Tuesday, June 23, 2020

चीनी उत्पादों के बहिष्कारसे क्या समस्या हल हो पायेगी...









क्या छोटी दुकानों में बिक रहा चीनी माल तोड़कर, या chinese
खाने का विरोध   करके चीन कि आर्थिक  कमर तोड़ी जा सकती है . क्या चीन का विरोध सिर्फ
 सोशल मीडिया टाक ही सिमित रहेगा.
या बड़ी  कम्पनिया
विशेषकर टेलिकॉम कम्पनिया चीन के साथ अपना करार तोड़ेगी. आज वैश्वीकरण के इस दौर
में दुनिया के सारे देश एक दुसरे पर निर्भर हैं. कोई भी देश ये नहीं कह सकता कि वो
दुनिया से हटकर आत्मनिर्भर हो सकता हैं.
आइये आंकलन करें भारत चीन आर्थिक सम्बन्धों कि वास्तविकता
क्या हैं .

·        
भारत-चीन
के बीच
2020
के बीच 5 लाख 50 हजार
करोड़ रुपए का कारोबार हुआ
जिसमे  चीन
से
4 लाख 40 हजार
करोड़ का सामान खरीदा गया
·        
थिंक
टैंक गेटवेहाउस के मुताबिक
, यूनिकॉर्न क्लब में शामिल 30 में से 18 स्टार्टअप
में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी हैं.
·        
भारतीय
पुन्जिपत्यों के संघ फिक्की के मुताबिक
45% इलेक्ट्रॉनिक
आइटम और
27%
ऑटो पार्ट्स भी
चीन से आते हैं.


1.   जरूरी
दवाइयों के लिए
65% से ज्यादा
कच्चा माल चीन से आता है


पिछले साल 9 जुलाई को लोकसभा में केमिकल मंत्री डीवी
सदानंद गौड़ा ने बताया था कि भारत जरूरी दवाइयों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने
वाले कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर है।
2.   देश के टॉप-5 स्मार्टफोन ब्रांड में 4 चीन के

रिसर्च फर्म काउंटरप्वाइंट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में जनवरी से मार्च के बीच भारतीय
स्मार्टफोन मार्केट में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी
70% से भी ज्यादा है। देश के टॉप-5 स्मार्टफोन ब्रांड में से 4 चीन के हैं। सबसे ज्यादा 30% मार्केट शेयर श्याओमी का है। दूसरे नंबर
पर
17% मार्केट शेयर के साथ वीवो है। टॉप-5 में सिर्फ सैमसंग ही है, जो दक्षिण कोरियाई कंपनी है।
3.   स्टार्टअप
में भी चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी


चीन का एफडीआई भले ही कम हो, लेकिन वहां
की कई कंपनियों की हिस्सेदारी भारत के स्टार्टअप्स में है।
 थिंक टैंक गेटवे हाउस की रिपोर्ट के
मुताबिक
, यूनिकॉर्न क्लब में शामिल भारत के 30 में से 18 स्टार्टअप
में चीन का पैसा लगा है। चीन की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा
, टिकटॉक बनाने वाली बाइटडांस और टेक कंपनी
टेन्सेंट ही भारत के
92 स्टार्टअप को फंडिंग करती हैं। इनमें
पेटीएम
, फ्लिपकार्ट, बायजू, ओला और ओयो
जैसे स्टार्टअप भी शामिल हैं।

4.   स्मार्टफोन
ही नहीं
, ऐप मार्केट
में भी
40% हिस्सा चीनी
ऐप्स का हैं


भारतीय मार्केट में न सिर्फ चीनी कंपनियों के स्मार्टफोन, बल्कि चीनी ऐप्स भी काफी पॉपुलर हैं। चीन
की कंपनियां सस्ते स्मार्टफोन भारत में लॉन्च करती हैं और भारतीयों को यही पसंद
आते हैं। मार्केट रिसर्च फर्म टेकआर्क के मुताबिक
, दिसंबर 2019 तक भारत में 50 करोड़ से ज्यादा लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल
कर रहे
 थे। टिकटॉक, 12 करोड़ से
ज्यादा भारतीय चलाते हैं। कैमस्कैनर ऐप के
 भी भारत में
10 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं।
5.   कपड़ों, टीवी में भी चाइनीज माल

इसी साल फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट
आई थी
, उसके मुताबिक हमारी गाड़ियों में लगने वाले 27% ऑटो पार्ट्स चीन से आते हैं। 45% इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स चीन से आते हैं।
जबकि
, टीवी, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन और एसी बनाने में यूज होने
वाले
70% कंपोनेंट भी चीन से ही आते हैं। इतना ही
नहीं
, हर साल देश में करीब साढ़े तीन हजार
करोड़ रुपए का सिंथेटिक धागा
, ढाई हजार
करोड़ रुपए का सिंथेटिक कपड़ा और करीब एक हजार करोड़ रुपए के बटन
, जिपर, हैंगर और
निडिल
 जैसे छोटे सामान भी हम चीन से खरीदते
हैं।


Saturday, June 6, 2020

बॉयस लॉकर रूम : पूंजीवादी संस्कृति का रिसता ज़ख्म 1


रविवार 3 मई को  एक छात्रा ने इंस्टाग्राम पर चल रहे एक ग्रुप की चैटिंग के स्क्रीन शॉट शेयर करते हुए लिखा कि  साउथ दिल्ली के कक्षा 10 और 11 के छात्र एक  ग्रुप चलाते हैं जिसका नाम है बॉयस लॉकर रूम. इस ग्रुप में वे कम उम्र की लड़कियों, अपने साथ पढ़ने वाली छात्राओं की तस्वीरें शेयर करते हैं उन तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ करते हैं उनके बारे में अश्लील बातें करते हैं यहां तक कि वह उनके रेप की  भी योजना बनाते हैं। जो स्क्रीनशॉट शेयर हुए उनमें बहुत ही अभद्र, अश्लील बातें थीं, किसी ने लिखा था, "हम उसका आसानी से रेप कर सकते हैं," "तुम जहां कहोगे मैं आ जाऊंगा हम उसका गैंगरेप करेंगे". उस छात्रा ने इस चैट के स्क्रीन शॉट को सबके सामने लाते हुए कहा कि उसके स्कूल के भी दो लड़के इसमें शामिल  हैं।
यह खबर सामने आते ही इन लड़कों ने इंस्टाग्राम पर यह एकाउंट डिलीट कर दिया और एक और ग्रुप बनाया और दोस्तों से कहा कि वह फर्जी आईडी से इसमें शामिल हों। ‌लड़कों की मानसिकता और हिम्मत देखिए कि अपने व्यवहार से शर्मिंदा होने की बजाय एक और फर्जी ग्रुप बनाकर इ विरोध कर रही  लड़कियों को हैरेस करने की योजना बनाते हैं. जो लड़कियां लड़कों के विरोध में बोल रही हैं उनके विषय में चैटिंग करते हैं कि,‌ "भाई इनके न्यूड रिलीज कर देते हैं,"‌ "पता चलेगा फेमिनिज्म का नतीजा क्या होता है। कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगी”
यहां सब कुछ बहुत शर्मनाक और दुखद है. ये ना सिर्फ माता पिता को तकलीफ देने वाला है, बल्कि समाज के सामने भी गंभीर सवाल पैदा करता है।
ये बच्चे ज्यादातर नाबालिग हैं, और धड़ल्ले से बेखौफ होकर लड़कियों की फोटो से छेड़छाड़ और यहां तक कि गैंगरेप तक के लिए प्लानिंग बनाने लगते हैं. इनके माहौल, मानसिकता, पॉवर का अहंकार और समाजी बुराइयों का बेनिफिट लेने की चतुराई, का एक पूरा पैकेज इनके दिमाग में है. जब ये कहते है कि विरोध करने वाली लड़कियों कि नग्न फोटो रिलीज़ कर दो, कही मुंह दिखने लायक नहीं रहेंगी,तो इससे पता चलता है कि ये लड़के अच्छे तरह जानते हैं कि समाज में नग्न तस्वीर औरत की इज्ज़त से बहुत गहराई से जुडी है. और ये कहना कि इनका इनका सारा फेमिनिस्म निकल जायेगा, क्या बताता है ? क्या ये बच्चे फेमिनिस्म के बारे में कुछ जानते हैं. शायद इतना ही जानते होंगे कि जो लड़की मर्द कि मर्जी का विरोध करे, वह फेमिनिस्ट है. उसी तरह जैसे कुछ विचारक भूखे आदिवासी रोटी मांगे तो उन्हें माओवादी बता देते हैं.
यह सभी लड़के महंगे एरिया साउथ दिल्ली में रहते हैं और महंगे निजी विद्यालयों में पढ़ते हैं. इनके परिवार के बारे में मीडिया में बहुत डिटेल तो नहीं आया है लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि यह सभी अमीरों जिनमें बड़े पूंजीपति व्यापारी और अफसर शामिल हैं उन्हीं के बच्चे होंगे। एक्सेप्शन हर जगह होते हैं इसलिए परिवारों व् सभी सभी बच्चों को तो नहीं कह सकते, लेकिन इस वर्ग के अधिकांश बच्चे  ऐसी ही मानसिकता के साथ बड़े होते हैं।
यह वह बच्चे हैं जिनकी परवरिश में कई कई लोग लगे रहते हैं. मां के साथ-साथ आया, कई नौकर चाकर इनकी देखभाल में लगे होते हैं. इन्हें भूख लगे या ना लगे इनकी पसंद की हर चीज के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं .पेट भले ही भरा हो लेकिन माएं अच्छे से अच्छा भोज्य पदार्थ लेकर इनके पीछे घूमती रहती हैं. स्कूल जाते हैं तो उनकी ड्रेस से लेकर जूतों तक किताबों से लेकर बसते तक, कोई दूसरा आदमी पैक करता है और बस्ता हाथ में लेकर बच्चे को गोद में लेकर उन्हें स्कूल तक छोड़ने जाता है. स्कूल में भी खाने-पीने का पूरा इंतजाम घर से कर के दिया जाता है, फिर भी कैंटीन तो है ही वहां पर.
बहुत ही कम उम्र में यह बच्चे घर में अपने माता-पिता को घर के नौकरों और स्टाफ के साथ बर्ताव, के साथ साथ परिवार के अन्य सदस्यों और रिश्तेदारों से भी अलग-अलग बर्ताव करते देखते हैं, वह उनकी बातचीत सुनते हैं और उन्हें समझ में आता है कि उनके पैसे और पॉवर का रुतबा है. पूंजीवादी संस्कृति में पून्जी, मुनाफ़ा/फायदा और उपभोग के इर्द गिर्द ही सारे रिश्ते बुने होते हैं.संगीत, कला, साहित्य, खेल  इनके लिए मनोरंजन का साधन है, ये  जिसे चाहे खरीद सकते हैं. पैसे देकर सिने स्टार को पार्टी में बुला सकते हैं, डिनर पर खिलाडियों को बुला सकते हैं,अपना गम गलत करने को संगीत कि मफ्फिले सजा सकते है. खिलाडियों की नीलामी करा सकते हैं, टीमे खरीद कर मैच करा सकते हैं. इसके माध्यम से भी अपनी पूंजी को बढ़ाना ही इनका सबसे बड़ा मकसद है.             
इन बच्चों को बहुत ही जल्दी समझ में आ जाता है कि यह कुछ स्पेशल बच्चे हैं. इनके नौकर, इनकी आया, इनका ड्राइवर, और उनके पिता को सलाम करने वाले अन्य लोग इनके समतुल्य या इनकी क्लास के लोग नहीं है। इतना ही नहीं धर्म और जात के भेदभाव और अच्छाई बुराई की बातें भी इसी उम्र में सीखने लगते हैं भाई मां-बाप को बात करते हुए देखते हैं, पिता को अपने क्लाइंट से बात करते देखते हैं और समझने लगते हैं कि क्लाइंट को फसाने के लिए क्या-क्या किया जाता है, रिश्वतखोरी यानी रिश्वत देकर काम करना और रिश्वत लेकर काम करना, चालबाजी और सबसे ज्यादा समझ में आता है कि पैसा ही सब कुछ है. पढ़ाई यहां योग्यताएं इसके मुकाबले कुछ भी नहीं है यदि पैसा और पावर पास में है तो वह अपने पैसे से बहुत सारे पढ़े लिखो को खरीद सकते हैं, अपने यहां काम पर रख सकते हैं।

इसकी जड़ें इस गैर बराबरी,असमानता, शोषण पर आधारित पूंजीवादी समाज की जड़ में है. पूंजीवादी संस्कृति में काम करना सबसे घटिया काम माना जाता है और श्रम यानी लेबर का सम्मान करने का तो सवाल ही नहीं उठता। तो काम करने के बाद यानी अपना व्यापार, फैक्ट्री, नौकरी या जो भी काम करते हैं वह करना इनके लिए खुशी का स्रोत नहीं बल्कि इनके अन्दर थकान, ऊब, नीरसता पैदा करता है. इसी लिए काम के बाद अपनी थकान और ऊब को उतारने के लिए मनोरंजन की योजनाएं बनाते  हैं. इस मनोरंजन के केंद्र में होता है, शराब और लड़की. शाम को देर रात देर तक होने वाली पार्टियां, कैसीनो, बार, किसी के घर या फार्महाउस पर होने वाली पार्टी, या फिर कुछ चुनिन्दा मुल्को जैसे सिंगापूर, थाईलैंड आदि देशों कि ट्रिप.
इन पार्टियों में वैसे कॉरपोरेट्स, नेताओं,व्यापारियों और, पूंजीपतियों  का मिलन भी होता है, और डील भी होती है, लेकिन शराब और शबाब के साथ। मालिक की सेक्रेटरी के साथ ट्रिप, देर रात की पार्टियां, वहां मस्त बेलौस अंदाज़, शराब की ओवर डोज़, बार गर्ल्स का डांस, कॉल गर्ल्स से अश्लील और भददे कमेन्ट, माओं की चिंताएं और घबराहट, गैर औरतों से पति के ताल्लुकात पर लम्बी बहस, आदमियों के ग्रुप में boys लोकर रूम जैसी बातें, पुरुषों कि in हरकतों पर औरतों का सामान्य तौर पर ये कहना कि लड़के तो लड़के ही होते हैं, इन तमाम कारनामों पर एक झीना सा सुरक्षित आवरण डाल देता है. ये सब सिर्फ पितृ सत्ता या सामंती सोच बदलने का मामला नहीं है. दरअसल पूंजीवाद पित्र्सत्ता को निगलकर आदमखोर हो गया है. बॉयज लोकर रूम जैसी घटनाएँ,तो सड़ते पूंजी वाद का एक फोड़ा है. वैश्यवृत्ती, बाल वैश्यवृत्ती, बच्चों कि तस्करी, कला के नाम पर फूहड़ खेल जैसे सौन्दर्य प्रतियोगिताएं, मॉडलिंग, फैशन शो, स्पा और मसाज पार्लर के बहाने चल रहे क्लब, आदि अनेक घिनौने व्यापर इसका हिस्सा हैं. इनके संस्थानों,दफ्तरों,फैक्ट्री में काम कर रही औरतों से शर्मनाक बर्ताव, इस सब से श्रमिक वर्ग तो पीड़ित होता ही है लेकिन शोषक का भी इतना अमानवीयकरण हो जाता है कि वह in सब चीज़ों के लिए इतना अनुकूलित हो जाता है कि कल्पना ही नहीं कर सकता कि ऐसा कोई समाज हो सकता है जहाँ ये बुराइयाँ ना हों.
बच्चे ये सब देखते और ओब्जर्ब करते हैं. बल्कि ये सब कुछ उनके अन्दर अनजाने में ही अब्सोर्ब होता जाता है और उनके स्वाभाव का हिस्सा बन जाता है. सब देखकर  बच्चों को समझ में आता है कि लड़कियां बराबरी का बर्ताव करने वाली कोई इंसान नहीं।
जिस तरह से बच्चे यह समझ लेते हैं कि यह दूसरे धर्म का है हम इससे श्रेष्ठ है , या कोई छोटी जाति का है यह हमारे बराबर नहीं बैठ सकता, नौकर हमारी गलत बात को गलत नहीं कह सकता, ड्राईवर ने भले ही कई बार जान भी बचायी हो पर साथ बैठ कर खाना नहीं खा सकता, चाचा चाची, मौसा मौसी में किस का स्टेटस हमारे बराबर है या नहीं, नए साल कि पार्टी में किसे बुलाया जाए आदि आदि, उसी तरह बचपन से ही उनकी समझ में आने लगता है कि लड़कियों को पैसे से खरीदा जा सकता है, पैसें में  तोला में जा सकता है और पैसे से चुप भी कराया जा सकता है।
उन्हें समाज के बारे में भी इतनी जानकारी होती है कि अगर किसी लड़की को छेड़ा रेप किया उसकी नंगी तस्वीर सोशल मीडिया में डाल दी तो उस लड़की की जिंदगी तो बर्बाद हो सकती है, वह किसी को मुंह दिखाने काबिल नहीं रहेगी लेकिन उन लड़कों पर कोई असर नहीं पड़ेगा । यही सबसे बड़ी खतरनाक चीज है । बच्चे घर से बाहर जाने लगते हैं तो वह अपने पैसे और पावर की ताकत को भी समझने लगते हैं।
उदारीकरण के बाद निजी स्कूलों का एक बड़ा नेटवर्क बना हमारे सांसदों के 27% सांसदों के शैक्षिक स्कूल हैं और यह स्कूल क्या है शिक्षा की दुकानें हैं जहां पर कम पैसा देकर अच्छे अध्यापक रखे जाते हैं और जहां बहुत पैसे वालों के बच्चे पढ़ते हैं और इन स्कूलों में गरीबों का तो दूर की बात है जो इनके समुदाय के या इनकी पसंद के लोग नहीं होते उनको एडमिशन नहीं मिलता. आईएएस लॉबी ने भी अपना एक अलग स्कूल संस्कृति स्कूल दिल्ली में खोल रखा है, उन्हें लगता है कि पूंजीपति और नेताओं के बच्चों से अपने बच्चों को दूर रखा जाये. स्कूल में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और बड़ा होने के बावजूद को की लड़कियों को स्कूल में एडमिशन नहीं मिला था. शिक्षा की दुकानों में बच्चे के व्यक्तित्व के विकास का नहीं बल्कि उसे पूंजीवादी व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए निष्ठुर मशीन में बदलने का काम किया जाता है ।
साम्राज्यवाद ने दुनिया में विभाजन बनाए रखने के लिए बहुत तरीके अपनाए हैं. वीडियो गेम और कॉमिक्स उसका भी एक बहुत बड़ा माध्यम है. इनमें हिंसा,औरतों को मात्र सेक्स सिंबल मानने और नस्लीय नफरत कूट-कूट कर भरी है। फिर जो बचपन में बॉलीवुड की फिल्में देखते हैं उन फिल्मों में भी हिंसा और सेक्स की भरमार है. पोर्नोग्राफी और एडल्ट फिल्में शिक्षित करने के लिए नहीं बल्कि इस नाम पर औरतों के ही शोषण को बयां करती हैं.
इनसे दूर जहाँ तक स्पोर्ट्स का सवाल है तो खेलने के लिए खुद खेलने की क्या जरूरत है यह खरीद लेते हैं शर्त लगाते हैं और हाथ में कोल्ड ड्रिंक की बोतल और चिप्स लिए सारा दिन मैच देखते रहते हैं. यह पेसिव मनोरंजन है, जिसमे खेलने वाले कि कोई भागीदारी नहीं है. इसे खेलने के बाद इंसान थका हुआ महसूस करता है ना कि ऊर्जावान. इनकी देखा देखी मध्यवर्ग और निम्न वर्ग में भी क्रिकेट की अर्थनीति को समझे बिना विज्ञापन के भरम में इस खेल के चंगुल में फंसे अपना कीमती वक़्त ख़राब किये रहते हैं. और क्या करें.
आप ही देखे, बेचारे बहुत सारे पूंजी पतियों को, बहुत सारे अमीरों को कुत्ता पालन प्रतियोगिता में इनाम मिल जाता है, वे इसे अपना शौक बताते हैं. जबकि घर में कई कई नौकर कुत्ता पालने के लिए रखे रहते हैं. और यही नौकर ही डॉग शो में कुत्ता तक लेकर आते हैं, इनाम मालिक ले जाते हैं. कुछ लोग बताते हैं कि उनका शौक बागवानी है और घर में कई-कई माली उनके पौधों की देखभाल करते हैं और प्रशंसा और इनाम मालिक ले जाते हैं. इसलिए अधिकांश  बच्चों का इन सब चीजों में कोई शौक नहीं होता। तो फिर यह बच्चे करेगा क्या.  इतनी कम उम्र में माता-पिता इन्हें अपने बिजनेस में भी नहीं लगाना चाहते. इनके लिए हैं पैसे की कोई कमी नहीं है खाने पीने का बेहतरीन इंतजाम गाड़ियां हैं घूमने के लिए गाड़ियां हैं, इनके सामने लड़की ही ऐसा खिलौना खिलौना है जिसके साथ खेलकर यह मनोरंजन कर सकते हैं, कई बार ये लौग गरीबों, दलितों, आदिवासियों के साथ भी ऐसा  ही कर देते हैं. वे तस्वीर को शेयर करते हैं और लड़की के डरने का मजा लेते हैं, उसकी तस्वीर से छेड़छाड़ करते हैं लड़की और डर जाती है इन्हें और ज्यादा मजा आता है, हद से आगे बढ़ते हैं फिर लगता है कि अब रेप कर दे रेप में रेप में भी लड़की की तकलीफ देखकर मजा आता है, इसके आगे फिर गैंगरेप की बात करते हैं. यह मनोवैज्ञानिक रूप से विकृत मानसिकता है, ये सेडिस्म है. पूंजीपतियों और अमीरों के संगठन फिक्की और एसोचेम के साथ अधिकारी संगठनों को भी इस सम्बन्ध में बात करनी चाहिए.
      
ये सामाजिक बीमारियाँ, विकृतियाँ, इन्सान द्वारा इन्सान के शोषण पर आधारित पूंजीवाद के खत्म होने के साथ ही ख़तम होंगी. पूंजीवाद ने पितृसत्ता को निगल लिया है, और आदमखोर बन गया है. पूंजीवादी वयवस्था के खिलाफ संघर्ष बहु आयामी है, इसके मुकाबले के लिए राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक संघर्ष करते हुए कामकाजी,श्रमिकों,किसानों,कि संस्कृति को बढ़ाते हुए जन संस्कृति का निर्माण करना होगा. इस पतनशील संस्कृति से संघर्ष भी श्रमिक आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

श्रमिक संस्कृति की बुनियाद श्रम है. श्रम ही खुशी का स्रोत है. श्रम तो सृजन का उत्सव है, शानदार इमारतें, संगीत, कला, भोजन, रहन-सहन सब कुछ इन्सान ने बनाया है.  ये हमारी आम जनता कि, आदिवासियों, और श्रमिकों कि संस्कृति है जिस पर पूंजीवादी प्रचार तंत्र हावी हो गया है. हमारे त्यौहार हमारी फसलों से जुड़े हैं, हमारे श्रम का ही उत्सव हैं. पूंजीवाद ने अपने मुनाफे के लिए बाजारवाद से इसे ढँक दिया है, इसी बात को हमे पहचानना है. श्रम के साथ ही जीवन के वे श्रेष्ठ मानवीय मूल्य जुड़े हैं जो इन्सान को जानवर से अलग करते हैं. यहाँ वयकति का अहंकार नहीं सामूहिकता, गला काट प्रतियोगिता नहीं आपसी सहयोग, भेद भाव नहीं आपसी सौहार्द, महनत कि लूट नहीं बराबर का बंटवारा, ही जीवन की पहचान हैं. 
आम लोगों के बच्चे, श्रमिक,किसान और गरीबों के बच्चे घर में, खेत में दुकानों में, माता पिता का हाथ बंटाते हैं, अपनी किताबों को पाने के लिए मेहनत करते हैं, कुछ काम करते हैं और पढ़ने के लिए भी पैसा जुटाते हैं, भाई बहनों की देखभाल भी करते हैं. सरकारी स्कूल में बच्चे सुबह-सुबह घर का काम निपटा कर स्कूल पहुंचते हैं. श्रमिक आंदोलन के बढ़ने के साथ-साथ श्रमिक संस्कृति भी आगे बढ़ेगी सामूहिकता, बराबरी, मेहनत के फल को बराबर बांटने की आकांक्षा, किसी को गिरा कर आगे बढ़ने की नहीं बल्कि साथ लेकर आगे चलने की इच्छाजिंदगी में दोहरा पन नहीं बल्कि सच पर टिकी ज़िन्दगी, श्रम का सम्मान इस संस्कृति का मूल होगा । इस संसार में जो भी है वह सृजन और संघर्ष का परिणाम है. सिम्मी का आंदोलन को श्रमिक संस्कृति के सचेतन निर्माण की तरफ भी ध्यान देना होगा.
इससे पहले कि हमारे बच्चे उत्सुकता वश या गलती से इस बॉयस लॉकर रूम में झांके इसका शिकार हों, हमारी बच्चियां इस संस्कृति इस बलात्कारी संस्कृति इस पूंजीवादी संस्कृति का शिकार हो हमें एक आंदोलन के तौर पूंजीवाद को उखाड़ने कि हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए.

आपको याद होगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनावों के दौरान उनका 2005 की बातचीत लीक हुई थी जिसमें वह औरतों के साथ बिना उनकी मर्जी के व्यवहार करने और बहुत ही अभद्र और अश्लील कमेंट करते हुए अपनी प्रशंसा कर रहे थे. और जब यह बातचीत वायरल हो गई तब उसको जस्टिफाई करने लगे की ये और कुछ नहीं बस एक बॉयस लॉकर रूम टाक  था, उनकी पत्नी ने भी उनका यह कहकर बचाव किया कि लड़के आखिर लड़के होते हैं, और ये असावधानी से की गई बातें थी. अमरीकी राजनीती में तूफान आया पर trump कि जीत पर इसका प्रभाव ना पद क्योंकि इस तरह कि घटनाओं का इतना सामान्यीकरण हो गया था कि विरोध करने वालों कि आवाज़ दब गयी.
इसीलिये हर ऐसी घटना पर विरोध किया जाना ज़रूरी है ताकि ऐसी घटनाओं के प्रति समाज अनुकूलित ना हो, उसमे सही गलत का विवेक जगा रहे, और संघर्ष का हौसला बुलंद रहे.