मई दिवस का इतिहास
शिकागो के शहीद
आज हम 8 घंटे काम के दिन को बहुत ही मामूली
ढंग से लेते हैं ऐसा लगता है जैसे 8 घंटे काम के दिन का अधिकार हमेशा से
ही था. आज हमें याद करने की जरूरत है कि ये सब इतना आसान नहीं था. मजदूर के अन्दर
हुनर है, जो साधारण कपड़े को आकर्षक परिधान में, दाल, चावल मसाले को लाखों तरह के
स्वादिष्ट वयांजन में, बंज़र खेतों को लह्लाह्लाती फसलों में, पत्थर के टुकड़े को
सजीव मूर्ती में बदल कर उस कच्चे माल की कीमत को कई गुना बढ़ा देता है. और इस कई गुना
बड़ी हुई कीमत को वसूलने के लिए पूंजीपति चाहता है कि काम के घंटे कम करने तो दूर की
बात मजदूर ज्यादा से ज्यादा समय काम करे, और
पूंजीपति के लिए मुनाफा पैदा करे. मजदूर को काम के घंटे नियत करने का अधिकार मिलना
ऐसा था जैसे चील के मुंह से मांस छुड़ाना.
8 घंटे काम का अधिकार मिलना आसान नहीं
था. हमारी पुरानी पीढी के मजदूर साथियों ने जो कठिन संघर्ष किए और जो कुर्बानियां
दी उसका नतीजा है जो हमें 8 घंटे काम का दिन के साथ साथ श्रमिकों के पक्ष में कुछ अन्य अधिकार
भी मिले हैं। 1 मई का दिन इन्हीं संघर्षों और कुर्बानियों को याद करने का दिन है, और संघर्षों और
कुर्बानियों की इस विरासत को आगे बढ़ाने का दिन है। 1 मई को दुनियाभर के
सभी मुल्कों में मजदूर जुलूस,
प्रदर्शन, हड़ताल और अन्य
कार्यक्रमों के जरिए अपनी एकजुटता को मजबूत बनाते हैं और मजदूर वर्ग के महान
शिक्षक कार्ल मार्क्स के लिए नारे को बुलंद करते हैं कि दुनिया के मजदूरों एक हो ।
मई दिवस का जन्म 8 घंटे काम के दिन के अधिकार के संघर्ष के तूफानी दौर से जन्मा है। पूंजीवाद के जन्म के साथ आधुनिक मजदूर वर्ग का उदय हुआ । शहरों का विकास होने लगा गांव से आकर बहुत से मजदूर इन फैक्ट्रियों में काम करने लगे और शहर के चारों तरफ झुग्गी झोपड़ी में बसने लगे। गांव के सामंती उत्पीड़न से त्रस्त होकर यह मजदूर आभासी आजादी का सपना लेकर शहर आए और फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन यूनिट में काम करने लगे। सस्ते श्रम के लिए पूंजीपति भी एक देश के मजदूर को दूसरे देश में जाने को,प्रोत्साहित करते। अमरीका में भी दुसरे देशों के श्रमिक बड़ी संख्या में काम करते थे.अमरीका के दक्षिणी राज्यों में अफ्रीका के काले लोगों से गुलामी कराने के लिए अमेरिका लाया जाता था इस गुलामी प्रथा के खिलाफ उत्तर और दक्षिण के राज्यों में भीषण संघर्ष हुआ और अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में दास प्रथा का खात्मा हुआ और अमेरिका में भी काले मजदूरों को देश के किसी भी हिस्से में जाकर काम करने की स्वतंत्रता मिली। अमरीका में भी प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या थी जिन्हें नाम मात्र की मजूरी देकर दिन रात काम कराया जाता था. यहाँ तक कि काम की अदिकता के कारण in मजदूरों की औसत उम्र 40 साल की ही थी.
फैक्ट्रियों में जो मजदूर काम करते थे उनके हालात बहुत खराब थे औरतें और बच्चे भी काम करते थे. रोशनी की कमी, गंदगी, कई कई घंटों तक एक ही अवस्था में काम करना, बीच में आराम का ना मिलना उनके स्वास्थ्य को बहुत जल्दी खराब कर देता था. इसके अलावा 12 से 14 घंटे तक काम करना पड़ता था काम का कोई निश्चित समय नहीं था मजदूर बेचारे तब तक काम रहते जब तक बेदम होकर गिर ना जाए ।”सूरज उगने से लेकर रात होने तक” मज़दूर कारख़ानों में काम करते थे. वे अपने बच्चों तक से बात ना कर पाते, जब घर से निकलते तो बच्चे सो रहे होते और जब घर लौटते तो बच्चे सो गए होते. इन हालात में काम के घंटे तय करने की बात शुरू हो गई। दुनिया में वैज्ञानिक समाजवाद और साम्यवाद के सिद्धांत की लोकप्रियता, पेरिस कम्यून, फ्रेंच रिवॉल्यूशन, नागरिक अधिकार आंदोलन के प्रभाव के कारण काम के घंटे नियत करने की मांग ने जोर पकड़ा।
अमेरिका में फिलाडेल्फिया के बढ़ईयो ने 1791 में 10 घंटे के काम के दिन के लिए हड़ताल की। 1830 आते आते यह सारे मजदूरों की मांग बन गई । 10 घंटे के आंदोलन का मजदूरों के जीवन पर काफी असर पड़ा 1830 से 1860 तक औसत दिन 12 घंटे से घटकर 11 घंटे रह गया। 1866 में मजदूरों की एक आम सभा जो बाल्टीमोर शहर में हुई थी उसमें घोषणा की गई कि ऐसा कानून पास कराया जाए, जो पूरे अमेरिका में 8 घंटे काम का दिन लागू करें। इसके 6 साल बाद 1872 में न्यूयॉर्क शहर के 1 लाख मजदूरों ने हड़ताल की और 8 घंटे के काम के दिन का अधिकार हासिल किया लेकिन यह ज्यादातर भवन निर्माण मजदूर थे।
साल 1884 में अमेरिका और कनाडा के मजदूर यूनियनों के फेडरेशन के सम्मेलन में बढई और मिस्त्रीओ के संगठन की नीव डालने वाले मजदूर जॉर्ज एडमंड्सटन ने सम्मेलन में प्रस्ताव रखा कि, सभी मजदूर संगठन 1 मई, 1886 से इस प्रस्ताव को लागू करने का संकल्प लें।
उस वक्त अमेरिका के मजदूर आंदोलन में तीन मुख्य धाराएं थी. वहां सबसे बड़े संगठन का नाम आर्डर ऑफ द नाइट्स ऑफ लेबर था । नाइट्स शब्द सामंती समाज में शूरवीर या वीर पुरुषों के लिए प्रयोग किया जाता था। इस संगठन ने 1878 में अपने पहले संविधान में ही 8 घंटे काम के दिन की मांग को शामिल किया था लेकिन यह संगठन जुझारू संघर्ष की बजाए अमेरिका की राजधानी में नेताओं को राजी करने पर ज्यादा जोर देता था। इन्होंने फेडरेशन ऑफ ट्रेड एंड लेबर यूनियन fotlu बनाया, जिसमें समाजवादी और मार्क्सवादी भी शामिल थे।
मजदूर आंदोलन की दूसरी धारा अराजकतावादियों यानी अनार्किस्ट की थी जिन्होंने 1883 में इंटरनेशनल वर्किंग पीपुल्स एसोसिएशन यानी मेहनतकश लोगों का अंतरराष्ट्रीय संघ बनाया. इस संगठन के अंदर कई अलग-अलग तरह के भी विचार मौजूद थे लेकिन यह लोग कानूनी और चुनावी अभियान के बजाए जुझारू तौर-तरीकों के पक्ष में थे. तीसरी धारा समाजवादियों की थी, जो कानूनी पक्ष के साथ जुझारू संघर्षो पर भी जोर देते थे.
1886 के लिए चल रहे अभियान में इन तीनों धाराओं के सभी हिस्से शामिल थे यद्यपि नाइट्स ऑफ लेबर की फेडरेशन ने आंदोलन में शामिल होने से इंकार कर दिया लेकिन उनकी स्थानीय कमेटी ने इसमें भागीदारी करना जारी रखा। 8 घंटे का आंदोलन को बढ़ते समर्थन के कारण पूंजीपतियों में हड़कंप मच गया । वे अपने स्तर पर मजदूर आंदोलन को दबाने के लिए तालाबंदी , हड़ताल तोड़ने के लिए नए मजदूरों की भर्ती, पुलिस और निजी सुरक्षा एजेंसियों की नियुक्ति, मजदूरों को धमकाने के लिए जासूसों और ठगों को हायर करना, और मजदूरों के बीच उन्हें बांटने के लिए स्थानीय बनाम आप्रवासी , गोरा बनाम काला रंग , मजदूरों की एकता को तोड़ने के लिए जातीयता श्रेष्ठता के आधार पर भेदभाव फ़ैलाने में जुट गएर. इस 8 घंटे के काम का आंदोलन का इतना प्रभाव था की नाइट्स ऑफ लेबर की सदस्यता जिसने कट्टरवाद और समाजवाद को खारिज कर दिया था, लेकिन 8 घंटे के काम कार्य दिवस का समर्थन किया था इस संगठन की सदस्यता अट्ठारह सौ चौरासी में 70 है,अट थी जो 1886 तक बढ़कर 7 लाख से ज्यादा हो गई। शिकागो में अराजकतावादी आंदोलनकारी ज्यादातर अप्रवासी थे और वह जर्मन भाषा के समाचार पत्र जिनका संपादन अगस्त स्पाइस करता था आर्बिटर ज़ेतुंग यानी वर्कर्स टाइम्स (workers times) के चारों ओर केंद्रित थी।
पूंजीपति और मालिकों का समर्थक मीडिया बार-बार डरा रहे थे कि 1 मई को हिंसा होगी लेकिन दुनिया का पहला मई दिवस एक शानदार सफलता के साथ संपन्न हुआ उस दिन लाखों मजदूर शांतिपूर्ण हड़ताल और प्रदर्शनों में शामिल हुए सबसे बड़ा प्रदर्शन शिकागो में हुआ जहां लगभग 90000 मजदूरों ने जुलूस निकाला इसमें से 40 हजार मजदूर अपने कारखानों से हड़ताल करके आए थे और शिकागो के एक मास पैक करने वाले कारखाने के 35000 मजदूरों ने इस हड़ताल के बाद 8 घंटे काम का अधिकार हासिल कर लिया और उनकी तनख्वाह भी नहीं कटी थी। पूरे अमेरिका में लगभग 5 लाख मजदूरों ने मई दिवस के जुलूस और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। शिकागो में ही 11,000 फ़ैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे.
8 घंटे काम का आंदोलन शिकागो में बहुत मजबूत था यहां आई पी डब्ल्यू ए के पास बड़ी सदस्यता थी और अल्बर्ट पार्सन और अगस्त स्पाइस जैसे तेजतर्रार नेता थे, कई हजार सक्रिय सदस्य थे और ये 3 भाषाओं में पांच अखबार निकालते थे। 3 मई 1886 तक शिकागो में हड़ताली मजदूरों की संख्या और बढ़ गई.
मई दिवस का जन्म 8 घंटे काम के दिन के अधिकार के संघर्ष के तूफानी दौर से जन्मा है। पूंजीवाद के जन्म के साथ आधुनिक मजदूर वर्ग का उदय हुआ । शहरों का विकास होने लगा गांव से आकर बहुत से मजदूर इन फैक्ट्रियों में काम करने लगे और शहर के चारों तरफ झुग्गी झोपड़ी में बसने लगे। गांव के सामंती उत्पीड़न से त्रस्त होकर यह मजदूर आभासी आजादी का सपना लेकर शहर आए और फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन यूनिट में काम करने लगे। सस्ते श्रम के लिए पूंजीपति भी एक देश के मजदूर को दूसरे देश में जाने को,प्रोत्साहित करते। अमरीका में भी दुसरे देशों के श्रमिक बड़ी संख्या में काम करते थे.अमरीका के दक्षिणी राज्यों में अफ्रीका के काले लोगों से गुलामी कराने के लिए अमेरिका लाया जाता था इस गुलामी प्रथा के खिलाफ उत्तर और दक्षिण के राज्यों में भीषण संघर्ष हुआ और अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में दास प्रथा का खात्मा हुआ और अमेरिका में भी काले मजदूरों को देश के किसी भी हिस्से में जाकर काम करने की स्वतंत्रता मिली। अमरीका में भी प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या थी जिन्हें नाम मात्र की मजूरी देकर दिन रात काम कराया जाता था. यहाँ तक कि काम की अदिकता के कारण in मजदूरों की औसत उम्र 40 साल की ही थी.
फैक्ट्रियों में जो मजदूर काम करते थे उनके हालात बहुत खराब थे औरतें और बच्चे भी काम करते थे. रोशनी की कमी, गंदगी, कई कई घंटों तक एक ही अवस्था में काम करना, बीच में आराम का ना मिलना उनके स्वास्थ्य को बहुत जल्दी खराब कर देता था. इसके अलावा 12 से 14 घंटे तक काम करना पड़ता था काम का कोई निश्चित समय नहीं था मजदूर बेचारे तब तक काम रहते जब तक बेदम होकर गिर ना जाए ।”सूरज उगने से लेकर रात होने तक” मज़दूर कारख़ानों में काम करते थे. वे अपने बच्चों तक से बात ना कर पाते, जब घर से निकलते तो बच्चे सो रहे होते और जब घर लौटते तो बच्चे सो गए होते. इन हालात में काम के घंटे तय करने की बात शुरू हो गई। दुनिया में वैज्ञानिक समाजवाद और साम्यवाद के सिद्धांत की लोकप्रियता, पेरिस कम्यून, फ्रेंच रिवॉल्यूशन, नागरिक अधिकार आंदोलन के प्रभाव के कारण काम के घंटे नियत करने की मांग ने जोर पकड़ा।
अमेरिका में फिलाडेल्फिया के बढ़ईयो ने 1791 में 10 घंटे के काम के दिन के लिए हड़ताल की। 1830 आते आते यह सारे मजदूरों की मांग बन गई । 10 घंटे के आंदोलन का मजदूरों के जीवन पर काफी असर पड़ा 1830 से 1860 तक औसत दिन 12 घंटे से घटकर 11 घंटे रह गया। 1866 में मजदूरों की एक आम सभा जो बाल्टीमोर शहर में हुई थी उसमें घोषणा की गई कि ऐसा कानून पास कराया जाए, जो पूरे अमेरिका में 8 घंटे काम का दिन लागू करें। इसके 6 साल बाद 1872 में न्यूयॉर्क शहर के 1 लाख मजदूरों ने हड़ताल की और 8 घंटे के काम के दिन का अधिकार हासिल किया लेकिन यह ज्यादातर भवन निर्माण मजदूर थे।
साल 1884 में अमेरिका और कनाडा के मजदूर यूनियनों के फेडरेशन के सम्मेलन में बढई और मिस्त्रीओ के संगठन की नीव डालने वाले मजदूर जॉर्ज एडमंड्सटन ने सम्मेलन में प्रस्ताव रखा कि, सभी मजदूर संगठन 1 मई, 1886 से इस प्रस्ताव को लागू करने का संकल्प लें।
उस वक्त अमेरिका के मजदूर आंदोलन में तीन मुख्य धाराएं थी. वहां सबसे बड़े संगठन का नाम आर्डर ऑफ द नाइट्स ऑफ लेबर था । नाइट्स शब्द सामंती समाज में शूरवीर या वीर पुरुषों के लिए प्रयोग किया जाता था। इस संगठन ने 1878 में अपने पहले संविधान में ही 8 घंटे काम के दिन की मांग को शामिल किया था लेकिन यह संगठन जुझारू संघर्ष की बजाए अमेरिका की राजधानी में नेताओं को राजी करने पर ज्यादा जोर देता था। इन्होंने फेडरेशन ऑफ ट्रेड एंड लेबर यूनियन fotlu बनाया, जिसमें समाजवादी और मार्क्सवादी भी शामिल थे।
मजदूर आंदोलन की दूसरी धारा अराजकतावादियों यानी अनार्किस्ट की थी जिन्होंने 1883 में इंटरनेशनल वर्किंग पीपुल्स एसोसिएशन यानी मेहनतकश लोगों का अंतरराष्ट्रीय संघ बनाया. इस संगठन के अंदर कई अलग-अलग तरह के भी विचार मौजूद थे लेकिन यह लोग कानूनी और चुनावी अभियान के बजाए जुझारू तौर-तरीकों के पक्ष में थे. तीसरी धारा समाजवादियों की थी, जो कानूनी पक्ष के साथ जुझारू संघर्षो पर भी जोर देते थे.
1886 के लिए चल रहे अभियान में इन तीनों धाराओं के सभी हिस्से शामिल थे यद्यपि नाइट्स ऑफ लेबर की फेडरेशन ने आंदोलन में शामिल होने से इंकार कर दिया लेकिन उनकी स्थानीय कमेटी ने इसमें भागीदारी करना जारी रखा। 8 घंटे का आंदोलन को बढ़ते समर्थन के कारण पूंजीपतियों में हड़कंप मच गया । वे अपने स्तर पर मजदूर आंदोलन को दबाने के लिए तालाबंदी , हड़ताल तोड़ने के लिए नए मजदूरों की भर्ती, पुलिस और निजी सुरक्षा एजेंसियों की नियुक्ति, मजदूरों को धमकाने के लिए जासूसों और ठगों को हायर करना, और मजदूरों के बीच उन्हें बांटने के लिए स्थानीय बनाम आप्रवासी , गोरा बनाम काला रंग , मजदूरों की एकता को तोड़ने के लिए जातीयता श्रेष्ठता के आधार पर भेदभाव फ़ैलाने में जुट गएर. इस 8 घंटे के काम का आंदोलन का इतना प्रभाव था की नाइट्स ऑफ लेबर की सदस्यता जिसने कट्टरवाद और समाजवाद को खारिज कर दिया था, लेकिन 8 घंटे के काम कार्य दिवस का समर्थन किया था इस संगठन की सदस्यता अट्ठारह सौ चौरासी में 70 है,अट थी जो 1886 तक बढ़कर 7 लाख से ज्यादा हो गई। शिकागो में अराजकतावादी आंदोलनकारी ज्यादातर अप्रवासी थे और वह जर्मन भाषा के समाचार पत्र जिनका संपादन अगस्त स्पाइस करता था आर्बिटर ज़ेतुंग यानी वर्कर्स टाइम्स (workers times) के चारों ओर केंद्रित थी।
पूंजीपति और मालिकों का समर्थक मीडिया बार-बार डरा रहे थे कि 1 मई को हिंसा होगी लेकिन दुनिया का पहला मई दिवस एक शानदार सफलता के साथ संपन्न हुआ उस दिन लाखों मजदूर शांतिपूर्ण हड़ताल और प्रदर्शनों में शामिल हुए सबसे बड़ा प्रदर्शन शिकागो में हुआ जहां लगभग 90000 मजदूरों ने जुलूस निकाला इसमें से 40 हजार मजदूर अपने कारखानों से हड़ताल करके आए थे और शिकागो के एक मास पैक करने वाले कारखाने के 35000 मजदूरों ने इस हड़ताल के बाद 8 घंटे काम का अधिकार हासिल कर लिया और उनकी तनख्वाह भी नहीं कटी थी। पूरे अमेरिका में लगभग 5 लाख मजदूरों ने मई दिवस के जुलूस और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। शिकागो में ही 11,000 फ़ैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे.
8 घंटे काम का आंदोलन शिकागो में बहुत मजबूत था यहां आई पी डब्ल्यू ए के पास बड़ी सदस्यता थी और अल्बर्ट पार्सन और अगस्त स्पाइस जैसे तेजतर्रार नेता थे, कई हजार सक्रिय सदस्य थे और ये 3 भाषाओं में पांच अखबार निकालते थे। 3 मई 1886 तक शिकागो में हड़ताली मजदूरों की संख्या और बढ़ गई.
पूंजीपतियों ने घबराकर तय किया कि अब
मजदूरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी हो गई है। सारे के सारे अख़बार (जिनके मालिक
पूँजीपति थे।) ”लाल ख़तरे” के बारे में चिल्ल-पों मचा रहे थे। पूँजीपतियों ने आसपास से भी
पुलिस के सिपाही, निजी सुरक्षाकर्मियों,कुख्यात पिंकरटन एजेंसी के हथियारों से लैस
गुण्डों को भी करके मज़दूरों पर हमला करने के लिए तैयार रखा था। पूँजीपतियों ने
इसे ”आपात स्थिति”
घोषित कर दिया था। शहर के तमाम
धन्नासेठों और व्यापारियों की बैठक लगातार चल रही थी जिसमें इस ”ख़तरनाक स्थिति” से निपटने पर विचार
किया जा रहा था।
मैकार्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कम्पनी के
मजदूरों को तालाबंदी कर के 3
महीने पहले बाहर कर दिया गया था।
कारखाने में पुलिस और पिंकरटन कम्पनी के भाड़े की निजी गार्ड की देखरेख में हड़ताल
तोड़ने वाले भर्ती किए गए थे और कारखाना इन्हीं के दम पर चलाया जा रहा था ।
3 मई दोपहर की बात है, इस कारखाने से कोई चौथाई मील दूर स्पाइस
हड़ताली लकड़ी मजदूरों के सामने भाषण दे रहे थे. यह लकड़ी मजदूर तालाबंदी के शिकार
मजदूरों का साथ देने के लिए मैकॉमिक हार्वेस्टर कारखाने की तरफ चले। इसी अगस्त
स्पाइस ने हड़ताली मजदूरों को सलाह दी कि वह संगठित रहें एक साथ रहें और यूनियन के
साथ खड़े रहे, वरना वह सफल नहीं होंगे । वह इन मजदूरों के बीच भाषण कर रहे थे। जब
पाली बदलने के लिए यह भाड़े के मजदूर बाहर निकले तो हड़ताली मजदूर उनका विरोध करने
लगे इतनी देर में ही बहुत से पुलिसवाले वहां पहुंच गए । स्पाइस और उनके साथी भी आ गए
थे, पर पुलिस ने आगे नहीं बढ़ने दिया। हड़ताली मजदूरों को पुलिस की
टुकड़ी ने रोका और उन पर लाठियों से हमला किया और फिर निहत्थे मजदूरों पर गोलियां
चला दी. कम से कम 4 मजदूर मौके पर मारे गए और बहुत से घायल हो गए. हड़ताल तोड़ने के लिए ये
मालिकों के इशारे पर की गयी हिंसा थी.
स्पाइस ने तुरंत अंग्रेजी और जर्मन भाषा में दो पर्चे जारी की है और इस अत्याचार का जिम्मेदार मालिकों को ठहराया और पुलिस द्वारा की गई इन हत्याओं की निंदा करने के लिए है मार्केट में एक रैली बुलाई गई।
रैली वाले दिन यानी 4 मई को पुलिस ने हड़ताली मजदूरों पर जगह-जगह हमले किए इन हमलों के बावजूद शाम को होने वाली इस रैली में 3000 के लगभग मजदूर इकट्ठा हुए शहर का मेयर भी वहां पहुंचा था जो यह सुनिश्चित करना चाहता था की रैली शांतिपूर्ण रहे । इस रैली में पहले स्पाइस में भाषण दिया और पुलिस द्वारा की गई हत्या का विरोध किया। पारसन ने अपने भाषण में 8 घंटे के दिन की मांग उठाई । भीड़ शांतिपूर्ण थी और रैली शांतिपूर्ण ढंग से चल रही थी । मौसम खराब हो रहा था बारिश का अंदेशा था शहर के मेयर कार्टर हैरिसन सीनियर घर चले गए। पार्सन के साथ उनके बच्चे भी थे, मौसम बिगड़ता देख वे चले गए, स्पाइस भी दूसरी बैठक में भाग लेने के लिए वहां से चले गए । रात के लगभग 10:30 बजे थे । मजदूरों की संख्या बहुत कम रह गई थी, यह नेता एक वेगन पर खड़े होकर अपने भाषण कर रहे थे। जैसे ही फीलडेन ने अपना भाषण खत्म किया और नीचे उतरे पुलिस बड़ी तादाद में वहां पहुंच गई और सभा समाप्त करने के लिए कहा फीलडेन पुलिस की बात का जवाब दे ही रहे थे कि भीड़ में से किसी ने बम फेंका धातु के टुकड़े चारों तरफ फ़ैल गए. एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई 6 अधिकारी घायल हुए प्रदर्शनकारियों की भी मौत हुई और इसके तुरंत बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच गोलियों भी चली. 5 मिनट से भी कम समय में पूरा चौक खाली हो गया. घटना पर अपनी रिपोर्ट में इंस्पेक्टर ने लिखा की फायरिंग को रोकने का आदेश दिया था कि कहीं हमारे ही कुछ साथी अंधेरे में एक दूसरे पर गोली ना चला दे. एक अज्ञात पुलिस अधिकारी ने शिकागो ट्रिब्यून को बताया बहुत बड़ी संख्या में पुलिस वाले एक दूसरे के ही रिवाल्वर से घायल हो गए थे । कम से कम 7 पुलिसकर्मी और मारे गए और 60 से अधिक घायल हुए. छ: मज़दूर मारे गये और 200 से ज्यादा जख्मी हुए। प्रदर्शनकारियों में कितने मरे और कितने घायल हुए यह पूरी संख्या सामने नहीं आई, क्योंकि गिरफ्तारी के डर से कोई भी घायल नागरिक इलाज के लिए नहीं आया. पुलिस की सहायता के लिए पूंजीपति थे, प्रेस था व्यापारिक घराने थे, उनकी देखभाल अच्छे से हुई उनकी सहायता के लिए कई हजार डॉलर का दान आया जबकि सारे श्रमिक और अप्रवासी समुदाय विशेषकर जर्मन और बोहेमिया संदेह के घेरे में आ गए .
मजदूर नेताओं के घर, प्रिंटिंग प्रेस, और कार्यालय पर पुलिस छापे मारे गए दर्जनों संदिग्धों को जो उस समय घटनास्थल पर भी नहीं थे उन्हें गिरफ्तार किया गया. यहां तक कि सर्च वारंट के बगैर लोगों के घर में घुसकर तोड़फोड़ की गई उन्हें गिरफ्तार किया गया मजदूरों की मीटिंग हॉल को तोड़ दिया गया अखबार आर्बिटर ज़ीतुंग के दफ्तर में दबिश दी गई। आठ मज़दूर नेताओं — अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्ट स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडाल्फ़ फ़िशर, सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग और आस्कर नीबे — पर झूठा मुक़दमा चलाकर उन्हें हत्या का मुजरिम क़रार दिया गया। इनमें से सिर्फ़ एक, सैमुअल फ़ील्डेन बम फटने के समय घटनास्थल पर मौजूद थे। जब मुक़दमा शुरू हुआ तो सात लोग ही कठघरे में थे। डेढ़ महीने तक अल्बर्ट पार्सन्स पुलिस की पकड़ में नहीं आया. वह पुलिस की पकड़ में आने से बच सकता था, लेकिन उसकी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया कि वह आज़ाद रहे जबकि उसके बेक़सूर साथी फ़र्जी मुक़दमें में फँसाये जा रहे हों. पार्सन्स ख़ुद अदालत में आया और जज से कहा, “मैं अपने बेक़सूर साथियों के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूँ।” प्रेस के मालिक, पूंजीपतियों और समाज के विभिन्न तबकों के बीच एक आम सहमति बनी कि अराजकतावादी आंदोलन का दमन जरूरी है. द नाइट ऑफ लेबर जैसे संगठनों ने अराजकतावादी आंदोलन से खुद को अलग करके दिखाया ।
कई मजदूरों पर भी शक हुआ जिन्होंने हो सकता बम फेंका हो, पर उनसे सख्ती से पूछ ताछ नहीं हुई. कई ने सरकारी गवाह बनकर झूठी गवाही दी. पुलिस ने झूठे गवाहों का बचाव किया, और देश से बाहर भेजने में भी मदद की. लेकिन काफी श्रमिकों का मानना था कि पिंकर्टन एजेंसी के पुरुष थे, जो गुप्त रूप से घुसपैठ करने वाले मजदूर समूह के बीच में आ गए थे और यह पहले भी मजदूरों की रणनीति और हड़ताल तोड़ने के हिंसक तरीकों को अपनाने के जिम्मेदार थे।
4 जून 1880 को 8 मजदूर नेताओं पर मुकदमा चलाया गया। पूँजीवादी न्याय के लम्बे नाटक के बाद 20 अगस्त 1887 को शिकागो की अदालत ने अपना फ़ैसला दिया। सात लोगों को सज़ा-ए-मौत और एक (नीबे) को पन्द्रह साल क़ैद बामशक्कत की सज़ा दी गयी.
स्पाइस ने तुरंत अंग्रेजी और जर्मन भाषा में दो पर्चे जारी की है और इस अत्याचार का जिम्मेदार मालिकों को ठहराया और पुलिस द्वारा की गई इन हत्याओं की निंदा करने के लिए है मार्केट में एक रैली बुलाई गई।
रैली वाले दिन यानी 4 मई को पुलिस ने हड़ताली मजदूरों पर जगह-जगह हमले किए इन हमलों के बावजूद शाम को होने वाली इस रैली में 3000 के लगभग मजदूर इकट्ठा हुए शहर का मेयर भी वहां पहुंचा था जो यह सुनिश्चित करना चाहता था की रैली शांतिपूर्ण रहे । इस रैली में पहले स्पाइस में भाषण दिया और पुलिस द्वारा की गई हत्या का विरोध किया। पारसन ने अपने भाषण में 8 घंटे के दिन की मांग उठाई । भीड़ शांतिपूर्ण थी और रैली शांतिपूर्ण ढंग से चल रही थी । मौसम खराब हो रहा था बारिश का अंदेशा था शहर के मेयर कार्टर हैरिसन सीनियर घर चले गए। पार्सन के साथ उनके बच्चे भी थे, मौसम बिगड़ता देख वे चले गए, स्पाइस भी दूसरी बैठक में भाग लेने के लिए वहां से चले गए । रात के लगभग 10:30 बजे थे । मजदूरों की संख्या बहुत कम रह गई थी, यह नेता एक वेगन पर खड़े होकर अपने भाषण कर रहे थे। जैसे ही फीलडेन ने अपना भाषण खत्म किया और नीचे उतरे पुलिस बड़ी तादाद में वहां पहुंच गई और सभा समाप्त करने के लिए कहा फीलडेन पुलिस की बात का जवाब दे ही रहे थे कि भीड़ में से किसी ने बम फेंका धातु के टुकड़े चारों तरफ फ़ैल गए. एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई 6 अधिकारी घायल हुए प्रदर्शनकारियों की भी मौत हुई और इसके तुरंत बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच गोलियों भी चली. 5 मिनट से भी कम समय में पूरा चौक खाली हो गया. घटना पर अपनी रिपोर्ट में इंस्पेक्टर ने लिखा की फायरिंग को रोकने का आदेश दिया था कि कहीं हमारे ही कुछ साथी अंधेरे में एक दूसरे पर गोली ना चला दे. एक अज्ञात पुलिस अधिकारी ने शिकागो ट्रिब्यून को बताया बहुत बड़ी संख्या में पुलिस वाले एक दूसरे के ही रिवाल्वर से घायल हो गए थे । कम से कम 7 पुलिसकर्मी और मारे गए और 60 से अधिक घायल हुए. छ: मज़दूर मारे गये और 200 से ज्यादा जख्मी हुए। प्रदर्शनकारियों में कितने मरे और कितने घायल हुए यह पूरी संख्या सामने नहीं आई, क्योंकि गिरफ्तारी के डर से कोई भी घायल नागरिक इलाज के लिए नहीं आया. पुलिस की सहायता के लिए पूंजीपति थे, प्रेस था व्यापारिक घराने थे, उनकी देखभाल अच्छे से हुई उनकी सहायता के लिए कई हजार डॉलर का दान आया जबकि सारे श्रमिक और अप्रवासी समुदाय विशेषकर जर्मन और बोहेमिया संदेह के घेरे में आ गए .
मजदूर नेताओं के घर, प्रिंटिंग प्रेस, और कार्यालय पर पुलिस छापे मारे गए दर्जनों संदिग्धों को जो उस समय घटनास्थल पर भी नहीं थे उन्हें गिरफ्तार किया गया. यहां तक कि सर्च वारंट के बगैर लोगों के घर में घुसकर तोड़फोड़ की गई उन्हें गिरफ्तार किया गया मजदूरों की मीटिंग हॉल को तोड़ दिया गया अखबार आर्बिटर ज़ीतुंग के दफ्तर में दबिश दी गई। आठ मज़दूर नेताओं — अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्ट स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडाल्फ़ फ़िशर, सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग और आस्कर नीबे — पर झूठा मुक़दमा चलाकर उन्हें हत्या का मुजरिम क़रार दिया गया। इनमें से सिर्फ़ एक, सैमुअल फ़ील्डेन बम फटने के समय घटनास्थल पर मौजूद थे। जब मुक़दमा शुरू हुआ तो सात लोग ही कठघरे में थे। डेढ़ महीने तक अल्बर्ट पार्सन्स पुलिस की पकड़ में नहीं आया. वह पुलिस की पकड़ में आने से बच सकता था, लेकिन उसकी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया कि वह आज़ाद रहे जबकि उसके बेक़सूर साथी फ़र्जी मुक़दमें में फँसाये जा रहे हों. पार्सन्स ख़ुद अदालत में आया और जज से कहा, “मैं अपने बेक़सूर साथियों के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूँ।” प्रेस के मालिक, पूंजीपतियों और समाज के विभिन्न तबकों के बीच एक आम सहमति बनी कि अराजकतावादी आंदोलन का दमन जरूरी है. द नाइट ऑफ लेबर जैसे संगठनों ने अराजकतावादी आंदोलन से खुद को अलग करके दिखाया ।
कई मजदूरों पर भी शक हुआ जिन्होंने हो सकता बम फेंका हो, पर उनसे सख्ती से पूछ ताछ नहीं हुई. कई ने सरकारी गवाह बनकर झूठी गवाही दी. पुलिस ने झूठे गवाहों का बचाव किया, और देश से बाहर भेजने में भी मदद की. लेकिन काफी श्रमिकों का मानना था कि पिंकर्टन एजेंसी के पुरुष थे, जो गुप्त रूप से घुसपैठ करने वाले मजदूर समूह के बीच में आ गए थे और यह पहले भी मजदूरों की रणनीति और हड़ताल तोड़ने के हिंसक तरीकों को अपनाने के जिम्मेदार थे।
4 जून 1880 को 8 मजदूर नेताओं पर मुकदमा चलाया गया। पूँजीवादी न्याय के लम्बे नाटक के बाद 20 अगस्त 1887 को शिकागो की अदालत ने अपना फ़ैसला दिया। सात लोगों को सज़ा-ए-मौत और एक (नीबे) को पन्द्रह साल क़ैद बामशक्कत की सज़ा दी गयी.
10 नवम्बर 1887 को सबसे कम उम्र के नेता लुइस लिंग्ग ने कालकोठरी में आत्महत्या कर
ली.11 नवम्बर 1887, शुक्रवार को
पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फ़िशर को शिकागो की कुक काउण्टी जेल में फाँसी दे दी गयी.
अफ़सरों ने मज़दूर नेताओं की मौत का तमाशा देखने के लिए शिकागो के लगभग 180
धनवान शहरियों को बुला रखा था. लेकिन मज़दूरों को डर से काँपते-घिघियाते
देखने की उनकी तमन्ना धरी की धरी रह गयी. वहाँ मौजूद एक पत्रकार ने बाद में लिखा :
“चारों मज़दूर नेता क्रान्तिकारी गीत गाते हुए फाँसी के तख्ते तक पहुँचे और शान के
साथ अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो हुए। फाँसी के फन्दे उनके गलों में डाल दिये गये।
स्पाइस का फन्दा ज्यादा सख्त था,
फ़िशर ने जब उसे ठीक किया तो स्पाइस
ने मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। फिर स्पाइस ने चीख़कर कहा, ‘एक समय आयेगा जब
हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से ज्यादा ताक़तवर होगी जिन्हें तुम आज दबा डाल रहे हो…’ फिर पार्सन्स ने
बोलना शुरू किया, ‘मेरी बात सुनो…
अमेरिका के लोगो! मेरी बात सुनो… जनता की आवाज़ को
दबाया नहीं जा सकेगा…’ लेकिन इसी समय तख्ता खींच लिया गया। 13 नवम्बर को चारों
मज़दूर नेताओं की शवयात्रा शिकागो के मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। पाँच
लाख से भी ज्यादा लौग इन नायकों को आख़िरी सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े.”
इन पांचों को
फॉरेस्ट पार्क में जर्मन वेल्थहेम सिमेट्री ,
में दफनाया गया। बाद में फॉरेस्ट
पार्क में ही जर्मन वेल्थहेम सिमेट्री फॉरेस्ट
होम सीमेट्री में जुड़ गई।
अब सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल
श्वाब और नीब ही जेल में थे. 6 साल बाद 26 जून, 1893 को इलिनॉइस
के गवर्नर जॉन पीटर अल्टगेल्ड ने इन आरोपियों को इन पर लगे सभी आरोपों से मुक्त करके रिहा कर
दिया । सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब और नीब को रिहा करते
हुए उन्होंने इस केस में अन्याय करने के लिए पूरी न्याय वयवस्था की आलोचना की. उनका कहना था कि जिस अपराध की सजा इन्हें मिली और उनकी मृत्यु हुई वह इन
अपराधियों ने किया ही नहीं था, ये सभी निर्दोष थे।
इस फैसले को लेकर उनका क्रिटिसिज्म भी हुआ, और उनका राजनीतिक उत्पीडन भी. लेकिन अपने फैसले के समर्थन में और लौगों द्वारा उठाये जा रहे सवालों के जवाब में उनहोंने बहुत से लेख लिखे और भाषण दिए. श्वान और नीबे को भी मृत्यु के बाद यही दफनाया गया। माइकल फील्डेन ही ऐसे शहीद है जिनकी कब्र यहां नहीं है.
इस फैसले को लेकर उनका क्रिटिसिज्म भी हुआ, और उनका राजनीतिक उत्पीडन भी. लेकिन अपने फैसले के समर्थन में और लौगों द्वारा उठाये जा रहे सवालों के जवाब में उनहोंने बहुत से लेख लिखे और भाषण दिए. श्वान और नीबे को भी मृत्यु के बाद यही दफनाया गया। माइकल फील्डेन ही ऐसे शहीद है जिनकी कब्र यहां नहीं है.
पायनियर ऐड एंड
सपोर्ट एसोसिएशन ने दफनाने के स्थान पर एक स्मारक बनाने के लिए फंड इकट्ठा करना
शुरू किया
1893 में हे मार्केट शहीद स्मारक,
मूर्तिकार अल्बर्ट वेनर्ट वेल्दम
में एक स्मारक बनाया। इसे 25 जून 1993 को एक मार्च निकालकर समर्पित किया गया इस पर पर शहादत का साल
खुदा है और स्पाइस की बहुत मशहूर कोटेशन है जो उसने ठीक फांसी से पहले शब्द कहे थे,
“एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी खामोशी उन आवाजों से ज्यादा ताकतवर होगी जिन
आवाजों को तुम आज दबा रहे हो.”
स्मारक के पीछे की
साइड में इन सभी शहीदों के नाम लिखे हैं,
और यहां एक प्लक/प्लेट है जिस पर
इलिनॉइस के गवर्नर जॉन पीटर अल्टगेल्ड कें पत्र की पंक्तियाँ अंकित हैं, जिसमें
उन्होंने in सभी शहीदों पर लगाए गए सभी आरोपों से मुक्त किया था। उन्होंने कहा था
कि बिना पर्याप्त सबूतों के in सभी पर मुकदमा चलाकर फांसी दी गयी.
![]() |
| हे मार्केट में शहीद स्मारक, का बोर्ड |
इस मौके पर इस स्मारक
के समर्पण समारोह में बड़ी संख्या में मजदूरों ने अपनी यूनियन के झंडो के साथ
भागीदारी की यूरोपियन यूनियन और अमेरिका ने यहां फूल भेजें.
हे मार्किट की पूरी घटना
मजदूर आन्दोलन को दबाने की बड़ी साज़िश थी, क्यों कि इसमें चुन चुन कर सबसे आगे की पंक्ति
के नेताओं को टारगेट किया गया. आर्बिटर ज़ितुंग अखबार जर्मन आप्रवासी
मजदूरों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय था. आर्बिटर ज़ितुंग अखबार के संपादक अल्बर्ट
पारसन, टाइपोग्रफर एडोल्फ
फिशर, अंग्रेज़ी
बोलने वाले मजदूरों के बीच सब से लोकप्रिय अखबार दी अलार्म के सम्पादक अगस्त स्पाइस को फांसी पर चढ़ा दिया, सहायक
संपादक माइकल श्वाब को आजीवन कारावास.
हे मार्केट बम विस्फोटों से जुड़े आठ शहीदों
में से 5 जर्मन मूल के जासूस, फिशर, एंगेल, लिंगग और श्वाब - जर्मन में जन्मे प्रवासी मजदूर थे, एक छठा, नीबे, जर्मन मूल का अमेरिकी नागरिक था.
और , क्रमशः ब्रिटिश विरासत के थे
दो अँगरेज़ थे , जिनमे से एक फील्डन का जन्म इंग्लैंड, और दूसरे पार्सन्स का जन्म अमरीका में हुआ था और उनके purkhe इंग्लैंड से आकर अमरीका में बसे थे. इस तरह देखे तो मात्र एक अमरीकी और 7 प्रवासी मजदूर थे.
आखिर हे मार्किट में पुलिस पर बम किसने फेंका, इस सम्बन्ध में कुछ workers पर भी सवाल उठे पर अधिकाँश वर्कर्स का मानना था कि बम फेंकने वाला पिंकर्टन एजेंसी का कोई एजेंट था.
और , क्रमशः ब्रिटिश विरासत के थे
दो अँगरेज़ थे , जिनमे से एक फील्डन का जन्म इंग्लैंड, और दूसरे पार्सन्स का जन्म अमरीका में हुआ था और उनके purkhe इंग्लैंड से आकर अमरीका में बसे थे. इस तरह देखे तो मात्र एक अमरीकी और 7 प्रवासी मजदूर थे.
आखिर हे मार्किट में पुलिस पर बम किसने फेंका, इस सम्बन्ध में कुछ workers पर भी सवाल उठे पर अधिकाँश वर्कर्स का मानना था कि बम फेंकने वाला पिंकर्टन एजेंसी का कोई एजेंट था.
पिंकर्टन नेशनल डिटेक्टिव एजेंसी (Pinkerton National Detective Agency) के रूप में स्थापित, एक निजी सुरक्षा गार्ड और
जासूसी एजेंसी है. एक स्कॉटिश जासूस, स्कॉट्समैन एलन, ने 1850 में संयुक्त
राज्य अमेरिका में ये कम्पनी स्थापित की थी और वर्तमान में यह Securitas AB की सहायक कंपनी है। पिंकर्टन के एजेंटों ने सिक्योरिटी
गार्डिंग से लेकर प्राइवेट मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टिंग तक के काम किए। पिंकर्टन अपनी
शक्ति के दम पर दुनिया का सबसे बड़ा निजी संगठन था। 19 वीं शताब्दी के अंत और 20 वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों
के दौरान, व्यापारियों,फेक्ट्री मलिको, पूंजीपतियों
ने यूनियनों में घुसपैठ करने, हड़तालियों और संदिग्ध यूनियन लीडर्स
को कारखानों से बाहर निकालने और कार्यकर्ताओं को डराने के लिए गार्डों की आप के नाम
पर गुंडों की भर्ती करने के लिए पिंकर्टन एजेंसी को काम पर रखा।
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