आंगनवाड़ी केंद्र, आंगनवाड़ी वर्कर और आंगनवाड़ी हेल्पर को ख़त्म करने पर
तुली उत्तर प्रदेश सरकार
उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस को बचाने के अभियान का अर्थ सिर्फ आंगनवाड़ी वर्कर हेल्पर को बचाना ही नहीं बल्कि करोड़ों शिशु गर्भवती माताओं और किशोरियों को कुपोषण और एनीमिया से बचाना, और स्वस्थ, शिक्षित उत्तर प्रदेश की नीव डालना भी है. प्रदेश में लगभग ढाई करोड़ से ज्यादा लाभार्थी आंगनवाड़ी में आते हैं, जबकि कवरेज 50 प्रतिशत से भी कम है. यहाँ तक कि भगवन श्री राम कि जग्न्मगाती अधोया शहर में परियोजना ही नहीं है. पिछले साल आधार ना होने के कारण 15 लाख लाभार्थी स्कीम से बाहर कर दिए गए. अभी लगभग 40 लाख प्रवासी मजदूर वापस आये हैं. अनेकों के साथ परिवार और बच्चे भी वापस आये है. lockdown में विभिन्न कारणों से बच्चों में कुपोषण, बढ़ा है और टीकाकरण भी ना होने के कारण स्वास्थ्य कि स्थिती ख़राब हो रही रही है. गाँव में आंगनवाड़ी को छोड़ कर और कोई ऐसा संस्थानिक केंद्र नहीं है महिलाओं और बच्चों को कोई राहत पहुंचा सके.
जब से
yogi सरकार उत्तर प्रदेश में आई है, आंगनवाड़ी को अन्दर से बिलकुल खोखला कर दिया गया
है. महामारी के इस दौर
में जबकि आंगनवाड़ी अपनी जान जोखिम में डाल कर कोरोना वारियर की तरह
संक्रमितों का पता लगाने, क्वारंटाइन और
आइसोलेशन में मरीजों की निगरानी करते हुए स्वयं संक्रमण का शिकार हो रही हैं और कई
कि मृत्यु भी हुई है परन्तु सरकार ने कोई राहत उन्हें नहीं दी है. महामारी के दौर में उत्तर प्रदेश की सरकार आंगनवाड़ी
वर्कर हेल्पर को उनके काम को स्वीकृति देने या मान्यता देने और उनकी प्रशंसा करने
की बजाय उनकी वर्कर हेल्पर की छंटनी का आदेश का आदेश छल कपट के आधार पर कर
रही है।
1.
62
वर्ष में हटाने के सरकारी आदेश में छल – कपट क्यों
है :
·
2012
में सरकार ने आंगनवाड़ी की नियुक्ति और सेवा
शर्तों को लेकर नियमावली तैयार की थी, इसमें कहा गया था जिनका भी अपॉइंटमेंट किया जाएगा, 62 साल की उम्र होने पर स्वत: ही उनकी
मानदेय सेवा समाप्त हो जाएगी.( annexure 1)
·
कोई भी
विवेकपूर्ण व्यक्ति इस बारे में कह सकता है कि यह नियमावली उन लोगों पर लागू होगी
जिनकी नियुक्ति 2012
के बाद इस शासनादेश के आधार पर
की जाएगी पूर्व में नियुक्त आंगनवाड़ी पर यह सेवा सेवा शर्तें लागू नहीं होंगी। किसी
भी शासनादेश का प्रभाव भूतलक्षी नहीं होता। उन्हीं परिस्थितियों में भूतलक्षी
हो सकता है जब कैबिनेट कि सिफारिश पर माननीय गवर्नर इसकी घोषणा करें।
· 2013 में प्रदेश सरकार की तरफ से तत्कालीन निदेशक ने माननीय हाईकोर्ट में एफिडेविट देकर नई नियमावली जमा की जिसमे उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्षों की होगी.
· कोर्ट में एफिडेविट जाने के बाद 2013 में ही तत्कालीन सरकार ने एक शासनादेश जारी करके पूर्व में आए 2012 के शासनादेश को निरस्त कर दिया था.
·
एक बार
फिर 2020 में उसी 2012 के निरस्त शासनादेश के आधार पर सचिव ने आदेश जारी कर दिया है। इसी के
आधार पर यूपी में आंगनवाड़ी को निकाला जा रहा है।
·
शासन की
नजरों में स्वयं को काबिल साबित करने के लिए आंगनवाड़ी की छटनी करने में अधिकारी
तेजी से शासनादेश को लागू करने में लगे है।
2.
आइये
समझें कि 62 वर्ष वाली
आंगनवाड़ी के हटने से आईसीडीएस कैसे ख़तम होगी : 62 वर्ष की आंगनवाड़ी को हटाने से किस तरह उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस खत्म हो जाएगी. उत्तर प्रदेश में 2011 से कोई नई नियुक्ति नहीं हुई है तब से अब तक बहुत सारे केंद्र बिना वर्कर के चल रहे हैं जिनमें से काफी केन्द्रों
को सरकार ने मर्जर के नाम पर दूसरे केंद्रों से जोड़ दिया है इससे औपचारिक रूप से
सरकार का काम तो चल गया लेकिन स्थानीय बच्चे आंगनवाड़ी की सुविधाओं से वंचित रह
गए। अनुमान है कि लगभग 12 से 15% आंगनवाड़ी की सीटें रिक्त है. अब अगर
यह 65 साल वाली आंगनवाड़ी को निकाल देते हैं
तो करीब 25 से 30% जगह खाली हो जाएंगी।इस तरह कुल 35 से 40 परसेंट
केंद्र खाली हो जाएंगे अर्थात उत्तर प्रदेश में लगभग एक लाख केंद्र रिक्त हो जाएंगे।
शासनादेश में इन केंद्रों को चलाने की जिम्मेदारी भी विभागीय अधिकारियों को सौंपी
गई है इसका सीधा मतलब है कि जो 62 वर्ष से कम उम्र की वर्कर बचेंगी उनमे से एक
वर्कर के पास तीन से पांच केंद्र देखने की जिम्मेदारी होगी. अब एक साथ 3 या 4 गांव के
अंदर पोषाहार बांटना, रजिस्टर भरना, मंथली रिपोर्ट तैयार करना, आदि सभी काम वर्कर
को करने होंगे और काम करने में कुछ ना कुछ चूक तो हो ही जाएगी, चूक ना भी हुई और अधिकारी असंतुष्ट हो गए तब भी उसे निकाले
जाने का खतरा रहेगा।
इस तरह 62 वर्ष सें कम की जो वर्कर सेवा में बच भी जाएंगी उन पर काम का
बोझ कई गुना बढ़ने के साथ-साथ निकालने का खतरा लगातार बना रहेगा।
3.
62 वर्ष की
आंगनवाड़ी को हटाना महिलाओं को धीमी मौत में धकेलने के सामान है: सालों से आंगनवाड़ी वर्करों आंगनवाड़ी
पेंशन और फंड की मांग कर रही है लेकिन सरकार का इस तरह कोई ध्यान नहीं है कि जिन
लोगों ने जीवन भर समाज की सेवा में लगाया देश की सेवा में लगाया राष्ट्र निर्माण
में लगाया आज एक एक पैसे को मोहताज हो रही है आंगनवाड़ी की भर्ती में एकल, विधवा, और गरीब महिला को वरीयता दी जाती है और आज इन्हीं महिलाओं को जिनका कोई
सहारा नहीं है उन्हें काम से अलग किया जा रहा है । अनेकों से बात हुई उन्होंने
बताया इस उमर में काफी पैसा तो उनका दवाई में ही खर्च हो जाता है। कोई सहारा नहीं
है ना ज़मीन ना मकान कोरोना महामारी के समय सरकार इन सभी को एक धीमी मौत के मुंह
में धकेल रही है ।
4.
आंगनवाड़ी
केंद्र का महत्व : उत्तर प्रदेश में गांव के अंदर 1000 की आबादी पर बस आंगनवाड़ी
केंद्र ही है जो गाँव के अन्दर कोई बुनियादी रचना है. ये केंद्र गाँव में विकास के
आंकड़े जुटाने, गाँव से हर तरह के सर्वे इकठ्ठा करने, राशनकार्ड से लेकर वोट बनवाने
तक का काम अंजाम देने वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई है. सरकारी योजना का लाभ ग्रास
रूट तक ले जाने, क्रियान्वयन की निगरानी करने वाली इकलौती वर्कर है. स्वयं ही
आंगनवाड़ी केंद्र पर किशोरियों में कुपोषण और एनीमिया की कमी के लिए पोषाहार, स्कूल
ड्राप आउट किशोरियों को प्रक्षिक्षण, गर्भवती व् धात्री को पोषाहार औत पोषण
जागरूकता का कार्य, 6 साल तक के बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य, टीकाकरण, अन्य
बीमारियों कि निगरानी और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का काम भी अंजाम
देती हैं. संक्षेप में देखें तो शिक्षित,स्वस्थ,बचपन कि बुनियाद तैयार करना इनका
काम है.इनका यही काम मजबूत देश के निर्माण में अहम् भूमिका निभा सकता है. सालों से
workers पेंशन,एक मुश्त फण्ड के लिए मांग कर रही हैं, पर up सरकार ने ना तो वर्कर कि समस्याओं पर और नही बुनियादी सुविधा,
किचेन,खेल का मैदान, खेल का सामान, टॉयलेट,पीने का साफ़ पानी,आदि कि कोई सुविधा दी है.
5. covid 19 के नियंत्रण की सफलता का श्रेय आंगनवाड़ी वर्कर और आशा वर्कर दोनों को हीदिया जा सकता है। गांव में आंगनवाड़ी वर्कर लंबे समय से तैनात है हर घर का सर्वे उनके पास है रास्ते जानती हैं उन्हीं के साथ मिलकर आशाओं ने प्रदेश में लगभग 38.9 लाख़ प्रवासियों का सर्वे किया । आंगनवाड़ी वर्कर इस बीमारी को रोकने में और इसकी निगरानी और नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कोरोना महामारी के द्वार में आंगनवाड़ी वर्कर को पुराना वारियर का दर्जा दिया गया ना करने पर किसी तरह की राहत राशि की घोषणा की गई। घर घर जाकर पोषाहार बंटवाया, इसके बावजूद विभाग ने जो भी मौखिक आदेश दिया आंगनवाड़ी वर्कर ने जी जान से वहां पर काम किया।
बीजेपी की योगी सरकार ने आंगनवाड़ी को कैसे ख़तम किया.
आईसीडीएस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य 0 से 6 वर्ष के शिशु के मानसिक शारीरिक व सामाजिक विकास की नीव रखना तथा 16 से 45 आयु वर्ग की महिलाओं एवं किशोरियों के पोषण एवं स्वास्थ्य स्तर में सुधार करना यह समाज के विकास का एक अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम है जो स्वस्थ समाज स्वस्थ प्रदेश और देश और स्वस्थ राष्ट्र की नीव डालता है पिछले सालों में इस कार्यक्रम की नीव बिल्कुल खोखली कर दी गई है. आइए इस स्कीम के अंतर्गत केंद्र से मिलने वाली सेवाओं, हॉट कुक, अति कुपोषित के पोषाहार, टेक होम राशन, स्कूल पूर्व शिक्षा, किशोरी बालिकाओं, टीकाकरण, का विश्लेषण करें और देखें कि वर्तमान में क्या स्थिति है
b.
उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस विभाग सिर्फ प्रचार यानी पब्लीसिटी एवं दूसरे विभागों को लेबर फोर्स यानी वर्कर्स को आउट सोर्स करने
की एजेंसी बन कर रह गया है. पंचायती राज, सामाजिक न्याय और समाज
कल्याण, चुनाव आयोग, जनगणना, स्वास्थ्य विभाग के सभी सामुदायिक कार्यक्रमों में वर्कर
को लगाया जाता है. ये सारे काम उनके आंगनवाड़ी से अतिरिक्त काम हैं. उन्हें 7 से 8 घंटे
काम करना पदत है, और प्रशासनिक अधिकारीयों जैसे ज़िल्काधिकारी, तहसीलदार आदि का दवाब
अलग से झेलना पदत है.
c.
हॉट कुक फूड/ ताज़ा गर्म भोजन : 3 से 6 वर्ष के बच्चों एवं गर्भवती व धात्री महिलाओं के लिए हॉट कुक यानी गरमा गरम खाने की व्यवस्था की जानी है. यह भोजन मार्च 2017 से बंद है यानी जब से योगी सरकार सत्ता में आई है हॉट कुक शुरू ही नहीं किया गया. जबकि ऐसी खबर है कि इसका पैसा केंद्र सरकार से लगातार उत्तर प्रदेश में आता रहा है कहां खर्च हो रहा है यह किसी को पता नहीं है. इस बारे में एक जांच भी मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली से आई थी जिसे प्रदेश के अधिकारियों ने दबा दिया.कई अधिकारीयों के ट्रान्सफर भी हुए,
पर जांच दावा दी गयी. हमने भी बाल अधिकार आयोग में शिकायत कि. चारों तरफ से दबाव पड़ने के बाद प्रदेश सरकार ने एक आदेश निकाल कर आंगनवाड़ी के भोजन को सरकारी स्कूलों के साथ देने तथा शहरी क्षेत्रों में माता समिति के माध्यम से देने का आदेश दिया लेकिन वह अभी तक क्रियान्वित नहीं हो पाया है.
d.
शबरी संकल्प अभियान का उद्देश्य है अति कुपोषित एवं गंभीरता के स्तर तक कुपोषित बच्चों को पोषाहार एवं उनको पोषण पुनर्वास केंद्र में इलाज कराने की व्यवस्था करना इसके अंतर्गत अभी तक पिछले सालों में एक भी बच्चे को कोई सुविधा नहीं दी गई है ये अभियान भी प्रचार प्रसार तक सीमित रहा.
e.
icds बना पब्लिसिटी विभाग आंगनवाड़ी केंद्र सिर्फ प्रचार का केंद्र : आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों की नहीं उनके अभिभावकों की गतिविधियों का एक केंद्र बनकर रह गया है. प्रत्येक माह की 5 तारीख को बचपन दिवस 15 को ममता दिवस 25 को लाडली दिवस यह सभी गतिविधियां करनी होती हैं जिसमें इन सभी गतिविधियों के लिए 3 महीने में एक बार ढाई रु० 250 प्रत्येक गतिविधि का इनको भुगतान किया जाता है, जबकि खर्च बहुत ज्यादा होता है. प्रत्येक माह सुपोषण मेला लगाया जाता है जिसके लिए इन्हें रु० 250 का भुगतान प्रत्येक माह होता है इसमें इन्हें रेसिपी बनाने का कंपटीशन एवं मां का दूध खाने पीने के बारे में सलाह आदि काउंसलिंग इन सबकी की जाती है यह पूरा का पूरा कार्यक्रम सिर्फ लोगों को समझाने और उनके बीच पोषण का प्रचार-प्रसार करने का काम हो गया यहां पर मिलने वाली सुविधाएं सभी बंद है.इस बीच गृह भ्रमण, कुपोषित बच्चों की पहचान आदि काम करने होते है.
f.
स्कूल पूर्व देखभाल
व शिक्षा (ECCE) के नाम पर माह में एक बार ecce दिवस मनाया जाता है जिसमे माँ के दूध का महत्व व स्वास्थ्य संबंधी बातें बताई जाती है.
g.
टेक होम राशन जिसे पंजीरी भी कहा जाता है इसे 6 माह से 3 वर्ष तक के बच्चों के लिए दिया जाता है कितने बच्चे केंद्र में नामांकित हैं उनकी आधी संख्या के बच्चों के लिए ही यह पोषाहार केंद्रों पर आ रहा है और यह दबाव डाला जा रहा है कि जिनके आधार कार्ड बने हैं सिर्फ उन्हीं को पोषाहार दिया जाए. ऐसी स्थिति में आंगनवाड़ी के सामने जो समुदाय के साथ मिलकर काम करती हैं और जहां अभी सभी बच्चों के आधार नहीं बने हैं. बड़ी संकट की स्थिति पैदा हो जाती है कि वह उन बच्चों को कैसे मना करें जिन बच्चों के पास आधार कार्ड नहीं है. आधार ना होने के कारण 14 लाख बच्चे आंगनवाड़ी सेवाओं से बाहर कर दिए गए.
h.
तीन तोले
पंजीरी/ यानी 30 ग्राम पंजीरी देकर कुपोषण दूर कर रही है योगी सरकार वर्तमान में 3 से 6 साल के
बच्चों को लगभग
एक किलो का पैकेट दिया जा रहा
है, जिस का मतलब है 3 से 6 साल के बच्चों को रोजाना 30 ग्राम या दूसरे शब्दों में तीन तोले पंजीरी यानी भुना आटा और चीनी का मिश्रण देकर
कुपोषण मिटा रही है। यही बुरा हाल 3 साल तक के बच्चों किशोरी, गर्भवती और धात्री
का है.
i.
मोर्निंग स्नैक : योगी सरकार आने के बाद से बंद है.
j.
किशोरियों के लिए स्कीम
SAG :
11 से 14 आयु वर्ग की स्कूल ड्राप आउट बालिकाओं के लिए प्रतिमाह डेढ़ किलो काला चना, ढाई किलो मोटा नाज और तीन माह में 450 ग्राम
देसी घी मिलेगा. फिलहाल देने वाले सामान कि मात्रा वस्तुतः आधी कर दी और एक केंद्र पर अधिकतम 3 किशोरियों के लिए सभी के लिए भी कुछ ही जिलों में भेजा है.
k.
वजन मशीने अभी तक मात्र एक बार बच्चो के वजन मापन के लिए झूला वाली, तथा एक बार गर्भवती के वजन के लिए पिछली सरकार द्वारा दी गयी थी. अधिकाँश मशीन ख़राब है.
l.
पिछले दरवाज़े से निजीकरण
: स्वस्थ भारत प्रेरक : टाटा trust के सहयोग से सभी जिलों में स्वस्थ भारत प्रेरक की नियुक्ति की गयी है जो पोषण अभियान में सहयोग करेंगे. साथ ही फ़ोन, टेबलेट डाटा एंट्री आदि में सह्योग करेंगे. सहयोग के नाम पर ngo को देने कि तयारी
है.
m.
पिछले दरवाज़े से निजीकरण:पोषण सखी : गर्भवती की देखभाल, केन्द्रों की निगरानी, अति कुपोषित को रेफेर करने में मदद आदि प्रदेश के 24 जिलों में कार्यरत, ये भी ngo से हैं.
n.
टीकाकरण कार्यक्रम : मुख्य कार्य आशा व ANM का है, आंगनवाडी की सहयोगी भूमिका है, पर आंगनवाड़ी केंद्र पर टीकाकरण बंद.
o.
स्कूल हेडमास्टर के पास हाजिरी रजिस्टर रखने की शुरुआत,का अर्थ है कि आंगनवाड़ी का महिला और
बाल विकास विभाग से शिक्षा विभाग में स्थानांतरण शुरू.
p.
लखनऊ की चिनहट और सीतापुर की खेराबाद परियोजना में लाभार्थियों को THR के स्थान पर सीधे बैंक से पैसा देने की योजना (DBT) की शुरुआत, जो
q.
एंड्राइड फ़ोन पर फोटो और रिपोर्टिंग: विभाग ने कुल जिलों में फोन दिए, जिनमे से बहुतों कि बेटरी फट गयी. नेट का पैसा कभी नहीं मिला और रिपोर्टिंग व् फोटो पर बहुत जोर डाला गया. ऑनलाइन रिपोर्टिंग ना कर पाने के कारण भी वर्कर व् हेल्पर का बहुत उत्पीडन हो रहा है.
r.
पंजीरी
की ठेकेदारी में पैसे का भ्रष्टाचार
तो अलग है, ये कभी भी पूरी मात्रा में नहीं आता
है, ना गिनती में ना वजन में। गुणवत्ता बहुत
ख़राब और इसके चेक करने की कोई व्यवस्था ही नहीं है।
6. उत्तर प्रदेश में कुपोषण कि स्थिती : अक्तूबर, 2014 में जारी up राज्य पोषण मिशन के विजन डॉक्यूमेंट के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्रति वर्ष लगभग 5.5 लाख बच्चों की मृत्यु हो जाती है. जिसमे से लगभग 45 प्रतिशत की मृत्यु माँ और बच्चे के कुपोषण के कारण होती है. उत्तर प्रदेश में 3 साल से कम उम्र के 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के, 52 प्रतिशत बौने, और 19.5 प्रतिशत सूखा रोग से ग्रस्त हैं.... प्रजनन आयु में महिलाओं में खून की कमी है. 36 प्रतिशत परिवार ही पर्याप्त रूप से आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करते हैं. विटामिन ए (7 प्रतिशत) और जिंक का बहुत कम कवरेज है जो की बच्चों की बहतर प्रतिरक्षा और उत्तर जीवित के लिए दो महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक हैं.(स्रोत NFHS3, 2005-06) NFHS 4 , 2015-16 के अनुसार उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत बच्चे बौने,17.9 प्रतिशत बच्चे सूखा रोग से ग्रस्त हैं. 2 वर्ष से कम उम्र के लगभग 5 प्रतिशत बच्चे ही दो वक़्त पेट भर के भोजन कर पाते हैं.
कुपोषण में यूपी के 3 जिले टॉप पर हैं. नीति आयोग ने देश के सर्वाधिक 100 कुपोषित जिलों की सूची भी दी है, जिसमें उत्तर प्रदेश के कुल 29 जिले शामिल हैं और पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश के 3 जिले हैं. प्रदेश का बहराइच जिला राज्य में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कुपोषण में पहले नंबर पर है। आयोग की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई थी, जब यूपी के गोरखपुर में जापानी बुखार से पीडि़त बच्चों की इलाज के दौरान मौत के मामले सामने आए हैं। जापानी बुखार फैलने की एक वजह कुपोषण को भी माना जाता है।
7.
उत्तर प्रदेश में कुपोषण के कुछ आंकड़े (Malnutrition report):
§ 10 में से 2
बच्चों का वजन जन्म के समय 2.5 किलो से कम,
§ हर 10 में से 4 बच्चे कुपोषण का शिकार,
§ 2 में से 1
लड़की खून की कमी का शिकार,
§ तकरीबन 35
लाख बच्चे सूखा रोग से ग्रस्त,
§ 93 लाख बच्चों की औसत लम्बाई कम,
§ 45 फ़ीसदी 5 साल के बच्चे कम वजन के

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