पर यह शहरी बुद्धिजीवी के बीच अपने ज्ञान का परचम लहराते हैं, और जीत की खुशी में पार्टी करते है।
इन्हे नहीं पता कि खेती किस तरह हमारे देश कि अर्थ व्यवस्था से जुड़ी है। सब नहीं पर अधिकांश व्यापार, नौकरी, निजी व्यवसाय करने वाले इन उच्च से लेकर निम्न मध्यवर्गीय लोग खुद को corporate ya पूंजीपति सें कम नहीं समझते। इन सभी शहरियों के अनुसार किसान गंदी मिट्टी में काम करते हैं गंदगी में रहते हैं उनके कपड़े साफ नहीं होते गांव की भाषा में बोलते हैं और शहरी आदमी के सामने तन के बात नहीं कर सकते।इन शहरों के अंदर जो snobbery का भाव कूट कूट कर भरा है , उसने आंखों पर पर्दा डाल रखा है। शहरी वर्ग इन ग्रामीण किसानों को घर या व्यापार में मजदूरी पर तो रख सकते हैं लेकिन बराबरी के स्तर पर इन्हें कोई इज्जत का दर्जा देने को तैयार नहीं है। किसानों से , महिलाओं यहां तक कि बच्चे भी कृशी कानूनों पर स्पष्टता से बात कर रहे हैं, सरकार के पत्र का जवाब दे रहे हैं, कानूनों का पॉइंट दर पॉइंट जवाब दे रहे हैं, ये सच सरकार इसलिए सरकार स्वीकार नहीं कर रही क्योंकि वह तो कॉरपोरेट के हाथ बिकी है, पर ये तथाकथित बुद्धिजीवी अपने अहंकार में सरकार के कदमों में पड़ा है ।
दूसरा मुद्दा ) किसानों को किसी ने बहकाया है
दूसरी तरफ सरकार, सरकार के बहुत से मंत्रियों समेत पत्रकार और बुद्धिजीवी यह कह रहे हैं कि किसान किसी के बहकावे में आ गए हैं। किसान बार-बार मीडिया के सामने आये, सरकार को पत्र लिखकर इन कानूनों की कमियों के बारे में बता रहे हैं इन कानूनों के पढ़ने वाले उनके जीवन के प्रभाव के बारे में बता रहे हैं लेकिन सरकार और उनके चाटुकार लागातार इनको भ्रमित करने वाली बात रिपीट कर रहे हैं। दरअसल सत्ता ऐसा माहौल बनाना चाहती है की किसान अज्ञानी और ना जानकार है, जिस तरह कभी गांव में होता था कि जो मुखिया जी ने कह दिया वह सही या गांव में किसी बड़े आदमी ने जो कह दिया वह सही क्योंकि उनके पास ज्यादा अक्ल है और ज्यादा समझ है इसी तरह सरकार यह वातावरण बनाती रही है कि सरकार के मंत्रियों अधिकारियों और अन्य समर्थकों के पास ज्यादा अक्ल है और वह जो कह रहे हैं वह किसानों को चुपचाप मान लेना चाहिए और किसानों को जो ने जो सुझाव दिए हैं वह किसानों की गलत समझ पर आधारित है ।
यह उसी तरह जैसे क्लास में कोई बच्चा अगर सेल्फ स्टडी करके क्लास में आता है, और अध्यापक के बताने से पहले सवाल का जवाब देने लगता है तो अध्यापक उस बच्चे को बड़ी पैनी नजर से देखता है ।
सरकार और उनके अधिकारी और अन्य अच्छी तरह जानते हैं कि किसान बेवकूफ नहीं है किसान को पता है कि कितने बीघे जमीन में कितना बीज लगेगा कितनी खाद लगेगी कितना कीटनाशक लगेगा और कितना पानी लगेगा। ये बात किसान खड़ा खड़ा हिसाब लगाकर आपको बता सकता है और सरकार के जो आईएएस अधिकारी हैं या कृषि विशेषज्ञ हैं उनसे पूछा जाए तो वह घंटों तक हिसाब लगाकर भी शायद ही बता पाए। वैसे मैं तो वैज्ञानिक विकास और तकनीक की बहुत कायल हूं, लेकिन किसान के अनुभव की भी कायल हूं कि वह बादल देख कर बता देता है बारिश कब होनी है और आंधी कब आएगी रंग देखकर बता देता है की फसल पकी है कि नहीं कब काटनी है आज या कल, जिस किसान को इतनी जानकारी है उसे बेवकूफ कह रहे है अज्ञानी कह रहे हैं। सालों तक बीजों को संरक्षित रखने, अनाज को संरक्षित रखने, पानी के स्रोतों को संरक्षित रखने पशुपालन और खेती पर आधारित न जाने कितने उद्योगों को शुरू करने का तरीका जिसने खोजा उस किसान को मूर्ख कह रहे हैं, इससे ज़्यादा अपमान और विद्रूप और क्या होगा।
1990 से जबसे उदारीकरण की आर्थिक नीतियां आई हैं, के बाद से अपने देश का मीडिया देखें तो फिल्मों में कोई भी ग्रामीण आधारित परिवेश आधारित या किसानों पर कोई फिल्म या नाटक नहीं आया टेलीविजन पर भी शहरी अभिजात और उच्च वर्ग का कब्जा है और उन्हीं की जिंदगी दिखाई देती है मीडिया में भी किसान का जिक्र आता है तो उनकी समस्याओं पर नहीं, बल्कि किसी सूखा पड़ने या बाढ़ पर ही।, खेती की नीतियों पर शायद ही किसी अखबार में कोई खबर आती हो खासतौर से हिंदी के अखबारों से तो खेती की नीति से संबंधित खबरें या लेख गायब ही रह ते है।
इन पिछले 30 सालों में गांव से स्कूल अस्पताल पंचायत घर साधन समितियां खाद और बिजली का सरकारी वितरण आदि की व्यवस्था जर्जर करके करके बिल्कुल ध्वस्त कर दी गई है। शिक्षा और इलाज पर किसानों का खर्च बेतहाशा बढा है खेती भी लाभ का धंधा नहीं रह गई है। लेकिन कोई और काम ना होने की स्थिति में खेती उनका एक काम तो है, इसे भी सरकार छीन लेना चाहती है।
तीसरा मुद्दा ) शहरी snobbery इस रूप में भी सामने आ रही है कि बार-बार शहरों की तरफ से यह बात उठाई जा रही है की रास्ते बंद है लोगों को परेशानी है इसलिए धरना बंद होना चाहिए। यह बात नई नहीं है।हर बार धरने के बाद मीडिया अगले दिन जाम लगी सड़कों की फोटो दिखाता है और जुलूस निकालने वालों की आलोचना करता है। सरकार की नीतियां ऐसी रही कि सारे संसाधन और सुविधाएं शहरों में केंद्रित होती गई और गांव इन सुविधाओं से वंचित होते गए ।
किसी भी कारण कर्मचारी, अधिकारी मंत्री नेता शहर में आए और यही आवास बना लिया एक नहीं कई कई मकान खरीद लिए अच्छी सड़कें बिजली पानी का इंतजाम हो गया। वाटर पार्क, नाइट क्लब, होटल, पब,शराब खाने/बार, सिनेमाघर, अच्छे स्कूल बच्चों के बहुमुखी विकास की अन्य सुविधाएं शहर में मिल गई तो इन्हें गांव के लोग उनके धरना आंदोलन इनके आराम में खलल मालूम देने लगे। क्या राजधानियों में आवास की नीति सरकार को नहीं बनानी चाहिए थी । दिल्ली, अब एकशहर से अब एक राज्य में बदलती जा रही है और वहां का मुख्यमंत्री दावा करता है कि वहां मिलने वाली सारी सुविधाएं सिर्फ वहां रहने वालों को मिलेंगे जैसे दिल्ली देश की राजधानी ना होकर इन नेताओं ने अपने घरेलू पैसे से दिल्ली का विकास किया है ।
दिल्ली ही नहीं लखनऊ और किसी भी अन्य राज्य की राजधानी के लिए आवास नीति जरूर होनी चाहिए। राजधानी पर जो पैसा अंधाधुंध खर्च होता है वह गांव के संसाधनों से ही कटकर आता है। अधिकारी भी बहुत से नीति बनाने वाले विभागों में होते हैं और वह इस तरह बजट का एलोकेशन करते हैं कि शहरों को अधिकतम सुविधाएं और शहरों के भी उन इलाके में ,जहां वे रहते हैं उसे अधिकतम सुविधाएं मिल सकें । शहर में नई कॉलोनी सिविल लाइन और पुराने शहर और पुरानी बस्ती का अंतर दिखाई देता है।
इस लड़ाई में किसानों का जीतना बेहद जरूरी है। अगर किसान जीता तो देश की बड़ी आबादी जीतेगी, और ये आंदोलन जागृति कि एक नई लहर लेकर आएगा, जो सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगी।
ग्रामीण भारत और शहर की सीमाओं से लगे क्षेत्र में देश की कुल मिलाकर 80 पर्सेंट आबादी रहती है, जिन्हें ना तो बुनियादी सुविधाएं मिली हैं और ना ही न्यूनतम मानवाधिकार।
अगली चुनौती है शहर और गांव की इस खाई को भरना ।
दरअसल सरकार कॉरपोरेट्स व वित्तीय पूंजी की सेवा में इस कदर निर्मम और क्रूर हो गई है कि अगर मुनाफे के लिए इंसान मरते हैं तो मरे।
आज इस पूंजी के दलालों ने भी यह बात साबित भी कर दी है।

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