1 अप्रैल, 2020 को 6 से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य
शिक्षा अधिकार कानून, 2009 को लागू
हुए दस वर्ष पूरे हो गए।भारत की संसद ने 4 अगस्त, 2009 को इस कानून को पास किया
और 1 अप्रैल 2010 में इसे लागू किया गया. आखिरकार आज़ादी के बाद देश को ऐसा एक
कानून मिला जिसकी परिकल्पना संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतो में की गयी थी. यधपि
0-6 साल के बच्चों को इससे बाहर रखा गया था, फिर भी इससे बहुत उम्मीद बढ़ी. कक्षा 8
तक की शिक्षा, उच्च शिक्षा की बुनियाद है. छोटा सा परिचय इस कानून का.
ज़रूरी
नहीं रोशनी चिरागों से ही हो,
तालीम से भी हो सकता है घर रोशन.
जी हाँ, ज़िन्दगी और देश को रोशन
करने में शिक्षा की बड़ी अहम् भूमिका है. प्रसिद्ध जर्मन कवि ब्रेख्त ने कहा है कि
“ऐ भूखे, तुम अपने लिए एक किताब की तलाश करो”, जिसका अर्थ हुआ कि भूखे के हाथ में
किताब होगी तो वह जान सकता है कि वह भूखा क्यों है, और उसे रोटी कैसे मिल सकती है.
इस कानून ने हक दिया है कि - कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा पूरी करने में बच्चों से स्कूल में फीस नही ली जायेगी. यही
नहीं किताबें, बस्ता, ड्रेस, जैसे अगर बच्चा देख नहीं पाता तो -ब्रेल लिपि की
किताबें , सुन
नहीं पाता तो सुनने की मशीन, ज़रूरत होने पर ट्राइसाइकिल आदि भी इस कानून के अनुसार सरकार उपलब्ध कराएगी ।
एक और बहुत ख़ास बात कि अगर बच्चें
ने बीच में स्कूल छोड़ दिया या कभी स्कुल
नहीं गया तो उस बच्चें को उसकी उम्र के मुताबिक क्लास में दाखिला दिया जायेगा। जैसे किसी की उम्र 10
साल है तो उसका दाखिला कक्षा 4 या 5 में किया जाएगा और दाखिले के पश्चात कक्षा में
दूसरे बच्चों के बराबर आने के लिए न्यूनतम 3 माह अधिकतम 02 वर्ष तक विशेष
प्रशिक्षण दिया जायेगा. मूल कानून में लिखा
था,किसी भी बच्चे को रोका नहीं जायेगा और बच्चे का सम्रग मूल्यांकन किया जायेगा । पर
अब 2019 में एक संशोधन कर दिया गया है. बच्चों को स्कूल में
किसी प्रकार का शारीरिक दण्ड,मानसिक यातना देना, जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र, भाषा या लड़के लड़की के आधार पर भेद
भाव करना गैर कानूनी होगा। उम्र के सबूत का अगर कोई दस्तावेज नहीं है तो ,माता-पिता या अभिभावक के शपथ पत्र को भी माना जायेगा
इस कानून ने
अध्यापक, अध्यापक बच्चों का अनुपात, प्रधानाध्यापक, और उनका कक्ष, 6 से 8 तक के स्कूल
में विषय वार शिक्षक, व्यायाम,कला के शिक्षक, आदि के बारे में
भी स्पष्ट उल्लेख किया है. अध्यापकों को दस
वर्षीय जनगणना, आपदा, चुनाव के कार्यों एवं ट्रेनिंग के अतिरिक्त किसी भी अन्य गैर
शैक्षणिक कार्य में नही लगाया जा सकता है.
इस कानून ने स्कूल
कैसा होगा, ये भी बताया है स्कूल में हर टीचर के लिए एक क्लास रूम, प्रधानाध्यापक के
लिए ऑफिस, बाउण्ड्री वाल (चहारदीवारी), खेल का मैदान, रसोई घर, स्टोर , बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय, सुरक्षित
और साफ़ पीने का पानी, और एक पुस्तकालय होगा.
इस कानून में बहुत हद तक शिक्षा का प्रबंधन माता-पिता के
हाथों में दे दिया है . स्कूल मैनेजमेंट कमेटी स्कूल की निगरानी/ देखभाल करेगी, बाल अधिकारों का संरक्षण व शिकायतों
को दूर करनें की व्यवस्था करेगी. स्कूल विकास योजना का निर्माण, इसका खर्च, और
खर्च की निगरानी इन्ही के हाथ में होगी.
स्थानीय प्राधिकारी,अपने क्षेत्र के समस्त बच्चों का जन्म से 14 वर्ष
की आयु तक का अभिलेख सर्वे के माध्यम से सुरक्षित रखेगे और देखेगे कोई बच्चा
शिक्षा से वंचित ना रहे.......
कानून ठीक से लागू हो ये सिर्फ सरकार की ही नहीं हमारी और आप की
भी ज़िम्मेदारी है. इसी ज़िम्मेदारे को निभा रहा है right टू education फोरम जिसे
संक्षेप में rte फोरम भी कहते है. यह शिक्षाधिकार कानून के क्रियान्वयन की पैरवी
और निगरानी का देश सबसे बड़ा नेटवर्क है. सभी राज्यों में इसका फैलाव है. rte फोरम के राष्ट्रिय संयोजक और
शिक्षाविद अम्बरीश राय ने कहा कि आज
देशव्यापी संकट की घड़ी में सरकारी अस्पताल और सरकारी स्कूल ही मरीजों के काम आ रहे
हैं. मुनाफाखोर प्राइवेट अस्पताल तो इस समय भी पैसा बनाने में जुटे हैं और
प्राइवेट स्कूलों ने अभी तक अपनी इमारतें मरीजों के लिए ऑफर नहीं की हैं जबकि वे
सरकार से कई तरह की छूट हासिल करते हैं। मौजूदा संकट सरकार के लिए भी एक चेतावनी है कि अगर निजीकरण को बढ़ावा देने के बजाय स्वास्थ्य और शिक्षा के सार्वजनिक ढांचे को मजबूत किया गया होता तो देश आज इतने बड़े संकट का सामना नहीं कर
रहा होता। उन्होने
मांग की है कि बजट में शिक्षा पर जीडीपी का कम-से-कम 6 फीसदी और स्वास्थ्य पर 5
फीसदी धनराशि खर्च हो.
उत्तर
प्रदेश में इस नेटवर्क का नाम स्टेट कलेक्टिव ओन राईट टू
education है और शोर्ट में स्कोर कहते है इसके संयोजक sanjeev सिन्हा ने बताया कि पिछले
10 वर्षो में इसी कानून की वजह से स्कूली
शिक्षा में नामांकन बढा है, लेकिन ठहराव की चुनौती बाकी है. हम स्कोर के माध्यम से
इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, निगरानी और जन भागीदारी बढाने, और smc को मजबूत करने का प्रयास कर रहे है।
इस तरह
शिक्षा अधिकार कानून ने हमे बहुत ताक़त दी है, ज़रूरत है कि हम इस कानून को समझे, और
अपने गाँव के स्कूल को सर्वश्रेष्ठ बनाने का प्रयास करें.
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