Tuesday, May 12, 2020

कैफ़ी आजमी कि ये नज़्म आज भी प्रासंगिक है





आज की रात
कैफी आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,

आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,

सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी


ये जमीं तब भी निगल लेने पे आमादा थी,
पांव जब टूटती शाखों से उतारे हमने,
इन मकीनो को ख़बर है,
न  मकानों  को ख़बर
उन दिनों की जो
गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने

सिर्फ खाक़ा था, जो सच पूछो तो खाका भी ना था
जिससे ये कसर
ये एवान  उतारे हमने

हाथ ढलते गए सांचों में तो थकते कैसे,
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने,

की ये दीवार बुलन्द,
और बुलन्द,
और बुलन्द,
बाम-ओ-दर*
और ज़रा
और सांवरे हमने

आंधियां तोड़ लिया करतीं थीं
शम्ओं की लौएं,
जड़ दिए इसलिए
बिजली के सितारे हमने 

बन गया कस्र*
तो पहरे पे कोई बैठ गया,
सो रहे ख़ाक पे हम
शोरिश*-ए-तामीर* लिए

अपनी नस-नस में लिए मेहनत-ए-पैहम* की थकन,
बंद आंखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए,
दिन पिघलता है उसी तरह सरों पर अब तक,
रात आंखों में खटकती है सियाह* तीर लिए

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी

मकीनों: मकानों के वासी
बाम-ओ-दर: छत और दरवाज़े
कस्र: महल
शोरिश: शोरगुल
तामीर: सृजनात्मकता
मेहनत-ए-पैहम: छुपी हुई मेहनत
सियाह: अंधेरा 

No comments:

Post a Comment