उत्तर प्रदेश सरकार के आईसीडीएस को खत्म करने के सुनियोजित षडयंत्र के खिलाफ 7, 8 व 9 अगस्त को उत्तर प्रदेश में आंगनवाड़ी वर्कर्स व हेल्पर्स की भूख हड़ताल और सत्याग्रह
उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस को
बचाने के अभियान का अर्थ सिर्फ आंगनवाड़ी वर्कर हेल्पर को बचाना ही नहीं बल्कि
करोड़ों शिशु गर्भवती माताओं और किशोरियों को कुपोषण और एनीमिया से बचाना, और
स्वस्थ,शिक्षित प्रदेश कि नीव डालना भी है.
आंगनवाड़ी केंद्र का महत्व : उत्तर
प्रदेश में गांव के अंदर 1000 की आबादी पर बस आंगनवाड़ी केंद्र ही है जो गाँव के
अन्दर कोई बुनियादी रचना है. ये केंद्र गाँव में विकास के आंकड़े जुटाने, गाँव से
हर तरह के सर्वे इकठ्ठा करने, राशनकार्ड से लेकर वोट बनवाने तक का काम अंजाम देने
वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई है. सरकारी योजना का लाभ ग्रास रूट तक ले जाने,
क्रियान्वयन की निगरानी करने वाली इकलौती वर्कर है. स्वयं ही आंगनवाड़ी केंद्र पर
किशोरियों में कुपोषण और एनीमिया की कमी के लिए पोषाहार, स्कूल ड्राप आउट
किशोरियों को प्रक्षिक्षण, गर्भवती व् धात्री को पोषाहार औत पोषण जागरूकता का
कार्य, 6 साल तक के बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य, टीकाकरण, अन्य बीमारियों कि
निगरानी और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का काम भी अंजाम देती हैं.
संक्षेप में देखें तो शिक्षित,स्वस्थ,बचपन कि बुनियाद तैयार करना इनका काम है.इनका
यही काम मजबूत देश के निर्माण में अहम् भूमिका निभा सकता है.
covid 19 के दौरान आंगनवाड़ी का काम और सरकार कि उपेक्षा :
covid 19 के नियंत्रण की सफलता का
श्रेय आंगनवाड़ी वर्कर और आशा
वर्कर दोनों को ही दिया जा सकता है।
गांव में आंगनवाड़ी वर्कर लंबे
समय से तैनात है हर घर का सर्वे उनके पास है रास्ते जानती हैं उन्हीं के साथ मिलकर
आशाओं ने प्रदेश में लगभग 38.9 लाख़
प्रवासियों का सर्वे किया । आंगनवाड़ी वर्कर इस बीमारी को रोकने में और इसकी निगरानी और नियंत्रण में भी
महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कोरोना महामारी के द्वार में आंगनवाड़ी वर्कर को
पुराना वारियर का दर्जा दिया गया ना करने पर किसी तरह की राहत राशि की घोषणा की गई।
घर घर जाकर पोषाहार बंटवाया, इसके बावजूद विभाग ने जो भी मौखिक आदेश दिया
आंगनवाड़ी वर्कर ने जी जान से वहां पर काम किया।
महामारी के दौर में वर्कर हेल्पर कि छंटनी का आदेश : लेकिन उत्तर प्रदेश की सरकार उनके
काम को स्वीकृति देने या मान्यता देने और उनकी प्रशंसा करने की बजाय उनकी छंटनी का
आदेश छल कपट के आधार पर कर रही है। सालों से workers पेंशन,एक मुश्त फण्ड के लिए
मांग कर रही हैं, पर up सरकार ने नाटो वर्कर कि समस्याओं पर और नही बुनियादी
सुविधा, किचेन,खेल का मैदान, खेल का सामान, टॉयलेट,पीने का साफ़ पानी,आदि कि कोई
सुविधा नहीं है.
62 वर्ष में
हटाने का सरकारी आदेश में छल – कपट क्या है : 2012 में सरकार ने आंगनवाड़ी की नियुक्ति और सेवा शर्तों को लेकर
नियमावली तैयार की थी, इसमें
कहा गया था जिनका भी अपॉइंटमेंट किया जाएगा, 62 साल की
उम्र होने पर स्वत: ही उनकी मानदेय सेवा समाप्त हो जाएगी. कोई भी विवेकपूर्ण
व्यक्ति इस बारे में कह सकता है कि यह नियमावली उन लोगों पर लागू होगी जिनकी
नियुक्ति 2012
के बाद इस शासनादेश के आधार पर
की जाएगी पूर्व में नियुक्त आंगनवाड़ी पर यह सेवा सेवा शर्तें लागू नहीं होंगी। किसी
भी शासनादेश का प्रभाव भूतलक्षि नहीं होता ।उन्हीं परिस्थितियों में भूटलक्षी हो
सकता है जब कैबिनेट कि सिफारिश पर माननीय
गवर्नर इसकी घोषणा करें।
2013 में माननीय हाईकोर्ट में एक केस में
एफिडेविट देकर नई नियमावली जमा की जिसमे उत्तर
प्रदेश सरकार ने कहा की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्षों की होगी। कोर्ट में एफिडेविट जाने के बाद 2013 में ही तत्कालीन सरकार ने एक शासनादेश
जारी करके पूर्व में आए 2012 के
शासनादेश को निरस्त कर दियाथा । एक बार फिर 2020 में उसी 2012 के निरस्त शासनादेश के आधार पर सचिव ने आदेश जारी कर दिया है। इसी के
आधार पर यूपी में आंगनवाड़ी को निकाला जा रहा है। शासन की नजरों में स्वयं को काबिल साबित करने के लिए
आंगनवाड़ी की छटनी करने में अधिकारी तेजी से शासनादेश को लागू करने में लगे है।
सालों से आंगनवाड़ी वर्करों
आंगनवाड़ी पेंशन और फंड की मांग कर रही है लेकिन सरकार का इस तरह कोई ध्यान नहीं
है कि जिन लोगों ने जीवन भर समाज की सेवा में लगाया देश की सेवा में लगाया राष्ट्र
निर्माण में लगाया आज एक एक पैसे को मोहताज हो रही है आंगनवाड़ी की भर्ती
में विधवा, और गरीब
महिला को वरीयता दी जाती है और आज
इन्हीं महिलाओं को जिनका कोई सहारा नहीं है उन्हें काम से अलग किया जा रहा है ।अनेकों
से बात हुई उन्होंने बताया इस उमर में काफी पैसा तो उनका दवाई में ही खर्च हो जाता
है।कोई सहारा नहीं है ना ज़मीन ना मकान कोरोना महामारी के समय सरकार इन सभी को एक
धीमी मौत के मुंह में धकेल रही है।
आइये समझें कि 62 वर्ष वाली आंगनवाड़ी के हटने से आईसीडीएस
कैसे ख़तम होगी : आइए
बताते हैं कि कैसे 62 वर्ष की
आंगनवाड़ी को हटाने से किस तरह उत्तर
प्रदेश में आईसीडीएस खत्म हो
जाएगी. उत्तर प्रदेश में 2011 से कोई
नई नियुक्ति नहीं हुई है तब से अब तक बहुत सारे केंद्र बिना वर्कर के चल रहे हैं जिनमें से काफी
को सरकार ने मर्जर के नाम पर दूसरे केंद्रों से जोड़ दिया है इससे औपचारिक रूप से
सरकार तो का काम तो चल गया लेकिन वह बच्चे आंगनवाड़ी की सुविधाओं से वंचित रह गए।
अनुमान है कि लगभग 12 से 15% आंगनवाड़ी की सीटें रिक्त है अब अगर
यह 65 साल वाली आंगनवाड़ी को निकाल देते हैं
तो करीब 25 से 30% जगह खाली हो जाएंगी।इस तरह कुल 35 से 40 परसेंट
केंद्र खाली हो जाएंगे अर्थात उत्तर प्रदेश में लगभग एक लाख केंद्र रिक्त हो जाएंगे।
शासनादेश में इन केंद्रों को चलाने की जिम्मेदारी भी विभागीय अधिकारियों को सौंपी
गई है इसका सीधा मतलब है कि जो 62 वर्ष से कम उम्र कि वर्कर बचेंगी उनमे से एक
वर्कर के पास तीन से पांच केंद्र देखने की जिम्मेदारी होगी. अब एक साथ 3 या 4 गांव के
अंदर पोषाहार बांटना, रजिस्टर भरना, मंथली रिपोर्ट तैयार करना, आदि सभी काम वर्कर
को करने होंगे और काम करने में कुछ ना कुछ चूक तो हो ही जाएगी, चूक ना भी हुई और अधिकारी असंतुष्ट हो गए तब भी उसे निकाले जाने
का खतरा रहेगा।
इस तरह 62 वर्ष सें कम की जो वर्कर सेवा में बच भी जाएंगी उन पर काम का
बोझ कई गुना बढ़ने के साथ-साथ निकालने का खतरा लगातार बना रहेगा।
62 वर्ष कि आंगनवाड़ी को हटाने का मामला बहुत गंभीर है इसे गंभीरता
से लेते हुए मिलकर लड़ना चाहिए.
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